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  • ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद LoC पर बढ़ी सतर्कता, लश्कर जैश और हिज्बुल की गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

    नई दिल्ली । भारत-पाकिस्तान सीमा पर सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। खुफिया इनपुट के हवाले से सामने आई जानकारी में दावा किया गया है कि नियंत्रण रेखा के पार 500 से अधिक आतंकियों के भारत में घुसपैठ के मौके का इंतजार करने की आशंका है। इस बीच पाकिस्तान की रणनीति में भी बदलाव की बात सामने आई है, जिसके तहत लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ाने की कोशिश किए जाने का दावा किया गया है।

    रिपोर्टों के अनुसार, इन संगठनों की गतिविधियों पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की निगरानी और नियंत्रण पहले की तुलना में अधिक बढ़ा है। पहले अलग-अलग आतंकी संगठनों के अपने कमांड ढांचे और नेतृत्व के माध्यम से गतिविधियां संचालित होने की बात कही जाती थी। अब इनके बीच तालमेल को एक केंद्रीय व्यवस्था के तहत मजबूत किए जाने का दावा किया जा रहा है।

    खुफिया अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से आतंकी नेटवर्क को लेकर पुनर्गठन किया गया है। इसका कथित उद्देश्य अलग-अलग संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और उनकी गतिविधियों पर केंद्रीय स्तर से निगरानी बढ़ाना है। हालांकि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी से नहीं हुई है।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता नियंत्रण रेखा के पार मौजूद संभावित आतंकियों की संख्या को लेकर है। रिपोर्ट में 500 से अधिक आतंकियों के घुसपैठ के अवसर की प्रतीक्षा करने की आशंका जताई गई है। ऐसे इनपुट के बाद सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ना स्वाभाविक है।

    बताया गया है कि हाल के महीनों में लश्कर-ए-तैयबा की गतिविधियों में तेजी देखी गई है, जबकि जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन की गतिविधियों में अपेक्षाकृत कमी का आकलन किया गया है। सुरक्षा एजेंसियां इसे पाकिस्तान की बदली हुई रणनीति के संदर्भ में देख रही हैं।

    रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि पाकिस्तान अब जम्मू-कश्मीर में स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने पर अधिक जोर दे रहा है। स्थानीय युवाओं को प्रभावित करने और आतंकी नेटवर्क से जोड़ने की कोशिशों की आशंका सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसे प्रयासों का उद्देश्य सीमा पार से होने वाली गतिविधियों के साथ स्थानीय नेटवर्क को जोड़ना बताया जा रहा है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अलग-अलग आतंकी संगठनों के बीच समन्वय बढ़ता है तो सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती का स्वरूप बदल सकता है। इसी वजह से सीमा सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी और आतंकवाद के लिए होने वाली भर्ती को रोकना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    भारत की सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिशों को लेकर सतर्क रही हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव के बीच इस तरह के इनपुट को और गंभीरता से देखा जा रहा है। हालांकि किसी भी खुफिया आकलन को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी पुष्टि जरूरी होती है।

    फिलहाल 500 से अधिक आतंकियों की संभावित मौजूदगी और आतंकी संगठनों पर आईएसआई के बढ़ते नियंत्रण से जुड़े दावे सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय हैं। आने वाले दिनों में सीमा पर गतिविधियों, घुसपैठ के प्रयासों और जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी।

  • J&K: सुरक्षा बलों ने LoC पर घुसपैठ की कोशिश को किया नाकाम… आतंकियों को खदेड़ा

    J&K: सुरक्षा बलों ने LoC पर घुसपैठ की कोशिश को किया नाकाम… आतंकियों को खदेड़ा


    श्रीनगर।
    जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) के राजौरी जिले (Rajouri district) में नियंत्रण रेखा (LoC) पर शनिवार को सुरक्षा बलों ने मुस्तैदी दिखाते हुए घुसपैठ (Infiltration) की एक संभावित कोशिश को नाकाम कर दिया। अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, सीमा पर तैनात सेना के जवानों ने एक संदिग्ध गतिविधि देखने के बाद फायरिंग शुरू कर दी। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार यह घटना शुक्रवार रात करीब 10 बजे राजौरी के तारकुंडी फॉरवर्ड एरिया में हुई।

