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  • आईएनएस महेंद्रगिरी से बढ़ी भारत की समुद्री ताकत, राजनाथ सिंह बोले- आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य क्षमता का संतुलन ही भविष्य की जीत तय करेगा

    आईएनएस महेंद्रगिरी से बढ़ी भारत की समुद्री ताकत, राजनाथ सिंह बोले- आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य क्षमता का संतुलन ही भविष्य की जीत तय करेगा

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना के युद्धक बेड़े में स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट आईएनएस महेंद्रगिरी के शामिल होने के साथ भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता को एक महत्वपूर्ण मजबूती मिली है। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत अब केवल समुद्र के माध्यम से अपनी रणनीतिक दिशा तय करने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में समुद्री क्षेत्र की दिशा निर्धारित करने की क्षमता भी विकसित कर रहा है। उन्होंने इसे भारत की बढ़ती सामरिक शक्ति, आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण और वैश्विक समुद्री उपस्थिति का महत्वपूर्ण प्रतीक बताया।

    विशाखापट्टनम में आयोजित कमीशनिंग समारोह को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आईएनएस महेंद्रगिरी एक आधुनिक ब्लू-वाटर स्टील्थ फ्रिगेट है, जो तटीय क्षेत्रों तक सीमित न रहकर गहरे समुद्री क्षेत्रों में लंबे समय तक अभियान संचालित करने में सक्षम है। यह युद्धपोत समुद्री सीमाओं की सुरक्षा, रणनीतिक निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना लगातार आधुनिक तकनीक और स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के जरिए अपनी परिचालन क्षमता का विस्तार कर रही है।

    आईएनएस महेंद्रगिरी प्रोजेक्ट 17ए के तहत निर्मित छठा और अंतिम स्टील्थ फ्रिगेट है। यह परियोजना भारत के स्वदेशी युद्धपोत निर्माण कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। युद्धपोत को आधुनिक हथियार प्रणालियों, लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता, अत्याधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, पनडुब्बी रोधी हथियारों और उन्नत रक्षा उपकरणों से लैस किया गया है। इसके कारण यह समुद्र, आकाश और पानी के भीतर मौजूद संभावित खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में सक्षम माना जाता है।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में युद्ध का स्वरूप लगातार बदल रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों का महत्व तेजी से बढ़ा है, लेकिन पारंपरिक सैन्य शक्ति की आवश्यकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण बनी हुई है। उन्होंने कहा कि भविष्य के संघर्षों में आधुनिक तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी, लेकिन किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके प्रशिक्षित सैनिकों, मजबूत सैन्य ढांचे और विश्वसनीय रक्षा क्षमता से ही तय होगी।

    उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत भविष्य की तकनीकों में निवेश के साथ-साथ अपनी पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी लगातार मजबूत बना रहा है। उनके अनुसार आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सैन्य प्लेटफॉर्म एक-दूसरे के विकल्प नहीं बल्कि पूरक हैं। इतिहास यह प्रमाणित करता है कि जिन देशों ने नई तकनीकों के आकर्षण में अपनी पारंपरिक सैन्य शक्ति की उपेक्षा की, उन्हें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसलिए संतुलित रक्षा रणनीति ही राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे प्रभावी आधार बन सकती है।

    रक्षा मंत्री ने हाल के सुरक्षा अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों ने समय-समय पर यह साबित किया है कि देश की आधुनिक और पारंपरिक दोनों प्रकार की सैन्य क्षमताएं मिलकर प्रभावी परिणाम देने में सक्षम हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय नौसेना आने वाले वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाएगी। आईएनएस महेंद्रगिरी का नौसेना में शामिल होना आत्मनिर्भर भारत अभियान, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और समुद्री रणनीतिक क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। भारत लगातार अपने रक्षा ढांचे को आधुनिक बनाते हुए ऐसी सैन्य क्षमताओं का विकास कर रहा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक समुद्री संतुलन में भी उसकी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाएंगी।

  • 11 जुलाई को नौसेना के बेड़े में शामिल होगा ‘महेंद्रगिरि’, स्वदेशी तकनीक से बना अत्याधुनिक युद्धपोत बढ़ाएगा भारत की समुद्री ताकत

    11 जुलाई को नौसेना के बेड़े में शामिल होगा ‘महेंद्रगिरि’, स्वदेशी तकनीक से बना अत्याधुनिक युद्धपोत बढ़ाएगा भारत की समुद्री ताकत

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना जल्द ही अपनी समुद्री शक्ति में एक और आधुनिक युद्धपोत जोड़ने जा रही है। 11 जुलाई को विशाखापत्तनम में आयोजित विशेष समारोह के दौरान स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट ‘महेंद्रगिरि’ को औपचारिक रूप से नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा। प्रोजेक्ट-17ए श्रृंखला का यह छठा युद्धपोत देश की रक्षा आत्मनिर्भरता और अत्याधुनिक नौसैनिक तकनीक का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

