Tag: Iran Israel Conflict

  • दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    नई दिल्ली। BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की दिल्ली में हुई अहम बैठक ईरान मुद्दे पर गहरे मतभेदों के बीच बिना संयुक्त बयान के खत्म हो गई। समिट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव, पश्चिम एशिया की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर तीखी चर्चा हुई, लेकिन सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं बन सकी।

    सूत्रों के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने BRICS देशों से मांग की कि संयुक्त बयान में ईरान पर हुए हमलों की स्पष्ट निंदा की जाए। उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने का आरोप लगाया और BRICS से खुला समर्थन मांगा। हालांकि भारत समेत कई सदस्य देशों ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाने की जरूरत बताई।

    बैठक में मौजूद देशों का मानना था कि पश्चिम एशिया के हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से कूटनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसी कारण साझा बयान पर सहमति नहीं बन पाई और अंत में केवल एक “Outcome Statement” जारी किया गया।

    हालांकि ईरान के मुद्दे पर मतभेद सामने आए, लेकिन करीब 60 अहम एजेंडों पर सभी देशों ने एक जैसी राय रखी। इनमें ऊर्जा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, क्लाइमेट एक्शन, वित्तीय कनेक्टिविटी और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे।

    समिट के दौरान S. Jaishankar ने अपने संबोधन में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों को हर हाल में खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि इन मार्गों पर रुकावट का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

    समिट से इतर जयशंकर और अराघची के बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक भी हुई। दोनों नेताओं ने ईरान-इजरायल तनाव, क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। भारत ने साफ किया कि वह बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने के पक्ष में है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS मंच पर ईरान मुद्दे पर खुलकर मतभेद सामने आना इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर भी भू-राजनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। इसके बावजूद आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के कई मुद्दों पर सदस्य देशों की एकजुटता कायम दिखाई दी।

  • दो नावों पर सवार पाकिस्तान, चीन के हथियार और अमेरिका की कृपा के बीच फंसी कूटनीति

    दो नावों पर सवार पाकिस्तान, चीन के हथियार और अमेरिका की कृपा के बीच फंसी कूटनीति

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच जब ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच टकराव ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी तब अचानक सीजफायर की घोषणा ने दुनिया को राहत दी। लेकिन इस युद्धविराम के पीछे जिस देश का नाम सामने आया उसने सभी को चौंका दिया। यह देश था पाकिस्तान जो खुद आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम लेकर सीजफायर का श्रेय दिए जाने के बाद इस्लामाबाद ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करना शुरू कर दिया। हालांकि वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह कहानी इतनी सीधी नहीं है बल्कि इसके पीछे बड़ी शक्तियों का जटिल खेल छिपा है।

    असल में चीन लंबे समय से पाकिस्तान का आर्थिक और सैन्य सहयोगी रहा है। भारी कर्ज और हथियारों के सहारे पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति बनी हुई है। लेकिन हाल के वर्षों में आर्थिक दबाव और कर्ज वापसी की सख्ती ने पाकिस्तान को नई राह तलाशने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे में अमेरिका के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करना उसके लिए एक जरूरी विकल्प बन गया।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि सीजफायर के पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका एक स्वतंत्र मध्यस्थ की कम और एक संदेशवाहक की अधिक रही। चीन जो ईरान से तेल आपूर्ति पर काफी निर्भर है इस संघर्ष के लंबा खिंचने से खुद आर्थिक दबाव में आ सकता था। ऐसे में उसने पाकिस्तान के माध्यम से दबाव बनाकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की।

    दूसरी ओर अमेरिका के लिए भी यह युद्ध लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं था। घरेलू दबाव और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बीच उसे एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो मध्यस्थ के रूप में सामने आ सके। पाकिस्तान इस भूमिका के लिए उपयुक्त था क्योंकि वह पहले से ही दोनों खेमों से संवाद बनाए हुए था।

