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  • वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने 42 साल बाद उसी किरण विमान से भरी आखिरी उड़ान, पहले फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी रहे साथ

    वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने 42 साल बाद उसी किरण विमान से भरी आखिरी उड़ान, पहले फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी रहे साथ

    नई दिल्ली । भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को अपने लंबे फ्लाइंग करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि पूरी की। उन्होंने हैदराबाद के पास डुंडीगल स्थित एयर फोर्स एकेडमी में एचजीटी-16 किरण ट्रेनर विमान से अपनी ‘यूनिफॉर्म में आखिरी उड़ान’ भरी। इस 55 मिनट की उड़ान को खास बनाने वाली बात यह रही कि उनके साथ उनके पहले फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) वीएस कोचर भी मौजूद थे। यह उड़ान उनके चार दशक से अधिक लंबे विमानन करियर के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में सामने आई।

    एपी सिंह ने 28 जनवरी 1984 को इसी एयर फोर्स एकेडमी से किरण विमान के जरिए अपनी पहली उड़ान भरी थी। चार दशक से अधिक समय बाद उसी स्थान और उसी प्रकार के विमान में अंतिम आधिकारिक उड़ान पूरी करके उन्होंने अपने करियर के एक खास अध्याय को प्रतीकात्मक रूप से पूरा किया। विमान की पहचान संख्या U 707 थी। इस उड़ान के साथ उनकी शुरुआती प्रशिक्षण यात्रा और वर्तमान जिम्मेदारी के बीच एक अनूठा जुड़ाव देखने को मिला।

    उड़ान पूरी होने के बाद एपी सिंह ने कहा कि उन्होंने अपनी वायुसेना यात्रा इसी बेसिक ट्रेनर विमान से शुरू की थी। उन्होंने यह भी कहा कि संभवतः वह पहले ऐसे वायुसेना प्रमुख हैं, जो उसी बेसिक ट्रेनर विमान से सेवानिवृत्ति की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में उड़ाया था और जो अब भी सेवा में है। उन्होंने अपने पहले प्रशिक्षक वीएस कोचर के प्रति आभार जताते हुए कहा कि कोचर ने इसी स्थान पर उन्हें उड़ान भरना सिखाया था। इसी वजह से वह अपने फ्लाइंग करियर का यह महत्वपूर्ण पड़ाव उनके साथ पूरा करना चाहते थे।

    किरण विमान के एयर फोर्स एकेडमी के रनवे पर उतरते ही वहां मौजूद वायुसेना के अधिकारियों और जवानों ने वाटर कैनन सैल्यूट देकर उनका स्वागत किया। यह सम्मान वायुसेना में एक विशेष अवसर पर दिया जाने वाला पारंपरिक अभिनंदन है। इस मौके पर एपी सिंह के पूर्व प्रशिक्षक वीएस कोचर भी मौजूद थे। 73 वर्षीय कोचर अपने पूर्व छात्र के साथ दोबारा आसमान में उड़ान भरने के अनुभव से भावुक नजर आए।

    कोचर ने एपी सिंह की प्रशंसा करते हुए उन्हें अपने सबसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि एपी सिंह बेहतरीन वायुसेना प्रमुखों में शामिल हैं और उनके साथ दोबारा उड़ान भरना किसी सपने के सच होने जैसा है। इस अनुभव ने प्रशिक्षक और प्रशिक्षु के उस रिश्ते को भी रेखांकित किया, जो प्रशिक्षण के वर्षों बाद भी कायम रहता है।

    इससे पहले 12 अक्टूबर को एपी सिंह ने जोधपुर एयर फोर्स स्टेशन पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय अभ्यास ‘तरंग शक्ति’ के दौरान स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस में अपनी अंतिम फाइटर जेट उड़ान भरी थी। तेजस की उड़ान लड़ाकू विमान संचालन से जुड़ी उनकी यात्रा का एक अहम पड़ाव थी, जबकि किरण विमान में मंगलवार को भरी गई उड़ान वर्दी में उनकी अंतिम आधिकारिक उड़ान बनी।

    एयर चीफ मार्शल एपी सिंह की सेवानिवृत्ति इसी महीने के अंत में निर्धारित बताई गई है। ऐसे समय में अपने पहले प्रशिक्षक के साथ उसी विमान में उड़ान भरना, जिसमें उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान करियर शुरू किया था, उनके लिए विशेष महत्व रखता है। यह घटना वायुसेना के प्रशिक्षण, पेशेवर अनुशासन और अनुभव की निरंतरता को भी सामने लाती है।

