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  • श्मशान घाट में मिली महिला को मां बनाकर की सेवा, मरते वक्त मिले आशीर्वाद से बदल गई सुदेश लहरी की किस्मत जानें, पूरी कहानी

    श्मशान घाट में मिली महिला को मां बनाकर की सेवा, मरते वक्त मिले आशीर्वाद से बदल गई सुदेश लहरी की किस्मत जानें, पूरी कहानी



    नई दिल्ली। देश के मशहूर कॉमेडियन और सिंगर सुदेश लहरी आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने की कहानी बेहद संघर्ष और भावनाओं से भरी हुई है। कभी इतनी गरीबी थी कि स्कूल जाने तक के पैसे नहीं थे, और गुजारे के लिए ढाबे पर बर्तन धोने से लेकर जूते-चप्पल बनाने और सब्जी बेचने तक का काम करना पड़ा। लेकिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने सबकुछ बदल दिया।

    दरअसल, हाल ही में टीवी शो ‘लाफ्टर शेफ्स 3’ में कृष्णा अभिषेक ने सुदेश लहरी से जुड़ा एक भावुक किस्सा सुनाया, जिसने सभी को भावुक कर दिया। बताया गया कि एक बार सुदेश लहरी किसी अंतिम संस्कार में शामिल होने श्मशान घाट पहुंचे थे, जहां उन्होंने एक बेहद दुखद स्थिति देखी।

    श्मशान घाट में उन्होंने एक कोने में एक महिला को बैठा हुआ देखा, जिसके शरीर पर घाव थे और वह बेहद तकलीफ में थी। यह दृश्य देखकर सुदेश लहरी से रहा नहीं गया। उस समय उनकी खुद की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी, लेकिन उन्होंने इंसानियत दिखाते हुए उस महिला को अपने साथ ले जाने का फैसला किया।

    घर लाकर उन्होंने उस महिला को अपनी मां की तरह रखा और पूरी श्रद्धा और सेवा भाव से उसकी देखभाल की। बताया जाता है कि सुदेश लहरी ने उस समय ढाबे पर काम करके और छोटे-मोटे काम करके जीवन चलाया, लेकिन उस महिला की सेवा में कोई कमी नहीं आने दी।

    कहा जाता है कि जब उस महिला की मृत्यु हुई, तो उसने सुदेश लहरी को आशीर्वाद दिया कि “तेरा कभी बुरा नहीं होगा और तू जीवन में बहुत सफल होगा।” इसी घटना के बाद सुदेश लहरी की किस्मत बदलने लगी और उन्हें मुंबई से बड़े मौके मिलने लगे।

    इसके बाद सुदेश लहरी ने अपने जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ जैसे शो से पहचान बनाई और धीरे-धीरे इंडस्ट्री में अपनी मजबूत जगह बना ली।

    सुदेश लहरी का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में इतनी गरीबी थी कि वह कभी स्कूल तक नहीं जा पाए। परिवार की हालत ऐसी थी कि घर तक बिक गया था। उन्होंने फैक्ट्री में काम किया, चाय-नाश्ता बेचा और जूते बनाने तक का काम किया।

    आज वही सुदेश लहरी भारतीय कॉमेडी इंडस्ट्री का बड़ा नाम हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी नेट वर्थ करोड़ों में है और वह एक शो के लिए लाखों रुपये फीस लेते हैं। मुंबई में उनका अपना घर भी है और वह लगातार टीवी, स्टेज शोज और फिल्मों में सक्रिय हैं।

    सुदेश लहरी की यह कहानी इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियां भी इंसान की मेहनत, इंसानियत और लगन के आगे हार जाती हैं।

  • हौसलों की उड़ान: गांव की पहली बहू मीनाक्षी बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

    हौसलों की उड़ान: गांव की पहली बहू मीनाक्षी बनीं आत्मनिर्भरता की मिसाल


    भोपाल । गुना जिले के बमोरी ब्लॉक से निकलकर एक साधारण ग्रामीण महिला ने आज ऐसी उड़ान भरी है जो पूरे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई है श्रीमती मीनाक्षी फराक्टे आज केवल एक नाम नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता और संघर्ष की पहचान बन चुकी हैं राजमाता स्व सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने न सिर्फ अपने जीवन को बदला बल्कि दर्जनों महिलाओं को रोजगार और आत्मविश्वास की राह दिखाई है

    मीनाक्षी शिवाजी राज सीएलएफ से जुड़ी हैं और उन्नत आजीविका प्रोसेसिंग केंद्र की सेंटर इंचार्ज के रूप में कार्य कर रही हैं उनका काम केवल प्रबंधन तक सीमित नहीं है बल्कि वह ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी निभाती हैं इस यात्रा की शुरुआत आसान नहीं थी लेकिन उन्होंने हर चुनौती को अवसर में बदल दिया

