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  • व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    व्यापार से लेकर रक्षा और तकनीक तक नई ऊंचाइयों पर भारत-अमेरिका संबंध, पूर्व अमेरिकी राजदूत ने बताया लोगों के रिश्तों को सबसे बड़ी शक्ति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की सबसे बड़ी ताकत दोनों देशों के नागरिकों के बीच गहरा विश्वास और लंबे समय से बना मानवीय जुड़ाव है। भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ आई. जस्टर ने कहा कि सरकारी स्तर पर समय-समय पर परिस्थितियां बदलती रही हैं, लेकिन दोनों देशों के लोगों के बीच विकसित रिश्तों ने हमेशा इस साझेदारी को स्थिर और मजबूत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि यही भरोसा आज भारत-अमेरिका संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला बन चुका है।

    उन्होंने अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम के लीडरशिप समिट को संबोधित करते हुए कहा कि भारत और अमेरिका की निकटता केवल आधुनिक रणनीतिक समझौतों का परिणाम नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क कई सदियों पुराने हैं। उन्होंने कहा कि भौगोलिक दूरी के बावजूद दोनों देशों के संबंध दुनिया के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक साझेदारों में शामिल हैं।

    केनेथ जस्टर ने बताया कि अमेरिका ने अपने शुरुआती विदेशी कूटनीतिक मिशनों में भारत को विशेष महत्व दिया था। अमेरिका ने वर्ष 1792 में तत्कालीन कलकत्ता और 1794 में मद्रास में अपने शुरुआती राजनयिक मिशन स्थापित किए थे। उन्होंने कहा कि यह तथ्य दर्शाता है कि भारत लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता आया है।

    उन्होंने भारत की स्वतंत्रता से पहले के दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन में ब्रिटेन पर दबाव बनाया था। इसके अलावा अमेरिका ने सितंबर 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के साथ औपचारिक संबंध स्थापित कर दिए थे, जबकि भारत की स्वतंत्रता में तब भी लगभग 11 महीने का समय शेष था।

    पूर्व राजदूत ने कहा कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत के आर्थिक सुधारों ने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी। हालांकि वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद संबंधों में कुछ समय के लिए तनाव पैदा हुआ, लेकिन दोनों देशों के वरिष्ठ नेतृत्व के बीच लगातार संवाद ने इस दूरी को कम किया। इसी प्रक्रिया ने बाद में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा का मार्ग भी प्रशस्त किया और द्विपक्षीय संबंधों को नई गति मिली।

    उन्होंने कहा कि इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव आया। उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग और असैन्य परमाणु समझौता इस परिवर्तन के प्रमुख आधार बने। आगे चलकर बराक ओबामा प्रशासन ने भारत को प्रमुख रक्षा साझेदार का दर्जा दिया, जबकि ट्रंप प्रशासन के दौरान 2+2 मंत्रीस्तरीय संवाद और क्वाड सहयोग को नई मजबूती मिली। इसके बाद जो बाइडेन प्रशासन ने क्वाड को शीर्ष नेतृत्व के स्तर तक पहुंचाकर रणनीतिक सहयोग को और व्यापक बनाया।

    जस्टर ने कहा कि हाल के वर्षों में रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, निवेश और व्यापार जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2001 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 19 अरब डॉलर था, जो अब बढ़कर करीब 250 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। दोनों देश इस दशक के अंत तक इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौता इस लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    पूर्व अमेरिकी राजदूत ने कहा कि भारतवंशी समुदाय ने भी दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई देने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अमेरिका में रहने वाले 50 लाख से अधिक भारतीय मूल के लोगों ने आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बनाई है। उन्होंने 2019 के “हाउडी मोदी” और 2020 के “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये कार्यक्रम दोनों देशों के नागरिकों के बीच बढ़ते विश्वास और आपसी सद्भाव के प्रतीक हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में यही जनसंपर्क भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को और अधिक व्यापक तथा मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहेगा।

  • वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत ट्रंप की नीति पर उठे सवाल

    वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत ट्रंप की नीति पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी बार वापसी के बाद में वैश्विक भू-राजनीति का परिदृश्य तेजी से बदलता नजर आ रहा है, जहां अमेरिका की विदेश नीति एक नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में शुरुआत से ही दुनिया भर में टैरिफ और व्यापारिक दबाव की राजनीति तेज थी, जिससे कई देशों के साथ अमेरिका के संबंधों में तनाव की स्थिति बन गई थी। लेकिन ईरान संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता के बीच अमेरिकी प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसका सीधा असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ा है।

    ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिका का ध्यान व्यापारिक विवादों से हटकर सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक गठबंधनों की ओर केंद्रित हो गया। इस बदलाव ने भारत जैसे देशों के महत्व को और बढ़ा दिया, जो लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। भारत ने इस दौरान अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई, चाहे वह रूस से तेल खरीदने का मामला हो या वैश्विक व्यापारिक दबाव।

    इस पूरी स्थिति में भारत को अमेरिका का एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद साझेदार माना जाने लगा है। वाशिंगटन के लिए यह स्पष्ट हो गया है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए नई दिल्ली की भूमिका बेहद अहम है। यही कारण है कि हाल के समय में अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भारत के प्रधानमंत्री की सराहना भी देखने को मिली है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक भरोसे का संकेत माना जा रहा है।

    हालांकि, अमेरिकी नीति में यह नरमी स्थायी है या केवल परिस्थितिजन्य, इस पर अभी सवाल बने हुए हैं। ट्रंप के पिछले रुख को देखते हुए यह संभावना भी जताई जा रही है कि जैसे-जैसे वैश्विक हालात स्थिर होंगे, व्यापारिक दबाव और टैरिफ की राजनीति फिर से लौट सकती है। चीन को लेकर भी अमेरिका का रुख कुछ हद तक नरम दिखाई दे रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच पूरी तरह से विश्वास की स्थिति अभी नहीं बनी है।

    भारत ने इस पूरे घटनाक्रम में यह स्पष्ट किया है कि वह किसी दबाव में आकर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगा। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिका अपनी पुरानी नीतियों की ओर लौटता है या फिर भारत के साथ साझेदारी को एक स्थायी रणनीतिक दिशा देता है।

  • कोलकाता से नई दिल्ली तक कूटनीतिक दौरा, मार्को रूबियो की यात्रा से भारत-अमेरिका संबंधों में नई मजबूती की उम्मीद

    कोलकाता से नई दिल्ली तक कूटनीतिक दौरा, मार्को रूबियो की यात्रा से भारत-अमेरिका संबंधों में नई मजबूती की उम्मीद


    नई दिल्ली । अमेरिका के विदेश मंत्री Marco Rubio अपने चार दिवसीय भारत दौरे पर कोलकाता पहुंचे, जहां उनका औपचारिक और कूटनीतिक अंदाज में स्वागत किया गया। यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोलकाता पहुंचने के बाद उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्यालय का दौरा किया और वहां चल रहे मानवीय कार्यों की जानकारी ली।

    इस यात्रा का सबसे अहम चरण नई दिल्ली में होने वाला है, जहां Narendra Modi से उनकी उच्चस्तरीय मुलाकात प्रस्तावित है। इस बैठक में दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और दोनों देश अपनी रणनीतिक साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

    कोलकाता आगमन के दौरान अमेरिका के राजदूत ने उनका स्वागत किया और इस दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। इसके बाद रूबियो की यात्रा का फोकस नई दिल्ली पर केंद्रित हो गया है, जहां वे विदेश मंत्री S. Jaishankar सहित कई वरिष्ठ नेताओं से भी मुलाकात करेंगे।

    ऊर्जा सुरक्षा इस दौरे का एक प्रमुख एजेंडा माना जा रहा है। अमेरिका भारत के साथ तेल और गैस आपूर्ति को लेकर दीर्घकालिक सहयोग बढ़ाने की दिशा में संकेत दे चुका है। वहीं भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए वैकल्पिक और सुरक्षित आपूर्ति स्रोतों को मजबूत करने पर जोर दे रहा है। दोनों देशों के बीच इस क्षेत्र में सहयोग भविष्य की रणनीतिक साझेदारी को और गहरा कर सकता है।

    इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा 26 मई को होने वाली क्वाड देशों की विदेश मंत्रियों की बैठक है, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल होंगे। इस बैठक में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, समुद्री सहयोग और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। यह मंच तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद अहम माना जाता है।

    इस पूरे दौरे को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका दोनों ही देश लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित अपनी साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। आने वाले दिनों में इस यात्रा के नतीजे दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत ने ट्रंप के टैरिफ का तोड़ निकाला  एफटीए बना सबसे बड़ा हथियार

    भारत ने ट्रंप के टैरिफ का तोड़ निकाला एफटीए बना सबसे बड़ा हथियार


    नई दिल्ली । 2025 का वर्ष वैश्विक व्यापार के लिए एक चुनौतीपूर्ण दौर साबित हुआ खासकर भारत के लिए जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट नीति को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाते हुए भारत पर 50% आयात शुल्क लगा दिए। इस टैरिफ ने भारत के निर्यातकों को गंभीर रूप से प्रभावित किया क्योंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार था। खासकर कपड़ा रत्न-आभूषण दवा समुद्री उत्पाद और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे क्षेत्रों पर इस फैसले का असर पड़ा।

