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  • क्यों खास हैं नाग? कालसर्प दोष, अश्लेषा नक्षत्र और नागयज्ञ से जुड़ी है हजारों साल पुरानी परंपरा

    क्यों खास हैं नाग? कालसर्प दोष, अश्लेषा नक्षत्र और नागयज्ञ से जुड़ी है हजारों साल पुरानी परंपरा


    नई दिल्ली । सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। भारतीय परंपरा में नागों का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है बल्कि ज्योतिष पौराणिक कथाओं लोकविश्वास और प्रकृति से भी उनका गहरा संबंध बताया गया है। खेतों में फसलों की रक्षा करने वाले सांपों से लेकर भगवान शिव के गले में विराजमान नाग तक भारतीय संस्कृति में सर्प को कई अलग अलग रूपों में देखा गया है। यही वजह है कि नाग पंचमी के अवसर पर नाग पूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

    ज्योतिष की बात करें तो सर्पों का संबंध राहु से जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार नवग्रहों में राहु के अधिदेवता काल और प्रतिदेवता सर्प माने जाते हैं। इसी कारण राहु से जुड़े दोषों की शांति के लिए सर्प और नाग देवता की पूजा का विधान बताया जाता है। कुंडली में कालसर्प दोष होने की स्थिति में भी ज्योतिषीय परंपराओं में नाग पूजा और उससे जुड़े उपाय बताए जाते हैं। हालांकि कालसर्प दोष को लेकर ज्योतिषियों के बीच अलग अलग मत भी पाए जाते हैं।

    नागों का संबंध केवल ग्रहों तक ही सीमित नहीं है। 27 नक्षत्रों में अश्लेषा नक्षत्र के देवता भी सर्प माने गए हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में अश्लेषा का संबंध नाग शक्ति से जोड़ा जाता है। इसी तरह प्राचीन ज्योतिष परंपराओं में नक्षत्रों के वाहनों और प्राकृतिक घटनाओं के बीच संबंध जोड़कर वर्षा के अनुमान लगाने की परंपरा भी बताई गई है। बारिश के मौसम में आकाशीय घटनाओं को समझने में इन प्रतीकों का उपयोग प्राचीन काल से होता रहा है।

    भारतीय पौराणिक कथाओं में नागों की भूमिका और भी व्यापक है। रामायण में लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है जबकि महाभारत की परंपरा में बलराम का संबंध भी शेषनाग से जोड़ा जाता है। रामायण में मेघनाद की पत्नी सुलोचना को नागकन्या बताया गया है। वहीं सुरसा का उल्लेख नागों की माता के रूप में मिलता है। इन कथाओं में नाग केवल एक जीव के रूप में नहीं बल्कि शक्ति और रहस्य के प्रतीक के तौर पर भी दिखाई देते हैं।

    महाभारत में भी नागों की कहानी बेहद महत्वपूर्ण है। अर्जुन का विवाह नागकन्या उलूपी से हुआ था। आगे चलकर राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डंसने से हुई। परीक्षित की मृत्यु से क्रोधित उनके पुत्र जन्मेजय ने नागों के विनाश के लिए नागयज्ञ शुरू कराया। कहा जाता है कि इस यज्ञ में बड़ी संख्या में नाग अग्नि में गिरने लगे थे। इसी दौरान ऋषि जरत्कारु के पुत्र आस्तीक ने यज्ञ को रुकवाया और नागों की रक्षा की। इस कथा को नाग पंचमी की धार्मिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है।

    नागों का उल्लेख कृष्ण की कथाओं में भी मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा भारतीय लोकजीवन में बेहद प्रसिद्ध है। वहीं महाभारत में भीम के नागलोक पहुंचने और वहां उन्हें असाधारण शक्ति प्राप्त होने का वर्णन मिलता है। मेघनाद द्वारा राम और लक्ष्मण को नागपाश में बांधने की कथा भी नागों के महत्व को दर्शाती है।

