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  • अमेरिका-इजरायल एकजुटता पर ईरान का सवाल, युद्धविराम को लेकर नई बहस तेज

    अमेरिका-इजरायल एकजुटता पर ईरान का सवाल, युद्धविराम को लेकर नई बहस तेज


    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और युद्धविराम की चर्चाओं के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहमति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कहा कि व्हाइट हाउस और ईरान के बीच बातचीत को लेकर अलग-अलग संकेत सामने आ रहे हैं, जबकि इसी दौरान हजारों अमेरिकी सैनिक मध्य-पूर्व की ओर तैनात किए जा रहे हैं।

    उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी युद्धविराम को सफल बनाने में कामयाब भी हो जाते हैं, तो क्या अमेरिका और इजरायल संघर्ष के अंतिम परिणाम पर सहमत होंगे?

    एक अन्य पोस्ट में ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका-इजरायल संघर्ष को एक महीना बीत चुका है और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सरकारें इस टकराव के दीर्घकालिक परिणामों का आकलन कर रही हैं।

    अराघची के अनुसार, स्थिति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक चलता है और ईरान होर्मुज स्ट्रेट से ईंधन और अन्य मालवाहक जहाजों की आवाजाही पर कितनी देर तक नियंत्रण बनाए रखता है।

    इस बीच ईरान ने अमेरिका पर संघर्षविराम नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इसे दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई बताया है। तेहरान ने कहा है कि यह कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन है और इसका जवाब दिया जाएगा।

    उधर अमेरिका की ओर से 26 मई को होर्मुज क्षेत्र में की गई सैन्य कार्रवाई को आत्मरक्षा बताया गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) के अनुसार, यह कार्रवाई अमेरिकी सैनिकों और युद्धपोतों की सुरक्षा के लिए की गई थी, जिसमें कथित तौर पर बारूदी सुरंग बिछा रही बोट्स और एक मिसाइल साइट को निशाना बनाया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट और मध्य-पूर्व में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

  • युद्धविराम के पीछे कौन सा बड़ा खेल? अमेरिका–इजरायल रिश्तों पर ईरानी विदेश मंत्री के तीखे सवाल

    युद्धविराम के पीछे कौन सा बड़ा खेल? अमेरिका–इजरायल रिश्तों पर ईरानी विदेश मंत्री के तीखे सवाल


    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में जारी तनाव और सैन्य गतिविधियों के बीच ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने अमेरिका और इजरायल के बीच संबंधों और युद्धविराम प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि क्षेत्र में हालात जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उसमें कई अंतरराष्ट्रीय पक्षों की भूमिकाएं स्पष्ट नहीं हैं और विभिन्न स्तरों पर विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं। अराघची के इन बयानों ने कूटनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    विदेश मंत्री अराघची ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से आरोप लगाया कि व्हाइट हाउस और ईरान के बीच बातचीत को लेकर अलग-अलग संकेत दिए जा रहे हैं, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि हजारों अमेरिकी सैनिक मध्य-पूर्व क्षेत्र की ओर तैनात किए जा रहे हैं, जिससे तनाव और बढ़ने की आशंका है। उनके अनुसार, यदि किसी स्तर पर युद्धविराम की कोशिश सफल भी होती है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका और इजरायल इस संघर्ष के अंतिम परिणाम को लेकर समान दृष्टिकोण रखते हैं या नहीं।

    अराघची ने अपने बयान में यह भी कहा कि क्षेत्र में जारी संघर्ष के एक महीने बाद अब दुनिया भर की सरकारें इसके राजनीतिक और आर्थिक प्रभावों का आकलन करने में जुटी हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकती है। उन्होंने विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि वहां से ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ेगा।

    उन्होंने आगे आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा रही है। ईरान का दावा है कि कुछ हालिया सैन्य गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय नियमों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि वह इन कार्रवाइयों को गंभीरता से देख रहा है और आवश्यक प्रतिक्रिया देने का अधिकार सुरक्षित रखता है।

    मध्य-पूर्व में स्थिति उस समय और संवेदनशील हो गई जब होर्मुज क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों की खबरें सामने आईं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, यह कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई थी और इसका उद्देश्य अपने सैनिकों और नौसैनिक इकाइयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। वहीं ईरान ने इन दावों को खारिज करते हुए इसे आक्रामक कदम बताया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से क्षेत्र में कूटनीतिक तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है। फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है और सभी पक्षों की नजर आगामी घटनाक्रम पर टिकी हुई है।