    यह भी साफ है कि पाकिस्तान की यह सक्रियता केवल शांति स्थापित करने की मंशा से नहीं थी। उसके सामने कई मोर्चों पर संकट खड़े हैं। अफगानिस्तान सीमा पर अस्थिरता आंतरिक आर्थिक संकट और बढ़ता कर्ज उसे लगातार दबाव में रखे हुए हैं। इसके अलावा भारत के साथ तनाव और सैन्य चुनौतियां भी उसकी स्थिति को कमजोर करती हैं।

    इसी कारण पाकिस्तान ने एक संतुलन साधने की रणनीति अपनाई है जिसमें वह एक तरफ चीन को नाराज नहीं करना चाहता और दूसरी ओर अमेरिका की कृपा भी हासिल करना चाहता है। यही वजह है कि वह दोनों देशों के बीच अपनी उपयोगिता साबित करने में जुटा है।

    कुल मिलाकर यह घटनाक्रम पाकिस्तान की कूटनीति से ज्यादा उसकी मजबूरी को उजागर करता है। चीन के कर्ज और अमेरिका के भरोसे के बीच फंसा पाकिस्तान अब हर उस मौके को भुनाने की कोशिश कर रहा है जिससे उसकी वैश्विक छवि सुधरे और आर्थिक राहत मिल सके। लेकिन यह संतुलन कितने समय तक टिकेगा यह आने वाले समय में ही साफ हो पाएगा।

  • ईरान-इजरायल तनाव के बीच राष्ट्रपति हर्जोग का कड़ा संदेश न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले के बाद बढ़ा संघर्ष

    ईरान-इजरायल तनाव के बीच राष्ट्रपति हर्जोग का कड़ा संदेश न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले के बाद बढ़ा संघर्ष


    नई दिल्ली:ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव ने एक बार फिर गंभीर मोड़ ले लिया है हाल ही में 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए सैन्य संघर्ष के दौरान ईरान ने इजरायल के न्यूक्लियर शहर अराद और डिमोना को निशाना बनाते हुए मिसाइल हमले किए इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय चिंता को और बढ़ा दिया है क्योंकि पहली बार इस संघर्ष में न्यूक्लियर ठिकानों पर सीधा हमला हुआ

    हमले के बाद इजरायली राष्ट्रपति Isaac Herzog ने तुरंत प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और हालात का जायजा लिया अराद में स्थित एक बेकरी को भी इस हमले में नुकसान पहुंचा जहां उन्होंने बेकरी मालिक से मुलाकात कर उनकी स्थिति को जाना हालांकि इस हमले में किसी भी नागरिक की मौत नहीं हुई लेकिन इमारतों को क्षति पहुंची

    राष्ट्रपति हर्जोग ने अपने दौरे के दौरान स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए बताया कि संकट के बावजूद नागरिकों ने सतर्कता और अनुशासन का परिचय दिया उन्होंने कहा कि सायरन बजते ही लोग सुरक्षित स्थानों और बंकरों में चले गए जिससे बड़ी जनहानि टल गई यह दर्शाता है कि नागरिक सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारी ने संभावित बड़े नुकसान को रोका

    हर्जोग ने सोशल मीडिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए एक परिवार की कहानी का उल्लेख किया जिनका बेकरी व्यवसाय हमले की चपेट में आया उन्होंने बताया कि इस परिवार के बेटे को 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के दौरान अगवा कर लिया गया था और बाद में उसे एक बंधक समझौते के तहत वापस लाया गया यह परिवार कई कठिनाइयों का सामना कर चुका है लेकिन इसके बावजूद उनकी हिम्मत और सकारात्मकता इजरायली समाज की मजबूती को दर्शाती है

    उन्होंने आगे कहा कि छोटे व्यवसायों का समर्थन करना केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि राष्ट्र की भावना को मजबूत करना है उन्होंने नागरिकों के धैर्य और साहस की सराहना करते हुए कहा कि इजरायली आत्मा इन कठिन परिस्थितियों में भी मजबूत बनी हुई है

    ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए राष्ट्रपति हर्जोग ने कहा कि मिसाइलों और हिंसा के जरिए इंसानियत को नुकसान पहुंचाने का प्रयास गलत है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा और किसी भी खतरे का जवाब देने में सक्षम है

