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  • इंटरनेट दुनिया से जोड़ता है, योग स्वयं से, डिजिटल युग में मानसिक शांति और आत्म-जागरूकता के लिए संतुलन जरूरी

    इंटरनेट दुनिया से जोड़ता है, योग स्वयं से, डिजिटल युग में मानसिक शांति और आत्म-जागरूकता के लिए संतुलन जरूरी

    नई दिल्ली ।डिजिटल युग में इंटरनेट और तकनीक ने लोगों के जीवन को काफी हद तक बदल दिया है। दुनिया भर की जानकारी तक पहुंच, दूर बैठे लोगों से बातचीत और कई कामों को कम समय में पूरा करना अब आसान हो गया है। हालांकि, तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मानसिक शांति और स्वयं के साथ समय बिताने का महत्व भी चर्चा में है। योग गुरु महेश अग्रवाल का विचार है कि इंटरनेट मनुष्य को दुनिया से जोड़ता है, जबकि योग उसे स्वयं से जुड़ने का अवसर देता है।

    यह विचार आधुनिक जीवन की एक अहम चुनौती की ओर ध्यान दिलाता है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से व्यक्ति लगातार बाहरी गतिविधियों से जुड़ा रहता है। समाचार, संदेश और डिजिटल सामग्री की निरंतर उपलब्धता के कारण ध्यान बार-बार भटक सकता है। यदि तकनीक का इस्तेमाल जरूरत से अधिक होने लगे, तो कुछ लोगों को मानसिक थकान, एकाग्रता में कमी और अपने लिए समय निकालने में परेशानी महसूस हो सकती है।

    तकनीक को पूरी तरह गलत मानना इस समस्या का समाधान नहीं है। इंटरनेट शिक्षा, जानकारी, संवाद और व्यक्तिगत विकास के लिए उपयोगी साधन है। इसका लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति इसका उपयोग किस उद्देश्य से और कितनी देर तक करता है। तकनीक को जीवन का सहायक बनाने और उस पर अनावश्यक निर्भरता से बचने के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।

    महेश अग्रवाल के विचार में योग व्यक्ति को बाहरी गतिविधियों से ध्यान हटाकर अपने भीतर देखने का अवसर देता है। योग में आसन, प्राणायाम और ध्यान जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। नियमित अभ्यास के माध्यम से व्यक्ति अपने शरीर, सांस और विचारों पर ध्यान केंद्रित करना सीख सकता है। इससे उसे अपनी मानसिक स्थिति को समझने और रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच कुछ समय शांत रहने में मदद मिल सकती है।

    योग का एक महत्वपूर्ण पहलू आत्म-जागरूकता भी है। दिनभर की भागदौड़ में व्यक्ति अक्सर अपनी भावनाओं, विचारों और जरूरतों पर ध्यान नहीं दे पाता। ध्यान और सांस से जुड़े अभ्यास उसे कुछ समय रुककर अपने अनुभवों को समझने का अवसर देते हैं। स्वयं के विचारों और भावनाओं के प्रति सजग होने की इस प्रक्रिया को आत्म-साक्षात्कार की दिशा में एक कदम माना जा सकता है।

    डिजिटल उपकरणों के लगातार इस्तेमाल से होने वाली थकान के बीच स्क्रीन से कुछ समय का विराम भी उपयोगी हो सकता है। इसके लिए हर व्यक्ति को तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाने की आवश्यकता नहीं है। दिन के कुछ हिस्सों में मोबाइल फोन को अलग रखना, सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना और नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों के लिए समय निकालना व्यावहारिक उपाय हो सकते हैं।

    योग और डिजिटल वेलबीइंग के बीच संतुलन बनाने के लिए शुरुआत छोटे बदलावों से की जा सकती है। सुबह उठने के बाद कुछ समय बिना मोबाइल देखे बिताना, सहज श्वास पर ध्यान देना और अपनी क्षमता के अनुसार सरल योगासन करना दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है। ध्यान के दौरान सांसों पर ध्यान केंद्रित करना भी मन को वर्तमान क्षण में लाने का एक सरल तरीका है। अभ्यास करते समय अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना जरूरी है और किसी परेशानी की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।

