Tag: IOC

  • सरकारी तेल कंपनियों की तगड़ी कमाई, तीन महीने में ₹30,106 करोड़ का मुनाफा, घाटे से ऐसे बदली तस्वीर

    सरकारी तेल कंपनियों की तगड़ी कमाई, तीन महीने में ₹30,106 करोड़ का मुनाफा, घाटे से ऐसे बदली तस्वीर

    नई दिल्ली ।देश की सरकारी तेल कंपनियों के लिए वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही कमाई के लिहाज से शानदार रही। कच्चे तेल की कीमतें पिछले तीन महीनों तक ऊंचे स्तर पर बनी रहने के बावजूद पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री और रिफाइनिंग कारोबार से जुड़ी तीन प्रमुख सरकारी कंपनियों ने बड़ा मुनाफा दर्ज किया है। जुलाई से सितंबर 2026 के बीच इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (HPCL) का संयुक्त शुद्ध मुनाफा 30,106 करोड़ रुपये रहा।

    इन कंपनियों की कमाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने केवल एक तिमाही में वित्त वर्ष 2025-26 के पूरे साल के संयुक्त मुनाफे का करीब 39 प्रतिशत हासिल कर लिया। तीनों कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 77,281 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया था। सितंबर तिमाही के नतीजे इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इससे पहले जून तिमाही में इन कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

    इस संयुक्त मुनाफे में सबसे बड़ा योगदान इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन का रहा। कंपनी ने सितंबर तिमाही में 21,630 करोड़ रुपये का स्टैंडअलोन शुद्ध मुनाफा दर्ज किया। वहीं, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन का मुनाफा पिछले साल की समान तिमाही के मुकाबले 22.5 प्रतिशत घटकर 4,993 करोड़ रुपये रह गया। सितंबर 2025 की तिमाही में कंपनी ने 6,443 करोड़ रुपये का लाभ कमाया था। हालांकि, जून 2026 की तिमाही में 3,962 करोड़ रुपये के घाटे के बाद कंपनी ने दोबारा मुनाफे में वापसी की है।

    हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन के नतीजों में भी सुधार दिखाई दिया। कंपनी का सितंबर तिमाही का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 9.1 प्रतिशत घटकर 3,483 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की समान अवधि में यह 3,830 करोड़ रुपये था। हालांकि, जून तिमाही में कंपनी को करीब 11,526 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ था। ऐसे में दूसरी तिमाही में मुनाफे में वापसी उसके वित्तीय प्रदर्शन में बड़ा बदलाव दर्शाती है।

    तीनों कंपनियों की कमाई में सुधार के पीछे केवल पेट्रोल-डीजल की बिक्री नहीं रही। कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव के साथ रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल और गैस कारोबार से मिलने वाले बेहतर मार्जिन ने भी अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) में बढ़ोतरी ने कंपनियों की कमाई को मजबूती दी।

    हिंदुस्तान पेट्रोलियम का ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन इसका प्रमुख उदाहरण है। सितंबर तिमाही में कंपनी का जीआरएम बढ़कर 32.15 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 8.80 डॉलर प्रति बैरल था। इस तरह कंपनी के रिफाइनिंग कारोबार से मिलने वाले मार्जिन में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया। बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन ने तिमाही के मुनाफे को बढ़ाने में योगदान दिया।

    मुनाफे के साथ तीनों सरकारी तेल कंपनियों के कारोबार के आकार में भी बढ़ोतरी हुई है। सितंबर तिमाही में इनका संयुक्त रेवेन्यू फ्रॉम ऑपरेशंस करीब 29 प्रतिशत बढ़कर 5.60 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। पिछले साल की समान तिमाही में यह आंकड़ा 4.35 लाख करोड़ रुपये था। इससे पेट्रोलियम कारोबार में कंपनियों की बिक्री और परिचालन आय में हुई बढ़ोतरी का पता चलता है।

    हालांकि, शानदार मुनाफे के बावजूद कंपनियों के सामने एलपीजी कारोबार से जुड़ी वित्तीय चुनौती बनी हुई है। 30 सितंबर 2026 तक इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के एलपीजी प्राइसिंग बफर में 32,505.69 करोड़ रुपये की अंडर रिकवरी दर्ज थी। इसका अर्थ है कि एलपीजी की बिक्री से जुड़ी लागत और प्राप्त राशि के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।

    इस तरह सितंबर तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों ने जून तिमाही के नुकसान से उबरते हुए संयुक्त रूप से 30,106 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया। रिफाइनिंग मार्जिन में सुधार और कारोबार से बढ़ी आय ने इस वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि एलपीजी से जुड़ा वित्तीय दबाव अब भी चुनौती बना हुआ है।

  • IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान

    IOC को 2,661.37 करोड़ का घाटा… कंपनी बोली- पेट्रोल-डीजल-LPG के दाम नहीं से हुआ नुकसान


    नई दिल्ली।
    सरकारी पेट्रोलियम कंपनी (State-Owned Petroleum Company) इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) (Indian Oil Corporation – IOC) ने चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही (April-June quarter) के नतीजे जारी कर दिए हैं। इस तिमाही में कंपनी को 2,661.37 करोड़ रुपये का बड़ा घाटा हुआ है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी को 5,688.60 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था जबकि जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में कंपनी ने 11,377.51 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।


    घाटे की वजह क्या है?