    अपने बयान में उन्होंने यह भी दोहराया कि इजरायल की रणनीति स्पष्ट है और वह अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है उन्होंने जोर देकर कहा कि संघर्ष का अंत तभी संभव है जब ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार और बैलिस्टिक क्षमताएं नहीं रहेंगी

    यह पूरा घटनाक्रम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को दर्शाता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता को और गहरा करता है इस संघर्ष का भविष्य क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है

  • जंग के डर से शेयर बाजार में भूचाल: सेंसेक्स 1862 अंक टूटा, निफ्टी 582 अंक लुढ़का

    जंग के डर से शेयर बाजार में भूचाल: सेंसेक्स 1862 अंक टूटा, निफ्टी 582 अंक लुढ़का


    नई दिल्‍ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध की आशंका ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला कर रख दिया है। इसी का असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला जहां सप्ताह के पहले कारोबारी दिन बाजार भारी गिरावट के साथ खुला। निवेशकों में घबराहट के माहौल के बीच बीएसई का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1, 862 अंकों की तेज गिरावट के साथ 77, 056 के स्तर पर खुला जबकि एनएसई का 50 शेयरों वाला निफ्टी 582 अंक टूटकर 23, 868 के स्तर पर पहुंच गया।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों में जोखिम की भावना को बढ़ा दिया है। युद्ध की आशंका के चलते निवेशक जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बना रहे हैं और सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा असर शेयर बाजारों पर पड़ रहा है जहां व्यापक स्तर पर बिकवाली देखने को मिल रही है।

    घरेलू बाजार में भी निवेशकों की चिंता साफ नजर आई। निफ्टी फ्यूचर्स पिछले बंद स्तर की तुलना में करीब 722 अंकों की गिरावट के साथ कारोबार करते दिखे जो इस बात का संकेत है कि बाजार में दबाव अभी और बढ़ सकता है। विश्लेषकों के अनुसार यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले दिनों में बाजार में और अधिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है।

    केवल भारत ही नहीं बल्कि एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में भी सोमवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई। जापान का निक्की 225 सूचकांक करीब 6.22 प्रतिशत गिरकर 53, 000 के स्तर से नीचे आ गया जबकि टॉपिक्स इंडेक्स में 5.27 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स भी बुरी तरह लुढ़क गया। पिछले सप्ताह 11 प्रतिशत गिरने के बाद सोमवार को इसमें 8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज हुई जिसके कारण सर्किट ब्रेकर सक्रिय हो गया और लगभग 20 मिनट के लिए ट्रेडिंग रोकनी पड़ी। वहीं हांगकांग का हैंग सेंग इंडेक्स भी वायदा कारोबार में भारी गिरावट के साथ खुला।

    अमेरिकी शेयर बाजारों के फ्यूचर्स में भी भारी दबाव देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में डॉउ जोन्स फ्यूचर्स करीब 950 अंक तक गिर गए जबकि एसएंडपी 500 फ्यूचर्स 100 अंकों से अधिक नीचे कारोबार करते दिखे। टेक्नोलॉजी शेयरों पर भी दबाव रहा और नैस्डैक फ्यूचर्स करीब 400 अंक तक गिर गए।

    इस गिरावट की बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेज उछाल भी है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने और हुर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका के कारण वैश्विक तेल बाजार में हलचल मच गई है। इसके अलावा कुवैत ईरान और यूएई जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन में कटौती की खबरों ने भी बाजार को प्रभावित किया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 18.03 प्रतिशत बढ़कर 109.40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 20.23 प्रतिशत की तेजी के साथ 109.29 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में हालात और बिगड़ते हैं और तेल उत्पादन प्रभावित होता है तो कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। ऐसे में वैश्विक अर्थव्यवस्था और शेयर बाजारों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। फिलहाल निवेशक हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं और बाजार में भारी उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।

  • ईरानी हमले में अमेरिकी THAAD डिफेंस सिस्टम क्षतिग्रस्त, जॉर्डन का रडार तबाह; अमेरिका को बड़ा सैन्य और आर्थिक नुकसान

