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  • जबलपुर की रैना यादव ने एशियन गेम्स में निभाई खास जिम्मेदारी, गोल्ड के बाद अब ओलंपिक जीत का सपना

    जबलपुर की रैना यादव ने एशियन गेम्स में निभाई खास जिम्मेदारी, गोल्ड के बाद अब ओलंपिक जीत का सपना


    जबलपुर । जबलपुर की रैना यादव ने भारतीय महिला हॉकी टीम की सहायक कोच के रूप में एशियन गेम्स में ऐतिहासिक सफलता का हिस्सा बनकर शहर का नाम रोशन किया है। भारतीय महिला हॉकी टीम ने एशियन गेम्स में 44 साल बाद स्वर्ण पदक अपने नाम किया और इसके साथ ही टीम ने ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई कर लिया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद मंगलवार को जब रैना यादव जापान से बेंगलुरु होते हुए जबलपुर पहुंचीं तो शहर में उनका जोरदार स्वागत किया गया। परिवार के सदस्यों के साथ साथी खिलाड़ियों और शुभचिंतकों ने भी उन्हें बधाई दी।

    एशियन गेम्स में भारतीय टीम के प्रदर्शन के पीछे लंबे समय से की गई तैयारी और रणनीति की अहम भूमिका रही। रैना यादव ने बताया कि टूर्नामेंट शुरू होने से पहले ही टीम का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था। खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ का पूरा ध्यान स्वर्ण पदक जीतने और ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने पर था। टीम ने हर मुकाबले को इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए खेला और फाइनल तक पहुंचने में सफलता हासिल की।

    फाइनल मुकाबला चीन की टीम के खिलाफ था। चीन पिछले ओलंपिक में रजत पदक जीत चुका था और इसलिए भारतीय टीम के सामने बड़ी चुनौती थी। रैना ने बताया कि टीम ने चीन के खिलाफ मुकाबले को लेकर पहले से रणनीति तैयार कर रखी थी। सेमीफाइनल में जब चीन और जापान आमने सामने थे तब भारतीय टीम चाहती थी कि चीन ही फाइनल में पहुंचे क्योंकि टीम की तैयारी चीन को ध्यान में रखकर की गई थी। चीन के फाइनल में पहुंचने के बाद खिलाड़ियों को अपनी तैयार रणनीति के मुताबिक खेलने का मौका मिला।

    रैना के मुताबिक फाइनल जैसे बड़े मुकाबले में दबाव होना स्वाभाविक था लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने इस दबाव को सकारात्मक तरीके से लिया। टीम ने मैदान पर अपनी रणनीति को लागू किया और शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। इस जीत ने भारतीय महिला हॉकी के लिए एक बड़ी उपलब्धि दर्ज की और ओलंपिक का टिकट भी पक्का किया।

    रैना ने बताया कि भारतीय महिला हॉकी टीम की तैयारी केवल किसी एक टूर्नामेंट तक सीमित नहीं है। टीम का वर्ष 2028 तक का कार्यक्रम और मैच शेड्यूल पहले से तय है। खिलाड़ियों के लिए हर दिन अलग तरह की तैयारी होती है जिसमें तकनीकी और टैक्टिकल अभ्यास के साथ वीडियो सेशन स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग तथा रिकवरी पर भी ध्यान दिया जाता है। लंबे समय की योजना के अनुसार खिलाड़ियों को बड़े टूर्नामेंट के लिए तैयार किया जा रहा है।

    सहायक कोच के रूप में रैना का सफर भी मेहनत और तैयारी से जुड़ा रहा है। उन्होंने अप्रैल में हॉकी इंडिया के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। इसके लिए उन्होंने लंबे समय तक खुद को तैयार किया। उनके पास इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन के विभिन्न स्तरों के कोर्स और कोचिंग से जुड़े प्रमाणपत्र हैं। इसके अलावा उन्होंने पटियाला से डिप्लोमा इन स्पोर्ट्स कोचिंग भी किया है।