    सीमा की रखवाली कर रहे सतर्क जवानों ने कुछ संदिग्ध आतंकवादियों को भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश करते देखा, जिसके बाद सैनिकों ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए छोटे हथियारों से फायरिंग शुरू कर दी। भारतीय सेना की इस कार्रवाई के बाद सीमा पार पाकिस्तान की ओर से भी जवाबी फायरिंग की गई। दोनों तरफ से यह गोलाबारी करीब डेढ़ घंटे तक रुक-रुक कर चलती रही। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस पूरी घटना में भारतीय पक्ष की ओर से किसी भी तरह के जान-माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है।


    इलाके में हाई अलर्ट, तलाशी अभियान शुरू

    शनिवार सुबह होते ही सेना ने पूरे तारकुंडी और उसके आस-पास के इलाकों की घेराबंदी कर एक बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रात के अंधेरे और गोलीबारी का फायदा उठाकर कोई घुसपैठिए भारतीय क्षेत्र में छिपने में कामयाब तो नहीं रहा। फिलहाल पूरे इलाके को कड़े पहरे में रखा गया है और आधुनिक उपकरणों के जरिए निगरानी को काफी बढ़ा दिया गया है।

    आपको बता दें कि जैसलमेर जिला प्रशासन ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे इलाकों में सरकारी जमीन पर बनी छह कथित अवैध मस्जिदों और मदरसों की इमारतों को अतिक्रमण रोधी अभियान के तहत हटा दिया। यह कार्रवाई बीते गुरुवार को प्रशासन के ‘ऑपरेशन क्लीन’ के तहत नाचना, तनोट और शाहगढ़ इलाकों में की गई। अधिकारियों ने बताया कि यह अभियान मीरपुर, हिंदोलों की ढाणी, अहमदपुरा और धानाना जैसे गांवों में चलाया गया। राजस्व, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में जेसीबी का इस्तेमाल कर इन ढांचों को हटा दिया गया।

    प्रशासन के अनुसार, जिन निर्माण या ढांचों को ढहाया गया वे सरकारी जमीन पर बनाए गए थे, जिसमें पोंग बांध परियोजना से विस्थापित परिवारों के लिए आरक्षित जमीन भी शामिल है। इसने कहा कि जिन गांवों या ढाणियों में अभियान चला गया वे अंतरराष्ट्रीय सीमा के लगभग 50 किलोमीटर के दायरे में आते हैं। सीमावर्ती क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए ‘ऑपरेशन’ के दौरान पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की भारी तैनाती रही।

  • पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    नई दिल्ली । वर्ष 1971 में पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों और सैन्य बर्बरता के परिणामस्वरूप तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह की जो आग भड़की थी, उसने इतिहास की दिशा बदलते हुए बांग्लादेश को जन्म दिया था। आज करीब 55 साल बाद, इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। इस बार बगावत का यह मुख्य केंद्र पूर्वी पाकिस्तान नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर यानी पीओके बना हुआ है। पिछले कई दिनों से जारी भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई है और राजनीतिक विश्लेषक अब पाकिस्तान के एक और संभावित विभाजन की अटकलें लगाने लगे हैं।

    पीओके के मुजफ्फरराबाद, डड्याल, रावलकोट और मीरपुर जैसे प्रमुख शहरों में स्थानीय अवाम अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे आटा, चावल और सस्ती बिजली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी है। इस शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा अत्यधिक दमनकारी नीतियां अपनाई जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सैन्य बलों ने प्रमुख पुलों और रास्तों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और भीड़ पर सीधे गोलीबारी की है। इस सैन्य कार्रवाई में अब तक दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं और कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश की अग्नि और अधिक धधक गई है।