    चार दशक से अधिक के फ्लाइंग करियर के इस पड़ाव में पहली उड़ान से अंतिम आधिकारिक उड़ान तक का जुड़ाव विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। जिस संस्थान और विमान से एपी सिंह ने अपने विमानन जीवन की शुरुआत की थी, उसी से जुड़कर उन्होंने वर्दी में अपनी अंतिम उड़ान पूरी की। उनके साथ पहले प्रशिक्षक की मौजूदगी ने इस अवसर को और यादगार बना दिया।

  • वायुसेना का एएन-32 विमान क्रैश होने से देश ने खोए पांच वीर सपूत, पुराने पड़ चुके परिवहन बेड़े को बदलने की प्रक्रिया तेज

    वायुसेना का एएन-32 विमान क्रैश होने से देश ने खोए पांच वीर सपूत, पुराने पड़ चुके परिवहन बेड़े को बदलने की प्रक्रिया तेज

    नई दिल्ली। असम के जोरहाट जिले में भारतीय वायुसेना का एक रूसी मूल का एएन-32 परिवहन विमान नियमित उड़ान के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस बेहद दर्दनाक हादसे में विमान में सवार वायुसेना के पांच जांबाज सैन्य कर्मियों की जान चली गई है। शहीदों की पहचान स्क्वाड्रन लीडर प्रशांत सिंह, फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार, सार्जेन्ट जितेंद्र शर्मा, अग्निवीर वायु खेमाराम कुमावत और अग्निवीर वायु दानिश आलम के रूप में की गई है। इस दुखद हादसे की खबर मिलते ही शहीदों के पैतृक आवासों और परिजनों के बीच गहरा कोहराम मच गया है।

    हादसे का शिकार हुए बत्तीस वर्षीय स्क्वाड्रन लीडर प्रशांत सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के कंडेरा गांव के निवासी थे और उनका परिवार वर्तमान में उत्तराखंड के देहरादून में निवास कर रहा है। प्रशांत अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे और करीब दो वर्ष पूर्व ही उनका विवाह हुआ था। उनकी पत्नी असम में ही वकालत के पेशे से जुड़ी हैं और घटना के वक्त वहीं उनके साथ रह रही थीं। सेवानिवृत्त केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के डिप्टी कमांडेंट उमेश सिंह के पुत्र प्रशांत की शहादत की सूचना मिलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।

    इस हादसे में बिहार ने भी अपने दो वीर सपूतों को खो दिया है। जहानाबाद जिले के हुलासगंज प्रखंड अंतर्गत बनवरिया गांव के रहने वाले फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार वर्ष 2021 में वायुसेना का हिस्सा बने थे। उन्होंने दुर्घटना से महज दो घंटे पहले ही अपनी मां से वीडियो कॉल पर बात की थी और व्यस्तता का हवाला देकर बाद में फोन करने की बात कही थी। वहीं, भोजपुर जिले के कोईलवर प्रखंड के कायमनगर निवासी बाइस वर्षीय अग्निवीर वायु दानिश आलम भी इस हादसे में वीरगति को प्राप्त हुए हैं। दानिश अक्टूबर 2025 में वायुसेना में भर्ती हुए थे और असम का जोरहाट एयरबेस उनकी पहली पोस्टिंग का स्थान था।

    राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के नावां क्षेत्र के पांचोता गांव में भी इस दुर्घटना के बाद मातम पसरा हुआ है, जहां के निवासी जांबाज अग्निवीर खेमाराम कुमावत इस विमान में तैनात थे। उनकी शहादत की खबर से पूरे गांव में शोक की स्थिति है। इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के टप्पल क्षेत्र स्थित सालपुर गांव के निवासी सार्जेन्ट जितेंद्र शर्मा भी इस हादसे में शहीद हो गए हैं। जितेंद्र वर्ष 2015 में वायुसेना में शामिल हुए थे और हाल ही में छुट्टी के दौरान उनकी शादी तय की गई थी, जिसकी तैयारियां घर में चल रही थीं।