    ईरानी हमले में अमेरिकी THAAD डिफेंस सिस्टम क्षतिग्रस्त, जॉर्डन का रडार तबाह; अमेरिका को बड़ा सैन्य और आर्थिक नुकसान



    नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। ईरान ने सऊदी अरब, UAE और जॉर्डन में तैनात अमेरिकी टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) सिस्टम को निशाना बनाया। जॉर्डन के ‘मुवफ्फाक साल्टी एयर बेस’ पर तैनात THAAD का रडार सिस्टम पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। यह रडार सिस्टम THAAD का सबसे अहम हिस्सा है, जो दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों की पहचान और ट्रैकिंग करता है।

    एक पूरे THAAD सिस्टम की कीमत लगभग ₹22 हजार करोड़ होती है, जबकि केवल रडार सिस्टम की कीमत ही 2,700 करोड़ रुपए (लगभग 300 मिलियन डॉलर) तक है। अमेरिका के पास वैश्विक स्तर पर केवल 7-8 ऐसे सिस्टम हैं, इसलिए यह हमला उनके लिए गंभीर सैन्य और आर्थिक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है। THAAD सिस्टम का नुकसान अमेरिका के क्षेत्रीय डिफेंस नेटवर्क पर भी बड़ा असर डाल सकता है।

    इस बीच, ईरान का युद्धपोत IRIS लावन भारत के कोच्चि बंदरगाह पर रुका हुआ है। तकनीकी खराबी के कारण 28 फरवरी को ईरान ने भारत से मदद मांगी थी, और भारतीय नौसेना ने 1 मार्च को इसे डॉक करने की अनुमति दी। जहाज पर मौजूद 183 क्रू मेंबर फिलहाल भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहरे हुए हैं। यह युद्धपोत हाल ही में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (IFR 2026) और मिलान 2026 नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ था। इससे पहले अमेरिका ने भारत लौट रहे ईरानी युद्धपोत IRIS देना को श्रीलंका के पास हमला कर डुबा दिया था, जिसमें 87 ईरानी नौसैनिक मारे गए थे।

    इजराइल ने भी ईरानी सेना के एयरफोर्स कमांड सेंटर पर हमला किया। इजराइली सेना ने दावा किया कि इस हमले में बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण स्थल, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य गोदाम को निशाना बनाया गया। यह हमला ईरान की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करने और क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    UAE के राष्ट्रपति Mohammed bin Zayed Al Nahyan ने कहा कि देश युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहा है, लेकिन वह अपने लोगों और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने में सक्षम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि UAE कमजोर नहीं है और किसी भी देश को आसानी से निशाना बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    साथ ही, ईरान ने बताया कि अमेरिका ने केशम आइलैंड पर स्थित पानी की सफाई प्लांट पर हमला किया, जिससे लगभग 30 गांवों में पीने के पानी की सप्लाई ठप हो गई। ईरान ने इस हमले को गंभीर और खतरनाक कदम बताया, जिससे क्षेत्रीय संकट और गहरा गया।

    मध्य-पूर्व में बिगड़ते हालात के बीच जर्मनी ने क्षेत्रीय देशों की मदद के लिए 100 मिलियन यूरो (लगभग 972 करोड़ रुपए) की सहायता देने की घोषणा की। यह धन उन लोगों की मदद के लिए होगा जिन्हें लड़ाई के कारण अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

    इस पूरी स्थिति के बीच अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष तेज होता जा रहा है। THAAD सिस्टम के नुकसान से अमेरिकी सुरक्षा नेटवर्क कमजोर हो सकता है, जबकि क्षेत्रीय देशों के नागरिकों के लिए खतरा लगातार बढ़ रहा है। मध्य-पूर्व में यह संघर्ष वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।

  • ईरान-इजराइल युद्ध का असर रसोई तक: LPG सिलेंडर 60 रुपये महंगा, कमर्शियल गैस में भी बड़ी बढ़ोतरी

    ईरान-इजराइल युद्ध का असर रसोई तक: LPG सिलेंडर 60 रुपये महंगा, कमर्शियल गैस में भी बड़ी बढ़ोतरी


