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  • रोम से स्वदेश रवाना हुए PM मोदी…. अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करेगा 5 देशों का दौरा

    रोम से स्वदेश रवाना हुए PM मोदी…. अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करेगा 5 देशों का दौरा


    रोम (इटली)।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने अपने पांच देशों के आधिकारिक दौरे को पूरा करते हुए बुधवार को इटली (Italy) के रोम (Rome) से भारत के लिए प्रस्थान किया। यह दौरा भारत की वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


    इटली यात्रा में रिश्तों को मिली नई मजबूती

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इटली यात्रा को बेहद सफल बताते हुए कहा कि उनकी चर्चा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर केंद्रित रही। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि भारत और इटली ने अपने संबंधों को स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप तक पहुंचाने का निर्णय लिया है, जिससे आने वाले समय में दोनों देशों के सहयोग को नई गति मिलेगी। पीएम मोदी ने इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मटेरेला से मुलाकात कर व्यापार, निवेश, संस्कृति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण खनिज, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर विस्तृत चर्चा की।


    आतंक के वित्तपोषण के खिलाफ भारत इटली की पहल वैश्विक नजीर: मोदी

    पीएम मोदी ने कहा कि आतंकवाद मानवता के लिए एक गंभीर चुनौती है और भारत-इटली दोनों इस बात पर एकमत हैं। आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ हमारी पहल ने पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है। पीएम मोदी ने कहा, भारत और इटली ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जिम्मेदार लोकतंत्र न केवल आतंकवाद की निंदा करते हैं, बल्कि इसके वित्तीय नेटवर्क को बाधित करने के लिए ठोस कदम भी उठाते हैं। पीएम ने यूक्रेन और पश्चिम एशिया संकट के बारे में कहा कि हम यूक्रेन, पश्चिम एशिया और अन्य तनावों के संबंध में लगातार एक-दूसरे के संपर्क में हैं। भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि सभी समस्याओं का समाधान संवाद और कूटनीति से होना चाहिए। इटली की पीएम जियोर्जिया मेलनी के साथ वार्ता के बाद साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी ने कहा, दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के साथ-साथ हमारी सेनाओं में भी सहयोग बढ़ रहा है।


    इटली दौरे की बड़ी उपलब्धियां

    – दोनों देशों के संबंध को विशेष रणनीतिक साझेदारी में बदलने से द्विपक्षीय संबंध तेजी से आगे बढ़ेगा।
    – भारत-इटली रक्षा औद्योगिक रोडमैप: रक्षा सहयोग और रक्षा उत्पादन तंत्र मजबूत होगा।
    – दुर्लभ खजिनों के क्षेत्र में सहयोग का एमओयू से खोज-खनन-उत्पादन में तेजी। आधुनिक तकनीक और निवेश में सहयोग बढ़ेगा।
    – ईडी-इटली के वित्तीय निगरानी विभाग में सहयोग से टैक्स संबंधी अपराधों, धनशोधन और आतंकवाद के खिलाफ फंडिंग पर मिलकर काम होगा।
    – भारत-इटली में 2027 को संस्कृति और पर्यटन वर्ष के रूप में मनाने का समझौता: दोनों देशों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
    – भारतीय नर्सों को काम के लिए इटली भेजने का समझौता: इससे भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा। दुनिया में भारतीय कार्यबल की गुणवत्ता को मान्यता।
    – गुजरात के लोथल में नेशनल मेरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स निर्माण के एमओयू से भारतीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा।
    – उच्च शिक्षा और शोध में सहयोग का रोडमैप: शोध की गुणवत्ता, औद्योगिक संपर्क और आधुनिक शिक्षण का तंत्र विकसित होगा। क्षमता निर्माण होगा।
    – समुद्री परिवहन क्षेत्र में सहयोग के लिए एमओयू से समुद्री बुनियादी ढांचा मजबूत होगा।


    रणनीतिक साझेदारी को मिला नया आयाम

    दोनों देशों ने संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना 2025-29 की प्रगति की समीक्षा की और व्यापार, निवेश, तकनीक, रक्षा, ब्लू इकोनॉमी, कनेक्टिविटी, शिक्षा और जन-से-जन संबंधों जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई। इटली सरकार ने भी इस यात्रा को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि भारत और इटली के संबंध अब अपने सबसे उच्च स्तर पर पहुंच चुके हैं।


