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  • इंदौर-देवास बायपास पर हादसों का खतरा बरकरार? हाईकोर्ट में आज खुलेगी सड़क सुधार के दावों की पोल

    इंदौर-देवास बायपास पर हादसों का खतरा बरकरार? हाईकोर्ट में आज खुलेगी सड़क सुधार के दावों की पोल


    इंदौर । इंदौर-देवास बायपास की बदहाल स्थिति और सड़क सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर हाईकोर्ट में आज एक बार फिर जनहित याचिका पर सुनवाई होगी। इस सुनवाई में सबसे अहम बात यह रहेगी कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI की ओर से गड्ढे भरने और सड़क की समस्याएं दूर करने के दावे कितने सही साबित होते हैं। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मौके पर जाकर बायपास की मौजूदा स्थिति देखने और अगली सुनवाई में वास्तविक हालात की जानकारी देने के निर्देश दिए थे। अब याचिकाकर्ता की रिपोर्ट से सड़क पर हुए सुधार की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

    यह जनहित याचिका मातृ फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अमेय बजाज ने वर्ष 2021 में दायर की थी। इसमें इंदौर-देवास बायपास की खराब हालत के साथ वाहन चालकों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं। याचिका के अनुसार बायपास पर जगह-जगह बड़े गड्ढे मौजूद रहे हैं। सर्विस रोड की हालत भी खराब बताई गई है। इसके अलावा खुले ड्रेनेज जलभराव और खराब या बंद स्ट्रीट लाइट के कारण वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के चलते दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ने का मुद्दा भी याचिका में उठाया गया है।

    याचिकाकर्ता ने पहले की सुनवाई में कोर्ट को बताया था कि बायपास की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उनका आरोप था कि सड़क पर गड्ढों और अन्य खामियों के कारण हादसों का खतरा बना हुआ है। याचिका में यह भी दावा किया गया कि गड्ढे में गिरने से एक महिला की मौत हुई थी। याचिकाकर्ता ने सड़क सुरक्षा से जुड़े न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं होने का मुद्दा उठाते हुए संबंधित एजेंसियों से प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।

    पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने NHAI से यह जानकारी मांगी थी कि वर्ष 2023 में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बायपास की स्थिति सुधारने के लिए क्या कदम उठाए गए। इसके जवाब में NHAI ने तस्वीरें पेश करते हुए दावा किया था कि सड़क के गड्ढे भर दिए गए हैं और समस्याओं को दूर करने के लिए जरूरी काम किए गए हैं। हालांकि कोर्ट ने केवल इन दावों के आधार पर स्थिति को अंतिम रूप से स्पष्ट मानने के बजाय याचिकाकर्ता को स्वयं मौके पर जाकर निरीक्षण करने को कहा था।

    आज की सुनवाई में सड़क की वास्तविक स्थिति और प्राधिकरण की ओर से किए गए सुधार कार्यों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि गड्ढों की समस्या कितनी दूर हुई है और सर्विस रोड जल निकासी तथा प्रकाश व्यवस्था जैसी समस्याओं में कितना सुधार हुआ है। हालांकि सुनवाई से पहले यह कहना उचित नहीं होगा कि सभी समस्याएं दूर हो चुकी हैं या अभी भी पहले जैसी स्थिति बनी हुई है।

    याचिका में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सड़क सुरक्षा संबंधी निर्देशों के पालन का मुद्दा भी शामिल है। इसमें दुर्घटना संभावित क्षेत्रों की पहचान करने और वहां चेतावनी संकेतक लगाने के साथ पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है। अवैध पार्किंग अवैध ढाबों और व्यावसायिक अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर नियंत्रण तथा आपातकालीन सेवाओं को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया गया है।

    याचिकाकर्ता की मांग है कि संबंधित एजेंसियां बायपास की सड़क को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस कदम उठाएं। जल निकासी की उचित व्यवस्था की जाए और दुर्घटना संभावित स्थानों पर जरूरी सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित किए जाएं। अब हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि NHAI के सुधार संबंधी दावों और मौके पर सामने आने वाली स्थिति में कितना अंतर है।