    जबलपुर । मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और Iran–Israel conflict का असर अब आम लोगों की रसोई तक पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय हालात और कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव के बीच देश में रसोई गैस के दामों में बढ़ोतरी कर दी गई है। तेल कंपनियों ने घरेलू Liquefied Petroleum Gas (LPG) cylinder की कीमतों में 60 रुपये का इजाफा किया है, जबकि कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम 115 रुपये तक बढ़ा दिए गए हैं। नई कीमतें तुरंत प्रभाव से लागू कर दी गई हैं और तेल कंपनियों की आधिकारिक वेबसाइट पर भी अपडेट कर दी गई हैं।

    इस बढ़ोतरी के बाद आम उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है। खासकर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी बड़ी चिंता बन सकती है, क्योंकि रसोई गैस पहले ही घरेलू बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने से घरों का मासिक खर्च बढ़ना तय है।

    मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां गैस सिलेंडर की कीमतें देश के कई बड़े शहरों से ज्यादा हो गई हैं। प्रदेश के शहरों में घरेलू गैस सिलेंडर के दाम में 60 रुपये की बढ़ोतरी के बाद अब इसकी कीमत करीब 920 रुपये तक पहुंच गई है। वहीं कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में 114 रुपये का इजाफा हुआ है, जिसके बाद इसकी कीमत 2100 रुपये से भी ज्यादा हो गई है।

    दिलचस्प बात यह है कि कई मामलों में मध्यप्रदेश के उपभोक्ताओं को देश के बड़े महानगरों से भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के तौर पर New Delhi और Mumbai जैसे महानगरों की तुलना में मध्यप्रदेश के कई शहरों में गैस सिलेंडर महंगा मिल रहा है। परिवहन लागत और टैक्स संरचना के कारण अक्सर राज्यों में गैस के दामों में अंतर देखने को मिलता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो आने वाले समय में ईंधन और ऊर्जा से जुड़ी अन्य चीजों के दाम भी बढ़ सकते हैं। इसका असर परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी देखने को मिल सकता है।

    कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने का असर होटल, रेस्टोरेंट और छोटे व्यवसायों पर भी पड़ने की संभावना है। इससे खाने पीने की चीजों की कीमतों में भी धीरे धीरे बढ़ोतरी हो सकती है। यानी गैस सिलेंडर की कीमतों में हुई यह बढ़ोतरी सिर्फ घर की रसोई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बाजार में भी महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है।

    फिलहाल नई दरें लागू हो चुकी हैं और उपभोक्ताओं को अब बढ़ी हुई कीमतों पर ही गैस सिलेंडर खरीदना होगा। ऐसे में मिडिल ईस्ट की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है, क्योंकि वहां के हालात का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

  • निवेशकों के चार दिन में 13 लाख करोड़ रुपये डूबे, ईरान-इजरायल युद्ध के बीच शेयर बाजार में कोहराम

    निवेशकों के चार दिन में 13 लाख करोड़ रुपये डूबे, ईरान-इजरायल युद्ध के बीच शेयर बाजार में कोहराम


    नई दिल्ली। ईरान-इजरायल युद्ध के लगातार खिंचने के असर से भारतीय शेयर बाजार में पिछले चार कारोबारी सत्रों में भारी गिरावट आई है। निवेशकों की कुल संपत्ति इस दौरान 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक घट गई है। कारोबारी हफ्ते के आखिरी दिन शुक्रवार को भी सेंसेक्स और निफ्टी में 1 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी 315.45 अंक गिरकर 24,450.45 पर बंद हुआ जबकि सेंसेक्स करीब 1100 अंक टूटकर 79,000 के नीचे बंद हुआ। शुक्रवार को ही लगभग 3 लाख करोड़ का मार्केट कैप स्वाहा हो गया।