    MEA ने बताया यात्रा को सफल

    विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस दौरे को बेहद सफल बताया। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की 5 देशों की यात्रा के अंतिम चरण में इटली में कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। पीएम मोदी ने 15 से 20 मई तक संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा किया। इस दौरान भारत ने कई देशों के साथ अपने आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी संबंधों को मजबूत किया।


    भारत और इटली के बीच का द्विपक्षीय व्यापार

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले जून 2024 में ग्रुप ऑफ सेवन (G7) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए इटली गए थे। अब उनका यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत और इटली के बीच द्विपक्षीय संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों देश संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना 2025-2029 को सक्रिय रूप से लागू कर रहे हैं। इस व्यापक रोडमैप के तहत व्यापार, निवेश, रक्षा और सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, नवाचार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और लोगों के बीच संपर्क जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा रहा है।

    मंत्रालय ने बताया कि वर्ष 2025 में भारत-इटली द्विपक्षीय व्यापार 16.77 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है। वहीं अप्रैल 2000 से सितंबर 2025 के बीच इटली से भारत में 3.66 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) दर्ज किया गया। दोनों देश रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।


    यात्रा के दौरान मिले कई सम्मान

    इसी यात्रा क्रम में नॉर्वे दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया गया, जो उनका 32वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। नॉर्वे में उन्होंने भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया। इसके अलावा स्वीडन में उन्हें ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार’ से सम्मानित किया गया और दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करते हुए रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने पर सहमति जताई।

  • डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’

    डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का तीखा जवाब, ‘मिडिल ईस्ट को बना देंगे नरक’


    तेहरान। डोनाल्ड ट्रंप की सख्त चेतावनी के बाद ईरान ने कड़ा पलटवार किया है। ट्रंप ने कहा था कि यदि ईरान समझौता नहीं करता तो उस पर “कहर” बरसेगा। इसके जवाब में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने मिडिल ईस्ट में हालात और बिगड़ने की चेतावनी दी है।  खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फाघारी ने कहा कि अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो पूरा क्षेत्र अमेरिका और इजरायल के लिए “नरक” बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को हराने का भ्रम विरोधियों को दलदल में फंसा देगा।

    ड्रोन और मिसाइल हमलों का दावा

    इब्राहिम जोल्फाघारी ने दावा किया कि ईरान ने अपने ड्रोन और मिसाइलों से इजरायल और अमेरिका से जुड़े कई ठिकानों को निशाना बनाया है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और इजरायल, ईरान पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने का दबाव बना रहे हैं। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान के पास समझौते या होर्मुज खोलने के लिए बहुत कम समय बचा है। उन्होंने लिखा कि पहले 10 दिन का समय दिया गया था और अब 48 घंटे बाद कड़ी कार्रवाई हो सकती है।


    लगातार बदलते बयान, बढ़ता तनाव

    28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद शुरू हुए इस संघर्ष में ट्रंप के बयान लगातार बदलते रहे हैं। एक ओर वे कूटनीतिक समाधान की बात करते हैं, तो दूसरी ओर ईरान को “स्टोन एज” में भेजने जैसी कड़ी चेतावनी भी देते हैं। युद्ध को एक महीने से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन होर्मुज अब भी पूरी तरह नहीं खुला है। दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है, जिससे इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।

    ऊर्जा संकट और बढ़ती कीमतें

    होर्मुज के बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है और ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है। पहले जहां ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल थी, अब यह 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है। हालांकि, कुछ देशों के जहाजों को सीमित रूप से होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी गई है, जिनमें भारत भी शामिल है। हाल ही में एक फ्रांसीसी कंपनी का जहाज इस मार्ग से गुजरने वाला पहला बड़ा पश्चिमी यूरोपीय जहाज बना। इसके बावजूद, क्षेत्र में लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के चलते सामान्य समुद्री आवाजाही अब भी प्रभावित बनी हुई है।

  • ईरान पर हमलों को ऑस्ट्रेलिया में कम समर्थन, सेना भेजने का विरोध

    ईरान पर हमलों को ऑस्ट्रेलिया में कम समर्थन, सेना भेजने का विरोध


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल के हमलों की वजह से तनाव की स्थिति बरकरार है। एक सर्वे से पता चला है कि ऑस्ट्रेलिया की केवल 26 फीसदी जनता ही ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल के हमलों को सही मानती है। वहीं 50 फीसदी आबादी ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की तैनाती को ठीक नहीं मानती।