  • रेलवे ट्रैक के लिए ढाई लाख पेड़ों की कटाई पर हाईकोर्ट सख्त, चोरल के जंगलों में वन्यजीवों और पर्यावरण को लेकर जताई गई चिंता

    रेलवे ट्रैक के लिए ढाई लाख पेड़ों की कटाई पर हाईकोर्ट सख्त, चोरल के जंगलों में वन्यजीवों और पर्यावरण को लेकर जताई गई चिंता


    इंदौर । इंदौर के चोरल जंगलों को बचाने के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम कदम उठाया है। सिमरोल से चोरल होते हुए बड़वाह तक प्रस्तावित रेलवे ट्रैक के निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई पर अदालत ने अंतरिम रोक लगा दी है। गुरुवार को चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोकजे और जस्टिस विनय सराफ की डिविजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए रेलवे और वन विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस परियोजना के कारण ढाई लाख से अधिक छोटे बड़े पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी।
    याचिकाकर्ता करण बैरागी की ओर से पेश अधिवक्ता मनीष यादव ने अदालत में चोरल के जंगलों के पर्यावरणीय महत्व को सामने रखा। दलील दी गई कि ये जंगल इंदौर और मालवा क्षेत्र के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। निमाड़ की ओर से आने वाली गर्म हवाओं को रोकने में भी इन जंगलों का महत्वपूर्ण योगदान बताया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से क्षेत्र का तापमान बढ़ सकता है। इसके साथ ही भूजल स्तर में गिरावट और बारिश के प्राकृतिक चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका भी जताई गई।
    याचिका में क्षेत्र में सूखे जैसी स्थिति का हवाला देते हुए कहा गया कि पिछले पांच वर्षों से गर्मियों के दौरान इंदौर का अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। ऐसे हालात में यदि ढाई लाख से अधिक पेड़ों की कटाई होती है तो मालवा और निमाड़ के पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है। अदालत में रेलवे ट्रैक के डिजाइन में किए गए बदलावों को लेकर भी सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि पहले के डिजाइन में लगभग 40 से 50 हजार पेड़ों के प्रभावित होने का अनुमान था लेकिन बाद में डिजाइन बदलने से पेड़ों की कटाई का दायरा काफी बढ़ गया।
    सुनवाई के दौरान रेलवे ट्रैक के तकनीकी पहलुओं पर भी चर्चा हुई। रेलवे की ओर से ढलान अधिक होने और सिमरोल से बड़वाह तक यात्रा में 30 से 40 मिनट अतिरिक्त लगने जैसी व्यावहारिक समस्याओं का हवाला दिए जाने की बात अदालत में रखी गई। इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि क्या वास्तव में परियोजना के लिए इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना जरूरी है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पेड़ों की कटाई पर अंतरिम रोक लगा दी।
    याचिकाकर्ता ने चोरल जंगलों में वन्यजीवों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया। अदालत में पेश दलीलों के मुताबिक क्षेत्र में बाघों के 37 और तेंदुओं के 89 पगमार्क दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा चीतल सांभर लोमड़ी मोर और जंगली खरगोश जैसे वन्यजीव भी यहां पाए जाते हैं। आशंका जताई गई कि जंगलों का बड़ा हिस्सा प्रभावित होने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है। याचिका में यह दावा भी किया गया कि क्षेत्र में लगभग 58 स्थानीय वृक्ष प्रजातियां दुर्लभ होती जा रही हैं और सलाई जैसे पेड़ों का दायरा भी घट रहा है।
    सुनवाई के दौरान जस्टिस विनय सराफ ने जबलपुर खंडपीठ के एक पुराने आदेश का उल्लेख किया। उस मामले में जंगलों की कटाई पर रोक लगाते हुए सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक छंटाई की अनुमति दी गई थी। इसी संदर्भ में चोरल जंगलों के मामले में भी पेड़ों की कटाई रोकने का आदेश जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने वन भूमि के उपयोग और पेड़ों की कटाई से जुड़े दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत कराने के साथ ही वानिकी वन्यजीव पारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञों की स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। फिलहाल हाईकोर्ट की अंतरिम रोक से प्रस्तावित कटाई पर विराम लग गया है। अब रेलवे और वन विभाग के जवाब के बाद मामले में आगे की दिशा स्पष्ट होगी।

  • परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र

    परिवार के विरोध के बावजूद जैन दीक्षा लेना चाहती है 20 साल की युवती हाई कोर्ट ने कहा फैसला लेने के लिए स्वतंत्र


    इंदौर । मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 20 वर्षीय युवती के जैन दीक्षा लेने के फैसले को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। युवती सांसारिक जीवन छोड़कर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना चाहती है लेकिन उसके परिवार के लोग उसके इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। उसे अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और धार्मिक जीवन अपनाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    मामला इंदौर से जुड़ा है जहां युवती ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा की मांग की थी। युवती ने बताया कि वह श्वेतांबर जैन धर्म से प्रभावित है और लंबे समय से धार्मिक जीवन अपनाने की इच्छा रखती है। उसका उद्देश्य सांसारिक जीवन से अलग होकर जैन साध्वी के रूप में दीक्षा लेना है। हालांकि उसके माता पिता और अन्य रिश्तेदार इस निर्णय से सहमत नहीं हैं।

    युवती को आशंका थी कि परिवार के सामाजिक प्रभाव के कारण उसके फैसले में बाधा डाली जा सकती है। इसी आशंका को लेकर उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अपनी स्वतंत्रता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

    मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन भट्ट की एकल पीठ ने की। कोर्ट ने युवती के माता पिता की भावनाओं को भी समझा और उनके दुख तथा चिंता के प्रति सहानुभूति जताई। हालांकि न्यायालय ने यह भी साफ किया कि युवती बालिग है और अपने जीवन की दिशा तय करने का उसे अधिकार है।

    कोर्ट ने कहा कि किसी बालिग नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी धर्म या जीवन पद्धति को अपनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी तरह यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से धार्मिक जीवन अपनाना चाहता है तो उसके इस अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए। न्यायालय ने युवती के मौलिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना।

    हाई कोर्ट ने युवती को अपनी सुरक्षा के लिए संबंधित थाना प्रभारी के समक्ष आवेदन देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आवेदन मिलने के बाद पुलिस को उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने होंगे। इस आदेश के जरिए न्यायालय ने युवती के दीक्षा लेने के व्यक्तिगत फैसले पर सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय उसकी स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

    मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें एक बालिग युवती की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल सामने आया है। परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए भी कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन और आस्था से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता हासिल है। अब युवती अपनी इच्छा के अनुसार आगे की धार्मिक प्रक्रिया अपना सकती है और पुलिस उसकी सुरक्षा को लेकर आवश्यक कदम उठाएगी।

  • लापता महिलाओं और बच्चों की तलाश पर हाई कोर्ट का बड़ा सवाल: कितने केस लंबित, पुलिस ने अब तक क्या किया?

    लापता महिलाओं और बच्चों की तलाश पर हाई कोर्ट का बड़ा सवाल: कितने केस लंबित, पुलिस ने अब तक क्या किया?


    इंदौर। इंदौर जिले में महिलाओं और बच्चों के लापता होने के मामलों को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने वर्ष 2021 से अब तक लापता हुई महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों का विस्तृत रिकॉर्ड राज्य सरकार से मांगा है। डबल बेंच ने सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए यह बताने को कहा है कि इस अवधि में कितने लोग लापता हुए हैं। इनमें से कितनों को पुलिस बरामद कर चुकी है और कितने मामले अभी भी लंबित हैं। अदालत ने उन मामलों की वर्तमान स्थिति की जानकारी भी मांगी है जिनमें अब तक लापता महिलाओं और बच्चों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

    यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है जिसमें इंदौर जिले में महिलाओं और बच्चों के लगातार लापता होने तथा उनकी तलाश में देरी का मुद्दा उठाया गया है। याचिका में कहा गया है कि सिर्फ लापता होने के मामलों की संख्या सामने रखना पर्याप्त नहीं है बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पुलिस और प्रशासन ने उनकी तलाश के लिए अब तक क्या कार्रवाई की है। खासतौर पर लंबे समय से लंबित मामलों में जांच किस स्तर पर पहुंची है और संबंधित अधिकारियों ने उन्हें सुलझाने के लिए क्या प्रयास किए हैं इसकी जानकारी भी सामने आनी चाहिए। अदालत के निर्देश के बाद अब सरकार को इन सभी पहलुओं पर जवाब देना होगा।

    याचिकाकर्ता की ओर से लापता महिलाओं और बच्चों के मामलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग भी की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसे मामलों की नियमित और स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि पुलिस की कार्रवाई किस दिशा में आगे बढ़ रही है और किन मामलों में अतिरिक्त प्रयास की जरूरत है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के स्तर पर इन प्रकरणों की समय समय पर समीक्षा करने की मांग भी रखी गई है। साथ ही एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को अधिक प्रभावी बनाने और पुलिस प्रशासन तथा दूसरे संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत बताई गई है।

    मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि लापता महिलाओं और बच्चों की तलाश केवल एक सामान्य पुलिस प्रक्रिया नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और गरिमा से जुड़ा संवेदनशील विषय है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी महिला या बच्चे के लापता होने के बाद शुरुआती समय में तेजी से कार्रवाई बेहद महत्वपूर्ण होती है। लंबे समय तक मामला लंबित रहने पर परिवार की चिंता बढ़ने के साथ तलाश की प्रक्रिया भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

    इस मामले में विशेषज्ञ समिति बनाने के साथ केंद्र सरकार की ओर से जारी दिशा निर्देशों के प्रभावी पालन की मांग भी की गई है। अदालत से यह आग्रह किया गया है कि लापता महिलाओं और बच्चों के मामलों की निगरानी के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए और जिलेवार आंकड़ों को नियमित रूप से सामने लाया जाए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार याचिका में सरकारी आंकड़ों की उपलब्धता और उन्हें सार्वजनिक किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

    अब हाई कोर्ट के नोटिस के बाद राज्य सरकार और संबंधित विभागों को वर्ष 2021 से अब तक के मामलों का विस्तृत ब्यौरा अदालत के सामने रखना होगा। इसमें लापता महिलाओं और बच्चों की संख्या बरामदगी की स्थिति लंबित मामलों की संख्या और उनकी तलाश के लिए की गई कार्रवाई शामिल हो सकती है। आगामी सुनवाई में इन आंकड़ों के सामने आने के बाद यह तस्वीर और स्पष्ट होगी कि इंदौर जिले में लापता महिलाओं और बच्चों के मामलों में पुलिस की कार्रवाई किस स्थिति में है और लंबे समय से लंबित मामलों को लेकर आगे क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

  • हाईकोर्ट में 31 अस्पतालों की सुनवाई ने पकड़ा नया मोड़, गलत जांच रिपोर्ट और अवैध संचालन के आरोपों से बढ़ी मुश्किलें

    हाईकोर्ट में 31 अस्पतालों की सुनवाई ने पकड़ा नया मोड़, गलत जांच रिपोर्ट और अवैध संचालन के आरोपों से बढ़ी मुश्किलें


    इंदौर । इंदौर के 31 अस्पतालों की वैधता और स्वास्थ्य संबंधी नियमों के पालन को लेकर दायर जनहित याचिका में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में गुरुवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट के निर्देश के अनुसार याचिकाकर्ता एडवोकेट चर्चित शास्त्री ने अपना रिजाइंडर यानी प्रत्युत्तर अदालत में पेश किया जिसमें सीएमएचओ डॉ माधव हासानी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई जांच रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाती और इससे नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया गया है।

    रिजाइंडर में कहा गया है कि सीएमएचओ की ओर से कोर्ट में दी गई रिपोर्ट भ्रामक है और उसमें वास्तविक स्थिति को पूरी तरह सामने नहीं रखा गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि गलत तथ्यों के आधार पर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई ताकि बिना नियमों का पालन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई प्रभावित हो सके।

