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  • गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने पर मिल सकती है राहत, जानिए सही तरीका और किन बातों का रखें ध्यान

    गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने पर मिल सकती है राहत, जानिए सही तरीका और किन बातों का रखें ध्यान

    नई दिल्ली । गले में खराश, दर्द या जलन होने पर गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना लंबे समय से अपनाया जाने वाला घरेलू उपाय है। मौसम में बदलाव, वायरल संक्रमण, एलर्जी, अधिक बोलने या गले में जलन जैसी स्थितियों में यह उपाय कुछ लोगों को अस्थायी राहत दे सकता है। हालांकि, नमक के पानी से गरारे किसी संक्रमण या बीमारी का इलाज नहीं करते, बल्कि लक्षणों को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

    गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने का सबसे प्रमुख फायदा गले की खराश और हल्के दर्द में राहत मिलना माना जाता है। नमक पानी गले के ऊतकों में मौजूद अतिरिक्त तरल पदार्थ को कम करने में मदद कर सकता है, जिससे सूजन और असहजता कुछ हद तक घट सकती है। इसी कारण हल्के गले के दर्द में इसे सहायक उपाय के तौर पर अपनाया जाता है।

    दूसरा फायदा गले में जमा बलगम से जुड़ा है। सर्दी या वायरल संक्रमण के दौरान गले में म्यूकस जमा होने से बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस हो सकती है। गरारे करने से जमा बलगम ढीला पड़ सकता है और उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। इससे गले में भारीपन और जलन की अनुभूति कम हो सकती है।

    नमक के पानी से गरारे मुंह और गले की सफाई बनाए रखने में भी मदद कर सकते हैं। नमक वाला पानी मुंह के वातावरण को प्रभावित करता है, जिससे कुछ सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां कम हो सकती हैं। हालांकि, इसे संक्रमण खत्म करने वाली दवा नहीं माना जाना चाहिए। बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण होने पर चिकित्सकीय सलाह की जरूरत पड़ सकती है।

    इस उपाय का एक अन्य लाभ मुंह की दुर्गंध को लेकर हो सकता है। यदि सांसों की बदबू मुंह में जमा बैक्टीरिया या खराब ओरल हाइजीन से जुड़ी है, तो नमक के पानी से कुल्ला या गरारे करने से मुंह की सफाई में कुछ मदद मिल सकती है। लेकिन लगातार बदबू बनी रहने पर इसके पीछे मसूड़ों, दांतों या किसी अन्य समस्या की जांच जरूरी हो सकती है।

    नमक के पानी से गरारे मुंह के छोटे घावों, हल्के छालों या मसूड़ों की मामूली परेशानी में भी कुछ राहत दे सकते हैं। दांत निकलवाने जैसी कुछ परिस्थितियों में भी डॉक्टर कभी-कभी नमक के पानी से कुल्ला करने की सलाह देते हैं। हालांकि, गंभीर घाव, लगातार रक्तस्राव या बढ़ते दर्द की स्थिति में घरेलू उपाय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    गरारे करने के लिए एक गिलास गुनगुने पानी में लगभग आधा चम्मच नमक मिलाया जा सकता है। पानी बहुत गर्म नहीं होना चाहिए। तैयार घोल को मुंह और गले में करीब 15 से 30 सेकंड तक घुमाकर गरारे करें और फिर उसे थूक दें। नमक का पानी निगलने से बचना चाहिए। जरूरत के अनुसार दिन में दो से तीन बार गरारे किए जा सकते हैं।

    यह भी समझना जरूरी है कि हर तरह की गले की समस्या में केवल नमक का पानी पर्याप्त नहीं होता। तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी, निगलने में गंभीर कठिनाई, लगातार बढ़ता दर्द या लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बच्चों को गरारे कराते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि वे पानी निगल सकते हैं।

    कुल मिलाकर, गुनगुने नमक के पानी से गरारे गले की खराश, हल्की सूजन, बलगम और मुंह की कुछ परेशानियों में अस्थायी आराम देने वाला आसान उपाय हो सकते हैं। लेकिन इन्हें चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। लक्षणों की वजह और गंभीरता के अनुसार सही उपचार के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।

  • वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    नई दिल्ली। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने देश और दुनिया में तेजी से पैर पसार रहे मोटापे को लेकर अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर चेतावनी जारी की है। हृदय रोग विशेषज्ञों के इस प्रतिष्ठित संगठन ने पहली बार एक विशेष गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मोटापा सिर्फ शरीर का वजन बढ़ने का सामान्य लक्षण या सुंदरता से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह असल में दिल, किडनी और मेटाबॉलिक तंत्र से जुड़ी कई जानलेवा और गंभीर बीमारियों की प्राथमिक जड़ है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी शरीर में विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी यानी बेली फैट सीधे तौर पर आंतरिक अंगों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर देता है। डॉक्टरों ने अपनी जांच और शोध में पाया है कि यह स्थिति शरीर के भीतर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन यानी लगातार बनी रहने वाली सूजन को जन्म देती है। इसके साथ ही यह इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती है और रक्त वाहिकाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करती है। इसी वजह से आगे चलकर मरीजों में डायबिटीज, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर और किडनी खराब होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

    मध्य प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच यह चेतावनी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत को वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ‘डायबिटीज कैपिटल’ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नई गाइडलाइन के मुताबिक, वजन बढ़ने की यह प्रक्रिया अक्सर उन बीमारियों का आधार तैयार करती है जो बाद में हृदय, वृक्क (किडनी) और शरीर के पूरे मेटाबॉलिज्म को एक साथ अपनी चपेट में ले लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में विशेषज्ञ अब इस घातक स्थिति को कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक यानी ‘सीकेएम सिंड्रोम’ कह रहे हैं।

    इस शोध और गाइडलाइन में सबसे चौंकाने वाला तथ्य पेट की चर्बी को लेकर सामने आया है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि किन्हीं दो व्यक्तियों का कुल वजन और बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल समान है, तब भी उनकी आंतरिक सेहत और जोखिम का स्तर पूरी तरह अलग हो सकता है। असली और सबसे बड़ा खतरा पेट के अंदरूनी अंगों के चारों ओर जमा होने वाले ‘विसरल फैट’ से होता है। यह छुपा हुआ विसरल फैट शरीर के भीतर लगातार ऐसे हानिकारक रसायनों का स्राव करता है, जो रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं और इंसुलिन के सकारात्मक प्रभाव को पूरी तरह खत्म कर देते हैं।

    हृदय रोग विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि खराब खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव के कारण कम उम्र में ही भारतीयों का दिल बूढ़ा हो रहा है। कार्डियक अरेस्ट और किडनी फेल्योर के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए अब मोटापे को एक प्राथमिक बीमारी मानकर इसका इलाज करना अनिवार्य हो गया है। चिकित्सा तंत्र ने आम जनता से अपील की है कि वे पेट के घेरे और विसरल फैट को नियंत्रित रखने के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं ताकि सीकेएम सिंड्रोम जैसी जटिलताओं से समय रहते बचा जा सके।