    वर्तमान में पीओके के भीतर जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे काफी हद तक 1971 के घटनाक्रम से मेल खाती हैं। उस दौर में जिस प्रकार तत्कालीन केंद्र सरकार पूर्वी पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उसे पश्चिमी हिस्से के विकास में लगाती थी, ठीक वैसा ही व्यवहार आज पीओके के साथ किया जा रहा है। क्षेत्र में स्थित जलविद्युत बांधों से बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन तो किया जाता है, परंतु उसका लाभ स्थानीय निवासियों को देने के बजाय पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को भेज दिया जाता है, जिससे पूरा पीओके अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है।

    इस दमन और शोषण के विरुद्ध लड़ रहे लोगों की आवाज को संगठित करने के लिए वहां ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) नामक संस्था प्रमुख भूमिका निभा रही है, जिसकी तुलना जानकार 1971 की ‘मुक्ति वाहिनी’ से कर रहे हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और वर्तमान आंदोलन में एक बड़ा वैचारिक अंतर भी साफ देखा जा सकता है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहा था, जबकि आज पीओके की जनता न केवल पाकिस्तान से पूर्ण मुक्ति चाहती है, बल्कि वे सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में नारे लगाते हुए भारत सरकार से सैन्य व कूटनीतिक हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं।

    इस बेहद गंभीर मानवीय संकट के बावजूद, वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों का ढोल पीटने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रमुख पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस विषय पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। कश्मीर के नाम पर अक्सर भारत के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने वाले वैश्विक मंच और समाचार एजेंसियां पीओके में हो रहे इस दमन पर मौन हैं। दूसरी ओर, भारत का रुख इस मामले पर हमेशा से अत्यंत स्पष्ट रहा है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और पीओके भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की उपेक्षा के बीच एलओसी के उस पार से उठ रही यह पुकार आने वाले समय में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है।

  • भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव, घुसपैठ रोकने की कार्रवाई के बीच आमने-सामने आए दोनों देश

    भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव, घुसपैठ रोकने की कार्रवाई के बीच आमने-सामने आए दोनों देश


    नई दिल्ली । भारत और बांग्लादेश के बीच साझा अंतरराष्ट्रीय सीमा एक बार फिर सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियों के केंद्र में आ गई है। हाल के दिनों में सीमा क्षेत्रों में बढ़ी सतर्कता और अवैध आवाजाही को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बीच दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र सक्रिय नजर आ रहे हैं। सीमा पर बढ़ी निगरानी के साथ-साथ कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है।

    सीमा सुरक्षा बल द्वारा पूर्वी क्षेत्र में लगातार निगरानी और गश्त बढ़ाए जाने के बाद कई संदिग्ध गतिविधियों पर रोक लगाई गई है। अधिकारियों के अनुसार सीमा पार से अवैध प्रवेश, तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके तहत संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है और तकनीकी संसाधनों का उपयोग भी बढ़ाया गया है।

    इसी बीच सीमा से जुड़े कुछ घटनाक्रमों को लेकर भारत और बांग्लादेश के सुरक्षा बलों के बीच फ्लैग मीटिंग आयोजित की गई। बैठक में दोनों पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखे और सीमा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। बांग्लादेश की ओर से कुछ आपत्तियां और चिंताएं व्यक्त की गईं, जबकि भारतीय पक्ष ने सीमा सुरक्षा और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया।

    सीमाई क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे पूर्वी सेक्टर में सतर्कता बढ़ा दी है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी प्रकार की अवैध घुसपैठ या सीमा उल्लंघन को रोकना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में नियमित गश्त के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

