Tag: Iran-Israel War

  • पश्चिम एशिया संकट पर पीएम मोदी का बड़ा कदम: आज लोकसभा में देंगे बयान, ईरान-इजरायल जंग के बीच भारत की 'सुरक्षा कवच' रणनीति तैयार!

    नई दिल्ली:  पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों के बीच भारत सरकार पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज दोपहर दो बजे लोकसभा में एक महत्वपूर्ण वक्तव्य देने वाले हैं। माना जा रहा है कि पीएम मोदी ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी इस भीषण संघर्ष से वैश्विक स्तर पर पैदा हुए ऊर्जा संकट और इसके भारत पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर संसद को संबोधित करेंगे। इस संबोधन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सोमवार सुबह ही प्रधानमंत्री ने संसद भवन परिसर में विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और सचिव स्तर के अधिकारियों के साथ एक बड़ी बैठक की, जिसमें मौजूदा हालातों की विस्तृत समीक्षा की गई।

    इससे पहले रविवार शाम को प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की अध्यक्षता की। इस उच्च स्तरीय बैठक में पश्चिम एशिया में जारी जंग के कारण पेट्रोलियम, बिजली, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और खाद सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ने वाले अपेक्षित प्रभावों पर गहन चर्चा की गई। कैबिनेट सचिव ने एक विशेष प्रेजेंटेशन के जरिए वैश्विक स्थिति और भारत सरकार द्वारा अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी दी। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि युद्ध का प्रभाव केवल अल्पकालिक नहीं, बल्कि मध्यम और दीर्घकालिक भी हो सकता है। ऐसे में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को इस झटके से बचाने के लिए तत्काल और दूरगामी, दोनों तरह के जवाबी उपायों पर काम शुरू कर दिया है।

    आम आदमी की बुनियादी जरूरतों, जैसे भोजन, ऊर्जा और ईंधन सुरक्षा को लेकर सरकार ने विस्तृत आकलन किया है। विशेष रूप से किसानों के लिए खरीफ सीजन के दौरान खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पिछले कुछ वर्षों में खाद का पर्याप्त स्टॉक बनाए रखने के लिए जो कदम उठाए गए थे, उनसे फिलहाल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रहेगी। साथ ही, भविष्य में उपलब्धता बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की भी तलाश शुरू कर दी गई है। ऊर्जा के मोर्चे पर राहत की बात यह है कि सभी पावर प्लांट्स में कोयले का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है, जिससे देश में बिजली की कमी होने की आशंका नहीं है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट से निपटने के लिए ‘संपूर्ण सरकार’ (Whole-of-Government) के दृष्टिकोण पर बल दिया है। उन्होंने मंत्रियों और सचिवों के एक विशेष समूह के गठन का निर्देश दिया है, जो सभी हितधारकों के साथ मिलकर काम करेगा। पीएम ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि इस बदलते वैश्विक घटनाक्रम के बीच भारतीय नागरिकों को कम से कम असुविधा होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों के साथ उचित समन्वय बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि युद्ध की आड़ में आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी और जमाखोरी को रोका जा सके। केमिकल, फार्मास्यूटिकल और औद्योगिक कच्चे माल के आयात के लिए नए और विविध स्रोतों की पहचान की जा रही है, ताकि भारतीय उद्योगों की गति धीमी न पड़े। आज लोकसभा में पीएम का बयान इस पूरी रणनीति का खाका देश के सामने रखेगा।

  • मिडिल ईस्ट में हवाई संघर्ष तेज, ईरान ने अमेरिका के 16 फाइटर और 10 रीपर ड्रोन किए नष्ट

    मिडिल ईस्ट में हवाई संघर्ष तेज, ईरान ने अमेरिका के 16 फाइटर और 10 रीपर ड्रोन किए नष्ट

    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब भीषण हवाई युद्ध का रूप ले चुका है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिकी वायुसेना को दुश्मन हमलों के साथ-साथ तकनीकी खराबी और आपसी तालमेल की कमी के कारण भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है। ब्लूमबर्ग और सीएनएन की रिपोर्ट्स में बताया गया है कि युद्ध की शुरुआत से अब तक अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य विमान नष्ट हो चुके हैं, जिनमें महंगे ड्रोन और रिफ्यूलिंग टैंकर शामिल हैं।

    इस दौरान 10 MQ-9 रीपर ड्रोन भी तबाह हो चुके हैं। इनमें से 9 को ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया, जबकि एक ड्रोन जॉर्डन के एयरफील्ड पर मिसाइल हमले की चपेट में आया और दो तकनीकी कारणों से नष्ट हुए। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ये मानव रहित ड्रोन जानबूझकर उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में भेजे जाते हैं ताकि नुकसान न्यूनतम रहे।