    न्यूज एजेंसी सिन्हुआ के अनुसार, स्वतंत्र फर्म ‘एसेंशियल रिसर्च’ के एक मासिक पोल, ‘द एसेंशियल रिपोर्ट’ के ताजा अपडेट में बताया गया है कि 10 फीसदी लोग ईरान पर हमले शुरू करने के अमेरिका-इजरायल के फैसले को पूरी तरह से जायज हमला मानते हैं और 16 फीसदी लोग इसे ठीक-ठाक कार्रवाई करार दे रहे हैं।

    वहीं ऑस्ट्रेलियाई आबादी का 27 फीसदी हिस्सा इस संघर्ष के सख्त खिलाफ है। 15 फीसदी लोगों ने कहा कि वे इसे नामंजूर करते हैं, जबकि बाकी लोग या तो निष्पक्ष रहने में यकीन रखते हैं या इस फैसले को लेकर असमंजस में हैं।

    संघर्ष में ऑस्ट्रेलिया के शामिल होने के बारे में पूछे जाने पर, पोल में शामिल 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे ईरान में अमेरिका-इजरायल के जमीनी अभियान के समर्थन में सेना भेजने का विरोध करेंगे, जबकि 21 प्रतिशत ने कहा कि वे ऐसे कदम के पक्ष में हैं।

    दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया ने ईरान से आने वाले यात्रियों पर बैन लगाने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से यह खतरा बढ़ गया है कि शॉर्ट-टर्म वीजा खत्म होने के बाद वे घर जाने से मना कर देंगे।

    गृह विभाग का कहना है कि अगले छह महीनों तक ईरानी पासपोर्ट पर यात्रा करने वाले लोगों को पर्यटन या काम के लिए ऑस्ट्रेलिया आने से रोक दिया जाएगा।

    एक बयान में कहा गया है, “ईरान में लड़ाई की वजह से यह खतरा बढ़ गया है कि कुछ अस्थायी वीजा होल्डर्स अपने वीजा खत्म होने पर ऑस्ट्रेलिया से बाहर नहीं जा पाएंगे या शायद ही जा पाएं।”

    विभाग ने आगे कहा कि वीजा मामले में थोड़ी सी राहत कुछ खास मामलों में दी जाएंगी, जैसे कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों के माता-पिता के लिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 85,000 से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई नागरिक ईरान में पैदा हुए थे और सिडनी और मेलबर्न जैसे बड़े शहरों में रहने वाले ईरानी समुदाय के पाए जाते हैं।

    इससे पहले ऑस्ट्रेलिया ने इस महीने मेहमान महिला फुटबॉल टीम की सात खिलाड़ियों और अधिकारियों को अपने देश में शरण दी। ऑस्ट्रेलिया के इस कदम से ईरान में भारी नाराजगी है।

    दरअसल, एशियन कप मैच के दौरान खेल शुरू होने से पहले खिलाड़ियों ने ईरान का राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया। इस कदम के बाद ईरान में इन खिलाड़ियों को देशद्रोही करार दिया गया। खिलाड़ियों की इस हरकत को इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ बगावत के तौर पर देखा गया।

    उन सात में से पांच ने बाद में ऑस्ट्रेलिया में पनाह लेने का अपना फैसला बदल दिया, जिससे यह शक और बढ़ गया कि उनके परिवार खतरे में आ गए हैं।

  • बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती

    बदलते वैश्विक समीकरण: अमेरिका पर बढ़ा दबाव, चीन-रूस बने चुनौती


    नई दिल्ली।  भारत की वैश्विक कूटनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। एस. जयशंकर दो दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हो रहे हैं, जहां वे जी-7 विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल भारत-फ्रांस संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी और प्रभावशाली बनाएगा।

    फ्रांस में होगी अहम कूटनीतिक बैठक

    विदेश मंत्री जयशंकर फ्रांस के अब्बे डेस वॉक्स-डी-सेर्ने में आयोजित बैठक में शामिल होंगे। उन्हें फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने आमंत्रित किया है। इस दौरान जयशंकर कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी कर सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    वैश्विक मुद्दों पर होगी गहन चर्चा

    इस जी-7 बैठक में दुनिया के कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसमें यूक्रेन में जारी युद्ध, पुनर्निर्माण की योजनाएं, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। साथ ही, सप्लाई चेन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखने पर भी विचार-विमर्श होगा।

