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  • समाज की उल्टी परंपरा, जहां दूल्हा जाता है ससुराल और निभाता है अनोखी रस्म

    समाज की उल्टी परंपरा, जहां दूल्हा जाता है ससुराल और निभाता है अनोखी रस्म


    नई दिल्ली। सहारा रेगिस्तान की तपती रेत और कठिन जीवन परिस्थितियों के बीच एक ऐसी जनजाति भी रहती है, जिसकी परंपराएं दुनिया की आम सामाजिक संरचना से बिल्कुल अलग हैं। यह है तुआरेग जनजाति, जिसे “ब्लू मेन ऑफ द सहारा” भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान है पुरुषों का घूंघट पहनना और शादी के बाद पति का पत्नी के घर जाकर रहना।

    तुआरेग समाज में पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला नीला घूंघट, जिसे स्थानीय भाषा में ‘टैगेलमस्ट’ कहा जाता है, केवल परंपरा नहीं बल्कि उनकी जीवनशैली का अहम हिस्सा है। लगभग 25 वर्ष की उम्र के बाद पुरुष इस घूंघट को पहनना शुरू करते हैं। यह कपड़ा उन्हें रेगिस्तान की तेज धूप, धूल और रेत से बचाता है। समय के साथ यह नीला रंग उनके चेहरे पर भी उतर आता है, जिससे उनकी पहचान और भी विशिष्ट हो जाती है।

    इस समाज की सबसे चौंकाने वाली विशेषता इसकी पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था है। यहां शादी के बाद पुरुष अपने घर में नहीं रहता, बल्कि पत्नी के घर जाकर शिफ्ट हो जाता है। यह व्यवस्था पूरी तरह मातृसत्तात्मक (matrilineal) है, जिसमें वंश और संपत्ति मां की लाइन से आगे बढ़ती है। बच्चों की पहचान भी मां के परिवार से जुड़ी होती है।

    तुआरेग समाज में घर या तंबू महिलाओं की संपत्ति माना जाता है। शादी के समय भी महिला अपना तंबू लेकर आती है और परिवार की अधिकांश संपत्ति, जैसे पशुधन और घरेलू सामान, महिलाओं के नियंत्रण में रहते हैं। यदि तलाक होता है, तो पुरुष को घर छोड़ना पड़ता है, जबकि बच्चे अपनी मां के साथ ही रहते हैं।

    इस जनजाति में महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से काफी स्वतंत्रता प्राप्त है। वे व्यापार करती हैं, बाजार संभालती हैं और सामाजिक फैसलों में भी अहम भूमिका निभाती हैं। पारंपरिक संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रहती है। यहां महिलाएं अपनी इच्छा से विवाह कर सकती हैं और जरूरत पड़ने पर तलाक का निर्णय भी ले सकती हैं।

    हालांकि समाज में नेतृत्व पूरी तरह महिलाओं के हाथ में नहीं है। जनजाति के प्रमुख और सरदार आमतौर पर पुरुष ही होते हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि नेतृत्व की वंश परंपरा भी मां के परिवार से जुड़ी होती है।

    तुआरेग जनजाति की परंपराएं आज भी माली, नाइजर, अल्जीरिया, लीबिया और बुर्किना फासो जैसे देशों के रेगिस्तानी क्षेत्रों में जीवित हैं। हालांकि आधुनिक शिक्षा और शहरी जीवन के प्रभाव से कुछ युवा इन परंपराओं से दूर हो रहे हैं, फिर भी गांवों में यह संस्कृति मजबूत बनी हुई है।

    सोशल मीडिया पर जब भी इस जनजाति की तस्वीरें सामने आती हैं, लोग हैरान रह जाते हैं। कोई इसे महिला सशक्तिकरण का उदाहरण मानता है, तो कोई इसे एक अलग सामाजिक व्यवस्था के रूप में देखता है। लेकिन सच्चाई यह है कि तुआरेग समाज अपनी जरूरतों और जीवन परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुई एक अनोखी सांस्कृतिक व्यवस्था है।