    नदी मार्गों, जंगलों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी अभियान चलाए जा रहे हैं। ड्रोन कैमरों, नाइट विजन उपकरणों और अन्य आधुनिक निगरानी प्रणालियों की मदद से चौबीसों घंटे गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि तकनीकी निगरानी से सीमा पार होने वाली संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते पहचानने और रोकने में मदद मिल रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा दुनिया की सबसे व्यस्त और संवेदनशील सीमाओं में से एक है, जहां सुरक्षा, मानवीय और आर्थिक पहलू एक साथ जुड़े रहते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की स्थिति को संभालने के लिए दोनों देशों के बीच संवाद और समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का समाधान आमतौर पर द्विपक्षीय बातचीत और स्थापित तंत्र के माध्यम से किया जाता रहा है।

    वर्तमान घटनाक्रम के बीच सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और द्विपक्षीय व्यवस्थाओं का पालन किया जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच संपर्क और संवाद की प्रक्रिया जारी रहने की संभावना है, ताकि सीमा से जुड़े किसी भी मुद्दे का समाधान शांतिपूर्ण और संस्थागत माध्यमों से किया जा सके।
  • भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव: असम से बंगाल तक BSF-BGB में टकराव, ग्रामीणों को लेकर स्थिति संवेदनशील

    भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव: असम से बंगाल तक BSF-BGB में टकराव, ग्रामीणों को लेकर स्थिति संवेदनशील




    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा पर तनाव लगातार तीसरे हफ्ते भी जारी है। असम से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले सीमावर्ती इलाकों में बीएसएफ (BSF) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के बीच झड़प और टकराव की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे हालात संवेदनशील बने हुए हैं।

    जानकारी के अनुसार, 6 मई के बाद से सीमा पर तनाव बढ़ा है और पिछले लगभग 17 दिनों में आठ से अधिक बार दोनों देशों की सुरक्षा बलों के बीच झड़प की घटनाएं दर्ज की गई हैं। कई जगहों पर अवैध घुसपैठ रोकने और सीमा पार गतिविधियों को लेकर स्थिति तनावपूर्ण बनी रही है।

    कई इलाकों में झड़प और आरोप-प्रत्यारोप
    बांग्लादेशी पक्ष का दावा है कि बीएसएफ की कार्रवाई के दौरान कुछ नागरिकों को सीमा पार धकेलने की कोशिश की गई, जबकि भारतीय पक्ष का कहना है कि वह अवैध घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए कार्रवाई कर रहा है। इस दौरान कई स्थानों पर गोलीबारी और टकराव की स्थिति भी बनी।करीमगंज (असम) और ब्राह्मणबारिया (बांग्लादेश) जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में हालात ज्यादा तनावपूर्ण बताए जा रहे हैं। वहीं, ‘जीरो पॉइंट’ नियमों के उल्लंघन को लेकर भी दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।

    BGB का जन-जागरूकता अभियान
    तनाव के बीच बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) ने सीमावर्ती इलाकों में लाउडस्पीकर के जरिए जन-जागरूकता अभियान शुरू किया है। इसमें स्थानीय लोगों को अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी और सीमा पार अपराधों से दूर रहने की अपील की जा रही है।

    BGB की 60वीं बटालियन ने इस अभियान की शुरुआत ब्राह्मणबारिया क्षेत्र से की है, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को सतर्क करना और सीमा सुरक्षा में सहयोग बढ़ाना बताया गया है।

    ग्रामीणों की भूमिका पर भी सवाल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई सीमावर्ती इलाकों में स्थानीय ग्रामीणों की भूमिका को लेकर भी विवाद सामने आया है। कुछ स्थानों पर ग्रामीणों के सुरक्षा बलों के साथ आगे बढ़ने और टकराव के दौरान ढाल की तरह इस्तेमाल होने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।

    जानकारों की राय
    विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पर यह तनाव केवल बाड़ या घुसपैठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे तस्करी और स्थानीय विवाद भी एक बड़ा कारण हो सकते हैं। कई बार सीमा पार गतिविधियों को रोकने के दौरान स्थिति अचानक हिंसक रूप ले लेती है।

    फिलहाल दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और सीमावर्ती क्षेत्रों में गश्त और निगरानी बढ़ा दी गई है।

  • बंगाल में BJP की बढ़त से बांग्लादेश में बढ़ी बेचैनी, ‘घुसपैठ’ पर क्या शुरू होगा नया विवाद?

