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  • वैश्विक तनाव बेअसर भारतीय दवाओं की बढ़ी मांग ,इंदौर के पीथमपुर एसईजेड ने बनाया रिकॉर्ड

    वैश्विक तनाव बेअसर भारतीय दवाओं की बढ़ी मांग ,इंदौर के पीथमपुर एसईजेड ने बनाया रिकॉर्ड


    इंदौर । वैश्विक तनाव और मिडिल ईस्ट संकट के बावजूद भारत की फार्मा इंडस्ट्री ने अपनी मजबूती एक बार फिर साबित कर दी है। मध्यप्रदेश के पीथमपुर स्थित स्पेशल इकोनॉमिक जोन की फार्मा कंपनियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जेनेरिक दवाओं के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिडिल ईस्ट संकट और व्यापारिक नीतियों में बदलाव जैसी चुनौतियां सामने हैं।

    वाणिज्यिक और उद्योग विभाग के अंतर्गत आने वाले मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम की रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच पीथमपुर एसईजेड से कुल 14302 करोड़ रुपए से अधिक का निर्यात हुआ है। यह पिछले वर्ष की तुलना में करीब 10.46 प्रतिशत अधिक है जो इस क्षेत्र की लगातार बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। खास बात यह है कि इस एसईजेड में लगभग 70 से 80 प्रतिशत कंपनियां फार्मा सेक्टर से जुड़ी हुई हैं।

    यहां निर्मित जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति दुनिया के कई बड़े बाजारों में की जा रही है जिनमें अमेरिका जर्मनी ऑस्ट्रेलिया यूनाइटेड किंगडम और खाड़ी देश शामिल हैं। इन दवाओं की बढ़ती मांग का सबसे बड़ा कारण इनकी किफायती कीमत और विश्वसनीय गुणवत्ता है। भारत में बनी जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं जिससे वैश्विक बाजार में इनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता काफी मजबूत हो जाती है।

    भारत को लंबे समय से फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता रहा है और इसका कारण यही है कि यहां कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत और बीमा कंपनियों के दबाव के चलते कई देश सस्ती दवाओं की ओर रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि भारतीय फार्मा कंपनियों को बड़े पैमाने पर ऑर्डर मिल रहे हैं।

    दिलचस्प बात यह भी है कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब भारत में कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के जरिए दवाएं बनवा रही हैं और उन्हें अपने ब्रांड नाम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच रही हैं। इससे न केवल भारतीय कंपनियों को फायदा हो रहा है बल्कि देश की निर्यात क्षमता भी लगातार बढ़ रही है।

    हालांकि इस सकारात्मक स्थिति के बीच कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और समुद्री मार्गों पर असर के कारण शिपमेंट में देरी हो रही है। कंटेनर समय पर रवाना नहीं हो पा रहे हैं जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों का असर लॉजिस्टिक्स पर पड़ता है लेकिन मांग बनी रहने के कारण निर्यात में गिरावट नहीं आई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो भारतीय जेनेरिक दवाओं का निर्यात और तेजी से बढ़ सकता है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद मेड इन इंडिया फार्मा सेक्टर वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है और आगे भी इसके विस्तार की पूरी संभावनाएं हैं।

  • फार्मा सेक्टर को मिलेगी नई ताकत! सरकार बढ़ाएगी निर्यात और सप्लाई चेन क्षमता

    फार्मा सेक्टर को मिलेगी नई ताकत! सरकार बढ़ाएगी निर्यात और सप्लाई चेन क्षमता


    नई दिल्ली।  तेलंगाना की राजधानी में फार्मास्यूटिकल्स सेक्टर पर ‘चिंतन शिविर’ का आयोजन किया गया, जिसको लेकर वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने मीडिया से बात की। इस दौरान राजेश अग्रवाल ने कहा कि ‘चिंतन शिविर’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सरकार, उद्योग और अन्य हितधारकों को एक मंच पर लाकर गहन मंथन करना है। इस पहल के तहत सेक्टर से जुड़ी चुनौतियों को समझते हुए उनके समाधान और भविष्य की स्पष्ट दिशा तय की जा रही है।

    वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि यह मंच केवल चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकार, उद्योग और अन्य संबंधित पक्षों की भूमिकाओं को स्पष्ट करते हुए ठोस रणनीति तैयार की जाती है। खासतौर पर फार्मा सेक्टर के लिए यह अहम है, क्योंकि यह भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा और तेजी से विकसित होता क्षेत्र है।

    अमेरिका द्वारा फार्मास्युटिकल सेक्टर पर लगाए गए संभावित टैरिफ को लेकर अग्रवाल ने कहा कि शुरुआती समझ के मुताबिक भारतीय जेनेरिक दवाएं इन टैरिफ से बाहर हैं। ऐसे में भारत के फार्मा निर्यात पर बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है। हालांकि, कुछ इनोवेटिव या पेटेंटेड दवाओं पर सीमित प्रभाव पड़ सकता है।

    उन्होंने यह भी बताया कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड फ्रेमवर्क एग्रीमेंट पर बातचीत जारी है। यदि किसी भी सेगमेंट में भारतीय उद्योग को दिक्कत आती है, तो उसे इस समझौते के तहत उठाया जाएगा और समाधान खोजा जाएगा।

    अग्रवाल ने आगे कहा कि भारत का फार्मा सेक्टर मजबूत स्थिति में है, और केंद्र सरकार इसके निर्यात को बढ़ाने के लिए लगातार नए बाजारों और उत्पादों पर ध्यान दे रही है। पिछले 5-6 वर्षों में भारत ने 9 फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) किए हैं, जो करीब 38 अर्थव्यवस्थाओं को कवर करते हैं। इनका कुल आर्थिक आकार 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है।

    अग्रवाल के मुताबिक, ये समझौते भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खोलेंगे, बाजारों में विविधता लाएंगे और घरेलू उद्योग को मजबूत करेंगे। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव को लेकर उन्होंने कहा कि मौजूदा संकट अभी कुछ ही हफ्तों पुराना है, इसलिए इसके दीर्घकालिक प्रभाव का अनुमान लगाना मुश्किल है। हालांकि, सरकार इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए लंबी अवधि की रणनीति तैयार कर रही है।

    वाणिज्य सचिव ने कोविड-19 महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसी बाहरी चुनौतियां समय-समय पर आती रहती हैं, लेकिन भारत ने हर बार इनसे निपटते हुए आगे बढ़ने की क्षमता दिखाई है।

    अग्रवाल के अनुसार, करीब 60 अरब डॉलर के आकार वाला भारत का फार्मा उद्योग अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत, आधुनिक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार है। सरकार का लक्ष्य है कि बायोसिमिलर, बायोलॉजिक्स और इनोवेटिव दवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों में भारत नेतृत्वकारी भूमिका निभाए।

    अग्रवाल ने कहा कि फिलहाल दवाओं की कीमतों पर किसी बड़े असर के संकेत नहीं हैं। लेकिन अगर भविष्य में कोई समस्या आती है, तो सरकार और उद्योग मिलकर उसका समाधान निकालेंगे।

    वाणिज्य सचिव ने जोर देकर कहा कि वर्तमान समय में सबसे बड़ी प्राथमिकता यह है कि दवाओं की सप्लाई किसी भी हाल में बाधित न हो। सरकार और उद्योग मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि घरेलू और वैश्विक स्तर पर दवाओं की उपलब्धता बनी रहे और भारत का फार्मा सेक्टर अपनी विकास की राह पर आगे बढ़ता रहे।