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  • मैराथन में भारत की ऐतिहासिक वापसी सावन बरवाल ने जीता सिल्वर बनाया नया नेशनल रिकॉर्ड

    मैराथन में भारत की ऐतिहासिक वापसी सावन बरवाल ने जीता सिल्वर बनाया नया नेशनल रिकॉर्ड


    नई दिल्ली। एशियन गेम्स 2026 में भारतीय एथलेटिक्स के लिए 26 सितंबर का दिन बेहद खास बन गया। नागोया में भारत के लंबी दूरी के धावक सावन बरवाल ने पुरुष मैराथन में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। उनके इस प्रदर्शन के साथ एशियन गेम्स की मैराथन स्पर्धा में भारत का 44 साल लंबा पदक का इंतजार खत्म हो गया। सावन ने 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड का समय निकालकर रेस पूरी की। यह उनका पर्सनल बेस्ट प्रदर्शन होने के साथ राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बन गया।

    मैराथन के फाइनल में जापान के इचिटाका यामाशिता ने 2 घंटे 10 मिनट 49 सेकंड के समय के साथ गोल्ड मेडल अपने नाम किया। सावन उनसे 48 सेकंड पीछे रहे। चीन के पेइयू फेंग ने 2 घंटे 12 मिनट 13 सेकंड के समय के साथ ब्रॉन्ज मेडल जीता। सावन ने रेस के शुरुआती हिस्से में जिस तरह का प्रदर्शन किया उससे साफ था कि वह पदक की मजबूत दावेदारी पेश कर रहे हैं।

    रेस की शुरुआत से ही सावन ने अपनी गति बनाए रखी। 5 किलोमीटर के पड़ाव पर वह दूसरे स्थान पर थे लेकिन 10 किलोमीटर तक पहुंचते पहुंचते उन्होंने बढ़त हासिल कर ली। 15 किलोमीटर और 20 किलोमीटर के पड़ाव पर भी सावन सबसे आगे बने रहे। हाफ मैराथन यानी 21.1 किलोमीटर की दूरी उन्होंने 1 घंटे 5 मिनट 54 सेकंड में पूरी की और उस समय भी वह रेस में आगे चल रहे थे।

    25 किलोमीटर तक सावन की बढ़त कायम रही और उन्होंने 1 घंटे 18 मिनट 19 सेकंड का समय दर्ज किया। इसके बाद जापान के यामाशिता ने रफ्तार बढ़ाई और 30 किलोमीटर के आसपास सावन को पीछे छोड़ दिया। हालांकि भारतीय धावक ने हार नहीं मानी और 35 किलोमीटर के पड़ाव तक फिर से बढ़त हासिल कर ली। रेस के अंतिम हिस्से में मुकाबला बेहद कड़ा रहा लेकिन 40 किलोमीटर के बाद यामाशिता ने निर्णायक बढ़त बना ली। अंत में सावन ने सिल्वर मेडल के साथ रेस पूरी की।

    इस पदक का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि भारत ने एशियन गेम्स में इससे पहले पुरुष मैराथन का पदक 1982 के दिल्ली एशियन गेम्स में जीता था। उससे पहले 1951 के एशियन गेम्स में भारत को मैराथन में गोल्ड और ब्रॉन्ज मेडल मिले थे। सावन का नागोया सिल्वर भारत के लिए 44 साल बाद इस स्पर्धा में आया पदक है। खास बात यह भी है कि 1982 के बाद यह पहला मौका है जब भारत ने देश के बाहर आयोजित एशियन गेम्स की मैराथन में पदक जीता है।

    सावन के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह इससे पहले राष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं। इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम मैराथन में उन्होंने 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड का समय निकालकर शिवनाथ सिंह के 48 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा था। शिवनाथ सिंह ने 1978 में 2 घंटे 12 मिनट का रिकॉर्ड बनाया था। अब नागोया में सावन ने अपने ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड में और सुधार कर दिया।

    भारत के दूसरे धावक कार्तिक करकेरा भी इस फाइनल में उतरे थे। वह 19 धावकों के बीच 17वें स्थान पर रहे। वहीं सावन बरवाल का सिल्वर भारतीय एथलेटिक्स के लिए एक बड़ी उपलब्धि बन गया है।