  • बांसुरी, मोर पंख और देसी अंदाज: कान्स में सान्या ठाकुर ने भारतीय परंपरा को बनाया ग्लोबल आकर्षण

    बांसुरी, मोर पंख और देसी अंदाज: कान्स में सान्या ठाकुर ने भारतीय परंपरा को बनाया ग्लोबल आकर्षण


    नई दिल्ली । दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में शामिल कान्स फिल्म फेस्टिवल में इस बार भारतीय संस्कृति की एक अनोखी और आध्यात्मिक झलक देखने को मिली, जब बिहार की अभिनेत्री सान्या ठाकुर ने ‘राधा रानी’ से प्रेरित अपने विशेष लुक के साथ रेड कार्पेट पर कदम रखा। ग्लैमर और फैशन से भरे इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर सान्या का यह पारंपरिक और सांस्कृतिक अंदाज हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचता नजर आया।

    सान्या ठाकुर का यह लुक केवल फैशन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें भारतीय परंपरा, कृष्ण भक्ति और सांस्कृतिक सौंदर्य का गहरा समावेश दिखाई दिया। जैसे ही उन्होंने रेड कार्पेट पर एंट्री ली, उनका देसी अंदाज विदेशी मेहमानों और फैशन प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन गया। बांसुरी, मोर पंख और पारंपरिक श्रृंगार के साथ सान्या ने ऐसा प्रभाव छोड़ा, जिसने उनके लुक को साधारण फैशन से कहीं आगे पहुंचा दिया।

    सान्या ने इस खास मौके के लिए भारी कढ़ाई वाला पारंपरिक लहंगा चुना, जिसमें भारतीय कला और शिल्प की खूबसूरत झलक दिखाई दी। उनके लहंगे में ऑफ-व्हाइट और क्रीम बेस के साथ पेस्टल रंगों की बारीक कढ़ाई की गई थी। फ्लोरल और ट्रेडिशनल मोटिफ्स से सजा यह परिधान बेहद आकर्षक और शाही नजर आ रहा था। सिल्वर थ्रेड, मिरर वर्क और सेक्विन डिटेलिंग ने पूरे आउटफिट को और अधिक भव्य बना दिया।

    लहंगे के साथ उन्होंने मैचिंग ब्लाउज और हल्के डिजाइन वाला नेट दुपट्टा कैरी किया, जिसने उनके लुक में संतुलन और ग्रेस जोड़ दिया। सान्या की स्टाइलिंग में हर छोटी डिटेल पर विशेष ध्यान दिया गया था। माथा पट्टी, बड़े झुमके, रंग-बिरंगी चूड़ियां और हाथों में आलता उनके पारंपरिक रूप को और निखार रहे थे। वहीं नथ और हल्के नेकलेस ने पूरे लुक को एक शास्त्रीय और पौराणिक स्पर्श दिया।

    हालांकि उनके पूरे लुक की सबसे बड़ी खासियत रही बांसुरी और मोर पंख की डिटेलिंग, जिसने ‘राधा रानी’ की थीम को जीवंत कर दिया। बालों को सॉफ्ट कर्ल्स के साथ स्टाइल करते हुए उसमें गजरा लगाया गया था, जबकि हाथ में थामी बांसुरी और उस पर सजा मोर पंख उनके कृष्ण भक्ति वाले रूप को और प्रभावशाली बना रहा था।

    मेकअप को भी बेहद सॉफ्ट और पारंपरिक रखा गया। ग्लॉसी पिंक लिप्स, हल्के रंगों का प्रयोग और माथे पर कुमकुम से बनाई गई फूलों जैसी बिंदी ने उनके चेहरे की सुंदरता को और उभार दिया। यह पूरा अंदाज किसी पौराणिक चित्र या सांस्कृतिक प्रस्तुति जैसा प्रतीत हो रहा था, जिसने रेड कार्पेट पर मौजूद लोगों को खासा प्रभावित किया।