    भारतीय परंपरा में नागों को केवल भय और विष का प्रतीक नहीं माना गया बल्कि उन्हें शक्ति संरक्षण उर्वरता और प्रकृति से जोड़कर भी देखा गया है। कश्मीर का अनंतनाग भी नाग परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण नाम है। इतिहास और लोककथाओं में इस क्षेत्र का संबंध नागों से बताया गया है।

    इस तरह कालसर्प दोष की ज्योतिषीय मान्यताओं से लेकर जन्मेजय के नागयज्ञ तक और कृष्ण की कालिया नाग कथा से लेकर शेषनाग की पौराणिक अवधारणा तक नाग भारतीय संस्कृति के अनेक स्तरों पर दिखाई देते हैं। यही वजह है कि नाग पंचमी केवल सांपों की पूजा का पर्व नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता में प्रकृति पौराणिक परंपरा और धार्मिक प्रतीकों के बीच गहरे संबंध को समझने का अवसर भी है।

  • आज का पंचांग: बसंत पंचमी पर सरस्वती वंदना का शुभ संयोग..

    आज का पंचांग: बसंत पंचमी पर सरस्वती वंदना का शुभ संयोग..


    नई दिल्ली :आज शुक्रवार 23 जनवरी 2026 को माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के साथ बसंत पंचमी का पावन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन ज्ञान विद्या संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी से ऋतुओं के परिवर्तन की शुरुआत होती है और जीवन में नई ऊर्जा सृजनशीलता और सकारात्मकता का प्रवेश होता है। सूर्य उत्तरायण में स्थित है और शिशिर ऋतु का प्रभाव बना हुआ है जिससे आज के दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

    तिथि वार और संवत
    आज माघ शुक्ल पंचमी तिथि रात्रि 1 बजकर 47 मिनट तक रहेगी इसके बाद षष्ठी तिथि का आरंभ होगा।
    वार शुक्रवार है।
    विक्रम संवत 2082
    शक संवत 1947
    राष्ट्रीय मिति माघ 03
    हिजरी तारीख शब्बन 03 1447
    सौर मास माघ मास प्रविष्टे 10

    नक्षत्र योग और करण
    दिन की शुरुआत पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में होगी जो दोपहर 2 बजकर 33 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके बाद उत्तराभाद्रपद नक्षत्र आरंभ होगा।
    योग की बात करें तो परिधि योग अपराह्न 3 बजकर 59 मिनट तक रहेगा इसके पश्चात शिव योग का शुभ संयोग बनेगा।
    करण बव करण दोपहर 2 बजकर 8 मिनट तक रहेगा इसके बाद कौलव करण प्रभावी होगा।

    चंद्रमा की स्थिति
    चंद्रमा सुबह 8 बजकर 34 मिनट तक कुंभ राशि में रहेगा इसके बाद गुरु की राशि मीन में प्रवेश करेगा। इससे भावनात्मक संतुलन आध्यात्मिक झुकाव और रचनात्मक सोच में वृद्धि देखी जा सकती है। बसंत पंचमी पर चंद्रमा का मीन राशि में गोचर सरस्वती आराधना के लिए विशेष शुभ माना गया है।

    सूर्य समय
    सूर्योदय सुबह 7 बजकर 13 मिनट
    सूर्यास्त शाम 5 बजकर 52 मिनट

    आज के पर्व
    बसंत पंचमी
    श्री पंचमी
    सरस्वती पूजा
    लक्ष्मी पूजन
    आज विद्यारंभ पुस्तक पूजन और पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से मानी जाती है।

    शुभ मुहूर्त
    ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:11 से 6:04
    विजय मुहूर्त दोपहर 2:08 से 2:52
    गोधूलि बेला शाम 5:42 से 6:08
    निशीथ काल रात्रि 11:54 से 12:47