    यूक्रेन संकट पर विशेष फोकस

    बैठक में यूक्रेन के पुनर्निर्माण को लेकर खास सत्र आयोजित होंगे। इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी, ह्यूमैनिटेरियन डीमाइनिंग और फंडिंग सिस्टम पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी जोर रहेगा, जो यूक्रेन की आर्थिक बहाली में मदद कर सकते हैं।

    समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर

    वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद अहम है। इस बैठक में मैरीटाइम रूट की सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाने के प्रयास किए जाएंगे।

    ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम में सुधार की पहल

    जी-7 देश वैश्विक शासन प्रणाली को और आधुनिक बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसमें ऐसे नए ढांचे तैयार करने पर जोर होगा, जो बदलती वैश्विक चुनौतियों जैसे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़े जोखिमो का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

    भारत समेत कई देशों की भागीदारी

    इस बैठक की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ जी-7 देश ही नहीं, बल्कि भारत, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ब्राजील और यूक्रेन जैसे कई साझेदार देश भी शामिल होंगे। यह जी-7 की बढ़ती आउटरीच और सहयोग की नीति को दर्शाता है।

    इवियन समिट की तैयारी का मंच

    यह बैठक जून में होने वाले जी-7 लीडर्स समिट (इवियन समिट) की तैयारी का अहम चरण मानी जा रही है। यहां होने वाली चर्चाएं भविष्य की वैश्विक रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • फ्रांस दौरे पर विदेश मंत्री जयशंकर, G7 बैठक में भारत की होगी अहम भूमिका

    फ्रांस दौरे पर विदेश मंत्री जयशंकर, G7 बैठक में भारत की होगी अहम भूमिका


    नई दिल्ली। भारत की वैश्विक कूटनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। एस. जयशंकर दो दिवसीय फ्रांस दौरे पर रवाना हो रहे हैं, जहां वे जी-7 विदेश मंत्रियों की अहम बैठक में हिस्सा लेंगे। यह दौरा न केवल भारत-फ्रांस संबंधों को मजबूती देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी और प्रभावशाली बनाएगा।

    फ्रांस में होगी अहम कूटनीतिक बैठक

    विदेश मंत्री जयशंकर फ्रांस के अब्बे डेस वॉक्स-डी-सेर्ने में आयोजित बैठक में शामिल होंगे। उन्हें फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने आमंत्रित किया है। इस दौरान जयशंकर कई देशों के अपने समकक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ता भी कर सकते हैं, जिससे भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

    वैश्विक मुद्दों पर होगी गहन चर्चा

    इस जी-7 बैठक में दुनिया के कई अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसमें यूक्रेन में जारी युद्ध, पुनर्निर्माण की योजनाएं, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। साथ ही, सप्लाई चेन को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखने पर भी विचार-विमर्श होगा।

    यूक्रेन संकट पर विशेष फोकस

    बैठक में यूक्रेन के पुनर्निर्माण को लेकर खास सत्र आयोजित होंगे। इसमें न्यूक्लियर सेफ्टी, ह्यूमैनिटेरियन डीमाइनिंग और फंडिंग सिस्टम पर चर्चा की जाएगी। यूरोपीय बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट जैसे संस्थानों की भूमिका पर भी जोर रहेगा, जो यूक्रेन की आर्थिक बहाली में मदद कर सकते हैं।

    समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन पर जोर

    वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा बेहद अहम है। इस बैठक में मैरीटाइम रूट की सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और सप्लाई चेन की मजबूती जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थिरता लाने के प्रयास किए जाएंगे।

    ग्लोबल गवर्नेंस सिस्टम में सुधार की पहल

    जी-7 देश वैश्विक शासन प्रणाली को और आधुनिक बनाने पर भी विचार कर रहे हैं। इसमें ऐसे नए ढांचे तैयार करने पर जोर होगा, जो बदलती वैश्विक चुनौतियों—जैसे सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संप्रभुता से जुड़े जोखिमों—का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।

    भारत समेत कई देशों की भागीदारी

    इस बैठक की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ जी-7 देश ही नहीं, बल्कि भारत, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, ब्राजील और यूक्रेन जैसे कई साझेदार देश भी शामिल होंगे। यह जी-7 की बढ़ती आउटरीच और सहयोग की नीति को दर्शाता है।

    इवियन समिट की तैयारी का मंच

    यह बैठक जून में होने वाले जी-7 लीडर्स समिट (इवियन समिट) की तैयारी का अहम चरण मानी जा रही है। यहां होने वाली चर्चाएं भविष्य की वैश्विक रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