    कुल मिलाकर, सान्या ठाकुर का यह कान्स डेब्यू केवल एक फैशन स्टेटमेंट नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का अंतरराष्ट्रीय मंच पर खूबसूरत प्रदर्शन बन गया। आधुनिक ग्लैमर की भीड़ में उनका यह एथनिक और सांस्कृतिक रूप सबसे अलग और यादगार नजर आया।

  • प्रेमानंद जी महाराज का जवाब: विदेश में नॉनवेज खाने के बाद भी लोग तरक्की कैसे करते हैं? जानिए गहरी सीख

    प्रेमानंद जी महाराज का जवाब: विदेश में नॉनवेज खाने के बाद भी लोग तरक्की कैसे करते हैं? जानिए गहरी सीख




    नई दिल्ली। प्रेमानंद जी महाराज  के एकांतिक वार्ता में दिए गए विचारों पर आधारित एक सवाल ने लोगों का ध्यान खींचा है। भक्त ने पूछा कि विदेशों में लोग मांसाहार करते हैं, फिर भी वे तरक्की कैसे कर लेते हैं? इस पर महाराज जी ने जीवन, धर्म और “सच्ची उन्नति” को लेकर गहरी बात समझाई।

    महाराज जी के अनुसार, केवल भौतिक सफलता या पैसा कमाना ही असली उन्नति नहीं है। उन्होंने कहा कि असली उन्नति वह है जिसमें मन की शांति, संस्कार और आध्यात्मिक संतुलन भी शामिल हो। उनके अनुसार, बाहरी सफलता को ही पूरी उन्नति मान लेना एक अधूरी सोच है।

    शाकाहार और कर्म का संदेश
    प्रेमानंद जी महाराज ने यह भी कहा कि हर जीव के जीवन का मूल्य है और कर्म का प्रभाव व्यक्ति पर जरूर पड़ता है। उन्होंने समझाया कि व्यक्ति के कर्म ही उसके जीवन के परिणाम तय करते हैं, और समय के साथ हर चीज का फल मिलता है।

    विदेश और “उन्नति” पर विचार
    भक्त के सवाल पर महाराज जी ने कहा कि केवल धन और भोग-विलास को उन्नति मानना सही नहीं है। उनके अनुसार, सच्ची शांति और संतोष केवल बाहरी सुविधाओं से नहीं मिलता, बल्कि आंतरिक संस्कारों और आध्यात्मिक जीवन से मिलता है।

    आधुनिकता और अध्यात्म का संतुलन
    महाराज जी ने यह भी कहा कि आधुनिक शिक्षा जरूरी है, लेकिन उसके साथ अध्यात्म का संतुलन भी होना चाहिए। उनके अनुसार, यदि दोनों साथ चलें तो समाज अधिक संतुलित और शांतिपूर्ण बन सकता है।

  • नारद जयंती पर ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मीडिया’ का संदेश, डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने रखा राष्ट्रीय दृष्टिकोण

    नारद जयंती पर ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मीडिया’ का संदेश, डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने रखा राष्ट्रीय दृष्टिकोण


    करैरा । मध्य प्रदेश में शिवपुरी जिले के करैरा स्थित श्री रामराजा गार्डन में नारद जयंती के अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक दिशा देखने को मिली। युगल किशोर शर्मा (जिला ब्यूरो प्रमुख हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी)के संयोजन में हुए इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में भोपाल से पधारे प्रसिद्ध लेखक व विचारक डॉ. मयंक चतुर्वेदी (क्षेत्रीय संपादक हिन्दुस्थान समाचार न्यूज़ एजेंसी) ने अपने संबोधन से कार्यक्रम को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया। कार्यक्रम का शुभारंभ नारद जी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मंच पर विशिष्ट अतिथि ब्रह्मेन्द्र गुप्ता (उपयुक्त विकास), विकाश खण्ड शिक्षा अधिकारी मुकेश शर्मा, धैर्यवर्धन शर्मा (प्रवक्ता, भाजपा मध्यप्रदेश) सहित अन्य गणमान्य मौजूद रहे, अध्यक्षता समाजसेवी सुरेश बंधु ने की।

    सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर राष्ट्रीय दृष्टि
    अपने उद्बोधन में डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और मीडिया’ विषय पर विस्तार से विचार रखते हुए कहा कि भारत की संस्कृति केवल परंपरा नहीं, बल्कि ज्ञान और विज्ञान का जीवंत स्रोत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत कभी निष्क्रिय नहीं रहा, बल्कि उसने सदैव विश्व कल्याण की दिशा में मार्गदर्शन किया है। उन्होंने आदि शंकराचार्य का उदाहरण देते हुए कहा कि अल्पायु में ही उन्होंने भारत को वैचारिक रूप से एकजुट कर चार धामों की स्थापना कर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया। डॉ. चतुर्वेदी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने सदियों तक बाहरी आक्रमणों का सामना करते हुए अपनी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा, जो आज भी समाज की मूल शक्ति है।
    विशिष्ट अतिथि ब्रह्मेन्द्र गुप्ता ने देवर्षि नारद को समाज जागरण का प्रतीक बताते हुए कहा कि संवाद और सूचना का सही उपयोग समाज को दिशा देता है। मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में समाज की अपेक्षाएँ पत्रकारिता और न्याय व्यवस्था से जुड़ी हैं। मीडिया ही वह सेतु है जो समाज की समस्याओं और वास्तविकताओं को शासन तक पहुँचाता है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। वहीं धैर्यवर्धन शर्मा ने चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य के उदाहरणों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में विचार और नेतृत्व की भूमिका को समझाया।
    इस अवसर पर समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वाले समाजसेवियों और संस्थाओं को सम्मानित किया गया,जिसमें मुख्य रूप से गौ सेवा,शिक्षा और साहित्य, खेल, रोजगार और समाज सेवा के क्षेत्र में सेवा प्रदान करने वाले लोगों का सम्मान किया गया। जिसे डॉ. चतुर्वेदी ने एक अनुकरणीय पहल बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और नई पीढ़ी को प्रेरित करते हैं। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कवि प्रमोद भारती ने किया, जबकि अंत में सुनील भार्गव ने वंदेमातरम गीत के साथ समारोह का समापन कराया।
  • सीएम धामी ने बाबा नीब करौरी महाराज पर आधारित फिल्म का प्रोमो और पोस्टर किया लॉन्च

    सीएम धामी ने बाबा नीब करौरी महाराज पर आधारित फिल्म का प्रोमो और पोस्टर किया लॉन्च

    नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में श्री बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन पर आधारित फिल्म का प्रोमो और पोस्टर जारी किया। इस अवसर पर योगगुरु स्वामी रामदेव, स्वामी चिदानंद सरस्वती, फिल्म के निर्देशक शरद सिंह ठाकुर सहित कई प्रमुख गणमान्य व्यक्ति और कलाकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम का माहौल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से ओतप्रोत नजर आया।

    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि यह फिल्म केवल एक मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और मानवता के मूल्यों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि ऐसे विषयों पर आधारित फिल्में समाज में सकारात्मक सोच को बढ़ावा देती हैं और लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं।

    सीएम धामी ने बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन और उनके विचारों को याद करते हुए कहा कि उनका दिव्य व्यक्तित्व आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि बाबा की शिक्षाएं सरलता, करुणा, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलने का संदेश देती हैं, जो वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं और समाज को दिशा देने का कार्य करती हैं।

    उन्होंने आगे कहा कि भारतीय संत परंपरा और सनातन संस्कृति के मूल्यों को सहेजना और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार की आध्यात्मिक फिल्मों के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरूक किया जा सकता है।

    कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों, निर्देशक और निर्माण टीम की सराहना करते हुए उन्हें इस प्रयास के लिए बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह फिल्म समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगी और लोगों को आध्यात्मिकता की ओर प्रेरित करेगी।

    इस आयोजन को उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है, जो संत परंपरा के महान व्यक्तित्वों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

  • मानवता और सहअस्तित्व भारतीय संस्कृति की पहचान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    मानवता और सहअस्तित्व भारतीय संस्कृति की पहचान : मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति के मूल में मानवता, सहअस्तित्व और परस्पर सहयोग का महत्वपूर्ण भाव शामिल है। मानवता, सहअस्तित्व भारतीय संस्कृति की पहचान है।

    उन्होंने कहा कि स्काउट और गाइड संगठन विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ संस्कारवान बनाने की दृष्टि से एक आदर्श संगठन है। इस नाते मध्य प्रदेश में इन युवाओं का एक सप्ताह का वैचारिक आयोजन स्थानीय युवाओं के लिए भी प्रेरक है। उन्होंने कहा कि बंगाल की खाड़ी से जुड़े सात राष्ट्रों को सहयोग के सूत्र में बांधने के लिए बिम्सटेक एक महत्वपूर्ण मंच है। युवा राष्ट्र के निर्माण में सहभागी होते हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव मंगलवार देर शाम अपने निवास स्थित संवाद सभाकक्ष में बिम्सटेक यूथ कल्चरल हेरिटेज एंड सस्टेनेबिलिटी इमेरसन प्रोग्राम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में सात देशों के युवा प्रतिनिधि शामिल थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रतिभागी देशों भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और थाईलैंड के स्काउट गाइड को प्रमाण-पत्र भी प्रदान किए।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भारत स्काउट और गाइड संगठन को रचनात्मक प्रकल्पों के संचालन के लिए बधाई दी। उन्होंने देश के दिल मध्य प्रदेश में अन्य देशों और राज्यों के प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि पड़ोसियों से हमारे आत्मीय और सहज संबंध है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल से भी यहां प्रतिनिधि आएं हैं। बंगाल की खाड़ी से बिम्सटेक के देश जुड़े हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत दक्षिण एशियाई देशों के लिए आशा, स्थिरता और विकास का एक सशक्त केंद्र बनकर उभरा है। उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रति यूथ कल्चरल हेरिटेज एंड सस्टेनेबिलिटी इमेरसन प्रोग्राम के लिए प्राप्त सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं को सांस्कृतिक धरोहर, पर्यावरण संरक्षण, सतत् विकास और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर विचार-विमर्श के साथ ही ऐसे महत्वपूर्ण विषयों को जीवन के लक्ष्यों में शामिल करने के लिए प्रेरित करते हैं।

    उन्होंने कहा कि हमारा देश अनेक नदियों का मायका है। भारत को मध्य प्रदेश से बड़ी जल राशि प्राप्त होती है। मध्य प्रदेश की नदियां कई राज्यों की नदियों में समाहित होकर उन्हें समृद्ध करती है। मध्य प्रदेश से सम्राट विक्रमादित्य की पहचान भी जुड़ी है, जो दान, वीरता, न्यायप्रियता और सुशासन के प्रतीक थे। उन्होंने अनेक राज्यों और राष्ट्रों में भिन्न-भिन्न नामों से व्यवस्थित शासन संचालन के प्रमाण प्रस्तुत किए। भारत ऐसे ही गौरवशाली व्यक्तित्वों से विश्व में अलग पहचान रखता है।

    कार्यक्रम को भारत स्काउट एंड गाइड के नेशनल कमिश्नर मनीष मेहता सहित अन्य पदाधिकारियों ने भी संबोधित किया।

  • स्व से सृष्टि तक मंगल ही हमारा संकल्प, सेवा ही हमारा परम धर्म: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