    आईओसी के चेयरमैन ए.एस साहनी ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कच्चे तेल की लागत बढ़ने के बावजूद कंपनी ने अन्य सरकारी तेल कंपनियों की तरह पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) के दाम नहीं बढ़ाए। इसका नुकसान कंपनी को उठाना पड़ा। हालांकि, इससे हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक तेल रिफाइनरी मार्जिन और परिचालन दक्षता में सुधार से हुई। उन्होंने कहा, ”पहली तिमाही में कंपनी ने करीब 1.91 करोड़ टन कच्चे तेल का अब तक का सर्वाधिक प्रोसेसिंग किया। इसके साथ ही ईंधन और अन्य नुकसान की दर घटकर 8.04 प्रतिशत रही, जो पहले 8.5 प्रतिशत थी।”

    इसके साथ ही साहनी ने यह भी कहा कि जून तिमाही में 45 लाख टन पेट्रोल और करीब 1.8 करोड़ टन डीजल की रिकॉर्ड बिक्री हुई। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की बिक्री भी 11 प्रतिशत बढ़ी, जिससे कंपनी को सहारा मिला। इस तिमाही में देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी की परिचालन आय 26 प्रतिशत बढ़कर 2.75 लाख करोड़ रुपये हो गई।

    उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई लेकिन कंपनी ने पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाकर कमी की भरपाई की। साहनी ने कहा कि कंपनी ने अगस्त के पूरे माह और सितंबर के कुछ दिनों तक के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। उन्होंने कहा कि अगले 45-50 दिनों के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई चिंता नहीं है।

    कंपनी का खर्च कम हुआ

    कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करने के कारण इस मद में कंपनी का खर्च एक साल पहले के 25,637 करोड़ रुपये से घटकर 13,536 करोड़ रुपये रह गया। वहीं, तैयार उत्पादों के दाम बढ़ने से उसे 20,925 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। मौजूदा कर और लंबित कर के भुगतान में छूट से कंपनी को 613 करोड़ रुपये की बचत हुई।


    शेयर का परफॉर्मेंस

    इंडियन ऑयल के शेयर की बात करें तो यह शुक्रवार को मामूली बढ़त के साथ 140.15 रुपये पर बंद हुआ। अब सोमवार को शेयर पर निवेशकों की नजर रहेगी।

  • कच्चे तेल में गिरावट से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में जोरदार उछाल, IOC–BPCL–HPCL में तेजी

    कच्चे तेल में गिरावट से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में जोरदार उछाल, IOC–BPCL–HPCL में तेजी

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट का सीधा असर भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों पर देखने को मिला है। बुधवार को सरकारी तेल विपणन कंपनियों के शेयरों में मजबूती दर्ज की गई, जिससे पूरे ऊर्जा सेक्टर में सकारात्मक माहौल बना रहा।

    बाजार में आई तेजी मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट और भू-राजनीतिक तनाव में कमी के संकेतों के कारण देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता कम होने से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, जिसका लाभ घरेलू तेल कंपनियों को मिला।

    दिन के कारोबार में Hindustan Petroleum Corporation Limited के शेयरों में 2 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखी गई और यह 410.50 रुपये के इंट्रा-डे हाई तक पहुंच गया। इसी तरह Bharat Petroleum Corporation Limited के शेयरों में भी 2.46 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई और यह 319.50 रुपये के स्तर तक पहुंच गया।

    वहीं Indian Oil Corporation Limited के शेयर भी 1.61 प्रतिशत की बढ़त के साथ 147.47 रुपये के उच्चतम स्तर पर कारोबार करते नजर आए। इन तीनों प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में आई तेजी ने ऊर्जा सेक्टर को मजबूती प्रदान की।

    विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट इस तेजी का प्रमुख कारण है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई हैं और यह पिछले तीन महीनों के निचले स्तर के आसपास कारोबार कर रही हैं। वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी लगभग 1 प्रतिशत गिरकर 75 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है।

