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  • तेजस शिरसे ने रचा इतिहास, 110 मीटर हर्डल्स में बनाया नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड; कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट लगभग पक्का

    तेजस शिरसे ने रचा इतिहास, 110 मीटर हर्डल्स में बनाया नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड; कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट लगभग पक्का


    नई दिल्ली । भारतीय एथलेटिक्स को शनिवार को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई, जब युवा हर्डलर Tejas Shirse ने पुरुषों की 110 मीटर हर्डल्स स्पर्धा में नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर इतिहास रच दिया। लुधियाना में आयोजित Indian Athletics Series 9 के दौरान तेजस ने 13.27 सेकंड का समय निकालते हुए न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि अपने ही पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।

    24 वर्षीय तेजस शिरसे ने इससे पहले 2024 में 13.41 सेकंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। अब उन्होंने अपने प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार करते हुए 13.27 सेकंड का समय दर्ज किया है। यह उपलब्धि भारतीय ट्रैक एवं फील्ड इतिहास के सर्वश्रेष्ठ स्प्रिंट-हर्डल प्रदर्शनों में गिनी जा रही है। खास बात यह है कि उनका यह प्रदर्शन Athletics Federation of India द्वारा निर्धारित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 क्वालिफिकेशन मार्क 13.39 सेकंड से भी बेहतर रहा।

    प्रतियोगिता के दौरान तेजस ने शुरुआत से ही अपना दबदबा बनाए रखा। ‘बी’ फाइनल में उन्होंने ब्लॉक्स से शानदार शुरुआत की और शुरुआती चरण में बढ़त हासिल कर ली। अंतिम हर्डल से हल्का संपर्क होने के बावजूद उन्होंने अपनी गति कम नहीं होने दी और शानदार अंदाज में फिनिश लाइन पार की। उनका समय देखते ही स्टेडियम में मौजूद दर्शकों और अधिकारियों ने उनकी उपलब्धि का स्वागत किया। इस रेस में Krishik M 13.55 सेकंड के समय के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

    तेजस का यह प्रदर्शन हाल के महीनों में उनकी लगातार प्रगति को भी दर्शाता है। पिछले महीने रांची में आयोजित Federation Cup Athletics Championships में उन्होंने 13.50 सेकंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता था। अब 13.27 सेकंड का समय उन्हें वर्ष 2026 की महाद्वीपीय रैंकिंग में शीर्ष खिलाड़ियों के बीच ला खड़ा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनका प्रदर्शन इस समय कॉन्टिनेंटल सूची में छठे स्थान पर है।

    भारतीय एथलेटिक्स के लिहाज से यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यदि तेजस का चयन कॉमनवेल्थ गेम्स टीम में होता है तो वह 2014 के बाद इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भाग लेने वाले पहले भारतीय पुरुष हर्डलर बन सकते हैं। इससे पहले Siddhanth Thingalaya ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

    दूसरी ओर, प्रतियोगिता में कुछ खिलाड़ियों के लिए निराशाजनक नतीजे भी सामने आए। पुरुषों की 800 मीटर दौड़ में Mohammed Afsal अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। उन्होंने 1 मिनट 47 सेकंड का समय निकाला, जो कॉमनवेल्थ गेम्स क्वालिफिकेशन मानक 1 मिनट 45 सेकंड से पीछे रहा। ऐसे में उनके चयन की संभावनाओं को बड़ा झटका लग सकता है।

    जैवलिन थ्रो स्पर्धा में भी खिलाड़ियों के बीच कॉमनवेल्थ गेम्स टीम में जगह बनाने की होड़ देखने को मिली। Sachin Yadav चोट के कारण प्रतियोगिता से बाहर रहे, जबकि दो बार के ओलंपिक पदक विजेता Neeraj Chopra अभी पूरी तरह फिटनेस हासिल करने की प्रक्रिया में हैं। ऐसे में Rohit Yadav, Shivam Lohakare और Kishore Kumar Jena जैसे खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का अवसर खुला हुआ है।

    तेजस शिरसे की इस उपलब्धि ने भारतीय एथलेटिक्स को नई ऊर्जा दी है और आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए उम्मीदें भी बढ़ा दी हैं।

  • भारतीय एथलेटिक्स में नया नाम, सावन बरवाल का संघर्ष और सफलता की कहानी

    भारतीय एथलेटिक्स में नया नाम, सावन बरवाल का संघर्ष और सफलता की कहानी


    नई दिल्ली। भारत में लंबे समय तक मैराथन और लंबी दूरी की दौड़ को क्रिकेट जैसे लोकप्रिय खेलों की तरह पहचान नहीं मिल पाई, लेकिन हिमाचल प्रदेश के धावक Sawan Barwal ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से इस सोच को बदलने की कोशिश की है। हाल ही में उन्होंने देश का 48 साल पुराना राष्ट्रीय मैराथन रिकॉर्ड तोड़कर भारतीय एथलेटिक्स में नया इतिहास रच दिया।

    हिमाचल की जोगिंदर नगर की पहाड़ियों से निकलकर भारतीय सेना में एथलीट बनने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित सुविधाओं और संसाधनों की कमी के बावजूद सावन ने लगातार अभ्यास और अनुशासन के बल पर खुद को शीर्ष स्तर के धावकों में स्थापित किया।

    अपने सफर पर बात करते हुए सावन कहते हैं कि पहाड़ों में पले-बढ़े होने से उन्हें सहनशक्ति और मानसिक मजबूती मिली। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में प्रशिक्षण ने उनकी क्षमता को निखारा और बाद में प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की।

    उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन बाद में जब उन्हें एक्सीलेंस सेंटर में बेहतर ट्रेनिंग, रिकवरी और न्यूट्रिशन की सुविधाएं मिलीं तो उनका प्रदर्शन और बेहतर हुआ। सेना में शामिल होने के बाद उन्हें स्थिरता और पेशेवर माहौल मिला, जिससे उनका करियर आगे बढ़ा।

    सावन के अनुसार, लंबी दूरी की दौड़ सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक खेल भी है। हर दिन लक्ष्य तय करना, समय के अनुसार प्रशिक्षण लेना और लगातार सुधार की कोशिश ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। वे कहते हैं कि “हमें ट्रेनिंग की रुकावटों को तोड़ना होगा” और लगातार अनुशासन बनाए रखना ही सफलता की कुंजी है।

    उनके करियर में परिवार का भी अहम योगदान रहा है। उनके बड़े भाई ने आर्थिक रूप से सहायता कर उन्हें स्पोर्ट्स शूज़, स्पाइक्स और अन्य जरूरी उपकरण उपलब्ध कराए। यह सहयोग उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ, खासकर उस समय जब वे आर्थिक रूप से स्थिर नहीं थे।

    चोट और कठिन दौरों पर बात करते हुए सावन ने स्वीकार किया कि 2023 में लगी गंभीर चोट के बाद छह से सात महीने तक उनका करियर अनिश्चितता में रहा। उस समय उन्होंने खुद पर संदेह भी किया, लेकिन धैर्य और निरंतर प्रयास ने उन्हें वापसी का रास्ता दिखाया। सावन का मानना है कि भारत में अब लंबी दूरी की दौड़ को पहले की तुलना में ज्यादा पहचान मिल रही है। युवाओं की भागीदारी बढ़ी है और मैराथन में प्रतिस्पर्धा का स्तर भी लगातार ऊपर जा रहा है।

    उनकी कहानी यह साबित करती है कि सही लक्ष्य, मजबूत इच्छाशक्ति और निरंतर अभ्यास से कोई भी एथलीट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है।