    स्व से सृष्टि तक मंगल ही हमारा संकल्प, सेवा ही हमारा परम धर्म: मुख्यमंत्री डॉ. यादव


    भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव गुरुवार को राजस्थान के भीलवाड़ा में आयोजित सनातन मंगल महोत्सव, संत समागम एवं दीक्षा महोत्सव में शामिल हुए। यह कार्यक्रम हरिशेवा उदासीन आश्रम में महामण्डलेश्वर स्वामी हंसरामजी महाराज की उपस्थिति में संपन्न हुआ, जहां मुख्यमंत्री ने संतों, विद्वतजनों और श्रद्धालुओं को एकजुट कर भारतीय संस्कृति के मूल्यों पर आधारित संदेश दिया।

    भीलवाड़ा में स्व से सृष्टि तक मंगल ही हमारा संकल्प, सेवा ही हमारा परम धर्म के मूल मंत्र के साथ डॉ. यादव ने कहा कि भारतीय संस्कृति ही वह महान संस्कृति है, जो सबके मंगल की कामना करती है। उनका कहना था कि वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत से प्रेरणा लेकर हमें केवल मानव नहीं, पृथ्वी के सभी प्राणियों, पेड़ पौधों और समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए जीना चाहिए। यही जीवन का उच्चतम लक्ष्य एवं परम सेवा धर्म है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी संस्कृति की जड़ें सेवा, समर्पण, विश्व बंधुत्व और सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय जैसी परोपकारी भावनाओं में निहित हैं। वे बोले कि जीवमात्र की सेवा ही श्रीहरि की सेवा है और सम्पूर्ण मानवता की सेवा धर्म है। उन्होंने यह भी बताया कि रा से राजस्थान और म से मध्यप्रदेश मिलकर राम की महिमा को आगे बढ़ा रहे हैं।

    डॉ. यादव ने संतों की समाज में भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि संतों के उपदेश नैतिक मूल्यों, करुणा, सद्भाव और समरसता को बढ़ावा देते हैं। पूज्य हंसरामजी महाराज ने धर्म, भक्ति, सेवा, सत्य तथा अहिंसा को जीवन में जीने का संदेश दिया है और हजारों असहायों को आश्रम के माध्यम से सहारा दिया है।

    कार्यक्रम में तीन युवा संतों ईशानराम जी महाराज, केशवराम जी महाराज और सुमज्ञराम जी महाराज को दीक्षा दी गई, जिनका मुख्यमंत्री ने माल्यार्पण कर अभिनंदन किया। मुख्यमंत्री ने बताया कि उज्जैन में वर्ष 2028 में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ में देश विदेश के सभी साधु संतों का स्वागत किया जाएगा और उनकी आशीष रूपी ऊर्जा से देश को आगे बढ़ाने का आग्रह किया है।

    राजस्थान सरकार के सहकारिता राज्यमंत्री गौतम कुमार दक ने भी मुख्यमंत्री का सम्मान किया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सामाजिक समरसता और धार्मिक पुनरुद्धार पर जोर दिया कार्यक्रम में सांसद दामोदर अग्रवाल, साधु संत, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर, महंत और बड़ी संख्या में धर्म श्रद्धालु मौजूद रहे।

  • रश्मिका मंदाना-विजय देवरकोंडा की शादी का प्राइमल थीम: सादगी, परंपरा और प्रकृति का संगम

    रश्मिका मंदाना-विजय देवरकोंडा की शादी का प्राइमल थीम: सादगी, परंपरा और प्रकृति का संगम