    रैना अपने सफर को संघर्षपूर्ण मानती हैं। उनका कहना है कि आगे बढ़ने के रास्ते में प्रोत्साहित करने वाले लोगों के साथ हतोत्साहित करने वाले लोग भी मिलते हैं लेकिन आलोचनाओं और मुश्किल परिस्थितियों ने उन्हें और मजबूती से आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। एशियन गेम्स का स्वर्ण उनके सफर की बड़ी उपलब्धि है लेकिन अब उनकी नजर अगले बड़े लक्ष्य पर है। रैना का सपना 2028 में लॉस एंजिल्स में होने वाले ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम के साथ बेहतर प्रदर्शन करना और स्वर्ण पदक जीतना है।

  • 19-0 फिर 17-1 और अब 20-1 भारतीय महिला हॉकी टीम का एशियन गेम्स में गोलों का तूफान

    19-0 फिर 17-1 और अब 20-1 भारतीय महिला हॉकी टीम का एशियन गेम्स में गोलों का तूफान


    नई दिल्ली । एशियन गेम्स 2026 में भारतीय महिला हॉकी टीम का शानदार अभियान लगातार आगे बढ़ रहा है। बुधवार को पूल बी के मुकाबले में भारत ने थाईलैंड को 20-1 के बड़े अंतर से हराकर टूर्नामेंट में लगातार तीसरी जीत दर्ज की। गिफू प्रीफेक्चुरल ग्रीन स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में भारतीय खिलाड़ियों ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया और पूरे मैच के दौरान थाईलैंड की टीम पर दबाव बनाए रखा। इस जीत के साथ भारतीय टीम पूल बी में शीर्ष स्थान पर बनी हुई है।

    भारत की इस बड़ी जीत की सबसे बड़ी स्टार दीपिका रहीं जिन्होंने अकेले नौ गोल दागे। ड्रैग फ्लिक विशेषज्ञ दीपिका ने अपने सभी नौ गोल पेनल्टी कॉर्नर के जरिए किए। उन्होंने लगातार भारतीय हमलों को गोल में बदलकर थाईलैंड की रक्षापंक्ति को मुश्किल में डाल दिया। दीपिका का यह प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि इससे पहले उज्बेकिस्तान के खिलाफ मुकाबले में उन्होंने आठ गोल किए थे। थाईलैंड के खिलाफ नौ गोल के साथ उन्होंने अपना ही रिकॉर्ड बेहतर कर दिया। टूर्नामेंट में तीन मैचों के बाद दीपिका के नाम 20 गोल हो चुके हैं।

    भारत के लिए नवनीत कौर ने भी शानदार प्रदर्शन किया और चार गोल किए। रुतुजा पिसल ने हैट्रिक पूरी की। इसके अलावा नेहा लालरेम्सियामी साक्षी राणा और कप्तान सलीमा टेटे ने भी गोल कर टीम की जीत में योगदान दिया। भारतीय टीम के हमलों में लगातार तेजी और तालमेल नजर आया। पेनल्टी कॉर्नर के मौकों को भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार तरीके से भुनाया और थाईलैंड को वापसी का कोई बड़ा अवसर नहीं दिया।

    थाईलैंड की टीम पूरे मुकाबले में भारतीय डिफेंस पर ज्यादा दबाव नहीं बना सकी। उसे मैच का एकमात्र गोल चौथे क्वार्टर के अंतिम हिस्से में मिला। सुपांसा समंसो ने पेनल्टी कॉर्नर के जरिए गोल किया। उनके ड्रैग फ्लिक में हल्का डिफ्लेक्शन हुआ और गेंद भारतीय गोल में पहुंच गई। इसके बावजूद भारत की बढ़त इतनी बड़ी थी कि इस गोल से मुकाबले की दिशा पर कोई असर नहीं पड़ा।

    भारतीय टीम ने इससे पहले टूर्नामेंट की शुरुआत उज्बेकिस्तान के खिलाफ 19-0 की बड़ी जीत से की थी। इसके बाद भारत ने इंडोनेशिया को 17-1 से हराया। अब थाईलैंड के खिलाफ 20-1 की जीत के साथ भारत ने लगातार तीसरी बार बड़े अंतर से मुकाबला अपने नाम किया है। शुरुआती तीन मुकाबलों में भारतीय टीम ने कुल 56 गोल किए हैं जबकि उसके खिलाफ केवल दो गोल हुए हैं।

