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  • 18 साल बाद भी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ से कमाई कर रहे अनिल कपूर, फिटनेस और समर्पण का उदाहरण

    18 साल बाद भी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ से कमाई कर रहे अनिल कपूर, फिटनेस और समर्पण का उदाहरण


    नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अनिल कपूर ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में एक भावुक और प्रेरक किस्सा साझा किया, जिसने सभी का ध्यान खींचा। 69 साल के अनिल कपूर ने बताया कि 18 साल पहले उन्होंने फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में एक छोटा सा रोल मुफ्त में किया था। उन्होंने यह रोल केवल सीखने और अनुभव हासिल करने के उद्देश्य से स्वीकार किया था, लेकिन आज यह फिल्म उनके लिए करोड़ों रुपये कमाने का जरिया बन चुकी है।

    अनिल कपूर ने बताया कि हाल ही में उन्हें फिल्म के लिए 3,000 पाउंड (लगभग साढ़े तीन लाख रुपये) का चेक मिला। उन्होंने कहा, “कुल मिलाकर यह राशि करीब आधा मिलियन पाउंड (लगभग 6 करोड़ रुपये) तक पहुंच सकती है। मैंने इसके लिए कभी पैसे नहीं मांगे थे, लेकिन टीम ने मुझे भुगतान किया। यह फिल्म मैंने सिर्फ सीखने और अनुभव हासिल करने के लिए की थी।”

    फिल्म और पैसे के अनुभव के बाद अनिल ने अपनी फिटनेस और जीवनशैली पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “मैं 69 साल की उम्र में भी तेज दौड़ सकता हूं और चलना मुझे बहुत पसंद है। अपनी उम्र के अनुसार मैंने खुद को फिट रखा है। जब मैं किसी अन्य अभिनेता को वजन उठाते देखता हूं, तो मैं भी उतना ही वजन उठाता हूं। मैं अपने शरीर की सुनता हूं और उसे चुनौती देता हूं।”

    अपने अभिनय और रोल पर उन्होंने कहा, “मैं जो भी रोल करता हूं, वह मेरी उम्र और अनुभव के अनुसार होता है। मुझे हमेशा लगता रहा है कि दर्शकों के विचार से पहले खुद को ढालना चाहिए। मैं अपने काम को बहुत पसंद करता हूं और जब तक सक्रिय हूं, जिंदगी बहुत खूबसूरत है।”

    अनिल कपूर का यह अनुभव बताता है कि एक कलाकार का समर्पण, सीखने का जज्बा और निरंतर फिटनेस उसे समय के साथ भी प्रासंगिक बनाए रख सकते हैं। उनके अनुभव से नए कलाकारों को प्रेरणा मिलती है कि अभिनय केवल पैसे कमाने का जरिया नहीं, बल्कि सीखने और खुद को सुधारने का अवसर होना चाहिए।

    इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि अनिल कपूर ने अपने करियर में अनुभव, मेहनत और सीखने के जज्बे को प्राथमिकता दी, जो उन्हें आज भी बॉलीवुड में सफल और प्रेरक बनाए रखता है।

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  • फिटनेस टेस्ट में फेल, फिर मिलेट्स से जीता विश्व बाजार, ये है शुभम तिवारी की प्रेरक कहानी

    फिटनेस टेस्ट में फेल, फिर मिलेट्स से जीता विश्व बाजार, ये है शुभम तिवारी की प्रेरक कहानी

    शहडोल के 30 वर्षीय युवा उद्यमी शुभम तिवारी की कहानी हर बेरोजगार युवा के लिए एक मिसाल है। नौकरी के लिए मेडिकल फिटनेस टेस्ट में असफल होने के बाद उन्होंने हार नहीं मानी। तीन साल की कड़ी मेहनत से मिलेट्स उत्पादों पर रिसर्च कर विदेशों तक अपनी पहचान बना ली। जर्मनी से मंगाईं आठ अत्याधुनिक मशीनें, गल्फ कंट्री, श्रीलंका, यूरोप और अमेरिका से 42 टन का प्री-ऑर्डर, 50 हजार किलो से ज्यादा घरेलू बुकिंग! और उसके बाद सफलतापूर्वक किए जा रहे सफल प्रसासों से शुभम साबित कर रहे हैं कि असफलता बस एक नया रास्ता दिखाने का बहाना है।
    दरअसल असफलता नया अवसर है। नेशनल हाईवे 43 पर स्थित ये यूनिट, जहां एक घंटे में एक टन अनाज प्रोसेस होता है, राज्‍य के शहडोल संभाग की पहली ऐसी सुविधा है।अगर आप भी बेरोजगार हैं, तो उनकी ये कहानी आपको उत्साह से भर देगी, क्योंकि सपनों को हकीकत में बदलना हर युवा के बस की बात है!