    रिपोर्ट में तकनीकी खराबी और गलतियों के कारण हुए नुकसान पर भी ध्यान दिया गया है। एक ऑपरेशन के दौरान KC-135 रिफ्यूलिंग टैंकर के दुर्घटनाग्रस्त होने से चालक दल के सभी 6 सदस्यों की मौत हुई। वहीं, कुवैत में अपनी ही सेना की गलत पहचान के चलते तीन अमेरिकी F-15 फाइटर मार गिराए गए। इसी बीच सऊदी अरब के बेस पर ईरानी मिसाइल हमले में पांच KC-135 विमान क्षतिग्रस्त हुए।

    आम तौर पर अमेरिकी वायुसेना युद्ध में एयर सुपीरियरिटी हासिल कर लेती है, लेकिन ईरान के खिलाफ यह चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। अधिकारियों ने माना है कि अमेरिका केवल स्थानीय स्तर पर हवाई हमलों में दक्ष है, पूरे ईरानी आकाश पर उनका कब्जा नहीं है। हाल ही में एक F-35 फाइटर जेट को ईरानी गोलाबारी के बाद इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी; पायलट सुरक्षित बच गए।

    ईरान ने अपने ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर हुए हमलों का बदला लेने के लिए कतर और सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले तेज कर दिए हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्गों को सुरक्षित करना अमेरिका के लिए चुनौती बना हुआ है, क्योंकि ईरान का सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम लगातार खतरा पैदा कर रहा है।

  • अमेरिका ने भारत को दी 30 दिन की रूसी तेल खरीदने की छूट, कहा मुश्किल समय में जिम्मेदार साथी

    अमेरिका ने भारत को दी 30 दिन की रूसी तेल खरीदने की छूट, कहा मुश्किल समय में जिम्मेदार साथी


    नई दिल्ली । पश्चिमी एशिया में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट पैदा कर दिया है। इस समय अमेरिकी प्रशासन ने भारत के लिए एक राहत भरा फैसला लिया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लैविट ने मंगलवार को घोषणा की कि भारत को 30 दिनों के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दी गई है।

    कैरोलाइन लैविट ने बताया कि भारत एक भरोसेमंद सहयोगी रहा है और मुश्किल समय में हमेशा जिम्मेदारी से कदम उठाता है। इस शॉर्ट टर्म फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध के कारण बढ़ती वैश्विक तेल कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर न डालें।

    व्हाइट हाउस ने यह भी स्पष्ट किया कि इस छूट से रूस को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होगा क्योंकि यह तेल पहले से समुद्र में मौजूद जहाजों में था। नेशनल सिक्योरिटी टीम और ट्रेजरी सेक्रेटरी की जांच के बाद ही यह निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया।

    28 फरवरी से बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज की खाड़ी में युद्ध की घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार उतार-चढ़ाव का सामना कर रही हैं। ऐसे कठिन दौर में अमेरिका का यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और घरेलू तेल आपूर्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय वैश्विक तेल संकट और तेल निर्यातकों की बदलती स्थिति के बीच भारत के लिए समयबद्ध राहत साबित होगा। भारत ने पहले रूसी तेल की खरीद पर रोक लगाई थी लेकिन यह छूट अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति संकट के मद्देनजर अस्थायी उपाय के रूप में दी गई है।

  • मिडिल ईस्ट जंग तेज: ईरान की चेतावनी‘एक लीटर तेल भी नहीं जाने देंगे’, होर्मुज स्ट्रेट पर नई शर्त

    मिडिल ईस्ट जंग तेज: ईरान की चेतावनी‘एक लीटर तेल भी नहीं जाने देंगे’, होर्मुज स्ट्रेट पर नई शर्त




    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष का आज 11वां दिन है और इसी बीच ईरान ने दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी जारी की है। ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि अगर हमले जारी रहे तो वह एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने देगा। ईरान ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नई शर्त भी रख दी है। ईरानी सेना का कहना है कि कुछ देशों के जहाजों को ही इस रास्ते से गुजरने दिया जाएगा और इसके लिए उन देशों को पहले अपने यहां से अमेरिका और इजराइल के राजदूतों को निकालना होगा।

    तो पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा हो सकता है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान इस रास्ते से गुजरने वाले तेल टैंकरों और व्यापारिक जहाजों से सुरक्षा शुल्क यानी सिक्योरिटी टैक्स वसूलने की योजना भी बना रहा है, खासकर उन देशों के जहाजों से जो अमेरिका के सहयोगी माने जाते हैं।