    भारतीय महिला हॉकी टीम का अगला मुकाबला शुक्रवार को जापान से होना है। यह मैच नॉकआउट चरण से पहले टीम के लिए अहम होगा। भारत की टीम 2023 के हांगझोऊ एशियन गेम्स में जीते गए कांस्य पदक से बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश में है। महिला हॉकी में भारत ने आखिरी बार 1982 में एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीता था। इस बार टीम की नजर लंबे अंतराल के बाद फिर से स्वर्ण पदक हासिल करने पर है।

    लगातार तीन मुकाबलों में जिस तरह भारतीय टीम ने गोल किए हैं उससे उसका आक्रामक खेल बेहद प्रभावशाली नजर आया है। खासतौर पर दीपिका की पेनल्टी कॉर्नर पर शानदार फिनिशिंग टीम के लिए बड़ा हथियार बनी हुई है। अब जापान के खिलाफ मुकाबले में भारतीय टीम इसी लय को बरकरार रखना चाहेगी और नॉकआउट चरण से पहले अपनी स्थिति और मजबूत करने की कोशिश करेगी।

  • हॉकी वर्ल्ड कप में भारत को बड़ा झटका, नीदरलैंड्स ने 2-0 से हराया; अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो का मुकाबला

    हॉकी वर्ल्ड कप में भारत को बड़ा झटका, नीदरलैंड्स ने 2-0 से हराया; अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो का मुकाबला


    नई दिल्ली। महिला हॉकी विश्व कप 2026 में भारतीय टीम को दूसरे दौर के मुकाबले में नीदरलैंड्स के खिलाफ 0-2 से हार का सामना करना पड़ा है। एम्स्टलवीन में खेले गए इस मुकाबले में भारतीय टीम ने रक्षात्मक रूप से संघर्ष जरूर किया लेकिन नीदरलैंड्स के लगातार दबाव के सामने गोल करने में कामयाब नहीं हो सकी। मौजूदा ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीदरलैंड्स ने दोनों गोल पेनल्टी कॉर्नर के जरिए किए। इस हार के बाद भारतीय टीम की सेमीफाइनल की राह काफी मुश्किल हो गई है।

    मुकाबले की शुरुआत से ही नीदरलैंड्स ने आक्रामक तेवर दिखाए। मैच के दूसरे मिनट में ही मेजबान टीम को पेनल्टी कॉर्नर मिला और यिब्बी जानसेन ने इसे गोल में बदलकर भारत पर शुरुआती दबाव बना दिया। भारत ने इसके बाद खेल को संभालने की कोशिश की लेकिन नीदरलैंड्स ने गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा और भारतीय खिलाड़ियों को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखा। भारतीय गोलकीपर और डिफेंस ने कई मौकों पर शानदार बचाव किया लेकिन मेजबान टीम के आक्रमण को पूरी तरह रोकना आसान नहीं था।

    दूसरे हाफ में नीदरलैंड्स ने एक बार फिर पेनल्टी कॉर्नर के जरिए भारत की मुश्किल बढ़ा दी। 38वें मिनट में फ्रेडरिके मातला ने पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलकर मेजबान टीम की बढ़त 2-0 कर दी। इसके बाद भारतीय टीम ने वापसी के लिए कई प्रयास किए लेकिन डच रक्षापंक्ति ने भारतीय फॉरवर्ड्स को ज्यादा मौके नहीं दिए। भारत के पास कुछ अवसर जरूर आए लेकिन उन्हें गोल में बदलने में टीम नाकाम रही।

    इस मुकाबले में भारत की सबसे बड़ी परेशानी आक्रमण में नजर आई। टीम को गोल के मौके बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा जबकि नीदरलैंड्स ने अपने पेनल्टी कॉर्नर का बेहतर इस्तेमाल किया। खास तौर पर मैच के शुरुआती चरण में मिला दबाव भारतीय टीम के लिए भारी पड़ा। हालांकि भारतीय डिफेंस ने पूरे मुकाबले में हार नहीं मानी और लगातार नीदरलैंड्स के हमलों का सामना करता रहा।

    अब भारतीय टीम के सामने सबसे अहम चुनौती ऑस्ट्रेलिया की है। रविवार 23 अगस्त को होने वाला यह मुकाबला भारत के लिए करो या मरो जैसा बन गया है। भारत को सेमीफाइनल की दौड़ में बने रहने के लिए ऑस्ट्रेलिया को हराना जरूरी होगा। नीदरलैंड्स के खिलाफ हार के बाद भारत के खाते में एक अंक है जबकि ऑस्ट्रेलिया भी चीन के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ के बाद एक अंक पर है। चीन के दो अंक हैं जबकि नीदरलैंड्स छह अंकों के साथ मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है।

