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  • लिलिमा मिंज: साधारण आदिवासी परिवार से निकलकर ओलंपिक तक का शानदार सफर!

    लिलिमा मिंज: साधारण आदिवासी परिवार से निकलकर ओलंपिक तक का शानदार सफर!


    नई दिल्ली। लिलिमा मिंज भारतीय महिला हॉकी टीम के उन खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिनमें शामिल हैं, सीमित सहयोगी के बावजूद अपनी मेहनत और प्रतिभा से देश का नाम रोशन किया। 10 अप्रैल 1994 को ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले में एक सामान्य जनजातीय परिवार में जन्मे लिलिमा ने बचपन से ही बचपन का सामना किया था, लेकिन उनका सपना बड़ा था- भारत के लिए हॉकी खेलना।

    हॉकी की धरती से मिलाप
    ओडिशा को भारतीय हॉकी का गढ़ माना जाता है, जहां से कई दिग्गज खिलाड़ी निकले हैं। दिलीप टिर्की जैसे महान खिलाड़ी से प्रेरित होकर लीलिमा ने भी अपना करियर बनाने का फैसला लिया। गाँव और स्थानीय मैदानों में प्रतिस्पर्धा करते हुए उन्होंने अपने खेल को नया और धीरे-धीरे पहचान बनाना शुरू किया।

    जूनियर टीम से सीनियर टीम तक का सफर
    लिलिमा जूनियर की मेहनत रंग लाई और 2011 में उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली। उसी वर्ष बैंकॉक में आयोजित अंडर-18 एशिया कप में उन्होंने टीम के साथ कांस्य पदक जीता। प्रदर्शन के दम पर उन्हें जल्द ही सीनियर टीम में मौका मिला और शानदार प्रदर्शन से उनके अंतरराष्ट्रीय बल्लेबाजों की असली शुरुआत हुई।

    टीम इंडिया की शानदार मिडफील्डर
    2011 से 2022 तक अपने करियर में लिलिमा ने भारतीय टीम के लिए 150 से ज्यादा मैच खेले। मिडफील्डर पर विशेष रूप से वह अपने तेज गेंदबाज, स्ट्राइकर पासिंग और डिफेंस डिफेंस को तोड़ने की क्षमता के लिए जेन जाइस्ट करता है। मैदान पर उनकी खेल टीम के लिए बैलेंस और प्लॉट का प्रतीक बना हुआ है।

    ओल और एशियाई खेलों में चमक प्रदर्शन
    लिलिमा मिंज ने कई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह 2014 एशियाई खेलों में कांस्य पदक वाली टीम का हिस्सा बने। इसके अलावा 2016 के रियो ओलंपिक 2016 के लिए क्वालीफाई करने वाली भारतीय टीम में भी अपना अहम योगदान दे रही हैं। 2018 एशियन गेम्स में उन्होंने टीम के साथ सिल्वर मेडल जीता। कॉमनवेल्थ गेम्स, हॉकी वर्ल्ड लीग और एशिया कप जैसे बड़े मंचों पर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

    भारतीय महिला हॉकी को नई पहचानने वाली पीढ़ी
    लिलिमा उस पीढ़ी का हिस्सा है, जिसने भारतीय महिला हॉकी को नई पहचान दी है। उनके दौर में टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत टीम के रूप में पहचान बनाई।

    कम उम्र में संन्यास ले लिया, लेकिन प्रेरणा बनी रही
    जनवरी 2022 में, मैक्सिम 27 साल की उम्र में लिलिमा मिंज ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया। हालाँकि उनकी यात्रा छोटी रही, लेकिन उनकी उपलब्धियाँ और संघर्ष आने वाली यात्रा के लिए प्रेरणा बन गए हैं।

  • डॉक्टर नहीं, बना देश का चैंपियन! योगेश कथुनिया ने डिस्कस थ्रो में दिलाया पदक

    डॉक्टर नहीं, बना देश का चैंपियन! योगेश कथुनिया ने डिस्कस थ्रो में दिलाया पदक


    नई दिल्ली। 3 मार्च 1997 को हरियाणा के बहादुरगढ़ में जन्मे Yogesh Kathuniya के माता-पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर बने। लेकिन किस्मत ने उनके लिए अलग रास्ता चुना। महज 9 साल की उम्र में उन्हें गुइलेन-बैरे सिंड्रोम नाम की गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी का पता चला। इस बीमारी में मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है। योगेश के लिए खड़ा होना भी मुश्किल हो गया था। मगर यहां से शुरू हुई एक मां की जिद और बेटे का संघर्ष। लगातार फिजियोथेरेपी और मां मीना देवी के अथक प्रयासों से योगेश बैसाखी के सहारे खड़े हो पाए। यही वह मोड़ था, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी।