  • एशियन गेम्स मिस करने का दर्द छलका नीरज चोपड़ा का भावुक पोस्ट बोले दोस्त टखने के बारे में नहीं पूछते

    एशियन गेम्स मिस करने का दर्द छलका नीरज चोपड़ा का भावुक पोस्ट बोले दोस्त टखने के बारे में नहीं पूछते


    नई दिल्ली। भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा इस समय एशियन गेम्स 2026 में मैदान पर उतरने के बजाय बाहर से भारतीय खिलाड़ियों का हौसला बढ़ा रहे हैं। टखने की लिगामेंट इंजरी के कारण नीरज को इस प्रतियोगिता से हटना पड़ा है। दो बार के ओलंपिक पदक विजेता और एशियन गेम्स के दो बार के चैंपियन नीरज के लिए यह फैसला आसान नहीं रहा। अब उन्होंने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट के जरिए बताया है कि भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका गंवाना उन्हें कितना परेशान कर रहा है।

    नीरज ने LinkedIn पर लिखा कि एशियन गेम्स उनके करियर के सबसे खास आयोजनों में से एक रहे हैं। उन्होंने 2018 जकार्ता और 2023 हांगझोऊ एशियन गेम्स में जैवलिन थ्रो का गोल्ड मेडल जीता था। ऐसे में इस बार प्रतियोगिता से बाहर रहना उनके लिए भावनात्मक रूप से काफी मुश्किल है। उन्होंने नागोया पहुंची भारतीय टीम को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वह खिलाड़ियों के साथ चलना और प्रतियोगिता का हिस्सा बनना मिस करेंगे लेकिन बाहर से टीम को अपना समर्थन देते रहेंगे।

    नीरज ने बताया कि वह टखने की लिगामेंट चोट से जूझ रहे हैं। काफी विचार करने के बाद उन्हें एशियन गेम्स में नहीं उतरने का फैसला स्वीकार करना पड़ा। उनके मुताबिक किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में देश की उम्मीदों के साथ मैदान पर उतरना सम्मान की बात है लेकिन उस मौके से दूर रहना उन्हें तकलीफ देता है। चोट के कारण वह डायमंड लीग फाइनल से भी बाहर हो चुके हैं। उनकी हालिया बड़ी प्रतियोगिता लॉजेन डायमंड लीग रही थी जहां वह श्रीलंका के रुमेश पथिरागे के बाद दूसरे स्थान पर रहे थे।

    नीरज के करियर में चोटों के कारण पहले भी ब्रेक आया है। 2019 में उन्हें दाएं हाथ की कोहनी की सर्जरी करानी पड़ी थी। 2022 में ग्रोइन इंजरी के कारण वह कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा नहीं ले सके थे। 2023 में मसल स्ट्रेन ने उनकी तैयारियों को प्रभावित किया जबकि 2024 में एडडक्टर की परेशानी के कारण उन्होंने एक प्रतियोगिता से नाम वापस लिया था। अब टखने की चोट ने उनके 2026 सीजन को प्रभावित किया है।

    इस पूरे दौर में नीरज ने दोस्तों के साथ को खास महत्व दिया है। उन्होंने बताया कि खिलाड़ी लंबे समय तक ट्रेनिंग यात्रा और प्रतियोगिताओं के कारण घर से दूर रहते हैं। ऐसे में आसपास के लोगों का साथ उन्हें सकारात्मक और जमीन से जुड़ा रखने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि मुश्किल समय में हमेशा सलाह की जरूरत नहीं होती। कई बार किसी दोस्त का फोन करना और खेल या चोट से अलग किसी विषय पर बातचीत करना ही काफी होता है।

    नीरज ने बताया कि उनके कुछ दोस्त जानते हैं कि वह इस समय अच्छी जगह पर नहीं हैं लेकिन फोन करने पर वे उनसे टखने के बारे में सवाल नहीं करते। वे सामान्य बातें करते हैं हंसते हैं पुरानी यादें साझा करते हैं और मिलने की योजनाएं बनाते हैं। नीरज के मुताबिक ऐसी बातचीत उन्हें याद दिलाती है कि जिंदगी सिर्फ अगली प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है। उनका यह संदेश ऐसे समय में आया है जब भारतीय दल एशियन गेम्स में अपनी चुनौती पेश कर रहा है और नीरज मैदान से दूर रहकर टीम का समर्थन कर रहे हैं।