    प्रोसेसिंग केंद्र में किसान दीदियों से कच्चा माल खरीदा जाता है और उसे प्रोसेस करके तैयार उत्पादों के रूप में बाजार में भेजा जाता है समूह की महिलाएं कभी घर घर जाकर कभी दुकानों में और कभी स्कूलों तथा आंगनवाड़ी के माध्यम से अपने उत्पादों की बिक्री करती हैं यह काम शुरुआत में बेहद कठिन था क्योंकि समाज में महिलाओं की इस भूमिका को लेकर भरोसा नहीं किया जाता था

    जब मीनाक्षी और उनकी साथी महिलाएं पहली बार दुकानों पर सामान लेकर पहुंचीं तो उन्हें कई सवालों का सामना करना पड़ा क्या आप समय पर सामान दे पाएंगी क्या गुणवत्ता बनी रहेगी क्या महिलाएं इस जिम्मेदारी को निभा सकती हैं ऐसे संदेह हर कदम पर उनके सामने खड़े थे कई बार उन्हें एक ही दुकान पर बार बार जाना पड़ा और दुकानदारों को समझाना पड़ा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी

    धीरे धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी और लोगों का भरोसा बढ़ता गया लगातार प्रयास और गुणवत्ता के दम पर आज यह यूनिट लगभग सत्तर लाख रुपये की बिक्री कर चुकी है जिसमें अकेले मीनाक्षी का योगदान पच्चीस से तीस लाख रुपये तक रहा है उनकी व्यक्तिगत आय जो पहले केवल पांच हजार रुपये थी वह अब बढ़कर पच्चीस हजार रुपये प्रतिमाह तक पहुंच चुकी है यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक सोच में भी बड़ा परिवर्तन है

    मीनाक्षी कहती हैं कि मार्केटिंग कोई कठिन काम नहीं है डर सिर्फ शुरुआत न करने से लगता है जब हम पहला कदम बढ़ाते हैं तो रास्ते खुद बनते जाते हैं उनका मानना है कि आत्मविश्वास और मेहनत के साथ कोई भी महिला अपने जीवन को बदल सकती है

    उनकी सफलता की कहानी यहीं खत्म नहीं होती हाल ही में उन्हें दिल्ली में आयोजित एआई समिट में भाग लेने का अवसर मिला जहां वे पहली बार हवाई जहाज में बैठीं यह अनुभव उनके जीवन का ऐतिहासिक पल था वे गर्व से कहती हैं कि वे अपने गांव की पहली बहू हैं जिसने फ्लाइट से यात्रा की है यह उपलब्धि उनके परिवार और पूरे गांव के लिए गर्व का विषय बन गई

    मीनाक्षी अपनी सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के समर्थन और योजनाओं को देती हैं उनका कहना है कि सरकार की योजनाओं और समूह की शक्ति ने उनके जैसे कई जीवन बदल दिए हैं आज उनकी कहानी यह साबित करती है कि यदि हौसले मजबूत हों तो गांव की महिलाएं भी आसमान को छू सकती हैं और अपने सपनों को साकार कर सकती हैं

  • जैकी चैन का भावुक फैसला, मौत के बाद दुनिया सुनेगी उनका खास गीत…

    जैकी चैन का भावुक फैसला, मौत के बाद दुनिया सुनेगी उनका खास गीत…


    नई दिल्ली।एक्शन फिल्मों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले जैकी चैन ने 71 वर्ष की उम्र में अपने प्रशंसकों को भावनात्मक कर देने वाला खुलासा किया है। उन्होंने हाल ही में एक विशेष गीत रिकॉर्ड किया हैजिसे उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ किया जाएगा। मंच पर यह बात साझा करते समय उनकी आवाज़ में अनुभव की गहराई और आंखों में जीवन भर की थकान साफ झलक रही थी। यह मानो उनके जीवन का आख़िरी संदेश होजिसे वह खुद दुनिया तक पहुंचाना चाहते हों।
    1954 में हांगकांग में जन्मे जैकी चैन का बचपन आसान नहीं रहा। मात्र सात साल की उम्र में उन्हें चीनी ओपेरा ट्रेनिंग स्कूल भेज दिया गयाजहां रोज़ाना करीब 20 घंटे शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण दिया जाता था। सख्त अनुशासनकठोर सज़ाएं और भावनाओं पर नियंत्रण उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा थे। जैकी बाद में स्वीकार कर चुके हैं कि उस दौर में रोने तक की इजाज़त नहीं होती थी।
    यही कठिन ट्रेनिंग आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। 70 और 80 के दशक में जैकी चैन ने लगभग हर खतरनाक स्टंट खुद किया। इस दौरान उन्हें 30 से अधिक गंभीर चोटें आईं। 1986 में फिल्म आर्मर ऑफ गॉड की शूटिंग के दौरान एक खतरनाक हादसे में उनके सिर में गंभीर चोट लगी जिससे उनकी जान पर बन आई थी। उस घटना के बाद जैकी को एहसास हुआ कि ज़िंदगी ने उन्हें दूसरा मौका दिया है।
    इसके बावजूद सफलता तुरंत नहीं मिली। लगभग एक दशक तक हॉलीवुड ने उन्हें नजरअंदाज़ किया। एशियाई चेहरा, भाषा की बाधा और अलग एक्शन स्टाइल को वजह बताया गया। लेकिन जैकी चैन ने हार नहीं मानी। 1998 में रिलीज़ हुई फिल्म रश ऑवर ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और वे वैश्विक स्टार बन गए।
    उनकी ज़िंदगी के कई चौंकाने वाले सच
    बाद में सामने आए। साल 2003 में उनके पिता ने बताया कि वे एक गुप्त एजेंसी से जुड़े थे, जबकि उनकी मां का अतीत भी विवादों से भरा रहा। जैकी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उनके जीवन के सबसे बड़े रहस्य उनके अपने परिवार से जुड़े थे।पर्सनल लाइफ को लेकर भी जैकी चैन ने खुद को कभी आदर्श नहीं बताया। उन्होंने स्वीकार किया कि वे अपने बेटे के लिए अच्छे पिता नहीं बन पाए। आज जब उनका आख़िरी गीत चर्चा में है, तो जैकी चैन का संदेश साफ है-ज़िंदगी में आख़िरी होने से मत डरो, अधूरा रह जाने से डरो।
  • किसान दिवस 2025 जब मंत्री की पत्नी के हिस्से आई फटी धोतीचौधरी चरण सिंह की ईमानदारी का वो किस्सा जो आज मिसाल है