    नौकरी के पीछे भागनेवाला युवा इस तरह बन गया नौकरी देनेवाला

    शुभम की शुरुआत प्रेरणादायक है। मास्टर्स डिग्री कर चुके, जब माइनिंग इंजीनियरिंग की नौकरी में मेडिकल अनफिट होकर बाहर हो गए तो उन्होंने ऑनलाइन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग क्लास शुरू की। और फिर इसी दौरान मिलेट के बारे में जानकारी प्राप्त हुई और फिर शुरुआत हुई ग्रेनॉक्सी की। हालांकि इससे जुड़ी उनकी कहानी यूं है कि माइनिंग इंजीनियरिंग डिप्लोमा के बाद कोल माइंस की नौकरी के लिए मेडिकल अनफिट कलर ब्लाइंडनेस की वजह से बाहर कर दिया गया था। इस पर शुभम ने हार नहीं मानी और सकारात्‍मक सोच के साथ ऑनलाइन कंप्टीशन एग्जाम की तैयारी करवाने के लिए यूट्यूब चैनल और एप्लीकेशन बनाया, जोकि देखते ही देखते सफलता की ऊंचाइयों को छूने लगा, आज जिसमें लगभग दो लाख से ऊपर बच्चे जुड़ चुके हैं और लगभग 84 बच्चों का शासकीय नौकरी में चयन भी हो चुका है।


    इस बीच शुभम ने सोचा, क्यों न कुछ ऐसा करें जो स्वास्थ्य से जुड़ा हो; अपने आस-पास का जनजाति बहुल्‍य क्षेत्र होने पर परंपरागत मोटे अनाज (मिलेट्स) पर नजर पड़ी, कोदो, कुटकी, रागी, ज्वार, बाजरा जैसे अनाज जो ‘सुपरफूड’ हैं क्योंकि ये पोषक तत्वों से भरपूर हैं। शुभम ने इन पर तीन साल तक रिसर्च की। स्थानीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों से सलाह ली। मिलेट्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू बढ़ाने वाली नई तकनीकें विकसित कीं। नतीजा! रस्स, आटा, सूजी, रवा, पास्ता, मैकरोनी, बेकरी आइटम्स और 14 तरह की कुकीज इन मोटे अनाज पर आधार‍ित कर तैयार हो गईं! ये उत्पाद सभी के लिए स्वादिष्ट होने के साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक भी हैं।

    आपका स्टार्टअप भी चमक सकता है!

    पैसे जुटाने में भी शुभम ने कमाल कर दिखाया। उद्यमियों, और किसानों को जोड़ा, ग्रामीण रोजगार बढ़ाया। राज्‍य के उद्यानिकी विभाग से भी 10 लाख रुपए का आर्थ‍िक सहयोग लिया, एक बैंक उन्‍हें 50 लाख रुपए देने आगे आई, फिर इस पूंजी से दो करोड़ की लागत वाली फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई। नेशनल हाईवे 43 पर बुढ़ार के साबो में स्थित ये यूनिट मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग की पहली ऐसी सुविधा है, जहां 12 तरह के मिलेट्स प्रोसेस हो रहे हैं। जर्मनी से आठ (कुल 12 में से) अत्याधुनिक मशीनें मंगाईं, जो एक ही छत के नीचे पूरी प्रोसेसिंग कर रही हैं। एक घंटे में एक टन अनाज तैयार!

