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  • कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा..

    कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा..


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, जहां मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को तेजी से ऊपर पहुंचा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में सैन्य गतिविधियों और टकराव की स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को झकझोर कर रख दिया है। इसी अस्थिरता के बीच कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।

    तेल बाजार में यह तेजी अचानक नहीं आई है, बल्कि पिछले कुछ दिनों से जारी तनाव और अनिश्चितता का सीधा परिणाम है। समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे और आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसी वजह से बाजार में घबराहट का माहौल है और कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक बाजार में स्थिरता की उम्मीद कम है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य हलचल का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर पड़ता है। यही कारण है कि इस समय बाजार में जोखिम बढ़ा हुआ है और कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो रही हैं।

    तेल की कीमतों में इस उछाल ने महंगाई की चिंता को भी बढ़ा दिया है। कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ता है। इससे दुनिया भर में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। खासकर आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

    भारत जैसे देशों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ती है, जिसका असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ने से वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति बेहद अस्थिर है और निवेशक बड़े फैसलों से बच रहे हैं। हर नई राजनीतिक या सैन्य खबर के साथ तेल बाजार में तेजी या गिरावट देखी जा रही है। यदि तनाव और बढ़ता है तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, जबकि कूटनीतिक समाधान से बाजार को राहत मिल सकती है।

    फिलहाल दुनिया की नजर इस क्षेत्र में होने वाली आगे की घटनाओं पर टिकी हुई है, क्योंकि यहां का हर बदलाव सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

  • वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर

    वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू राजनीतिक तनावों के बीच देश की मौद्रिक नीति को लेकर बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले निर्णय से बच रहा है और आगे की दिशा आर्थिक आंकड़ों और जोखिमों के विस्तृत आकलन के आधार पर तय की जाएगी। उन्होंने इसे वेट एंड वॉच की स्थिति बताया और कहा कि मौजूदा समय में स्थिरता बनाए रखना प्राथमिकता है।

    अपने एक अंतरराष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों और वैश्विक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की भूमिका भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी आय के प्रवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि पश्चिम एशिया भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार क्षेत्र है, जो देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा, आयात का महत्वपूर्ण भाग और कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही उर्वरक आयात और विदेशी रेमिटेंस में भी इस क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह की गहरी आर्थिक निर्भरता के कारण किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

    आरबीआई गवर्नर ने विशेष रूप से दूसरे दौर के प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आपूर्ति व्यवधान यदि लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनका असर धीरे धीरे कीमतों और उत्पादन लागत पर फैल सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। इस प्रकार की स्थिति केवल अस्थायी नहीं होती बल्कि आर्थिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

    मौद्रिक नीति को लेकर उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में तटस्थ रुख बनाए हुए है और हाल के महीनों में की गई ब्याज दरों में कटौती के बाद अब स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति पूरी तरह डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाती है और बदलते आर्थिक संकेतकों के अनुसार लगातार जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करती रहती है ताकि नीति निर्णय संतुलित और प्रभावी बने रहें।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन की सराहना की और बताया कि यूनिफाइड पेमेंट सिस्टम के माध्यम से लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की डिजिटल प्रगति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक नए डिजिटल लोन सिस्टम पर काम चल रहा है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और छोटे व्यवसायों को त्वरित और आसान ऋण उपलब्ध कराना है।

    वित्तीय अनुशासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि देश का राजकोषीय घाटा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार कम हुआ है, जो आर्थिक प्रबंधन में सुधार का संकेत है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सरकारी ऋण अनुपात में भी धीरे धीरे सुधार देखा जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है।