    बंगाल में BJP की बढ़त से बांग्लादेश में बढ़ी बेचैनी, ‘घुसपैठ’ पर क्या शुरू होगा नया विवाद?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बढ़त ने भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी सियासी हलचल तेज कर दी है। चुनाव परिणामों पर नजर रख रहे बांग्लादेश के नेताओं ने पहले ही संभावित स्थिति को लेकर चिंता जताई थी, जो अब फिर चर्चा में है। सवाल उठ रहा है कि अगर बंगाल में BJP सरकार बनाती है, तो क्या अवैध प्रवासियों यानी कथित ‘घुसपैठियों’ पर कार्रवाई तेज होगी और इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

    दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति में यह मुद्दा पहले ही उठ चुका है। बांग्लादेश की एक पार्टी के सांसद अख्तर हुसैन ने संसद में आशंका जताई थी कि अगर पश्चिम बंगाल में BJP सत्ता में आती है, तो भारत में रह रहे बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजा जा सकता है। उनके मुताबिक, ऐसा होने पर बांग्लादेश को एक बड़े शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि “प्रवासियों का सैलाब” देश में लौट सकता है, जिससे हालात बिगड़ सकते हैं।

    भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। BJP लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है और अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात करती रही है। ऐसे में बंगाल में उसकी संभावित जीत को इस नीति से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी स्तर पर यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2001 में भारत में करीब 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी प्रवासी होने का अनुमान था। वहीं, कुछ स्वतंत्र रिपोर्ट्स के अनुसार यह संख्या 2026 तक 1.5 से 2 करोड़ के बीच हो सकती है। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना में जनसंख्या बदलाव को अक्सर इस मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है।

    लेकिन असली चुनौती इन लोगों की पहचान को लेकर है। बड़ी संख्या में लोग फर्जी दस्तावेजों के जरिए खुद को भारतीय नागरिक साबित कर चुके हैं, जिससे उन्हें चिन्हित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, अगर भारत इन्हें वापस भेजना चाहता है, तो बांग्लादेश की सहमति जरूरी होगी। अगर ढाका इन लोगों को अपना नागरिक मानने से इनकार करता है, तो यह मामला और जटिल हो सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल कानून या प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है। बांग्लादेश इस मुद्दे को अपनी संप्रभुता और सम्मान से जोड़कर देखता है, जबकि भारत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन के नजरिए से देखता है।

    2024 के बाद बांग्लादेश की राजनीति में आए बदलाव के चलते वहां की सरकार पर घरेलू दबाव भी बढ़ा है कि वह भारत के प्रति सख्त रुख अपनाए। हालांकि, नई सरकार की ओर से भारत के साथ संबंध सामान्य रखने के संकेत भी दिए गए हैं, लेकिन ‘घुसपैठ’ का मुद्दा दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील और संभावित विवाद का कारण बन सकता है।

    ऐसे में बंगाल चुनाव के नतीजे सिर्फ एक राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसके असर क्षेत्रीय राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह मुद्दा सियासी बयानबाजी तक सीमित रहता है या वास्तव में किसी बड़े कूटनीतिक टकराव का रूप लेता है।

  • पश्चिम बंगाल चुनाव: ममता का चौका या कमल का कमाल? घुसपैठ और एसआईआर के मुद्दों के बीच दिलचस्प जंग

    पश्चिम बंगाल चुनाव: ममता का चौका या कमल का कमाल? घुसपैठ और एसआईआर के मुद्दों के बीच दिलचस्प जंग