  • ईरान तनाव के बीच अमेरिका की कूटनीति तेज भारत, कनाडा केन्या से अहम बातचीत

    ईरान तनाव के बीच अमेरिका की कूटनीति तेज भारत, कनाडा केन्या से अहम बातचीत


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच मार्को रुबियो के नेतृत्व में अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। इस क्रम में उन्होंने भारत कनाडा और केन्या के शीर्ष नेताओं से बातचीत कर ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार साझा किए।

    भारत के साथ हुई बातचीत में एस जयशंकर के साथ मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति और बदलते हालात पर चर्चा की गई। दोनों देशों ने आपसी रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक स्थिरता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

    कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ बातचीत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। अमेरिका ने इस दौरान वैश्विक सुरक्षा और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने पर जोर दिया। साथ ही हैती में शांति बहाली के प्रयासों और वहां की स्थिति पर भी विचार साझा किए गए।

    केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो के साथ हुई बातचीत में अमेरिका ने ईरान के मुद्दे पर केन्या के रुख की सराहना की। दोनों नेताओं ने खाड़ी देशों के खिलाफ ईरान की गतिविधियों की निंदा पर चर्चा की और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इस दौरान अमेरिका ने हैती में शांति स्थापित करने के लिए केन्या के योगदान की भी सराहना की।

    अमेरिका की यह पहल इस बात का संकेत है कि वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान ढूंढने की दिशा में काम कर रहा है। एशिया अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के प्रमुख साझेदार देशों के साथ संवाद बढ़ाकर अमेरिका अपनी कूटनीतिक पकड़ को और मजबूत करना चाहता है।

    यह कूटनीतिक सक्रियता दर्शाती है कि अमेरिका ईरान और मध्य पूर्व के मुद्दों को लेकर बेहद गंभीर है और वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त रणनीति के तहत आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।

  • मॉरीशस ने मालदीव के साथ तोड़े सभी राजनयिक रिश्ते, चागोस द्वीप विवाद बना वजह

    मॉरीशस ने मालदीव के साथ तोड़े सभी राजनयिक रिश्ते, चागोस द्वीप विवाद बना वजह


    नई दिल्ली/माले। मॉरीशस सरकार ने शुक्रवार 27 फरवरी को एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया और मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह कदम मालदीव के चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर बदलते रुख के बाद उठाया गया। ध्यान दें कि दोनों देश भारत के मित्र हैं।

    विवाद का कारण

    मॉरीशस के विदेश मंत्रालय के अनुसार मालदीव ने हाल ही में चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देना बंद कर दिया है। साथ ही मालदीव ने मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच चागोस को लेकर हुए हालिया समझौते पर आपत्ति जताई। मॉरीशस की कैबिनेट ने इस कदम को राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन के लिए आवश्यक बताया।

    मालदीव का रुख

    मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मुइज्जू ने 5 फरवरी को स्टेट ऑफ द नेशन संबोधन में कहा कि चागोस पर मालदीव का दावा मॉरीशस या किसी अन्य देश से अधिक मजबूत है। उन्होंने 2022 में मालदीव की पिछली सरकार द्वारा मॉरीशस की मान्यता को औपचारिक रूप से वापस ले लिया और इसे समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।

    चागोस द्वीप समूह: विवाद की पृष्ठभूमि

    चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का समूह है जिसमें सबसे बड़ा डिएगो गार्सिया है। रणनीतिक रूप से इसका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि यहां से मध्य पूर्व दक्षिण एशिया और अफ्रीका पर सैन्य और सुरक्षा निगरानी आसान है।

    1965 में ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस को अलग कर दिया और इसे ब्रिटिश-हिंद महासागर क्षेत्र का हिस्सा बना दिया। डिएगो गार्सिया पर अमेरिका ने 1966 में 50 साल के पट्टे पर सैन्य अड्डा बनाया जो आज भी अमेरिकी रणनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए ब्रिटेन ने 1967-1973 के बीच द्वीप के 1,500–2,000 मूल निवासियों को मॉरीशस और सेशेल्स में विस्थापित कर दिया।

    अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप

    मॉरीशस ने दशकों तक चागोस पर अपनी संप्रभुता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में ICJ ने ब्रिटेन को द्वीप को मॉरीशस को सौंपने की सलाह दी। UN महासभा ने भी ब्रिटेन से मॉरीशस को चागोस सौंपने का प्रस्ताव पारित किया।