    यह दुर्घटना वर्ष 2026 में भारतीय वायुसेना के विमानों से जुड़ी पांचवीं बड़ी घटना है। चालू वर्ष में जनवरी से अब तक प्रयागराज में एक प्रशिक्षण विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने, पश्चिमी मोर्चे पर एक तेजस विमान के रनवे से बाहर जाने, मार्च में असम के कार्बी आंगलोंग में सुखोई विमान के क्रैश होने और अप्रैल में पुणे में सुखोई की हार्ड लैंडिंग जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। कार्बी आंगलोंग हादसे में भी दो अधिकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

    बार-बार हो रहे इन हादसों के बीच वायुसेना के परिवहन बेड़े के आधुनिकीकरण की आवश्यकता को और अधिक बल मिला है। रक्षा रणनीतियों के अनुसार, वायुसेना के पुराने पड़ चुके एएन-32 और एवरो विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाने के लिए अत्याधुनिक और नई पीढ़ी के एयरबस सी-295 सैन्य परिवहन विमानों को शामिल करने की प्रक्रिया जारी है। भारत ने कुल छप्पन सी-295 विमानों की खरीद का समझौता किया है, जिसमें से सोलह विमान सीधे स्पेन से निर्मित होकर आ रहे हैं, जबकि शेष चालीस विमानों का निर्माण गुजरात के वडोदरा में घरेलू स्तर पर टाटा और एयरबस के संयुक्त उपक्रम द्वारा किया जा रहा है।

  • जोरहाट एयरफोर्स स्टेशन में AN-32 क्रैश से मचा हड़कंप, लैंडिंग के बाद लगी भीषण आग, हादसे की जांच शुरू

    जोरहाट एयरफोर्स स्टेशन में AN-32 क्रैश से मचा हड़कंप, लैंडिंग के बाद लगी भीषण आग, हादसे की जांच शुरू

    नई दिल्ली । असम के जोरहाट एयरफोर्स स्टेशन पर भारतीय वायुसेना के AN-32 परिवहन विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटना ने सैन्य और सुरक्षा तंत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। शनिवार को हुई इस घटना में विमान लैंडिंग के दौरान हादसे का शिकार हो गया। दुर्घटना के तुरंत बाद विमान में आग लग गई, जिससे एयरबेस परिसर में अफरा-तफरी की स्थिति बन गई। घटना की जानकारी मिलते ही वायुसेना की आपातकालीन टीमें मौके पर पहुंचीं और राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया।

    प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, AN-32 विमान नियमित परिचालन उड़ान पर था और जोरहाट एयरफील्ड पर उतरने की प्रक्रिया में था। इसी दौरान विमान निर्धारित रनवे पर सुरक्षित लैंडिंग नहीं कर सका और एयरबेस के भीतर स्थित घास एवं उबड़-खाबड़ क्षेत्र में जा पहुंचा। टकराव के बाद विमान को गंभीर क्षति पहुंची और उसमें आग लग गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसे के बाद तेज विस्फोट जैसी आवाज भी सुनाई दी।

    हादसे की तस्वीरों और शुरुआती रिपोर्टों से संकेत मिले हैं कि विमान दो हिस्सों में टूट गया। हालांकि दुर्घटना के कारणों को लेकर अभी कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। वायुसेना ने कहा है कि घटना के सभी पहलुओं की जांच की जाएगी और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम दुर्घटना के कारणों का विस्तृत आकलन करेगी।

    जोरहाट एयरफोर्स स्टेशन पूर्वोत्तर भारत में भारतीय वायुसेना की रणनीतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यह एयरबेस सीमावर्ती क्षेत्रों तक सैन्य रसद पहुंचाने, अभियान संचालन और आपातकालीन सहायता मिशनों में अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे पर हुए विमान हादसे को गंभीरता से लिया जा रहा है।

    AN-32 भारतीय वायुसेना के प्रमुख परिवहन विमानों में शामिल है। सोवियत मूल के इस दो इंजन वाले टर्बोप्रॉप विमान का उपयोग सैनिकों, सैन्य उपकरणों और आवश्यक सामग्री के परिवहन के लिए व्यापक स्तर पर किया जाता है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में संचालन की क्षमता के कारण यह विमान लंबे समय से वायुसेना के बेड़े का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

    हादसे के बाद एयरबेस पर सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। बचाव दलों ने आग पर नियंत्रण पाने के साथ-साथ विमान के मलबे की जांच भी शुरू कर दी है। फिलहाल किसी के हताहत होने या घायल होने को लेकर स्पष्ट और आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। वायुसेना ने कहा है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध होते ही साझा की जाएंगी।

    रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विमान दुर्घटनाओं की जांच में तकनीकी खामियों, मौसम की स्थिति, पायलट इनपुट तथा लैंडिंग प्रक्रिया से जुड़े सभी पहलुओं का गहन परीक्षण किया जाता है। इसी क्रम में इस मामले में भी विस्तृत जांच की संभावना है। दुर्घटना का वास्तविक कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

    फिलहाल पूरे घटनाक्रम पर वायुसेना और रक्षा अधिकारियों की नजर बनी हुई है। राहत एवं सुरक्षा संबंधी सभी उपायों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि जांच एजेंसियां हादसे की वजहों का पता लगाने में जुटी हैं। इस घटना ने एक बार फिर सैन्य विमानन सुरक्षा और परिचालन मानकों की समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित किया है।

  • मिराज 2000: भारत की परमाणु ताकत का अहम स्तंभ, ईरान-यूक्रेन संघर्षों में भी साबित हुआ ‘गेम चेंजर’ फाइटर जेट

    मिराज 2000: भारत की परमाणु ताकत का अहम स्तंभ, ईरान-यूक्रेन संघर्षों में भी साबित हुआ ‘गेम चेंजर’ फाइटर जेट




    नई दिल्ली। मिराज 2000 एक फ्रांसीसी मूल का 4th जनरेशन मल्टीरोल फाइटर जेट है, जिसे डसॉल्ट एविएशन ने विकसित किया था और यह कई देशों की वायु सेनाओं में लंबे समय से सेवा दे रहा है। भारत ने इस विमान को 1980 के दशक के अंत में शामिल किया था और यह आज भी भारतीय वायुसेना के सबसे भरोसेमंद लड़ाकू विमानों में से एक माना जाता है।

    भारतीय वायुसेना में मिराज 2000 का मुख्य रोल एयर डिफेंस, सटीक हमला और रणनीतिक मिशन हैं। भारत के न्यूक्लियर ट्रायड में वायु-आधारित विकल्प के तौर पर इसे एक समय पर महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म माना गया, क्योंकि यह परमाणु हथियार ले जाने और उन्हें गिराने की क्षमता रखता है। हालांकि भारत की आधिकारिक न्यूक्लियर नीति “No First Use” पर आधारित है, यानी भारत पहले परमाणु हमला नहीं करता, बल्कि केवल जवाबी कार्रवाई की रणनीति रखता है।

    मिराज 2000 की सबसे बड़ी ताकत इसकी सटीकता, तेज गति और कठिन परिस्थितियों में भी मिशन पूरा करने की क्षमता है। भारत ने कारगिल युद्ध (1999) में इसी विमान का प्रभावी इस्तेमाल किया था, जहां इसने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सटीक बमबारी कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    हाल के वर्षों में मिराज 2000 को कई अपग्रेड्स दिए गए हैं, जिससे इसकी एवियोनिक्स, रडार और हथियार प्रणाली और आधुनिक हो गई है। हालांकि अब भारत धीरे-धीरे राफेल जैसे नए लड़ाकू विमानों को शामिल कर रहा है, जो भविष्य में कुछ रणनीतिक भूमिकाएं संभाल रहे हैं।

    दुनिया के अन्य देशों में भी मिराज 2000 का उपयोग किया जाता है। यूक्रेन ने इसे रूसी ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को रोकने में काफी प्रभावी पाया है, खासकर एयर डिफेंस इंटरसेप्शन मिशनों में। वहीं UAE जैसे देशों ने भी इस विमान को लंबे समय तक अपने बेड़े में शामिल रखा है और इसे स्ट्राइक मिशनों में उपयोग किया है।

    जहां तक ईरान या किसी अन्य हालिया संघर्ष में मिराज के इस्तेमाल के दावों का सवाल है, उनकी स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन्हें पुख्ता तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर मिराज 2000 आज भी एक मजबूत और भरोसेमंद लड़ाकू विमान माना जाता है, जिसने भारत सहित कई देशों की वायु शक्ति को लंबे समय तक मजबूती दी है और अब यह धीरे-धीरे नई पीढ़ी के फाइटर जेट्स के साथ अपनी भूमिका साझा कर रहा है।

  • PM मोदी की इजरायल यात्रा और 'गोल्डन हेरोइजन' का दांव: सुखोई के साथ मिलकर अभेद्य किलों को खाक कर देगी यह मिसाइल!