    किसान दिवस 2025 जब मंत्री की पत्नी के हिस्से आई फटी धोतीचौधरी चरण सिंह की ईमानदारी का वो किस्सा जो आज मिसाल है


    इंदौर । लखनऊ आज किसान दिवस है यह दिन देश के उन अन्नदाताओं को समर्पित है जिनकी मेहनत से हमारी थाली सजती है। लेकिन जब भी किसानों की बात होती हैदेश के पूर्व प्रधानमंत्री और ‘किसानों के मसीहा’ चौधरी चरण सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है। साल 2025 में भी उनके जीवन के किस्से राजनीति में शुचिता और ईमानदारी की सबसे बड़ी मिसाल माने जाते हैं।

    1966 का वो दौर: मंत्री पद और सादा जीवन

    किस्सा साल 1966 का है। उस वक्त चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में वन मंत्री जैसे कद्दावर पद पर थे। सत्ता और सुविधाओं की कोई कमी नहीं थीलेकिन उनका रहन-सहन किसी साधारण किसान जैसा ही था। उनकी सादगी का आलम यह था कि उनके घर में सुबह की शुरुआत आज के नेताओं की तरह तामझाम से नहींबल्कि अनुशासन और सादगी से होती थी।

    जब बेटी वन विभाग की जीप से घर आई

    एक सुबह उनकी बड़ी बेटी सत्यवती अपने बच्चों के साथ आगरा से लखनऊ अपने पिता से मिलने पहुंचीं। बातचीत के दौरान जब चौधरी साहब को पता चला कि सत्यवती सरकारी कार्य के लिए आवंटित ‘वन विभाग की जीप’ से आई हैंतो वे बेहद आहत हुए। उन्होंने अपनी बेटी को स्पष्ट समझाया कि सरकारी सुविधाएं जनता की अमानत हैंपरिवार के निजी उपयोग के लिए नहीं। उन्होंने अपनी बेटी से उस यात्रा का किराया तक सरकारी कोष में जमा करवाया था।

    पत्नी की फटी धोती और अटूट ईमानदारी

    चौधरी चरण सिंह की ईमानदारी का सबसे भावुक कर देने वाला पहलू उनकी पत्नी गायत्री देवी से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब वे मंत्री थेतब भी उनकी पत्नी फटी हुई धोती को टांका लगाकर पहनती थीं। एक बार किसी ने टोका कि “चौधरी साहब मंत्री हैंआप नई धोती क्यों नहीं ले लेतीं?” इस पर सादगी भरा जवाब मिला कि जो है उसी में संतोष है। चौधरी साहब का मानना था कि यदि वे अपनी मेहनत की कमाई से अधिक खर्च करेंगेतो उन्हें भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ेगाजो उनके उसूलों के खिलाफ था।

    आज के दौर में प्रासंगिकता

    चौधरी चरण सिंह के ये किस्से आज के दौर के राजनेताओं के लिए एक आईना हैं। उन्होंने न केवल किसानों के हक की लड़ाई लड़ीबल्कि यह भी सिद्ध किया कि सत्ता में रहकर भी इंसान अपनी जड़ों और सादगी से जुड़ा रह सकता है। यही कारण है कि आज दशकों बाद भी किसान दिवस पर उनकी ईमानदारी की गाथाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं। अवसर राष्ट्रीय किसान दिवस 2025। व्यक्तित्व पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह। आदर्श सरकारी जीप के उपयोग पर बेटी से वसूला था किराया। सादगी मंत्री पद पर रहते हुए भी पत्नी पहनती थीं फटी धोती।