    याचिकाकर्ता ने अपने प्रत्युत्तर के साथ कई ऐसे दस्तावेज भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जिनके बारे में दावा किया गया कि वे कूटरचित हैं। इसके अलावा कुछ अस्पतालों के ऐसे रिकॉर्ड भी पेश किए गए जिनके संबंध में कहा गया कि वे आवश्यक वैधानिक अनुमति और पंजीयन के बिना संचालित हो रहे हैं जबकि आधिकारिक दस्तावेजों में अलग स्थिति दिखाई गई है। याचिका में यह भी कहा गया कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

    इससे पहले हुई सुनवाई में भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि जिन 31 अस्पतालों के संबंध में मामला लंबित है उनके स्थान पर 34 संस्थानों की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। साथ ही विनायक पैथोलॉजी लैब और लेडी हलीमा हॉस्पिटल को सील किए जाने से जुड़े कथित फर्जी आदेश भी रिकॉर्ड पर रखने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा कुछ अस्पतालों की ओर से नगर निगम के कथित फर्जी शपथ पत्रों के आधार पर भवन अनुमति से जुड़े दस्तावेज पेश किए जाने का दावा भी किया गया।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि जनहित याचिका दायर करने के बाद उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और हमले की कोशिशें भी हुई हैं। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी है और उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।

    अब ताजा सुनवाई में पेश किए गए रिजाइंडर और उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। कोर्ट यह जांच करेगी कि प्रस्तुत रिपोर्ट और रिकॉर्ड में कितनी सच्चाई है तथा यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या गलत जानकारी दी गई है तो उसके लिए क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले का फैसला इंदौर के स्वास्थ्य तंत्र और निजी अस्पतालों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में अस्पतालों के संचालन और नियामकीय व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है।

  • महिला की मर्जी सर्वोपरि, गर्भ रखना या गिराना उसका अधिकार; इंदौर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

    महिला की मर्जी सर्वोपरि, गर्भ रखना या गिराना उसका अधिकार; इंदौर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कानून में निर्धारित समय सीमा के भीतर गर्भावस्था को जारी रखना है या समाप्त करना इसका अंतिम निर्णय महिला का होगा। अदालत ने कहा कि गर्भपात के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है क्योंकि महिला की शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार हैं।

    यह मामला इंदौर संभाग के एक विवाहित दंपती से जुड़ा है जिनकी शादी को करीब दो वर्ष हुए थे। वैवाहिक जीवन के दौरान दोनों के बीच लगातार विवाद बढ़ते गए और इसी दौरान महिला गर्भवती हो गई। जब गर्भावस्था लगभग 13 सप्ताह की थी तब दंपती अलग रहने लगे। महिला ने अदालत को बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में वह गर्भ जारी नहीं रखना चाहती क्योंकि इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    महिला ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी। याचिका में कहा गया कि पति के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय लगभग तय हो चुका था लेकिन बाद में पति अपने रुख से पीछे हट गया। ऐसे में गर्भावस्था को जारी रखना उसके लिए मानसिक तनाव और भावनात्मक पीड़ा का कारण बन रहा है।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पति को नोटिस जारी किया था लेकिन वह न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। राज्य सरकार की ओर से भी याचिका का विरोध नहीं किया गया। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।

    अपने आदेश में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक महिला को अपनी शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का मानसिक और शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक महिला पर पड़ता है इसलिए अंतिम निर्णय भी उसी का होना चाहिए।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला की गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 में निर्धारित समय सीमा के भीतर थी। इसलिए अधिकृत चिकित्सक कानून के अनुसार गर्भसमापन की प्रक्रिया कर सकते हैं। न्यायालय ने यह भी माना कि पति पत्नी का अलग रहना वैवाहिक संबंधों में गंभीर विवाद या तलाक जैसी परिस्थितियां गर्भपात की अनुमति देने के लिए वैध आधार हो सकती हैं।

    फैसले में अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिला की गरिमा मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोच्च प्राथमिकता है। साथ ही न्यायालय ने चिकित्सकों को निर्देश दिए कि गर्भपात की पूरी प्रक्रिया स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा निर्देशों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप पूरी संवेदनशीलता और सावधानी के साथ की जाए।