    शुभम तिवारी कहते हैं, “सरकारी नौकरी के शुरूआती प्रयासों में असफल होने पर मैंने तुरंत निर्णय ले लिया था कि अब स्‍वयं के लिए नौकरी नहीं चाहिए, वे नौकरी देनेवाले बनेंगे। इसलिए मैं अपनी इस सोच के साथ स्‍वयं को आत्‍मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा। मेरा तो यही कहना है कि प्रत्‍येक युवा को सकारात्‍मक नजरिया रखते हुए अपने प्रयास जिस भी फील्‍ड में हैं वहां करना चाहिए, सफलता कभी शीघ्र अन्‍यथा कुछ देर से मिलती जरूर है।”

    उनके प्रमोशन का कमाल देखिए! जनवरी 2024 से सोशल मीडिया पर जोर दिया। कोई प्लेटफॉर्म नहीं था तो खुद बनाया। स्कूलों में बच्चों को मिलेट्स के फायदे बताए। नतीजा, 50 हजार किलो से ज्यादा प्री-ऑर्डर मिले! विदेशी बाजारों का सर्वे किया, जिसमें कि अमेरिका, गल्फ कंट्री, श्रीलंका, यूरोप में वहां की डिमांड और दामों का अध्ययन कर कीमतें तय कीं। आज 42 टन का ऑर्डर बुक हो चुका है! श्रीलंका ने 12 टन कोदो राइस, अमेरिका ने 10 टन। सबसे पहले ये विदेशी ऑर्डर पूरे किए जा रहे हैं। स्‍वभाविक है अब मध्‍य प्रदेश के शहडोल का कोदो राइस श्रीलंका-अमेरिका की रसोई तक पहुंचेगा!

    शुभम का व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत है। सकारात्मक सोच, लगातार प्रयोग यही उनकी सफलता के औजार हैं। उनके इस प्रयास ने आज शहडोल जैसे जनजाति बहुल्‍य क्षेत्र के गरीब किसानों को भी आत्‍मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है, क्‍योंकि अब किसानों को उनकी फसल के उचित दाम उनके खेत में ही सुलभ हो रहे हैं। शुभम तिवारी की टीम इन किसानों से मोटा अनाज उनके खेत में जाकर एकत्र करती है।


    रोजगार पर फोकस

    शुभम शहडोल संभाग तक ही सीमित नहीं रहे हैं, वे इससे बाहर निकलकर जबलपुर भी अपने नवाचारों को लेकर पहुंचे हैं। जबलपुर के गोरखपुर थाने के पास महर्षि विद्या मंदिर के सामने में ग्रेनॉक्सी सुपरफूड कैफे उन्‍होंने शुरू किया है, जिसमें हेल्दी मिलेट से बने पिज्जा, बर्गर, सैंडविच, इडली, डोसा, कप केक, बिरयानी, पास्ता, नूडल्स मिलते हैं।

    उनका साफ कहना है, “भविष्य में निर्यात बढ़ेगा तो हम अधिक रोजगार देनेवाले बनेंगे, इसके लिए नई युनिट होना भी जरूरी है” वे बताते हैं कि “मैं एसएचजी की महिलाओं को प्रशिक्षण दे रहा हूँ जिससे वो भी सीखकर हमारे साथ या फिर स्वयं का रोजगार शुरू कर सके। इनक्यूबेशन सेंटर और एक्सपोर्ट पर अपने एनजीओ जिसका नाम शुभम करोती कल्याणम यूथ सोसाइटी है, उसके माध्यम से अन्‍यों की सहायता के लिए मैं उन लोगों की मदद के लिए भी आगे आ रहा हूं जिनके पास पैसे का अभाव है वो इन्वेस्टर से जुड़कर पैसे और मेंटरशिप प्राप्त कर सकते हैं और एक्सपोर्ट के माध्यम से अपने प्रोडक्ट्स को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचा सकते हैं।”