  • नीरज चोपड़ा ने 14 महीने बाद फेंका 88 मीटर पार भाला, जीत से 9 सेंटीमीटर दूर; श्रीलंकाई स्टार ने फिर हराया

    नीरज चोपड़ा ने 14 महीने बाद फेंका 88 मीटर पार भाला, जीत से 9 सेंटीमीटर दूर; श्रीलंकाई स्टार ने फिर हराया


    नई दिल्ली। भारत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने लुसाने डायमंड लीग में शानदार वापसी करते हुए 88.05 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो किया। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में यह दूरी हासिल की और कुछ समय के लिए प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। हालांकि श्रीलंका के युवा स्टार रुमेश थरंगा पथिरागे ने तीसरे प्रयास में 88.14 मीटर का थ्रो कर नीरज को पीछे छोड़ दिया। इस तरह नीरज को रजत पदक से संतोष करना पड़ा और वह गोल्ड से सिर्फ 9 सेंटीमीटर दूर रह गए।

    लुसाने में नीरज का प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि यह इस सीजन में उनका सबसे लंबा थ्रो है। इससे पहले उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था और वह 2026 में 88 मीटर के आंकड़े को पार नहीं कर पाए थे। लुसाने में 88.05 मीटर का प्रयास उनके लिए बड़ा आत्मविश्वास बढ़ाने वाला प्रदर्शन माना जा रहा है। यह जून 2025 में पेरिस डायमंड लीग में 88.16 मीटर फेंकने के बाद उनका एक साल से अधिक समय में सबसे लंबा थ्रो भी रहा।

    मुकाबले में नीरज ने शुरुआत 83.54 मीटर के थ्रो से की थी। इसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने अपना प्रदर्शन अचानक काफी बेहतर किया और 88.05 मीटर तक भाला पहुंचाकर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। इस थ्रो के बाद नीरज की जीत लगभग तय होती नजर आ रही थी लेकिन रुमेश पथिरागे ने कुछ ही देर बाद शानदार जवाब दिया। श्रीलंकाई खिलाड़ी ने तीसरे प्रयास में 88.14 मीटर का थ्रो किया और महज 9 सेंटीमीटर के अंतर से नीरज को दूसरे स्थान पर धकेल दिया।

    रुमेश पथिरागे के लिए यह जीत बेहद खास रही। 23 वर्षीय श्रीलंकाई खिलाड़ी इस समय शानदार फॉर्म में चल रहे हैं और इस सीजन में नीरज के खिलाफ लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लुसाने की जीत से पहले भी पथिरागे ने नीरज को दो अहम मुकाबलों में पीछे छोड़ा था। दोनों की प्रतिद्वंद्विता अब जैवलिन थ्रो में एक नई कहानी बनती नजर आ रही है।

    ग्रेनेडा के एंडरसन पीटर्स ने 86.69 मीटर के सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। उन्होंने यह दूरी अपने छठे और आखिरी प्रयास में दर्ज की। त्रिनिदाद और टोबैगो के मौजूदा विश्व चैंपियन केशॉर्न वालकॉट 83.71 मीटर के साथ चौथे स्थान पर रहे। इस तरह नीरज और पथिरागे के बीच मुकाबला बाकी खिलाड़ियों की तुलना में काफी आगे रहा।

    नीरज के लिए लुसाने का यह प्रदर्शन भले ही गोल्ड में नहीं बदल सका लेकिन 88 मीटर के पार पहुंचना उनके लिए बड़ी सकारात्मक खबर है। 2026 सीजन की शुरुआत में संघर्ष करने के बाद उन्होंने अब अपनी पुरानी लय की झलक दिखाई है। इससे आगे होने वाली बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए उनकी तैयारी को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। नीरज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस प्रदर्शन को लगातार बनाए रखना और आने वाले मुकाबलों में 90 मीटर के आंकड़े के करीब पहुंचना होगी।