  • ‘वायरल गर्ल’ की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई टली, जन्म प्रमाण पत्र को लेकर उठी आपत्तियां; 23 जून को होगी अगली सुनवाई

    ‘वायरल गर्ल’ की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई टली, जन्म प्रमाण पत्र को लेकर उठी आपत्तियां; 23 जून को होगी अगली सुनवाई


    मध्‍य प्रदेश । इंदौर स्थित Madhya Pradesh High Court में शुक्रवार को सोशल मीडिया पर चर्चित ‘वायरल गर्ल’ की याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनके जन्म और पहचान संबंधी दस्तावेजों में कथित रूप से हेरफेर कर उन्हें नाबालिग साबित करने की कोशिश की गई, जिससे उनकी वैध शादी को विवादित बनाया जा सके। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से याचिका में मौजूद कमियों और जन्म प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि को लेकर आपत्तियां दर्ज की गईं। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आवश्यक सुधार करने के लिए समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 23 जून को निर्धारित कर दी।

    याचिका में दावा किया गया है कि उनके जन्म रिकॉर्ड से जुड़े दस्तावेजों में बदलाव किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उनके पिता द्वारा जन्म संबंधी अभिलेखों में छेड़छाड़ कर उन्हें वास्तविक उम्र से कम दिखाने का प्रयास किया गया। याचिका के अनुसार छोटे भाई के दस्तावेजों को उनके दस्तावेज बताकर प्रस्तुत किया गया, जिससे उनकी आयु को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई। याचिकाकर्ता का कहना है कि वह बालिग हैं और उनके आधिकारिक रिकॉर्ड में कथित हस्तक्षेप की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

    मामले ने उस समय अधिक तूल पकड़ा जब मार्च 2026 में विवाह के बाद उनकी उम्र को लेकर विवाद खड़ा हो गया। याचिका में कहा गया है कि फिल्म शूटिंग के सिलसिले में केरल प्रवास के दौरान उनकी मुलाकात एक युवक से हुई थी, जिसके बाद दोनों ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर इस संबंध को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।

    इसी बीच National Commission for Scheduled Tribes की ओर से विवाह के समय याचिकाकर्ता की उम्र को लेकर आशंका व्यक्त की गई थी। इसके बाद मामले में पुलिस जांच शुरू हुई और उपलब्ध शिकायतों एवं दस्तावेजों के आधार पर युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। हालांकि उम्र संबंधी विवाद और दस्तावेजों की सत्यता का मुद्दा अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि विवाह को सोशल मीडिया पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया और इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। याचिकाकर्ता और उनके पति ने अदालत से अनुरोध किया है कि मूल जन्म प्रमाण पत्र को बहाल किया जाए तथा रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए।

    शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता P. V. Dinesh वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में उपस्थित हुए। राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष ने याचिका में तकनीकी खामियों और जन्म प्रमाण पत्र की प्रतिलिपि की स्पष्टता को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद अदालत के समक्ष जन्म प्रमाण पत्र की मूल प्रति प्रस्तुत की गई।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकीलों को निर्देश दिया कि वे याचिका में मौजूद त्रुटियों को दूर करें और दस्तावेजों की स्पष्ट एवं प्रमाणित प्रतियां रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें। अदालत ने इसके लिए 10 दिन का समय प्रदान किया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 23 जून को होगी, जहां संशोधित दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर आगे विचार किया जाएगा।

  • भोजशाला परिसर विवाद पर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी, सभी पक्षों को दस्तावेज सौंपने के निर्देश

    भोजशाला परिसर विवाद पर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी, सभी पक्षों को दस्तावेज सौंपने के निर्देश


    मध्य प्रदेश/धार: मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े विवाद मामले में इंदौर हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान अदालत ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं, जिनसे मामले की जांच और पारदर्शिता की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को आदेश दिया है कि 98 दिनों तक चले सर्वे की पूरी वीडियोग्राफी संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराई जाए। इसके साथ ही स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी पक्षों को वीडियो रिकॉर्डिंग सौंप दी जाए, ताकि वे अपने तर्क और दावे इन साक्ष्यों के आधार पर प्रस्तुत कर सकें।