    बैंकिंग और बड़े शेयरों पर दबाव

    सबसे अधिक दबाव ICICI बैंक के शेयर पर रहा जो 3.39 प्रतिशत गिरा। इसके अलावा एक्सिस बैंक अल्ट्राटेक सीमेंट HDFC बैंक और SBI के शेयरों में भी 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली। बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप 27 फरवरी को 463.25 लाख करोड़ रुपये था जो अब घटकर 449.79 लाख करोड़ रुपये रह गया है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में विदेशी संस्थागत निवेशकों FII ने भारतीय बाजार में भारी बिकवाली की है। वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक अक्सर सुरक्षित बाजारों की ओर रुख करते हैं जिससे उभरते बाजारों जैसे भारत में दबाव बढ़ जाता है। इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ती कीमत और रुपये की कमजोरी ने भी बाजार की गिरावट को तेज किया। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 86 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

    लार्ज-कैप और 52-वीक लो पर शेयर

    चार दिन की बिकवाली में सबसे अधिक दबाव बड़े शेयरों यानी लार्ज-कैप स्टॉक्स पर पड़ा जिससे सेंसेक्स में ज्यादा गिरावट आई। बीएसई 500 इंडेक्स के कई शेयर अपने 52-हफ्ते के निचले स्तर पर आ गए। इनमें ACC अंबुजा सीमेंट एल्काइल एमिन्स केमिकल्स साइएंट बर्जर पेंट्स इंडिया कोहांस लाइफसाइंसेज इंद्रप्रस्थ गैस एडब्ल्यूएल एग्री बिजनेस बिरला कॉर्पोरेशन जेके लक्ष्मी सीमेंट जुबिलेंट फार्मावा प्रॉक्टर एंड गैंबल हाइजीन एंड हेल्थ केयर और सोनाटा सॉफ्टवेयर शामिल हैं।

    विशेषज्ञों की राय और भविष्य का अनुमान

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट करीब 2–3 प्रतिशत के करेक्शन के रूप में देखी जा सकती है। हालांकि ईरान-इजरायल युद्ध के कारण निवेशकों का भरोसा फिलहाल कमजोर पड़ा है और बाजार पहले ही लगभग 8 प्रतिशत टूट चुका है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह स्थिति अवसर भी पैदा कर सकती है। यदि वैश्विक हालात स्थिर होते हैं और विदेशी निवेशकों की बिकवाली कम होती है तो बाजार में फिर से तेजी लौट सकती है। आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों पश्चिम एशिया की स्थिति विदेशी निवेशकों के रुख और वैश्विक बाजारों के प्रदर्शन पर रहेगी।

  • ईरान-इजरायल युद्ध का वैश्विक ऊर्जा संकट: दुनिया भर में महंगी हुई रसोई गैस, जानें भारत पर क्या होगा असर?

    ईरान-इजरायल युद्ध का वैश्विक ऊर्जा संकट: दुनिया भर में महंगी हुई रसोई गैस, जानें भारत पर क्या होगा असर?

    नई दिल्ली ।  पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने न केवल वैश्विक भू-राजनीति को प्रभावित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में भी भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। मार्च 2026 की शुरुआत के साथ ही वैश्विक बाजार में रसोई गैस LPG की कीमतों में बड़ी हलचल देखी जा रही है। globalpetrolprices.com द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2 मार्च 2026 तक दुनिया भर में एलपीजी की औसत कीमत 71.96 भारतीय रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गई है। यह उछाल मुख्य रूप से ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी सैन्य संघर्ष और लॉजिस्टिक बाधाओं का परिणाम माना जा रहा है।

    वैश्विक स्तर पर कीमतों का विश्लेषण करें तो यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है कि अमीर और ऊर्जा आयात करने वाले देशों में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। अल्जीरिया, अंगोला, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हाल के दिनों में एलपीजी की दरों में वृद्धि दर्ज की गई है। इसके विपरीत, रूस और बेलारूस जैसे देशों में मामूली गिरावट देखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों तक सबकी पहुंच समान है, लेकिन विभिन्न देशों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स और दी जाने वाली सब्सिडी के कारण खुदरा कीमतों में जमीन-आसमान का अंतर पैदा हो जाता है।