    लुसाने डायमंड लीग का नतीजा नीरज के लिए एक करीबी हार जरूर रहा लेकिन उनका 88.05 मीटर का थ्रो बताता है कि भारतीय स्टार अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म की ओर लौट रहे हैं। दूसरी तरफ पथिरागे की लगातार चुनौती ने पुरुष जैवलिन थ्रो में मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है। नीरज अब इस प्रदर्शन से मिले आत्मविश्वास के साथ सीजन के अगले बड़े मुकाबलों में नजर आएंगे।

  • तीन पदकों के साथ भारत ने रचा शानदार अभियान, पूजा सिंह का हाई जंप फाइनल में नहीं चला जलवा

    तीन पदकों के साथ भारत ने रचा शानदार अभियान, पूजा सिंह का हाई जंप फाइनल में नहीं चला जलवा


    नई दिल्ली । यूजीन में आयोजित वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप में भारत का अभियान तीन पदकों के साथ समाप्त हुआ। भारतीय खिलाड़ियों ने प्रतियोगिता में दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। हालांकि नेशनल सीनियर रिकॉर्ड होल्डर पूजा सिंह से महिलाओं की हाई जंप स्पर्धा में बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन फाइनल में उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा और उन्हें सातवें स्थान से संतोष करना पड़ा।

    19 वर्षीय पूजा सिंह इस प्रतियोगिता में मजबूत दावेदार के तौर पर उतरी थीं। उन्होंने इसी साल की शुरुआत में 1.93 मीटर की छलांग लगाकर नेशनल सीनियर रिकॉर्ड बनाया था। इसके अलावा मई में एशियन अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी पूजा ने 1.93 मीटर की ऊंचाई पार करते हुए गोल्ड मेडल जीता था। शानदार फॉर्म के कारण उनसे वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप में भी पदक की उम्मीद की जा रही थी।

    महिलाओं की हाई जंप फाइनल में पूजा सिंह ने 1.84 मीटर की ऊंचाई सफलतापूर्वक पार की। इसके बाद उन्होंने 1.87 मीटर की ऊंचाई पार करने की तीन कोशिशें कीं, लेकिन तीनों प्रयास असफल रहे। इस कारण उन्हें सातवें स्थान पर प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ा। ऑस्ट्रेलिया की इजोबेल लुइसन-रो ने 1.92 मीटर की छलांग लगाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। हंगरी की लिलियाना बाटोरी ने सिल्वर और स्पेन की एताना अलोंसो ने ब्रॉन्ज मेडल जीता।

    पूजा का इस सीजन में प्रदर्शन हालांकि बेहद प्रभावशाली रहा है। एशियन अंडर-20 चैंपियनशिप में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ गोल्ड जीतने के अलावा वह सीनियर एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप की मौजूदा चैंपियन भी हैं। ऐसे में वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप में पदक से चूकना उनके लिए निराशाजनक जरूर रहा, लेकिन उनका लगातार बेहतर प्रदर्शन भारतीय एथलेटिक्स के लिए सकारात्मक संकेत है।

    भारत की महिला 4×400 मीटर रिले टीम का प्रदर्शन भी फाइनल में उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। भूमिका नेहते, तहुरा खातून, तनु चौधरी और थिया अरुमुगम की भारतीय टीम ने 3 मिनट 45.28 सेकंड का समय दर्ज किया और फाइनल में आखिरी स्थान पर रही। अमेरिका ने 3 मिनट 29.15 सेकंड के समय के साथ गोल्ड मेडल जीता। ऑस्ट्रेलिया को 3 मिनट 31.39 सेकंड के साथ सिल्वर और ग्रेट ब्रिटेन को 3 मिनट 32.08 सेकंड के साथ ब्रॉन्ज मेडल मिला।

    भारत के तीन पदकों में दो सिल्वर और एक ब्रॉन्ज शामिल रहे। आशीष यादव ने पुरुषों की जैवलिन थ्रो में सिल्वर मेडल जीतकर भारत के अभियान की शुरुआत की। इसके बाद बसंत कुमार मेघवाल ने पुरुषों की हाई जंप में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। पुरुषों की लॉन्ग जंप में शाहनवाज खान ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर भारत की पदक संख्या तीन तक पहुंचाई।