    इसी बीच युद्ध का असर क्षेत्र के दूसरे देशों पर भी दिखने लगा है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी UNHCR के अनुसार 2 मार्च से अब तक 80 हजार से ज्यादा सीरियाई नागरिक लेबनान से सीमा पार कर अपने देश वापस लौट चुके हैं। एजेंसी की प्रवक्ता सेलिन श्मिट ने बताया कि इजराइली हमलों के डर से कई परिवार जल्दबाजी में लेबनान छोड़कर लौटे हैं। अधिकांश लोग बिना सामान लिए ही निकल गए और फिलहाल अपने रिश्तेदारों के घरों में रह रहे हैं। अभी तक इन लोगों ने आपातकालीन आश्रय की कोई आधिकारिक मांग दर्ज नहीं कराई है।

    युद्ध के बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल युद्धविराम नहीं चाहता। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान पर हमला करने वालों को ऐसा जवाब दिया जाएगा कि वे दोबारा ऐसा करने की हिम्मत न करें। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान को नहीं लगता कि अमेरिका और इजराइल से बातचीत करके यह युद्ध खत्म होगा। उनके मुताबिक ईरान उस स्थिति को खत्म करना चाहता है जिसमें पहले युद्ध होता है, फिर बातचीत और युद्धविराम होता है और कुछ समय बाद फिर से लड़ाई शुरू हो जाती है।

    दूसरी तरफ इराक ने भी इस संघर्ष से दूरी बनाने की कोशिश की है। इराक के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी ने अमेरिका से साफ कहा है कि इराक की जमीन या उसके हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल पड़ोसी देशों पर हमले के लिए नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह बात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर बातचीत के दौरान कही। इराक का कहना है कि वह इस युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता और अपने क्षेत्र को किसी भी सैन्य टकराव से दूर रखना चाहता है।

    युद्ध के कारण एशिया के कई देशों में भी चिंता बढ़ गई है। पाकिस्तान के बाद अब थाईलैंड ने ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करने का आदेश दिया है। थाई सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के विदेश यात्रा पर भी रोक लगा दी है और ऊर्जा बचत के लिए अलग-अलग उपाय लागू किए हैं। पाकिस्तान में भी सरकार ने खर्च कम करने के लिए सरकारी दफ्तरों को हफ्ते में चार दिन खोलने और आधे कर्मचारियों को घर से काम करने का फैसला किया है। वहीं वियतनाम ने लोगों से ईंधन बचाने की अपील की है और बांग्लादेश ने ऊर्जा संकट को देखते हुए विश्वविद्यालय बंद कर दिए हैं तथा छुट्टियों की अवधि बढ़ा दी है।

    इस संघर्ष का पर्यावरण पर भी असर दिखने लगा है। पाकिस्तान के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि ईरान में हुए हवाई हमलों के बाद वहां से उठने वाला धुआं और प्रदूषण पाकिस्तान के पश्चिमी इलाकों तक पहुंच सकता है, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब हो सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के तेल भंडारण ठिकानों पर हमलों के बाद कई शहरों के ऊपर घना काला धुआं छाया हुआ है और वहां सांस लेना मुश्किल हो गया है।

    दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने भी इस स्थिति को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। कंपनी के सीईओ अमीन नासिर के अनुसार अगर युद्ध जारी रहता है और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इससे केवल ऊर्जा क्षेत्र ही नहीं बल्कि शिपिंग, बीमा, हवाई यात्रा, खेती और ऑटोमोबाइल जैसे कई उद्योगों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा दुनिया में तेल का भंडार पहले ही पिछले पांच वर्षों के सबसे निचले स्तर के आसपास है, इसलिए सप्लाई में किसी भी बड़ी रुकावट से स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    इसी बीच तुर्किये ने भी अपनी सुरक्षा बढ़ा दी है और देश के दक्षिण-पूर्वी इलाके में अमेरिकी पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किया गया है। तुर्किये का कहना है कि हाल की घटनाओं को देखते हुए उसकी सीमाओं और हवाई क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत की जा रही है।

    उधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि अमेरिकी नौसेना अब तक ईरान के 46 युद्धपोतों को डुबो चुकी है। उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने कहा कि युद्ध कब खत्म होगा यह ईरान तय करेगा और अगर हमले जारी रहे तो क्षेत्र से एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने दिया जाएगा।

    युद्ध का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। मिस्र ने घरेलू ईंधन की कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर दी है। सरकार का कहना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण तेल सप्लाई और समुद्री परिवहन मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है।

    कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में जारी यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है। तेल सप्लाई, शरणार्थी संकट, पर्यावरण और वैश्विक अर्थव्यवस्था—इन सभी पर इसका असर साफ दिखाई देने लगा है और अगर हालात जल्द नहीं संभले तो दुनिया को एक बड़े ऊर्जा और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