    अशुभ समय
    राहुकाल सुबह 10:30 से 12:00
    गुलिक काल सुबह 7:30 से 9:00
    यमगंड दोपहर 3:30 से 4:30
    दुर्मुहूर्त सुबह 9:06 से 9:50
    पंचक पूरे दिन प्रभावी रहेगा।

    अमृत काल
    सुबह 9:53 से 11:13 तक

    धार्मिक दृष्टि से आज का दिन पूजा साधना और शुभ संकल्प के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की आराधना से बुद्धि विवेक स्मरण शक्ति और विद्या में वृद्धि होने का विश्वास किया जाता है।

    आज शुक्रवार 23 जनवरी 2026 को माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के साथ बसंत पंचमी का पावन पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन ज्ञान विद्या संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी से ऋतुओं के परिवर्तन की शुरुआत होती है और जीवन में नई ऊर्जा सृजनशीलता और सकारात्मकता का प्रवेश होता है। सूर्य उत्तरायण में स्थित है और शिशिर ऋतु का प्रभाव बना हुआ है जिससे आज के दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

    तिथि वार और संवत
    आज माघ शुक्ल पंचमी तिथि रात्रि 1 बजकर 47 मिनट तक रहेगी इसके बाद षष्ठी तिथि का आरंभ होगा।
    वार शुक्रवार है।
    विक्रम संवत 2082
    शक संवत 1947
    राष्ट्रीय मिति माघ 03
    हिजरी तारीख शब्बन 03 1447
    सौर मास माघ मास प्रविष्टे 10

    नक्षत्र योग और करण
    दिन की शुरुआत पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में होगी जो दोपहर 2 बजकर 33 मिनट तक प्रभावी रहेगा। इसके बाद उत्तराभाद्रपद नक्षत्र आरंभ होगा।
    योग की बात करें तो परिधि योग अपराह्न 3 बजकर 59 मिनट तक रहेगा इसके पश्चात शिव योग का शुभ संयोग बनेगा।
    करण बव करण दोपहर 2 बजकर 8 मिनट तक रहेगा इसके बाद कौलव करण प्रभावी होगा।

    चंद्रमा की स्थिति
    चंद्रमा सुबह 8 बजकर 34 मिनट तक कुंभ राशि में रहेगा इसके बाद गुरु की राशि मीन में प्रवेश करेगा। इससे भावनात्मक संतुलन आध्यात्मिक झुकाव और रचनात्मक सोच में वृद्धि देखी जा सकती है। बसंत पंचमी पर चंद्रमा का मीन राशि में गोचर सरस्वती आराधना के लिए विशेष शुभ माना गया है।

    सूर्य समय
    सूर्योदय सुबह 7 बजकर 13 मिनट
    सूर्यास्त शाम 5 बजकर 52 मिनट

    आज के पर्व
    बसंत पंचमी
    श्री पंचमी
    सरस्वती पूजा
    लक्ष्मी पूजन
    आज विद्यारंभ पुस्तक पूजन और पीले वस्त्र धारण करने की परंपरा विशेष रूप से मानी जाती है।

    शुभ मुहूर्त
    ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5:11 से 6:04
    विजय मुहूर्त दोपहर 2:08 से 2:52
    गोधूलि बेला शाम 5:42 से 6:08
    निशीथ काल रात्रि 11:54 से 12:47

    अशुभ समय
    राहुकाल सुबह 10:30 से 12:00
    गुलिक काल सुबह 7:30 से 9:00
    यमगंड दोपहर 3:30 से 4:30
    दुर्मुहूर्त सुबह 9:06 से 9:50
    पंचक पूरे दिन प्रभावी रहेगा।

    अमृत काल
    सुबह 9:53 से 11:13 तक

    धार्मिक दृष्टि से आज का दिन पूजा साधना और शुभ संकल्प के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की आराधना से बुद्धि विवेक स्मरण शक्ति और विद्या में वृद्धि होने का विश्वास किया जाता है।