    महेंद्रगिरि को भारतीय नौसेना की वर्तमान और भविष्य की समुद्री चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। इसका डिजाइन भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है, जबकि इसका निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने किया है। यह पूरी तरह स्वदेशी विशेषज्ञता और रक्षा विनिर्माण क्षमता का परिणाम है, जिससे भारत की तकनीकी दक्षता और मजबूत हुई है।

    यह युद्धपोत स्टील्थ तकनीक से लैस है, जिसके कारण दुश्मन के रडार पर इसकी पहचान सामान्य जहाजों की तुलना में काफी कम होती है। विशेष संरचना और आधुनिक डिजाइन इसे समुद्र में अधिक गोपनीय तरीके से संचालन करने में सक्षम बनाते हैं। युद्ध की स्थिति में यह विशेषता नौसेना को सामरिक बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    महेंद्रगिरि में अत्याधुनिक हथियार और आधुनिक युद्ध प्रणालियां स्थापित की गई हैं। इसमें सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें, सतह से वायु में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, आधुनिक सेंसर, पनडुब्बी रोधी हथियार और एकीकृत कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है। यह युद्धपोत एक साथ वायु, समुद्र और पनडुब्बी से आने वाले खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में सक्षम है।

    युद्धपोत में आधुनिक कंबाइंड डीजल ऑर गैस प्रणोदन प्रणाली का उपयोग किया गया है। सामान्य समुद्री गश्त के दौरान यह ईंधन की बचत करते हुए लंबी दूरी तक संचालन कर सकता है, जबकि आवश्यकता पड़ने पर गैस टर्बाइन की सहायता से तेज गति भी हासिल कर सकता है। यह क्षमता इसे लंबी अवधि के समुद्री अभियानों और विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में प्रभावी बनाती है।

    महेंद्रगिरि की एक और बड़ी विशेषता इसकी उच्च स्वदेशी भागीदारी है। इसके निर्माण में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। देश की अनेक रक्षा कंपनियों के साथ-साथ सैकड़ों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों ने इसके विभिन्न उपकरण, सेंसर, प्रणालियां और अन्य आवश्यक घटकों के निर्माण में योगदान दिया है। इससे रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित हुए हैं।

    यह युद्धपोत केवल युद्ध संचालन तक सीमित नहीं रहेगा। मानवीय सहायता एवं आपदा राहत अभियान, खोज एवं बचाव कार्य, समुद्री सुरक्षा गश्त और अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिशनों में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान राहत पहुंचाने से लेकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखने तक, महेंद्रगिरि कई प्रकार के अभियानों में प्रभावी योगदान देने में सक्षम होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक गतिविधियों और वैश्विक समुद्री व्यापार के महत्व को देखते हुए आधुनिक युद्धपोतों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में महेंद्रगिरि जैसे स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक प्रभाव को नई ऊंचाई देंगे। यह युद्धपोत आने वाले वर्षों में भारत की समुद्री शक्ति, आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और आधुनिक नौसैनिक क्षमता का महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर देश की सुरक्षा को और मजबूत करेगा।

  • आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान

    आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान


    नई दिल्ली ।
    भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में व्यापक बदलाव और तेज प्रगति का साक्षी बना है। स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों के बल पर देश ने न केवल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह वृद्धि देश की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    रक्षा क्षेत्र में यह बदलाव आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर लागू की गई विभिन्न नीतियों का परिणाम माना जा रहा है। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप रक्षा निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला।

    आज भारत के रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है। यह स्थिति उस समय से बिल्कुल अलग है जब देश मुख्य रूप से रक्षा आयात पर निर्भर माना जाता था। अब स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य उपकरण, हथियार प्रणालियां और रक्षा तकनीकें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और उत्पादन गुणवत्ता में बढ़ते विश्वास का संकेत है।

    रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों के विकास को गति मिली है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों, निगरानी तकनीकों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में अनुसंधान की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण देश की रक्षा आवश्यकताओं को स्वदेशी स्तर पर पूरा करने की क्षमता मजबूत हुई है।

    रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि ने भी इस परिवर्तन को गति प्रदान की है। पिछले दशक में रक्षा क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, अनुसंधान परियोजनाओं और उत्पादन क्षमताओं को मजबूती मिली है। रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य भी कई गुना बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। इससे रक्षा उद्योग से जुड़े हजारों उद्यमों और रोजगार अवसरों को भी लाभ मिला है।

    सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा निजी क्षेत्र और नवाचार आधारित संस्थाओं के लिए खोला गया है। इससे नई तकनीकों के विकास और रक्षा क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है। विशेषज्ञ इसे रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।

    इसके साथ ही परीक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाकर निजी कंपनियों को भी रक्षा तकनीकों के विकास में सहयोग प्रदान किया गया है। इससे रक्षा उत्पादन का दायरा केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है। इस मॉडल ने देश में रक्षा निर्माण क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निर्यात में हुई तेज वृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखती है। इससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, सामरिक साझेदारियां और रक्षा कूटनीति को मजबूती मिली है। आने वाले वर्षों में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर आधारित यह मॉडल भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग के प्रमुख देशों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।