    नई दिल्ली । उदयपुर की अरावली पहाड़ियों के बीच बसी मेमेंटोस बाय आईटीसी एकाया में इस समय एक बेहद खास उत्सव का माहौल है। फिल्म और टीवी की दुनिया के चर्चित पावर कपल, रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा, अब कुछ ही पलों में सात फेरे लेकर एक दूसरे के जीवन में हमेशा के लिए शामिल होने वाले हैं। पिछले कुछ दिनों से चल रहे शाही समारोह की झलकियां सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं, लेकिन अब उनकी शादी का थीम भी सामने आया है, जो बाकी सितारों की शादियों से बिल्कुल अलग और बेहद खास है।

    रश्मिका और विजय की शादी का थीम प्राइमल यानी मूल और आदिम पर आधारित है। इस थीम का मकसद है जड़ों की ओर लौटना और शादी की हर रस्म को उसी सादगी, पवित्रता और भावनात्मक गहराई के साथ निभाना, जैसे दशकों पहले विवाह होते थे। इस थीम में दिखावे से ज्यादा महत्व परंपराओं, रीति रिवाजों और रिश्तों की गहन भावनाओं को दिया गया है। सजावट में प्राकृतिक रंगों, मिट्टी, लकड़ी, फूलों और पारंपरिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। शादी का हर पल जीवन की मूल ऊर्जा, प्रकृति और पंचतत्व के साक्षी में संपन्न होगा।

    इस प्राइमल थीम के जरिए यह जोड़ा अपनी नई जिंदगी की शुरुआत सादगी और आध्यात्मिकता के साथ करना चाहता है। यह केवल एक शादी नहीं, बल्कि रिश्तों के वास्तविक अर्थ का उत्सव होगा, जहां विश्वास और संस्कार ही सबसे महत्वपूर्ण होंगे।

    संगीत समारोह में भी ट्रेडिशन को प्राथमिकता दी गई। विजय की मां माधवी देवरकोंडा ने इस मौके पर भावनाओं से भरा एक अनोखा पल साझा किया। उन्होंने रश्मिका को पारंपरिक चूड़ियां भेंट कीं, जो सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि रश्मिका का देवरकोंडा परिवार में स्वागत और खानदान की विरासत का प्रतीक हैं। यह पल दर्शाता है कि यह रिश्ता केवल दो सितारों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक है।

    पिछले कुछ दिनों में आयोजित विरोश प्रीमियर लीग, पूल पार्टी और हल्दी की रस्में सोशल मीडिया पर छाई रहीं। संगीत समारोह ने न केवल नाच गाने और रंग बिरंगी सजावट का जश्न पेश किया, बल्कि परिवार और परंपरा की गहराई को भी उजागर किया। रश्मिका और विजय की यह शादी दिखावे से परे, सादगी, प्राकृतिक सौंदर्य और पुरातन भारतीय संस्कृति के संगम का उदाहरण बन रही है।

    उदयपुर की शांत पहाड़ियों में सजाई गई यह शादी दर्शकों को याद दिलाती है कि वास्तविक खुशी और उत्सव केवल बाहरी चमक दमक में नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कारों और प्रकृति के गहरे जुड़ाव में छिपी होती है। रश्मिका और विजय का यह प्राइमल थीम, उनकी नई यात्रा की शुरुआत को स्थायी, भावपूर्ण और यादगार बनाने का संकल्प है। 

  • शिक्षा के विस्तार के साथ भारतीय संस्कृति से जुड़ाव आवश्यक : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव

    शिक्षा के विस्तार के साथ भारतीय संस्कृति से जुड़ाव आवश्यक : मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव


    भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि शिक्षा का विस्तार होना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़ाव भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने यह विचार शुक्रवार शाम गांधी नगर स्थित सागर पब्लिक स्कूल के रजत जयंती समारोह में व्यक्त किए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने स्कूल के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और सेवाभावी पदाधिकारियों का सम्मान भी किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए विद्यार्थियों का लक्ष्य केवल प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी बनने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्हें श्रेष्ठ शिक्षक, समर्पित जनप्रतिनिधि, कुशल व्यापारी और अच्छे किसान बनने की भावना भी विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी ऐसे प्रकल्पों से जुड़ें, जिससे वे केवल नौकरी पाने वाले नहीं बल्कि नौकरी देने वाले बनें।