    लेकिन भारत ने इस चुनौती का सामना बड़े ही समझदारी से किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी को मजबूत करते हुए मुक्त व्यापार समझौतों का सहारा लिया जिससे न केवल निर्यात में वृद्धि हुई बल्कि कई देशों के साथ संबंध भी मजबूत हुए। नतीजतन नवंबर 2025 में भारत के कुल निर्यात में 19.4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई और अमेरिका को निर्यात में 22% से ज्यादा उछाल आया जो एक बड़ा आश्चर्य था।

    भारत ने एफटीए पर काम तेज किया

    अमेरिकी टैरिफ से जूझते हुए भारत ने तेजी से मुक्त व्यापार समझौतों पर काम करना शुरू कर दिया। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक भारत इस समय यूरोपीय संघ न्यूजीलैंड और चिली के साथ उन्नत स्तर की एफटीए वार्ता कर रहा है। इसी कड़ी में भारत ने ओमान के साथ पहला एफटीए समझौता करने की योजना बनाई जिस पर नवंबर में हस्ताक्षर किए गए। यह एफटीए दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने खासकर इंजीनियरिंग उत्पादों वस्त्र फार्मास्यूटिकल्स और कृषि उत्पादों के निर्यात को नई गति देने के लिए महत्वपूर्ण था।

    एफटीए भारत की आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा

    भारत की आर्थिक रणनीति में एफटीए अब एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुके हैं। ये समझौते भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहरी हिस्सेदारी दिलाने निर्यात में निरंतर वृद्धि और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के अवसर प्रदान करते हैं। एफटीए के माध्यम से व्यापार टैरिफ में कटौती और स्थिर व्यापार नियम भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद करते हैं साथ ही नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

    अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक चुनौतियां

    अमेरिकी टैरिफ की चुनौती के बावजूद भारत ने वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं से बचने के लिए एफटीए पर तेजी से काम किया। व्यापार विशेषज्ञ अजय श्रीवास्तव के मुताबिक भारत एफटीए को एक रणनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है जिससे निर्यात बाजारों में विविधता लाई जा सके और अमेरिका के ऊंचे टैरिफ के असर को कम किया जा सके। भारत के पास फिलहाल 26 देशों के साथ 15 एफटीए हैं और 26 अन्य देशों के साथ प्राथमिकता व्यापार समझौते हैं।

    भारत की एफटीए नीति से बढ़ा भरोसा

    हाल के वर्षों में भारत ने यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापक आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते किए हैं जिससे इन देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसी साल मई में भारत और ब्रिटेन ने भी लंबे समय से लंबित एफटीए पर सहमति की घोषणा की थी जिसके तहत भारतीय खाद्य उत्पादों और मसालों को ब्रिटेन के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी। इन समझौतों ने तेज और स्पष्ट व्यापार ढांचे की जरूरत को और मजबूत किया है।

    सरकार का रुख और भविष्य की दिशा

    भारत सरकार वैश्विक व्यापार में चुनौतीपूर्ण माहौल के बावजूद एफटीए वार्ताओं को आगे बढ़ा रही है। व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल का कहना है कि आगामी वर्ष में इन समझौतों से अच्छे नतीजे मिलेंगे। हालांकि भारत के व्यापारिक साझेदारों से ज्यादा बाजार पहुंच की मांग और छोटे किसानों और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा की चिंता बनी हुई है।

    भारत और अमेरिका के रिश्ते

    भारत और अमेरिका के रिश्तों में पिछले कुछ समय से उतार-चढ़ाव आए हैं खासकर रूस से रियायती कच्चे तेल की निरंतर खरीद को लेकर। हालांकि हाल ही में दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों में नरमी के संकेत मिले हैं। पीएम मोदी ने ट्रंप की शांति योजना की सराहना की और दोनों नेताओं ने फोन पर व्यापार और अन्य मुद्दों पर बातचीत की।

    कई देशों से हाथ मिलाने का कारण

    वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता के दौर में भारत अब एक स्थिर और आकर्षक पार्टनर के रूप में उभर रहा है। विकसित देशों जैसे ब्रिटेन यूरोपीय संघ और ईएफटीए के देशों के लिए भारत का बड़ा बाजार और सस्ते उत्पाद आकर्षण का कारण बन रहे हैं जबकि उभरते बाजार जैसे ओमान चिली क्रिटिकल मिनरल्स और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग देख रहे हैं
    भारत की एफटीए नीति वैश्विक व्यापार में बदलती परिस्थितियों के बीच उसके निर्यात और आर्थिक विकास को नई दिशा देने के लिए एक मजबूत रणनीतिक कदम साबित हो रही है। यह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा साथ ही उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करेगा।