    आज तकनीक से पूरी तरह अलग रहना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उसके इस्तेमाल की आदतों में सुधार किया जा सकता है। इंटरनेट और डिजिटल उपकरण बाहरी दुनिया से जुड़ने के अवसर देते हैं, जबकि योग स्वयं की जरूरतों और मानसिक स्थिति को समझने में सहायक हो सकता है। दोनों के बीच संतुलन बनाकर व्यक्ति तकनीक के लाभ उठाने के साथ अपने स्वास्थ्य, एकाग्रता और आंतरिक शांति के लिए भी समय निकाल सकता है।

  • आज भी फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं NSA अजीत डोभाल

    आज भी फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं NSA अजीत डोभाल

    नई दिल्‍ली। आज के दौर में जहां मोबाइल फोन और इंटरनेट जीवन की अनिवार्य जरूरत बन चुके हैं, वहीं भारत के सबसे ताकतवर सुरक्षा विशेषज्ञों में से एक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एनएसए (NSA) अजीत डोभाल ने अपनी एक अनूठी आदत से सबको चौंका दिया है। शनिवार को दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2026’ के उद्घाटन सत्र में उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए बताया कि वे आज भी मोबाइल फोन और इंटरनेट का उपयोग नहीं करते हैं।

    डोभाल ने कहा, “फोन और इंटरनेट ही संवाद के एकमात्र माध्यम नहीं हैं। संपर्क करने के ऐसे कई अन्य तरीके हैं जिनके बारे में ज्यादातर लोगों को पता तक नहीं है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल विशेष परिस्थितियों में ही फोन का उपयोग करते हैं, जैसे कि विदेश में रहने वाले लोगों या अपने परिवार से बात करने के लिए।

    उन्होंने युवाओं को धैर्य का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि संदेश हमेशा ईमानदारी से संप्रेषित होने चाहिए, न कि प्रोपेगेंडा के माध्यम से।
    कौन हैं अजीत डोभाल?
    अजीत डोभाल भारत के 5वें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। 1945 में उत्तराखंड में जन्मे डोभाल केरल कैडर के रिटायर्ड IPS अधिकारी हैं। उनके नाम कई ऐसी उपलब्धियां दर्ज हैं जो किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती हैं। वे भारत के इतिहास में ‘कीर्ति चक्र’ पाने वाले सबसे युवा पुलिस अधिकारी हैं। सितंबर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक की योजना बनाने और उन्हें सफलतापूर्वक अंजाम देने में उनकी मुख्य भूमिका रही है। डोकलाम विवाद को सुलझाने और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को खत्म करने में उन्होंने कड़ा रुख अपनाया।
    पाकिस्तान में 7 साल ‘अंडरकवर’

    अजीत डोभाल का करियर हैरतअंगेज कारनामों से भरा रहा है। कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान में एक ‘अंडरकवर’ एजेंट के रूप में 7 साल बिताए, जहां उन्होंने चरमपंथी समूहों की खुफिया जानकारी इकट्ठा की। इसके बाद उन्होंने इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में 6 साल तक काम किया। 1971 से 1999 के बीच उन्होंने इंडियन एयरलाइंस के कम से कम 15 अपहरण मामलों को सुलझाया। 1999 के कुख्यात कंधार कांड (IC-814) में वे मुख्य वार्ताकारों में से एक थे। मिजोरम और पंजाब में आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ उन्होंने जमीनी स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई।

    युवा नेताओं को संबोधित करते हुए डोभाल ने भावुक होकर कहा कि भारत ने अपनी आजादी के लिए बहुत भारी कीमत चुकाई है। कई पीढ़ियों ने इसके लिए नुकसान और कठिनाइयां झेली हैं। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे भारत के समृद्ध इतिहास और उसकी उन्नत सभ्यता से प्रेरणा लें और देश के मूल्यों, अधिकारों और विश्वासों के आधार पर एक शक्तिशाली भारत का निर्माण करें।