    पिछले कुछ दिनों में ब्रेंट क्रूड में लगभग 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता के संकेत मिले हैं। इस गिरावट के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चा भी एक महत्वपूर्ण कारण मानी जा रही है, जिससे ईरान के तेल निर्यात में वृद्धि की संभावना बन सकती है।

    इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से पूरी तरह खोलने की संभावनाओं ने भी बाजार की धारणा को सकारात्मक बनाया है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और इसके सुचारू संचालन से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होती है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत का संकेत है क्योंकि इससे आयात बिल में कमी आती है और भुगतान संतुलन पर दबाव घटता है। इससे महंगाई को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है और आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है।

    इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली में कमी और रुपये की मजबूती भी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखी जा रही है। इन दोनों कारकों से आने वाले समय में निवेश प्रवाह में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।

    ऊर्जा क्षेत्र में आई यह तेजी ऐसे समय पर आई है जब घरेलू शेयर बाजार लगातार चौथे कारोबारी सत्र में मजबूती के साथ बंद हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं में कमी और ऊर्जा कीमतों में नरमी से बाजार का समग्र माहौल सकारात्मक बना हुआ है।

  • 2036 ओलंपिक की मेजबानी का भारत का सपना: अवसर, चुनौतियां और तैयारी की असली परीक्षा

    2036 ओलंपिक की मेजबानी का भारत का सपना: अवसर, चुनौतियां और तैयारी की असली परीक्षा


    नई दिल्ली । भारत ने 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए औपचारिक रूप से दावेदारी पेश कर दी है। यह कदम देश की खेल महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, लेकिन इसके साथ ही प्रशासनिक कमजोरियां, बुनियादी ढांचे की सीमाएं, पर्यावरणीय चिंताएं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन जैसे सवाल भी खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट जैसे सुधारों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत न सिर्फ 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स बल्कि 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए भी गंभीर प्रयास कर रहा है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य देश के अधिक से अधिक खिलाड़ियों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा के अवसर देना है।

    पिछले वर्ष जुलाई में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने स्विट्जरलैंड के लुजान स्थित अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति आईओसी मुख्यालय का दौरा किया और गुजरात के अहमदाबाद को संभावित मेजबान शहर के रूप में प्रस्तुत किया। अहमदाबाद और गांधीनगर को मिलाकर तैयार की गई योजना में करीब 4.1 से 7.5 अरब डॉलर के खर्च का अनुमान है। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आईओसी ने बातचीत के दौरान तीन प्रमुख चिंताएं जताईं भारतीय ओलंपिक संघ के भीतर प्रशासनिक खामियां, डोपिंग के बढ़ते मामले और ओलंपिक खेलों में भारत का अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन।

    विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। स्पोर्ट्स मेडिसिन और एंटी-डोपिंग विशेषज्ञ पी.एस.एम. चंद्रन का मानना है कि इन चुनौतियों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। उनके अनुसार डोपिंग के आंकड़े इसलिए अधिक दिखते हैं क्योंकि भारत अन्य देशों की तुलना में ज्यादा परीक्षण करता है। उनका यह भी कहना है कि बोली प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका पैसे और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव की होती है, न कि केवल पदकों की संख्या की।

    दूसरी ओर, खेल प्रशासक शाजी प्रभाकरन का मानना है कि भारत को अब स्पोर्ट्स डिप्लोमेसी के जरिए अपनी क्षमताओं को दुनिया के सामने रखना चाहिए। हालांकि, वे यह भी स्वीकार करते हैं कि इंडोनेशिया, तुर्की, चिली, सऊदी अरब और जर्मनी जैसे देशों से मुकाबला कड़ा होगा। उनके अनुसार, यदि भारत 2036 की रेस में सफल नहीं होता, तो 2040 का दशक ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।

    पूर्व ओलंपियन और लॉन्ग जंपर अंजू बॉबी जॉर्ज भारत की दावेदारी की प्रबल समर्थक हैं। उनका कहना है कि ग्रासरूट टैलेंट प्रोग्राम और नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल जैसे कदम भारत को ओलंपिक मेजबानी के लिए तैयार कर रहे हैं। वहीं, वरिष्ठ खेल पत्रकार शारदा उग्रा आगाह करती हैं कि प्रदूषण, शहरी बुनियादी ढांचा और वैश्विक छवि जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक अहमदाबाद को एक पूर्ण वैश्विक शहर के रूप में खुद को साबित करने के लिए अभी समय चाहिए। कुल मिलाकर, 2036 ओलंपिक की मेजबानी भारत के लिए एक बड़ा अवसर है लेकिन यह तभी संभव होगा जब देश खेल प्रशासन, पर्यावरण और बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर ठोस और विश्वसनीय प्रगति दिखा सके।