    डॉ. यादव ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारी संस्कृति मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। उन्होंने यह भी कहा कि नई तकनीक के उपयोग के साथ भारतीय संस्कृति से जुड़े रहना हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की प्रगति की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि आज गूगल और अन्य वैश्विक संस्थाओं में भारतीय उच्च पदों पर कार्यरत हैं और देश का नाम रौशन कर रहे हैं।

    इस अवसर पर डॉ. यादव ने सागर समूह के स्कूल सहित सातवें शिक्षण संस्थान के शुभारंभ पर बधाई दी और समूह की शिक्षा क्षेत्र में 25 वर्ष की उपलब्धियों को सराहा। समारोह में उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा निर्मित विज्ञान मॉडल—जैसे प्लांट्स द्वारा जल प्रदूषण रोकना, विंड मिल और लाइव गार्ड मैनेजमेंट—का अवलोकन किया। साथ ही मिट्टी के शिल्प निर्माण करने वाले बच्चों से संवाद कर उनकी प्रतिभा की प्रशंसा की।

    मुख्यमंत्री ने कक्षा 10 वीं में अंशुमन मौर्य को भी सम्मानित किया, जिन्होंने 99.6 प्रतिशत अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया में तीसरी रैंक हासिल की।

    कार्यक्रम को रामेश्वर शर्मा ने भी संबोधित किया। समारोह की शुरुआत में सागर समूह के प्रमुख सुधीर अग्रवाल, सिद्धार्थ अग्रवाल और सागर अग्रवाल ने मुख्यमंत्री और अन्य अतिथियों का स्वागत किया।

    डॉ. यादव ने कहा कि शिक्षा सिर्फ ज्ञान देने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह संस्कार, मूल्य और भारतीय संस्कृति से जुड़ाव का मार्ग भी है। उन्होंने विद्यार्थियों को जीवन में श्रेष्ठता, नैतिक मूल्यों और समाज के लिए योगदान देने की प्रेरणा दी।

  • उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस: मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दीं शुभकामनाएं, राष्ट्र निर्माण में UP के योगदान को सराहा

    उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस: मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने दीं शुभकामनाएं, राष्ट्र निर्माण में UP के योगदान को सराहा

    भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शनिवार 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के समस्त नागरिकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश को भारतीय संस्कृति का केंद्र बताते हुए राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने संदेश में कहा कि उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली परंपराओं, आध्यात्मिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत का संगम है। उन्होंने कहा: भारतीय संस्कृति महान परंपराओं और राष्ट्र निर्माण के महायज्ञ में उत्तर प्रदेश का योगदान अतुलनीय और प्रेरणादायी है। प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण की यह पावन धरा आज प्रगति के नए आयाम स्थापित कर रही है।

    विकास और सुशासन की कामना

    मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश के निरंतर उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए विश्वास जताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सफलता के नए शिखर छुएगा। उन्होंने आगे कहा सांस्कृतिक एकता मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच गहरे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध हैं। दोनों राज्य मिलकर एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को साकार कर रहे हैं। समृद्धि का पथ डॉ. यादव ने कामना की कि गौरवशाली उत्तर प्रदेश विकास, समृद्धि और सुशासन के पथ पर इसी तरह निरंतर अग्रसर बना रहे और देश की अर्थव्यवस्था में अपना बहुमूल्य योगदान देता रहे।

    क्यों मनाया जाता है UP दिवस

    गौरतलब है कि 24 जनवरी 1950 को ही तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस का नाम बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ किया गया था। साल 2018 से प्रतिवर्ष इस दिन को स्थापना दिवस के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की यह बधाई दोनों पड़ोसी राज्यों के बीच सौहार्द और परस्पर सहयोग की भावना को और प्रगाढ़ करती है।