    इस मामले में भोजशाला परिसर के अधिकार को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद जारी है और अदालत में इस विषय पर नियमित सुनवाई हो रही है। याचिका मुस्लिम पक्ष की ओर से कमाल मौला वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा दायर की गई है, जिस पर डबल बेंच में सुनवाई की जा रही है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से अपने कानूनी तर्क और ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न न्यायिक निर्णयों और पूर्व मामलों का उल्लेख भी शामिल है।

    सुनवाई के दौरान कानूनी बहस मुख्य रूप से टाइटल विवाद, साक्ष्यों की स्वीकार्यता और याचिका की वैधता जैसे मुद्दों पर केंद्रित रही। मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से प्रस्तुत दलीलों में यह कहा गया कि एएसआई सर्वे की रिपोर्ट और उसकी प्रक्रिया को लेकर पहले भी न्यायालयों द्वारा कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं, जिन्हें इस मामले में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सर्वे प्रक्रिया के दौरान कुछ पहलुओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई थीं। उनका कहना है कि सर्वे के दौरान की गई खुदाई और रिकॉर्डिंग में कुछ अवशेषों को लेकर असमानता देखने को मिली है, जिससे मामले की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि वीडियोग्राफी से वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी और अदालत के समक्ष सभी पक्षों के दावों का सही मूल्यांकन संभव हो सकेगा।

    दूसरी ओर, पक्षकारों का कहना है कि सर्वे के दौरान विभिन्न धार्मिक और ऐतिहासिक अवशेषों को रिकॉर्ड किया गया है और इन्हें कानूनी प्रक्रिया के तहत प्रस्तुत किया गया है। इस पूरे मामले में दोनों पक्ष अपने अपने दावों को मजबूत करने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों पर आधारित दलीलें पेश कर रहे हैं।

    अदालत के इस आदेश के बाद अब सभी पक्षों को 27 अप्रैल तक संबंधित वीडियो क्लिप्स उपलब्ध कराई जाएंगी, जिसके बाद मामले की आगे की सुनवाई में इन साक्ष्यों के आधार पर तर्क प्रस्तुत किए जाएंगे। यह निर्णय मामले की पारदर्शिता और निष्पक्ष सुनवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे आगे की कानूनी प्रक्रिया और स्पष्ट हो सकेगी।

  • MP: पाकिस्तानी पति-पति का पारिवारिक विवाद पहुंचा इंदौर HC, पत्नी ने लगाई पति को वापस भेजने की गुहार

    MP: पाकिस्तानी पति-पति का पारिवारिक विवाद पहुंचा इंदौर HC, पत्नी ने लगाई पति को वापस भेजने की गुहार


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) में पारिवारिक विवाद का एक बेहद खास मामला सुनवाई के लिए आया है, जिसमें पति-पत्नी दोनों पाकिस्तान (Husband and Wife Pakistani) के रहने वाले हैं, हालांकि पति बीते कुछ सालों से भारत में रह रहा है। अब इस कपल ने पारिवारिक सुलह के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। दरअसल इस हिंदू जोड़े की शादी साल 2020 में पाकिस्तान में हुई थी, और शादी के कुछ समय बाद से ही यह दोनों अलग-अलग देशों में रह रहे हैं। इस दौरान सुलह-समझौते की तमाम कोशिशें नाकाम होने के बाद दोनों के बीच विवाद का यह मुद्दा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय पहुंच गया है। महिला ने पति पर आरोप लगाया है कि वह दूसरी शादी करने की तैयारी कर रहा है, वहीं पति का कहना है कि उसकी पत्नी उससे धन ऐंठने के लिए यह सब कर रही है।


    पत्नी का आरोप- पति करने जा रहा दूसरी शादी

    प्राप्त जानकारी के अनुसार पाकिस्तानी महिला निकिता देवी (28) ने उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में रिट याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता निकिता पाकिस्तान के कराची शहर की रहने वाली है। उसने अपने पति विक्रम कुमार नागदेव (35) पर बिना तलाक दिए दूसरी शादी की तैयारी करने का आरोप लगाया है और अदालत से उसे भारत से वापस पाकिस्तान भेजने की गुहार लगाई है।


