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  • होर्मुज पर नया गेमप्लान: ईरान-ओमान डील से बदल सकती है वैश्विक तेल राजनीति

    होर्मुज पर नया गेमप्लान: ईरान-ओमान डील से बदल सकती है वैश्विक तेल राजनीति



    नई दिल्ली। दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। ईरान ने इस अहम जलमार्ग की निगरानी और संचालन के लिए ओमान के साथ मिलकर नई व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत जहाजों की आवाजाही पर निगरानी, सुरक्षा और संभावित “टोल सिस्टम” जैसी व्यवस्था लागू करने की बात सामने आ रही है, जिससे ईरान को आर्थिक लाभ और क्षेत्रीय नियंत्रण दोनों मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

    ईरान का नया दांव: सुरक्षा के नाम पर कमाई का मॉडल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का कहना है कि वह इस जलमार्ग में एक स्थायी सुरक्षा ढांचा तैयार करना चाहता है, जिसमें अन्य तटीय देश भी शामिल हों। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने संकेत दिया है कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए साझा प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के पीछे सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक हित भी छिपे हैं। ईरान पहले से ही “पर्सियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी” जैसी व्यवस्था के जरिए जहाजों की निगरानी और शुल्क वसूली का मॉडल विकसित कर चुका है।

    दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन पर दबाव
    Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का परिवहन होता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा या टोल व्यवस्था सीधे वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर सकती है।

    अगर ईरान की यह योजना लागू होती है, तो इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है, क्योंकि कंपनियों को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है। पहले भी तनाव के दौरान इस मार्ग पर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को हिला दिया था।

    ओमान की भूमिका क्यों अहम?
    ईरान ने पहले भी ओमान के सामने इस तरह की संयुक्त व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उस समय इसे ठुकरा दिया गया था। अब एक बार फिर ईरान ओमान के साथ साझेदारी की कोशिश कर रहा है।

    Oman इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत संतुलित और तटस्थ भूमिका निभाता है, इसलिए उसकी भागीदारी किसी भी नए मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्य बना सकती है। हालांकि ओमान पहले ही संकेत दे चुका है कि वह किसी एक देश के नियंत्रण या एकतरफा टोल व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेगा।

    ईरान का लक्ष्य: राजस्व + रणनीतिक नियंत्रण
    विश्लेषकों के अनुसार ईरान का यह कदम दो बड़े उद्देश्यों की ओर इशारा करता है

    युद्ध और प्रतिबंधों से प्रभावित अर्थव्यवस्था के लिए नया राजस्व स्रोत

    Strait of Hormuz पर रणनीतिक पकड़ मजबूत करना

    इससे ईरान भविष्य में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाने की स्थिति में भी रह सकता है।
    भारत को कैसे मिल सकता है फायदा?
    भारत के लिए यह जलमार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रूट से आता है। अगर ईरान-ओमान के बीच कोई स्थिर और पारदर्शी व्यवस्था बनती है, तो इससे भारत को तीन बड़े फायदे मिल सकते हैं

    1. तेल आपूर्ति में स्थिरता
    अनिश्चितता कम होने से सप्लाई चेन ज्यादा सुरक्षित हो सकती है।

    2. कीमतों में उतार-चढ़ाव कम
    यदि टोल सिस्टम नियंत्रित और स्थिर रहा, तो अचानक तेल महंगा होने का जोखिम घट सकता है।

    3. रणनीतिक साझेदारी का लाभ
    Oman के साथ भारत के मजबूत रिश्ते इस पूरे सिस्टम में भारत के हितों को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत कर सकते हैं।

    Strait of Hormuz पर ईरान का नया प्रस्ताव सिर्फ एक सुरक्षा मॉडल नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम माना जा रहा है। अगर ओमान इस व्यवस्था का हिस्सा बनता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत और चुनौती—दोनों ला सकता है।

  • रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

    रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर


    नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच अमेरिका ने एक अहम कदम उठाते हुए रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों में 30 दिनों की अतिरिक्त छूट देने का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार यह राहत उन कच्चे तेल कार्गो पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं, ताकि उनकी सप्लाई बाधित न हो और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम किया जा सके।

    यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि यह “अस्थायी जनरल लाइसेंस” उन देशों के लिए राहत की तरह है, जिनकी ऊर्जा जरूरतें तत्काल हैं और जो समुद्र में फंसे तेल कार्गो पर निर्भर हैं।

    इस बीच भारत ने अपनी स्थिति एक बार फिर स्पष्ट कर दी है कि वह किसी भी अमेरिकी छूट या प्रतिबंध ढांचे पर निर्भर नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ज्वाइंट सेक्रेट्री सुजाता शर्मा ने साफ कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना न तो पहले रोका था, न छूट के दौरान रोका और न ही आगे रोकेगा। उनके मुताबिक यह निर्णय पूरी तरह से व्यावसायिक और आर्थिक जरूरतों पर आधारित है।

    सरकारी पक्ष का कहना है कि भारत की प्राथमिकता देश में ईंधन आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या मूल्य वृद्धि का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े। हाल के समय में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में तेल कंपनियों पर दबाव बना हुआ है, जिससे प्रतिदिन करोड़ों रुपये के नुकसान की स्थिति भी बनी हुई है।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से किसी भी तरह की सप्लाई बाधा देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर सीधा असर डाल सकती है। इसी कारण रूस से कच्चे तेल की खरीद को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

    आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और यह निर्भरता लगातार बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन में गिरावट और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती मांग ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में आयातित तेल देश की ऊर्जा व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    कुल मिलाकर, जहां अमेरिका वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए अस्थायी राहत दे रहा है, वहीं भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह घरेलू जरूरतों और आर्थिक वास्तविकताओं पर आधारित रहेगी।

  • होर्मुज संकट: भारत की तेल रणनीति में रूस और सऊदी की अहम भूमिका..

    होर्मुज संकट: भारत की तेल रणनीति में रूस और सऊदी की अहम भूमिका..


    नई दिल्ली :भारत का कच्चे तेल आयात रणनीति India पिछले कुछ महीनों में काफी बदल गया है। हालाँकि भारत ने रूस से तेल की खरीद कम कर दी है, लेकिन रूस अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है। फरवरी में सऊदी अरब से क्रूड की सप्लाई में 30 फीसदी की वृद्धि हुई और यह रोजाना 10 लाख बैरल के स्तर तक पहुंच गई, जो जनवरी में 7.7 लाख बैरल थी।

    ग्लोबल डेटा सर्विस प्रोवाइडर Kpler के अनुसार, पिछले कुछ सालों में सऊदी से आयात रोजाना 6-7 लाख बैरल के आसपास था, लेकिन फरवरी में यह छह साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। वहीं रूस से तेल का आयात जनवरी में 11 लाख और दिसंबर में 12 लाख बैरल था, जबकि फरवरी में यह करीब 10 लाख बैरल प्रति दिन रहा।

    पश्चिम एशिया से भारत की सप्लाई बढ़ने के कारण गल्फ क्षेत्र से आने वाले क्रूड की हिस्सेदारी इम्पोर्ट बास्केट में बढ़ी है। लेकिन ईरान संकट और होर्मुज की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से यह स्थिति अस्थिर हो गई है। भारत के पास वर्तमान में केवल 18 दिन का क्रूड स्टॉक उपलब्ध है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान संकट लंबा खिंचता है तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना होगा। रूस से अतिरिक्त सप्लाई की संभावना मौजूद है क्योंकि उसके कई जहाज समुद्र में हैं जिन्हें भारत की तरफ मोड़ा जा सकता है।

    इस बीच भारत ने होर्मुज की खाड़ी में ट्रांजिट कर रहे 25-27 लाख बैरल तेल पर भी नजर रखी है, जो ईराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आ रहा है। संकट की स्थिति में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनिंग आपूर्ति बनाए रखने के लिए रूस और सऊदी से तेल की खरीद बढ़ाना पड़ सकता है।इस रणनीति से भारत न केवल आपूर्ति संकट से निपटने में सक्षम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच स्थिरता भी बनाए रख सकेगा।