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  • हॉकी वर्ल्ड कप में भारत को बड़ा झटका, नीदरलैंड्स ने 2-0 से हराया; अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो का मुकाबला

    हॉकी वर्ल्ड कप में भारत को बड़ा झटका, नीदरलैंड्स ने 2-0 से हराया; अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो का मुकाबला


    नई दिल्ली। महिला हॉकी विश्व कप 2026 में भारतीय टीम को दूसरे दौर के मुकाबले में नीदरलैंड्स के खिलाफ 0-2 से हार का सामना करना पड़ा है। एम्स्टलवीन में खेले गए इस मुकाबले में भारतीय टीम ने रक्षात्मक रूप से संघर्ष जरूर किया लेकिन नीदरलैंड्स के लगातार दबाव के सामने गोल करने में कामयाब नहीं हो सकी। मौजूदा ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीदरलैंड्स ने दोनों गोल पेनल्टी कॉर्नर के जरिए किए। इस हार के बाद भारतीय टीम की सेमीफाइनल की राह काफी मुश्किल हो गई है।

    मुकाबले की शुरुआत से ही नीदरलैंड्स ने आक्रामक तेवर दिखाए। मैच के दूसरे मिनट में ही मेजबान टीम को पेनल्टी कॉर्नर मिला और यिब्बी जानसेन ने इसे गोल में बदलकर भारत पर शुरुआती दबाव बना दिया। भारत ने इसके बाद खेल को संभालने की कोशिश की लेकिन नीदरलैंड्स ने गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा और भारतीय खिलाड़ियों को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखा। भारतीय गोलकीपर और डिफेंस ने कई मौकों पर शानदार बचाव किया लेकिन मेजबान टीम के आक्रमण को पूरी तरह रोकना आसान नहीं था।

    दूसरे हाफ में नीदरलैंड्स ने एक बार फिर पेनल्टी कॉर्नर के जरिए भारत की मुश्किल बढ़ा दी। 38वें मिनट में फ्रेडरिके मातला ने पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलकर मेजबान टीम की बढ़त 2-0 कर दी। इसके बाद भारतीय टीम ने वापसी के लिए कई प्रयास किए लेकिन डच रक्षापंक्ति ने भारतीय फॉरवर्ड्स को ज्यादा मौके नहीं दिए। भारत के पास कुछ अवसर जरूर आए लेकिन उन्हें गोल में बदलने में टीम नाकाम रही।

    इस मुकाबले में भारत की सबसे बड़ी परेशानी आक्रमण में नजर आई। टीम को गोल के मौके बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा जबकि नीदरलैंड्स ने अपने पेनल्टी कॉर्नर का बेहतर इस्तेमाल किया। खास तौर पर मैच के शुरुआती चरण में मिला दबाव भारतीय टीम के लिए भारी पड़ा। हालांकि भारतीय डिफेंस ने पूरे मुकाबले में हार नहीं मानी और लगातार नीदरलैंड्स के हमलों का सामना करता रहा।

    अब भारतीय टीम के सामने सबसे अहम चुनौती ऑस्ट्रेलिया की है। रविवार 23 अगस्त को होने वाला यह मुकाबला भारत के लिए करो या मरो जैसा बन गया है। भारत को सेमीफाइनल की दौड़ में बने रहने के लिए ऑस्ट्रेलिया को हराना जरूरी होगा। नीदरलैंड्स के खिलाफ हार के बाद भारत के खाते में एक अंक है जबकि ऑस्ट्रेलिया भी चीन के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ के बाद एक अंक पर है। चीन के दो अंक हैं जबकि नीदरलैंड्स छह अंकों के साथ मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है।

    भारत ने विश्व कप के पहले दौर में चीन के खिलाफ 2-2 से ड्रॉ खेला था और इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ गोलरहित ड्रॉ के जरिए दूसरे दौर में जगह बनाई थी। पूल डी में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर रहा था। अब टीम के सामने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ऐसा प्रदर्शन करने की चुनौती है जिसमें डिफेंस के साथ आक्रमण में भी बेहतर तालमेल नजर आए।

    नीदरलैंड्स के खिलाफ हार ने निश्चित रूप से भारत की सेमीफाइनल की राह कठिन कर दी है लेकिन टीम की उम्मीदें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जीत भारत को फिर से मजबूत स्थिति में ला सकती है। ऐसे में भारतीय खिलाड़ियों को पेनल्टी कॉर्नर के साथ गोल करने के मौकों को भुनाने और शुरुआती दबाव से बचने पर खास ध्यान देना होगा। अब टूर्नामेंट में भारत का अगला मुकाबला ही उसकी आगे की राह तय करेगा।

  • रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    नई दिल्ली। मणिपुर बीते कुछ वर्षों में भारतीय खेल जगत का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। इस छोटे से राज्य ने देश को कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने अपने जज्बे और मेहनत से भारत का नाम रोशन किया। इन्हीं नामों में एक है अनुराधा देवी थोकचोम, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय महिला हॉकी में अपनी अलग पहचान बनाई। अनुराधा न सिर्फ एक बेहतरीन खिलाड़ी रहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है।

    गरीबी से निकला हौसले का सफर
    अनुराधा देवी थोकचोम का जन्म 2 फरवरी 1989 को मणिपुर के तौबुल गांव में हुआ। उनके पिता थोकचोम चुरामणि पेशे से रिक्शा चालक थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। खेती और मछली पालन से जुड़े इस परिवार में तीन बच्चे थे। बड़े भाई फुटबॉल खेलते थे और खेल का माहौल घर में पहले से मौजूद था। हालांकि मणिपुर में फुटबॉल ज्यादा लोकप्रिय रहा है, लेकिन अनुराधा ने बहुत कम उम्र में हॉकी को अपना सपना बना लिया।

    हॉकी स्टिक से बदली किस्मत
    भाई-बहनों के मार्गदर्शन और अपने जिद्दी इरादों के चलते अनुराधा ने हॉकी स्टिक थामी। उन्होंने तोबुल यूथ क्लब से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में इम्फाल स्थित पोस्टीरियर हॉकी अकादमी में प्रशिक्षण लिया। संसाधनों की कमी के बावजूद उनका अनुशासन और मेहनत जल्द ही रंग लाने लगी और वे राज्य स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गईं।

    अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकी अनुराधा
    2006 में महिला हॉकी चैंपियंस ट्रॉफी के जरिए अनुराधा ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पदार्पण किया। फॉरवर्ड के रूप में खेलते हुए उन्होंने भारतीय टीम के लिए 80 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले। 2014-15 महिला हॉकी वर्ल्ड लीग में उनके शानदार प्रदर्शन की खूब सराहना हुई, जहां भारत ने पांचवां स्थान हासिल कर रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। 2016 के रियो ओलंपिक में भारतीय महिला टीम की 36 साल बाद वापसी में भी अनुराधा टीम का अहम हिस्सा रहीं।

    एशिया में पदक, करियर का स्वर्णिम अध्याय
    अनुराधा 2013 क्वालालंपुर एशिया कप में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं। इसके बाद 2016 में सिंगापुर में आयोजित एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम में शामिल होकर उन्होंने अपने करियर को यादगार बना दिया। इसी ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया।

    खेल के बाद नई जिम्मेदारी
    हॉकी को अलविदा कहने के बाद अनुराधा देवी थोकचोम वर्तमान में भारतीय रेलवे के लिपिक विभाग में कार्यरत हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो गरीबी भी प्रतिभा की राह नहीं रोक सकती। अनुराधा आज भी मणिपुर और देश की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।