    इस प्रदर्शन के साथ भारत ने वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप का समापन तीन पदकों के साथ किया। खास बात यह है कि भारत ने 2021 और 2022 के संस्करणों में जितने कुल पदक जीते थे, इस बार भी उतने ही पदक हासिल किए। पूजा सिंह भले ही अपने रिकॉर्ड प्रदर्शन को पदक में नहीं बदल सकीं, लेकिन युवा भारतीय एथलीटों का यह प्रदर्शन आने वाले वर्षों के लिए उम्मीद जगाता है।

  • तेजस शिरसे ने रचा इतिहास, 110 मीटर हर्डल्स में बनाया नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड; कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट लगभग पक्का

    तेजस शिरसे ने रचा इतिहास, 110 मीटर हर्डल्स में बनाया नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड; कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट लगभग पक्का


    नई दिल्ली । भारतीय एथलेटिक्स को शनिवार को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई, जब युवा हर्डलर Tejas Shirse ने पुरुषों की 110 मीटर हर्डल्स स्पर्धा में नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर इतिहास रच दिया। लुधियाना में आयोजित Indian Athletics Series 9 के दौरान तेजस ने 13.27 सेकंड का समय निकालते हुए न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि अपने ही पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।

    24 वर्षीय तेजस शिरसे ने इससे पहले 2024 में 13.41 सेकंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। अब उन्होंने अपने प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार करते हुए 13.27 सेकंड का समय दर्ज किया है। यह उपलब्धि भारतीय ट्रैक एवं फील्ड इतिहास के सर्वश्रेष्ठ स्प्रिंट-हर्डल प्रदर्शनों में गिनी जा रही है। खास बात यह है कि उनका यह प्रदर्शन Athletics Federation of India द्वारा निर्धारित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 क्वालिफिकेशन मार्क 13.39 सेकंड से भी बेहतर रहा।

    प्रतियोगिता के दौरान तेजस ने शुरुआत से ही अपना दबदबा बनाए रखा। ‘बी’ फाइनल में उन्होंने ब्लॉक्स से शानदार शुरुआत की और शुरुआती चरण में बढ़त हासिल कर ली। अंतिम हर्डल से हल्का संपर्क होने के बावजूद उन्होंने अपनी गति कम नहीं होने दी और शानदार अंदाज में फिनिश लाइन पार की। उनका समय देखते ही स्टेडियम में मौजूद दर्शकों और अधिकारियों ने उनकी उपलब्धि का स्वागत किया। इस रेस में Krishik M 13.55 सेकंड के समय के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

    तेजस का यह प्रदर्शन हाल के महीनों में उनकी लगातार प्रगति को भी दर्शाता है। पिछले महीने रांची में आयोजित Federation Cup Athletics Championships में उन्होंने 13.50 सेकंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता था। अब 13.27 सेकंड का समय उन्हें वर्ष 2026 की महाद्वीपीय रैंकिंग में शीर्ष खिलाड़ियों के बीच ला खड़ा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनका प्रदर्शन इस समय कॉन्टिनेंटल सूची में छठे स्थान पर है।

    भारतीय एथलेटिक्स के लिहाज से यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यदि तेजस का चयन कॉमनवेल्थ गेम्स टीम में होता है तो वह 2014 के बाद इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भाग लेने वाले पहले भारतीय पुरुष हर्डलर बन सकते हैं। इससे पहले Siddhanth Thingalaya ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

    दूसरी ओर, प्रतियोगिता में कुछ खिलाड़ियों के लिए निराशाजनक नतीजे भी सामने आए। पुरुषों की 800 मीटर दौड़ में Mohammed Afsal अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। उन्होंने 1 मिनट 47 सेकंड का समय निकाला, जो कॉमनवेल्थ गेम्स क्वालिफिकेशन मानक 1 मिनट 45 सेकंड से पीछे रहा। ऐसे में उनके चयन की संभावनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।