    हालिया ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता

    ब्रिटेन और मॉरीशस ने समझौता किया जिसमें मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी गई लेकिन डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य बेस लंबे पट्टे (99 साल) के तहत संचालित होता रहेगा।

    मालदीव का विवाद
    मालदीव ने अब चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता और ब्रिटेन के साथ हुए समझौते पर आपत्ति जताई। इससे मॉरीशस ने मालदीव के साथ सभी राजनयिक संबंध तोड़ दिए।

  • ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी

    ट्रंप ने यूक्रेन और ईरान वार्ता की कमान अपने दामाद और दोस्त के हाथों में सौंपी


    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दामाद जेरेड कुश्नर और पुराने मित्र स्टीव विटकॉफ को दुनिया के दो सबसे बड़े संकटों यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव को संभालने की जिम्मेदारी दी है। गुरुवार को दोनों ने स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अलग-अलग बैठकों में इन मुद्दों पर चर्चा की।

    जिनेवा में व्यस्त कूटनीतिक दौरा
    कुश्नर और विटकॉफ ने अपने जिनेवा दौरे की शुरुआत ओमान के राजदूत के आवास से की जहां उन्होंने ईरानी अधिकारियों से मुलाकात की। इसका उद्देश्य तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौते पर मुहर लगाना और अमेरिका तथा इजरायल द्वारा संभावित हमलों को रोकना था। इसके कुछ ही घंटों बाद दोनों ने इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में यूक्रेनी अधिकारियों से बैठक की। रूसी आक्रमण अब अपने पांचवें वर्ष में है इसलिए यह वार्ता बेहद अहम मानी जा रही थी। इसके बाद फोर सीजन्स होटल में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों से अलग-अलग मंजिलों पर मुलाकात की गई। शाम तक दोनों फिर से ओमान के राजदूत के आवास लौटे और गुरुवार देर रात अमेरिका के लिए रवाना हुए।

    गाजा शांति समझौते में भूमिका

    कुश्नर और विटकॉफ की जिम्मेदारी केवल यूरोप या ईरान तक सीमित नहीं है। एक सप्ताह से भी कम समय पहले उन्होंने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उद्घाटन बैठक में हिस्सा लिया था। यह संस्था गाजा पट्टी में हमास और इजरायल के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

    ट्रंप की कूटनीतिक रणनीति
    ट्रंप की यह कवायद उनकी कूटनीतिक रणनीति को साफ दर्शाती है। वे अमेरिकी सरकार के पारंपरिक तंत्र पर भरोसा करने की बजाय अपनी सबसे अहम प्राथमिकताओं के लिए भरोसेमंद सहयोगियों दामाद और मित्र पर निर्भर हैं।

    विशेषज्ञों की चिंता और वाइट हाउस का बचाव

    कई विशेषज्ञों ने कहा है कि तीन बड़े और जटिल मुद्दों को केवल दो लोग संभालना चुनौतीपूर्ण है। ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के वरिष्ठ फेलो आरोन डेविड मिलर ने कहा कि हर वार्ता स्वयं में कई जटिल विवरणों का महासागर है। वहीं वाइट हाउस के एक अधिकारी ने इनका बचाव करते हुए कहा कि कुश्नर और विटकॉफ का सफलता का ट्रैक रिकॉर्ड और समय प्रबंधन उन्हें इन जिम्मेदारियों के लिए सक्षम बनाता है। दोनों को नियमित रूप से खुफिया ब्रीफिंग भी दी जाती है।

    व्यावसायिक हितों पर उठ रहे सवाल

    दोनों के बड़े व्यावसायिक हितों के कारण उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। जेरेड कुश्नर की निवेश फर्म ‘एफिनिटी पार्टनर्स’ अरबों डॉलर का प्रबंधन करती है जिसमें कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड का पैसा शामिल है। स्टीव विटकॉफ की क्रिप्टो फर्म ‘वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल’ में हिस्सेदारी है जो अबू धाबी सरकार से जुड़े फंड्स के साथ मध्य पूर्व में सौदे कर रही है। इसके अलावा विटकॉफ और रूस के वार्ताकार किरिल दिमित्रीव ने युद्ध के बाद आर्थिक समझौतों पर चर्चा की। रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने कहा कि ये अच्छे व्यापारी हो सकते हैं लेकिन सीनेट की मंजूरी या सरकारी निगरानी के अधीन नहीं हैं।