    कॉलेज से शुरू हुआ खेलों का सफर
    किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान 2016 में उन्हें पैरा एथलेटिक्स के बारे में जानकारी मिली। प्रेरणा मिली और उन्होंने डिस्कस थ्रो को अपना लक्ष्य बना लिया। मेहनत रंग लाई और 2018 में बर्लिन में आयोजित वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता में एफ36 कैटेगरी में 45.18 मीटर का थ्रो कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

    पैरालंपिक में देश को दिलाया गौरव
    टोक्यो में आयोजित 2020 Summer Paralympics में योगेश ने डिस्कस थ्रो एफ56 स्पर्धा में रजत पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया। उनके शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें 2021 में तत्कालीन राष्ट्रपति Ram Nath Kovind द्वारा अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

    चोट, बीमारी और फिर वापसी
    2022 में उन्हें सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी की समस्या का सामना करना पड़ा, जिससे रीढ़ की नसें प्रभावित होती हैं। छह महीने तक रिकवरी चली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

    इसके बाद 2024 Summer Paralympics में फिर से रजत पदक जीतकर साबित कर दिया कि उनका जज्बा किसी भी मुश्किल से बड़ा है। 2025 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने एफ56 वर्ग में रजत पदक हासिल किया।

    संघर्ष से सफलता तक
    योगेश कथुनिया की कहानी सिर्फ पदकों की नहीं, बल्कि हिम्मत, परिवार के समर्थन और अडिग विश्वास की कहानी है। शारीरिक अक्षमता को उन्होंने अपनी पहचान नहीं बनने दिया, बल्कि उसे अपनी ताकत बना लिया।

  • रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    रिक्शा चालक पिता की बेटी से अंतरराष्ट्रीय हॉकी स्टार तक, अनुराधा देवी थोकचोम की संघर्ष और स्वर्णिम सफलता की कहानी

    नई दिल्ली। मणिपुर बीते कुछ वर्षों में भारतीय खेल जगत का मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। इस छोटे से राज्य ने देश को कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने अपने जज्बे और मेहनत से भारत का नाम रोशन किया। इन्हीं नामों में एक है अनुराधा देवी थोकचोम, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय महिला हॉकी में अपनी अलग पहचान बनाई। अनुराधा न सिर्फ एक बेहतरीन खिलाड़ी रहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है।

    गरीबी से निकला हौसले का सफर
    अनुराधा देवी थोकचोम का जन्म 2 फरवरी 1989 को मणिपुर के तौबुल गांव में हुआ। उनके पिता थोकचोम चुरामणि पेशे से रिक्शा चालक थे और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। खेती और मछली पालन से जुड़े इस परिवार में तीन बच्चे थे। बड़े भाई फुटबॉल खेलते थे और खेल का माहौल घर में पहले से मौजूद था। हालांकि मणिपुर में फुटबॉल ज्यादा लोकप्रिय रहा है, लेकिन अनुराधा ने बहुत कम उम्र में हॉकी को अपना सपना बना लिया।

    हॉकी स्टिक से बदली किस्मत
    भाई-बहनों के मार्गदर्शन और अपने जिद्दी इरादों के चलते अनुराधा ने हॉकी स्टिक थामी। उन्होंने तोबुल यूथ क्लब से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में इम्फाल स्थित पोस्टीरियर हॉकी अकादमी में प्रशिक्षण लिया। संसाधनों की कमी के बावजूद उनका अनुशासन और मेहनत जल्द ही रंग लाने लगी और वे राज्य स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गईं।

    अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकी अनुराधा
    2006 में महिला हॉकी चैंपियंस ट्रॉफी के जरिए अनुराधा ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में पदार्पण किया। फॉरवर्ड के रूप में खेलते हुए उन्होंने भारतीय टीम के लिए 80 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले। 2014-15 महिला हॉकी वर्ल्ड लीग में उनके शानदार प्रदर्शन की खूब सराहना हुई, जहां भारत ने पांचवां स्थान हासिल कर रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। 2016 के रियो ओलंपिक में भारतीय महिला टीम की 36 साल बाद वापसी में भी अनुराधा टीम का अहम हिस्सा रहीं।

    एशिया में पदक, करियर का स्वर्णिम अध्याय
    अनुराधा 2013 क्वालालंपुर एशिया कप में कांस्य पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा रहीं। इसके बाद 2016 में सिंगापुर में आयोजित एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली टीम में शामिल होकर उन्होंने अपने करियर को यादगार बना दिया। इसी ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हॉकी से संन्यास ले लिया।

    खेल के बाद नई जिम्मेदारी
    हॉकी को अलविदा कहने के बाद अनुराधा देवी थोकचोम वर्तमान में भारतीय रेलवे के लिपिक विभाग में कार्यरत हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो गरीबी भी प्रतिभा की राह नहीं रोक सकती। अनुराधा आज भी मणिपुर और देश की युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।