    जैवलिन थ्रो स्पर्धा में भी खिलाड़ियों के बीच कॉमनवेल्थ गेम्स टीम में जगह बनाने की होड़ देखने को मिली। Sachin Yadav चोट के कारण प्रतियोगिता से बाहर रहे, जबकि दो बार के ओलंपिक पदक विजेता Neeraj Chopra अभी पूरी तरह फिटनेस हासिल करने की प्रक्रिया में हैं। ऐसे में Rohit Yadav, Shivam Lohakare और Kishore Kumar Jena जैसे खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का अवसर खुला हुआ है।

    तेजस शिरसे की इस उपलब्धि ने भारतीय एथलेटिक्स को नई ऊर्जा दी है और आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए उम्मीदें भी बढ़ा दी हैं।

  • भारतीय एथलेटिक्स में नया नाम, सावन बरवाल का संघर्ष और सफलता की कहानी

    भारतीय एथलेटिक्स में नया नाम, सावन बरवाल का संघर्ष और सफलता की कहानी


    नई दिल्ली। भारत में लंबे समय तक मैराथन और लंबी दूरी की दौड़ को क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेलों की तरह पहचान नहीं मिल पाई, लेकिन हिमाचल प्रदेश के धावक Sawan Barwal ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से इस सोच को बदलने की कोशिश की है। हाल ही में उन्होंने देश का 48 साल पुराना राष्ट्रीय मैराथन रिकॉर्ड तोड़कर भारतीय एथलेटिक्स में नया इतिहास रच दिया।

    हिमाचल की जोगिंदर नगर की पहाड़ियों से निकलकर भारतीय सेना में एथलीट बनने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित सुविधाओं और संसाधनों की कमी के बावजूद सावन ने लगातार अभ्यास और अनुशासन के बल पर खुद को शीर्ष स्तर के धावकों में स्थापित किया।

    अपने सफर पर बात करते हुए सावन कहते हैं कि पहाड़ों में पले-बढ़े होने से उन्हें सहनशक्ति और मानसिक मजबूती मिली। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण ने उनकी क्षमता को निखारा और बाद में प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की।

    उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन बाद में जब उन्हें एक्सीलेंस सेंटर में बेहतर ट्रेनिंग, रिकवरी और न्यूट्रिशन की सुविधाएं मिलीं तो उनका प्रदर्शन और बेहतर हुआ। सेना में शामिल होने के बाद उन्हें स्थिरता और पेशेवर माहौल मिला, जिससे उनका करियर आगे बढ़ा।

    सावन के अनुसार, लंबी दूरी की दौड़ सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक खेल भी है। हर दिन लक्ष्य तय करना, समय के अनुसार प्रशिक्षण लेना और लगातार सुधार की कोशिश ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। वे कहते हैं कि “हमें ट्रेनिंग की रुकावटों को तोड़ना होगा” और लगातार अनुशासन बनाए रखना ही सफलता की कुंजी है।

    उनके करियर में परिवार का भी अहम योगदान रहा है। उनके बड़े भाई ने आर्थिक रूप से सहायता कर उन्हें स्पोर्ट्स शूज़, स्पाइक्स और अन्य जरूरी उपकरण उपलब्ध कराए। यह सहयोग उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ, खासकर उस समय जब वे आर्थिक रूप से स्थिर नहीं थे।

    चोट और कठिन दौरों पर बात करते हुए सावन ने स्वीकार किया कि 2023 में लगी गंभीर चोट के बाद छह से सात महीने तक उनका करियर अनिश्चितता में रहा। उस समय उन्होंने खुद पर संदेह भी किया, लेकिन धैर्य और निरंतर प्रयास ने उन्हें वापसी का रास्ता दिखाया। सावन का मानना है कि भारत में अब लंबी दूरी की दौड़ को पहले की तुलना में ज्यादा पहचान मिल रही है। युवाओं की भागीदारी बढ़ी है और मैराथन में प्रतिस्पर्धा का स्तर भी लगातार ऊपर जा रहा है।

    उनकी कहानी यह साबित करती है कि सही लक्ष्य, मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर अभ्यास से कोई भी एथलीट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है।