    भारतीय उपभोक्ताओं के लिए इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच एक राहत भरी खबर सामने आई है। जहां दुनिया भर के कई देशों में गैस की कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं भारत में फिलहाल एलपीजी की कीमतें 59.9 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई हैं। इंडियन ऑयल के ताजा डेटा के अनुसार, देश की राजधानी दिल्ली में 14.2 किलोग्राम वाला घरेलू सिलेंडर ₹853 में उपलब्ध है, जबकि मुंबई में यह ₹852.50 की दर से बिक रहा है। हालांकि, भौगोलिक स्थिति के कारण पटना में इसकी कीमत ₹951 और लखनऊ में ₹890.50 तक पहुंच गई है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों जैसे कारगिल में सिलेंडर ₹985.5 और पुलवामा में ₹969 में मिल रहा है।

    वाणिज्यिक मोर्चे पर भी कीमतों में स्थिरता देखी जा रही है। दिल्ली में 19 किलो वाला कमर्शियल सिलेंडर 1768.50 रुपये और मुंबई में 1720 रुपये में मिल रहा है, जबकि चेन्नई में इसकी कीमत 1929 रुपये है। लेकिन यह स्थिरता कितनी लंबी टिकेगी, यह हॉर्मुज जलमार्ग की स्थिति पर निर्भर करता है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की एक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लंबा खिंचता है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हॉर्मुज जलडमरूमध्य Strait of Hormuz को अवरुद्ध कर दिया जाता है, तो पूरा एशिया ऊर्जा संकट की चपेट में आ सकता है।

    चूँकि एशिया के अधिकांश देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी जलमार्ग पर निर्भर हैं, इसलिए हॉर्मुज की नाकेबंदी कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यदि वैश्विक तनाव और बढ़ता है, तो कच्चे तेल और गैस के दामों में होने वाला उतार-चढ़ाव भारतीय बाजार को भी प्रभावित कर सकता है। फिलहाल सरकार की सब्सिडी नीतियों और स्टॉक प्रबंधन ने आम आदमी की जेब को सुरक्षित रखा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की अस्थिरता भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

  • खाड़ी युद्ध से प्रभावित भारत का चावल निर्यात, लाखों करोड़ रुपये का स्टॉक समंदर में…

    खाड़ी युद्ध से प्रभावित भारत का चावल निर्यात, लाखों करोड़ रुपये का स्टॉक समंदर में…


    नई दिल्ली : ईरान-इजरायल युद्ध की गर्मी Iran और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का असर अब भारतीय बासमती चावल के निर्यात पर भी पड़ रहा है। खाड़ी देशों में पानी के जहाजों का आवागमन रुक जाने के कारण भारत से निर्यात होने वाला चावल फंसा हुआ है। इस वजह से न केवल कच्चे तेल और नेचुरल गैस का आयात प्रभावित हुआ है, बल्कि भारत का बासमती चावल भी समय पर नहीं पहुंच पा रहा है।

    ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया के मुताबिक, भारत से खाड़ी देशों को भेजा जाने वाला चावल का ट्रांजिट समय लगभग 40 दिन का होता है। इसमें भारतीय बंदरगाह पर लगने वाला समय, जहाजों पर यात्रा का समय और डेस्टिनेशन कंट्री के बंदरगाह पर लगने वाला समय शामिल है। अभी हालात की वजह से निर्यात ठहरा हुआ है, लेकिन इससे पहले भेजे गए लगभग छह लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों, समंदर में या गंतव्य देशों के पोर्ट पर फंसे हैं।

    निर्यातकों का कहना है कि इस समय अटके हुए भारतीय बासमती चावल का वैल्यू पांच से छह हजार करोड़ रुपये है। इतने बड़े कंशाइनमेंट के फंसने के कारण नए कंशाइनमेंट की पैकिंग और बैगिंग का काम फिलहाल रोक दिया गया है। जब हालात सामान्य होंगे, तब यह काम फिर से शुरू किया जाएगा।

    भारत से हर साल करीब 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात होता है, जिसमें से लगभग 70 फीसदी खाड़ी देशों को जाता है। इसका मतलब सालाना करीब 45 लाख टन बासमती चावल खाड़ी देशों में भेजा जाता है। इनमें से छह से सात लाख टन का निर्यात अकेले ईरान को होता रहा है। ईरान को निर्यात का रिकॉर्ड 14 लाख टन तक पहुंच चुका है।