    भारत ने विश्व कप के पहले दौर में चीन के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ खेला था और इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ गोलरहित ड्रॉ के जरिए दूसरे दौर में जगह बनाई थी। पूल डी में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर रहा था। अब टीम के सामने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऐसा प्रदर्शन करने की चुनौती है जिसमें डिफेंस के साथ आक्रमण में भी बेहतर तालमेल नजर आए।

    नीदरलैंड्स के खिलाफ हार ने निश्चित रूप से भारत की सेमीफाइनल की राह कठिन कर दी है लेकिन टीम की उम्मीदें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जीत भारत को फिर से मजबूत स्थिति में ला सकती है। ऐसे में भारतीय खिलाड़ियों को पेनल्टी कॉर्नर के साथ गोल करने के मौकों को भुनाने और शुरुआती दबाव से बचने पर खास ध्यान देना होगा। अब टूर्नामेंट में भारत का अगला मुकाबला ही उसकी आगे की राह तय करेगा।

  • रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    नई दिल्ली। मणिपुर बीते कुछ वर्षों में भारतीय खेल जगत का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। इस छोटे से राज्य ने देश को कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने अपने जज्बे और मेहनत से भारत का नाम रोशन किया। इन्हीं नामों में एक है अनुराधा देवी थोकचोम, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय महिला हॉकी में अपनी अलग पहचान बनाई। अनुराधा न सिर्फ एक बेहतरीन खिलाड़ी रहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है।

    गरीबी से निकला हौसले का सफर
    अनुराधा देवी थोकचोम का जन्म 2 फरवरी 1989 को मणिपुर के तौबुल गांव में हुआ। उनके पिता थोकचोम चुरामणि पेशे से रिक्शा चालक थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। खेती और मछली पालन से जुड़े इस परिवार में तीन बच्चे थे। बड़े भाई फुटबॉल खेलते थे और खेल का माहौल घर में पहले से मौजूद था। हालांकि मणिपुर में फुटबॉल ज्यादा लोकप्रिय रहा है, लेकिन अनुराधा ने बहुत कम उम्र में हॉकी को अपना सपना बना लिया।

    हॉकी स्टिक से बदली किस्मत
    भाई-बहनों के मार्गदर्शन और अपने जिद्दी इरादों के चलते अनुराधा ने हॉकी स्टिक थामी। उन्होंने तोबुल यूथ क्लब से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में इम्फाल स्थित पोस्टीरियर हॉकी अकादमी में प्रशिक्षण लिया। संसाधनों की कमी के बावजूद उनका अनुशासन और मेहनत जल्द ही रंग लाने लगी और वे राज्य स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गईं।

    अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकी अनुराधा
    2006 में महिला हॉकी चैंपियंस ट्रॉफी के जरिए अनुराधा ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पदार्पण किया। फॉरवर्ड के रूप में खेलते हुए उन्होंने भारतीय टीम के लिए 80 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले। 2014-15 महिला हॉकी वर्ल्ड लीग में उनके शानदार प्रदर्शन की खूब सराहना हुई, जहां भारत ने पांचवां स्थान हासिल कर रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। 2016 के रियो ओलंपिक में भारतीय महिला टीम की 36 साल बाद वापसी में भी अनुराधा टीम का अहम हिस्सा रहीं।

    एशिया में पदक, करियर का स्वर्णिम अध्याय
    अनुराधा 2013 क्वालालंपुर एशिया कप में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं। इसके बाद 2016 में सिंगापुर में आयोजित एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम में शामिल होकर उन्होंने अपने करियर को यादगार बना दिया। इसी ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया।

    खेल के बाद नई जिम्मेदारी
    हॉकी को अलविदा कहने के बाद अनुराधा देवी थोकचोम वर्तमान में भारतीय रेलवे के लिपिक विभाग में कार्यरत हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो गरीबी भी प्रतिभा की राह नहीं रोक सकती। अनुराधा आज भी मणिपुर और देश की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।