    लॉन्ग टर्म वीजा पर इंदौर में रह रहा पाकिस्तानी शख्स

    अधिकारियों के मुताबिक पति-पत्नी पाकिस्तान के नागरिक हैं और उनकी शादी 26 जनवरी 2020 को वहां के सिंध प्रांत में हुई थी। फिलहाल महिला का पति लंबी अवधि के वीजा (LTV) के आधार पर इंदौर में रह रहा है। पाकिस्तानी महिला ने याचिका में आरोप लगाया है कि उसके पति ने उसे छोड़ दिया है और वह भारत में रहने वाली एक महिला से मार्च 2026 में गैरकानूनी तौर पर दूसरी शादी की तैयारी कर रहा है।

    याचिकाकर्ता के वकील दिनेश रावत ने गुरुवार को बताया कि पाकिस्तान में अपने मायके में रह रही निकिता ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर की है जिस पर अगले हफ्ते सुनवाई हो सकती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के मामलों में अलग-अलग रिट (औपचारिक आदेश) जारी करने की शक्ति देता है।


    महिला की गुहार- पति उठा रहा बेजा फायदा

    पाकिस्तानी महिला के वकील ने बताया, ‘मेरी मुवक्किल ने याचिका में उच्च न्यायालय से गुहार लगाई है कि कानूनी जटिलताओं का बेजा फायदा उठा रहे उनके पति को भारत में दूसरी शादी करने से रोका जाए और वापस पाकिस्तान भेज दिया जाए।’


    पति बोला- वह अपनी मर्जी से पाकिस्तान लौटी थी

    उधर, निकिता के पति ने अपनी पत्नी के आरोपों को खारिज किया है। नागदेव ने कहा, ‘पाकिस्तान में शादी के बाद हम भारत आ गए थे। इसके थोड़े समय बाद मेरी पत्नी अपनी मर्जी से पाकिस्तान लौट गई थी। वह भारत आने या आपसी सहमति से तलाक लेने को राजी नहीं हुई। मैंने अपने समुदाय की पंचायतों के जरिए भी पारिवारिक विवाद सुलझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी।’


    शख्स ने कहा- अब पत्नी को तलाक देना चाहता हूं

    शख्स ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी पारिवारिक विवाद के बहाने उससे धन ऐंठने की कोशिश कर रही है। नागदेव का कहना है कि वह एलटीवी के आधार पर इंदौर में रह रहा है और तमाम भारतीय कानूनों का पालन कर रहा है। उसने कहा, ‘अब मैं अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता हूं। उसने मुझे देश-विदेश में बदनाम करके मानसिक रूप से परेशान कर दिया है।’


    सिंधी पारिवारिक परामर्श केंद्र भी पहुंचा था मामला

    पाकिस्तानी दंपति का यह पारिवारिक विवाद उच्च न्यायालय से पहले, इंदौर के ‘सिंधी पंच मध्यस्थता एवं विधिक परामर्श केंद्र’ पहुंचा था, लेकिन वहां कोई समझौता नहीं हो सका। केंद्र के प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने बताया, ‘मेरी कई कोशिशों के बाद भी दोनों पक्षों के बीच सुलह-समझौता नहीं हो सका। इसके बाद मैंने जिला प्रशासन के सामने पेश अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि नागदेव को वापस पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए क्योंकि वह और उसकी पत्नी दोनों पाकिस्तानी नागरिक हैं तथा उनके पारिवारिक विवाद का न्याय क्षेत्र पाकिस्तान है।’

    मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी कहलाने वाले इंदौर में लंबी अवधि के वीजा (एलटीवी) या रेजिडेंशियल परमिट के आधार पर सिंधी हिंदू समुदाय के उन शरणार्थियों की बड़ी आबादी रहती है जो कथित प्रताड़ना के चलते पाकिस्तान से पलायन कर भारत आए हैं।