    अब जबकि खाड़ी में युद्ध छिड़ गया है, भारत के निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। न केवल वर्तमान कंशाइनमेंट फंसा है, बल्कि भविष्य में खाड़ी देशों को निर्यात की योजनाओं पर भी संकट मंडरा रहा है। यह स्थिति भारत के बासमती निर्यातकों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर रही है।

  • ईरान-इजराइल संघर्ष में बंकरों में कैद यूपी-बिहार के लोग, होली पर घर लौटने से हुए वंचित

    ईरान-इजराइल संघर्ष में बंकरों में कैद यूपी-बिहार के लोग, होली पर घर लौटने से हुए वंचित


    गोरखपुर। ईरान और इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष ने होली पर घर लौटने की भारतीयों की उम्मीदों को रोक दिया है। उत्तर प्रदेश और बिहार के नागरिक जो काम या कारोबार के सिलसिले में खाड़ी देशों में गए थे मिसाइल हमलों के डर से बंकरों में शरण लिए हुए हैं और उड़ानों के रद्द होने से फंसे हुए हैं।

    मिसाइल हमलों की दहशत


    गोरखपुर के रसूलपुर निवासी अब्दुल रहमान ने दुबई से बताया कि एयरपोर्ट के पास छह मिसाइलें देखी गईं जिन्हें एयर डिफेंस ने हवा में मार गिराया। एक मिसाइल पास में गिरी लेकिन कोई क्षति नहीं हुई। धमाकों की खौफनाक आवाजें कमरे तक पहुंच रही थीं और लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागते रहे। शनिवार देर रात से यह स्थिति जारी है। संदीप कुमार जो मई 2024 में इजराइल गए थे ने बताया कि 2 मार्च को भारत वापसी की फ्लाइट रद्द कर दी गई। यरुशलम और पेटा टिकवा के बीच कार्यरत जनार्दन ने कहा कि रविवार सुबह छह से सात बजे तक लगातार मिसाइलों के धमाके सुनाई दिए।

    छात्र और युवा भी फंसे

    सिद्धार्थनगर के आधा दर्जन छात्र ईरान में धार्मिक शिक्षा ले रहे हैं जिनसे परिजन संपर्क नहीं कर पा रहे। सीवान के इटहरी गांव निवासी 24 वर्षीय जितेंद्र प्रसाद तीन साल बाद होली मनाने घर लौटने वाले थे लेकिन दोहा एयरपोर्ट पर उड़ानें रद्द होने की जानकारी मिली। फिलहाल 25 युवकों को एयरपोर्ट के पास अमेरिकी आर्मी बेस कैंप में ठहराया गया है।

    यरुशलम में रिहायशी इलाकों की स्थिति गंभीर

    कुशीनगर के पडरौना निवासी नंदलाल विश्वकर्मा जो वेस्ट बैंक क्षेत्र में हैं ने बताया कि रिहायशी इलाकों में स्थिति गंभीर है। बीच-बीच में सायरन बजता रहता है और लोग नजदीकी बंकरों की ओर भागते हैं। हमलावर अक्सर शब्बात के समय को निशाना बनाते हैं जो यहूदी धर्म का साप्ताहिक विश्राम दिवस है। बंकर छोटे या हल्के हमलों से बचाव कर सकते हैं लेकिन सीधे और बड़े हमलों में पर्याप्त नहीं होंगे।

    दुबई से फंसे नागरिकों का अनुभव
    गोरखपुर के वसीम जो दुबई में कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं ने बताया कि ठहरने के स्थान के पास मिसाइलों के धमाके और उड़ानें दिखाई दे रही हैं। हालांकि ईरान का लक्ष्य मुख्य रूप से मिलिट्री बेस कैंप हैं रिहायशी इलाके सुरक्षित रह रहे हैं।

    खामेनेई की मौत के बाद यूपी में अलर्ट

    ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत के बाद उत्तर प्रदेश में अलर्ट जारी किया गया है। पुलिस और खुफिया एजेंसियों को शिया बहुल इलाकों और प्रदर्शन संवेदनशील जिलों में पूरी सतर्कता बरतने और अतिरिक्त निगरानी रखने को कहा गया है।