    इस बीच शुभम तिवारी ये भी कहते हैं, “जिस तरह से माननीय प्रधानमंत्री जी ने शहडोल को फुटबॉल के लिए वैश्विक मंच पर मिनी ब्राजील के नाम से विश्व विख्यात किया है। उसी तरह से मैं मिलेट (श्री अन्न) को जो ओडीओपी प्रोडक्ट भी हैं, उसके लिए शहडोल को मिलेट हब बनाना चाहता हूं ताकि विश्व स्तर पर यहां का मिलेट लोगों के घर तक पहुंचे।” वे कहते हैं, “मेरा लक्ष्य मुनाफा नहीं, आत्मनिर्भर भारत है।” युवाओं और बेरोजगारों के लिए शुभम तिवारी का संदेश साफ है कि हार मत मानो! रिसर्च करो, सोशल मीडिया अपनाओ, सरकार के अनुदान लो। छोटे से स्टार्टअप से विश्व बाजार तक पहुंचो।

  • सुपरस्टार बनने से पहले संघर्ष के दिन, Gippy Grewal की संघर्ष और मेहनत की कहानी

    सुपरस्टार बनने से पहले संघर्ष के दिन, Gippy Grewal की संघर्ष और मेहनत की कहानी


    नई दिल्ली। पंजाबी फिल्मों और संगीत की दुनिया के सुपरस्टार गिप्पी ग्रेवाल ने सफलता का लंबा सफर मेहनत और संघर्ष से तय किया है। आज जहां उनका नाम करोड़ों फैंस के दिलों में गूंजता है, वहीं शुरूआत में उन्होंने गाड़ियों धोने, सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी और कनाडा में रेस्तरां में वेटर जैसी नौकरियां की। गिप्पी का जन्म 2 जनवरी 1983 को हुआ था और आज वह अपना 39वां जन्मदिन मना रहे हैं।

    बचपन से संगीत की ओर झुकाव
    गिप्पी बचपन से ही संगीत और नाटकों में रुचि रखते थे। पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी कम थी, और उन्होंने केवल इतनी पढ़ाई की कि पास हो सकें। 12वीं के बाद उन्होंने म्यूजिक सीखना शुरू किया।

    उनके गुरु ने उनकी रफ आवाज पर काम करने की सलाह दी, जिसे उन्होंने सुधारकर अपनी अलग पहचान बनाई। यह रफ और अनोखी आवाज ही उन्हें पंजाबी संगीत और फिल्मों में अलग मुकाम दिलाने में मददगार साबित हुई।

    छोटी नौकरियों से बड़ी मंजिल तक
    गिप्पी ग्रेवाल पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेता, गायक, निर्माता, निर्देशक और लेखक के रूप में सक्रिय हैं। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने कनाडा में वेटर, दिल्ली में सिक्योरिटी गार्ड और गाड़ियों की धोने जैसी नौकरियों में काम किया।

    उनका मानना है कि किसी भी काम में शर्म नहीं होनी चाहिए और ईमानदारी से कमाए पैसे से ही सुकून मिलता है। यही मेहनत और समर्पण उन्हें संगीत में करियर बनाने के लिए प्रेरित करता रहा।

    संगीत और फिल्म की दुनिया में धमाका
    गिप्पी ने अपने संगीत करियर की शुरुआत हिट अलबम ‘चक्ख लाई’ से की। इसके बाद साल 2010 में उन्हें पंजाबी फिल्म ‘मेल करादे रब्बा’ में काम करने का मौका मिला और फिर ‘जिहने मेरा दिल लुटेया’ में उनकी लोकप्रियता बढ़ी। साल 2012 में उन्होंने खुद ‘कैरी ऑन जट्टा’ का निर्माण किया, जो इंडस्ट्री की बड़ी हिट साबित हुई। इसके बाद ‘कैरी ऑन जट्टा 2’ ने बॉक्स ऑफिस पर 60 करोड़ रुपये कमाए। अब उनके फैंस इस साल तीसरे भाग का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

    मेहनत और ईमानदारी की मिसाल
    गिप्पी ग्रेवाल की कहानी यह साबित करती है कि संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी से कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है। आज वह पंजाबी सिनेमा के सुपरस्टार हैं और संगीत की दुनिया में भी करोड़ों फैंस के दिलों पर राज कर रहे हैं। उनके संघर्ष और सफलता की कहानी नए कलाकारों और फैंस के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी हुई है।