    यूक्रेन का नजरिया

    यूक्रेन ने कुश्नर और विटकॉफ की भागीदारी का स्वागत किया है। मार्च की शुरुआत में रूसी अधिकारियों के साथ अगली त्रिपक्षीय चर्चा की उम्मीद है जिससे राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन की बैठक का रास्ता साफ हो सके। अमेरिका में यूक्रेन की राजदूत ओल्गा स्टेफनिशिना ने कहा कि सीधे राष्ट्रपति ट्रंप से संपर्क होने की वजह से वे दोनों उनके लिए उपयोगी हैं। हालांकि ट्रंप के पहले कार्यकाल में यूक्रेन वार्ता के विशेष दूत रहे कर्ट वोल्कर ने माना कि सीधा संपर्क सकारात्मक है लेकिन कुश्नर और विटकॉफ को इन मुद्दों की पूरी गहन समझ नहीं है।

  • ग्रीनलैंड पर बयानबाज़ी से बढ़ा वैश्विक तनाव, डेनमार्क ने नाटो की एकता पर जताई गहरी चिंता

    ग्रीनलैंड पर बयानबाज़ी से बढ़ा वैश्विक तनाव, डेनमार्क ने नाटो की एकता पर जताई गहरी चिंता


    नई दिल्ली।ग्रीनलैंड को लेकर हालिया बयानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए तनाव को जन्म दे दिया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए नाटो की एकता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने की आशंका जताई है। उन्होंने साफ कहा कि यदि किसी सहयोगी देश ने ग्रीनलैंड पर दबाव बनाने या बल प्रयोग करने की कोशिश की, तो इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होगी, बल्कि नाटो जैसे सामूहिक सुरक्षा गठबंधन की नींव भी कमजोर पड़ सकती है।

    प्रधानमंत्री फ्रेडरिकसन का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक सार्वजनिक टिप्पणी में ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से बेहद अहम बताते हुए उस पर नियंत्रण की इच्छा जाहिर की थी। हालांकि यह बयान किसी आधिकारिक नीति का हिस्सा नहीं है लेकिन इसके बाद यूरोप और नाटो से जुड़े देशों में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। कई देशों ने इसे सहयोगी देशों के बीच भरोसे के सिद्धांत के खिलाफ बताया है।ग्रीनलैंड भले ही जनसंख्या के लिहाज़ से छोटा इलाका हो, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे वैश्विक राजनीति में बेहद अहम बनाती है। यह डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और नाटो का हिस्सा भी है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड से सैन्य निगरानी, मिसाइल चेतावनी प्रणाली और समुद्री मार्गों पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान होता है। जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक में नए समुद्री रास्तों के खुलने की संभावना ने इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ा दी है।

    डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने नाटो के मूल सिद्धांतों की याद दिलाते हुए कहा कि यह संगठन आपसी भरोसे, सामूहिक सुरक्षा और संप्रभुता के सम्मान पर आधारित है। यदि किसी सदस्य या सहयोगी देश की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी जाती है, तो इससे नाटो की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे हालात में नाटो केवल एक औपचारिक संगठन बनकर रह जाएगा, जिसकी वैश्विक भूमिका सीमित हो सकती है।इस पूरे विवाद पर ग्रीनलैंड की ओर से भी स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने आई है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने कहा कि उनके देश का भविष्य किसी बाहरी दबाव या अंतरराष्ट्रीय बयानबाज़ी से तय नहीं होगा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड के लोग अपने राजनीतिक और आर्थिक फैसले खुद लेने में सक्षम हैं और किसी भी तरह की अटकलों से डरने की जरूरत नहीं है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी के पीछे कई रणनीतिक कारण हैं। आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियां, दुर्लभ खनिज संसाधनों की उपलब्धता और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खुलने वाले नए समुद्री मार्ग इस इलाके को वैश्विक शक्तियों के लिए अहम बनाते हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में पहले से मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचा भी इसकी रणनीतिक उपयोगिता को बढ़ाता है।फिलहाल यह विवाद राजनीतिक बयानों और कूटनीतिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित है, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में बढ़ता तनाव साफ नजर आ रहा है। डेनमार्क ने स्पष्ट कर दिया है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। आने वाले समय में नाटो और उसके सहयोगी देशों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा और तेज होने की संभावना है।