    PM मोदी की इजरायल यात्रा और 'गोल्डन हेरोइजन' का दांव: सुखोई के साथ मिलकर अभेद्य किलों को खाक कर देगी यह मिसाइल!


    नई दिल्ली।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी इजरायल यात्रा को लेकर देश और दुनिया के रक्षा गलियारों में जबरदस्त हलचल है। पिछले आठ वर्षों में पीएम मोदी की यह पहली इजरायल यात्रा होगी, जिसे रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस यात्रा के दौरान रक्षा, ऊर्जा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI के क्षेत्रों में ऐतिहासिक समझौते हो सकते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इजरायल की उस ‘सीक्रेट’ मिसाइल प्रणाली की हो रही है, जिसने रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। खबरें हैं कि इजरायल ने भारत को अपनी सबसे शक्तिशाली एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम गोल्डन हेरोइजन Golden Horizon देने की पेशकश की है। यद्यपि आधिकारिक तौर पर अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है, परंतु यदि यह सौदा सिरे चढ़ता है, तो भारतीय वायुसेना की ताकत में कई गुना इजाफा होना तय है।

    गोल्डन हेरोइजन कोई साधारण मिसाइल नहीं है; यह इजरायल की उस उन्नत सैन्य तकनीक का हिस्सा है जिसे उसने हमास और ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच विशेष रूप से विकसित किया है। अक्टूबर 2024 में ईरान पर हमले से ठीक पहले लीक हुए अमेरिकी दस्तावेजों ने दुनिया को इस मिसाइल के वजूद से रूबरू कराया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह एक ऐसी मिसाइल है जिसे फाइटर जेट्स से हवा में ही दागा जा सकता है। इसकी मारक क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी अनुमानित रेंज 1,500 से 2,000 किलोमीटर के बीच है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस रेंज के साथ भारतीय विमान बिना दुश्मन की सीमा में प्रवेश किए उनके गहरे ठिकानों को तबाह कर सकते हैं।

    इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी रफ़्तार और भेदने की क्षमता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गोल्डन हेरोइजन गहरे भूमिगत बंकरों और भारी सुरक्षा वाले ढांचों को भी मिट्टी में मिलाने की शक्ति रखती है। जब इसे फाइटर जेट से छोड़ा जाता है, तो यह पहले एक निश्चित ऊंचाई तक बैलिस्टिक प्रक्षेपवक्र Trajectory का पालन करती है और फिर सीधे लक्ष्य पर काल बनकर गिरती है। अपने अंतिम चरण में इसकी गति 5 मैक ध्वनि की गति से पांच गुना से भी अधिक हो जाती है, जो इसे ‘हाइपरसोनिक’ श्रेणी के करीब खड़ा करती है। तुलनात्मक रूप से देखें तो भारत की शान कही जाने वाली ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल की गति 2.8 मैक है। यानी गोल्डन हेरोइजन न केवल रफ़्तार में बल्कि मारक क्षमता में भी एक नया बेंचमार्क स्थापित करती है।

    भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह मिसाइल गेम-चेंजर साबित हो सकती है। भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल सुखोई-30 MKI Su-30MKI जैसे शक्तिशाली विमान इस मिसाइल को ढोने और दागने के लिए पूरी तरह अनुकूल बताए जा रहे हैं। पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों के साथ बढ़ते सीमा विवादों के बीच, यह तकनीक भारत को एक ऐसा ‘स्टैंड-ऑफ’ लाभ देगी जिससे दुश्मन का एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह नाकाम हो जाएगा। गाजा युद्ध में हमास के सुरंग नेटवर्क को ध्वस्त करने वाली इस तकनीक ने अपनी उपयोगिता पहले ही साबित कर दी है।

    प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से उम्मीद है कि रक्षा क्षेत्र में केवल हथियारों की खरीद ही नहीं, बल्कि तकनीक के हस्तांतरण Technology Transfer पर भी बात होगी। यदि गोल्डन हेरोइजन भारतीय शस्त्रागार का हिस्सा बनती है, तो यह न केवल भारत की मारक क्षमता को बढ़ाएगी बल्कि दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन को भी पूरी तरह भारत के पक्ष में झुका देगी। हालांकि, दुनिया की निगाहें अब नई दिल्ली और यरुशलम से आने वाली आधिकारिक घोषणाओं पर टिकी हैं, लेकिन इतना साफ है कि यह दोस्ती आने वाले समय में दुश्मनों के लिए ‘काल’ साबित होने वाली है।