    कोलकाता। West Bengal में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही सियासी माहौल गर्म हो गया है। पिछली बार आठ चरणों में हुए मतदान के विपरीत इस बार केवल दो चरणों में चुनाव होने की संभावना ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की पार्टी All India Trinamool Congress लगातार चौथी बार जीत दर्ज कर इतिहास रचेगी या Bharatiya Janata Party पहली बार सत्ता का दरवाजा खोल पाएगी।

    मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर पहले से ही सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। भाजपा कानून-व्यवस्था, घुसपैठ और 15 साल की कथित एंटी-इन्कम्बेंसी को बड़ा मुद्दा बनाकर मैदान में उतरी है, जबकि ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को मजबूत बनाए रखने की कोशिश में जुटी हैं। राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 28 प्रतिशत मानी जाती है, जो चुनावी समीकरण में अहम भूमिका निभाती है।

    भाजपा की नजर सत्ता पर

    तीन देशों—Bhutan, Nepal और Bangladesh—से घिरे इस राज्य में भाजपा पिछले ढाई दशक से सत्ता में आने की कोशिश कर रही है। पिछले चुनाव में पार्टी ने Communist Party of India (Marxist) सहित वाम दलों और Indian National Congress को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया था, लेकिन सरकार बनाने का सपना अधूरा रह गया।
    इस बार भाजपा ने घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया है। साथ ही पिछले चुनाव से सबक लेते हुए पार्टी ने दलबदल कर आए नेताओं की जगह पुराने कार्यकर्ताओं को टिकट देने की रणनीति अपनाई है।

    36 सीटों पर कांटे की टक्कर

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पिछले चुनाव में करीब 36 सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोट से भी कम था। कई सीटों पर तो हार-जीत कुछ सौ वोटों से तय हुई थी। ऐसे में माना जा रहा है कि इन सीटों पर थोड़ा सा भी वोटों का झुकाव बदला तो सत्ता का गणित पूरी तरह बदल सकता है।

    उत्तर बंगाल और जंगलमहल पर फोकस

    भाजपा खासतौर पर उत्तर बंगाल और जंगलमहल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। Cooch Behar, Alipurduar, Jalpaiguri और Darjeeling जैसे जिलों में पिछले चुनाव में उसे अच्छी सफलता मिली थी।
    वहीं ममता बनर्जी की सरकार महिलाओं, किसानों और गरीब वर्ग के लिए चलाई गई कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी मैदान में अपनी सबसे बड़ी ताकत बता रही है।

    मुस्लिम वोट बैंक पर नजर

    मुस्लिम वोट बैंक बंगाल की राजनीति में निर्णायक माना जाता है। इसे साधे रखने के लिए ममता बनर्जी लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। एसआईआर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क और संसद तक विरोध जताना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
    दूसरी ओर, भाजपा आदिवासी, मतुआ और महिला मतदाताओं को एकजुट कर पिछली बार के लगभग सात प्रतिशत वोट अंतर को कम करने की कोशिश में है। राज्य में नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari भी घुसपैठ के मुद्दे पर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।

    नए समीकरण भी बना सकते हैं असर

    इस बार मुस्लिम वोटों के नए समीकरण पर भी सबकी नजर है। मुर्शिदाबाद क्षेत्र में Humayun Kabir की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी, Asaduddin Owaisi की All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (एआईएमआईएम) और Abbas Siddiqui की Indian Secular Front (आईएसएफ) के बीच संभावित गठबंधन की चर्चाएं हैं। माना जा रहा है कि यह समीकरण तृणमूल के लिए कुछ इलाकों में चुनौती बन सकता है।

    राष्ट्रीय राजनीति पर भी नजर

    विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तृणमूल अपना किला बचा पाएगी या भाजपा पहली बार बंगाल की सत्ता तक पहुंचने में कामयाब होगी।