  • ईरान-इजराइल जंग का असर: भारत में LPG इमरजेंसी, सरकार ने रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने का आदेश

    ईरान-इजराइल जंग का असर: भारत में LPG इमरजेंसी, सरकार ने रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने का आदेश


    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान-इजराइल के बीच जारी संघर्ष का असर अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी दिखने लगा है। संभावित गैस संकट को देखते हुए भारत सरकार ने आपात कदम उठाते हुए देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को रसोई गैस (LPG) का उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया है। सरकार ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करते हुए आदेश जारी किया कि अब रिफाइनरियां अपने पास मौजूद प्रोपेन और ब्यूटेन का उपयोग प्राथमिकता से LPG बनाने में करें, ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को गैस सिलेंडर की सप्लाई में कोई कमी न आए।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष के कारण सप्लाई चेन प्रभावित होने की आशंका है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार ने देर रात निर्देश जारी किए। आदेश के अनुसार अब रिफाइनरी कंपनियां इन गैसों का उपयोग अन्य औद्योगिक कामों में नहीं करेंगी, बल्कि इन्हें सीधे LPG उत्पादन में लगाया जाएगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रोपेन और ब्यूटेन की सप्लाई प्राथमिकता के आधार पर सरकारी तेल कंपनियों को दी जाएगी। इसमें प्रमुख रूप से Indian Oil Corporation, Hindustan Petroleum और Bharat Petroleum शामिल हैं। इस फैसले का उद्देश्य देश के करीब 33 करोड़ से अधिक LPG उपभोक्ताओं को बिना रुकावट गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना है।

    LPG दरअसल प्रोपेन और ब्यूटेन गैसों का मिश्रण होती है, जो कच्चे तेल की रिफाइनिंग के दौरान निकलती हैं। इन गैसों का इस्तेमाल आम तौर पर पेट्रोकेमिकल उद्योग, प्लास्टिक निर्माण और ईंधन के रूप में भी किया जाता है। लेकिन मौजूदा हालात में सरकार ने इनका उपयोग मुख्य रूप से घरेलू गैस उत्पादन में करने का निर्देश दिया है।

    सरकार के इस फैसले का असर निजी कंपनियों पर भी पड़ सकता है। खासकर Reliance Industries जैसी कंपनियों के पेट्रोकेमिकल उत्पादन और निर्यात पर इसका असर पड़ने की संभावना है। प्रोपेन और ब्यूटेन के डायवर्जन के कारण अल्काइलेट्स जैसे उत्पादों का उत्पादन कम हो सकता है, जिनका उपयोग पेट्रोल की गुणवत्ता सुधारने में किया जाता है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कंपनियों के मुनाफे पर भी दबाव पड़ सकता है, क्योंकि पेट्रोकेमिकल उत्पाद बाजार में LPG से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं।

    स्थिति को और गंभीर बनाने वाली खबर कतर से आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरानी ड्रोन हमलों के बाद कतर ने अपने कुछ LNG प्लांट का उत्पादन अस्थायी रूप से रोक दिया है। इससे भारत को मिलने वाली गैस सप्लाई में लगभग 40 प्रतिशत तक कटौती हो गई है। भारत अपनी कुल LNG जरूरत का बड़ा हिस्सा कतर से आयात करता है, इसलिए यह रुकावट घरेलू बाजार पर सीधा असर डाल सकती है।

    सबसे बड़ी चिंता Strait of Hormuz को लेकर है, जो कतर और यूएई जैसे देशों से तेल-गैस सप्लाई का मुख्य समुद्री मार्ग है। युद्ध के कारण इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों की संख्या तेजी से घट गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक जहां 28 फरवरी को इस मार्ग से 91 जहाज गुजरे थे, वहीं अब यह संख्या घटकर लगभग 26 रह गई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है।

    उधर गैस की कमी को लेकर सिटी गैस कंपनियों ने भी सरकार को चेतावनी दी है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो CNG और PNG की कीमतें बढ़ सकती हैं। उद्योग संगठनों का कहना है कि अगर कतर से सस्ती गैस नहीं मिली तो उन्हें स्पॉट मार्केट से महंगी गैस खरीदनी पड़ेगी, जिसकी कीमत फिलहाल दोगुनी से भी ज्यादा है।

    इस पूरे संकट को देखते हुए भारत सरकार फिलहाल घरेलू गैस आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव कदम उठा रही है, ताकि आम लोगों को रसोई गैस की किल्लत का सामना न करना पड़े।

  • Iran-Israel War ने बढ़ाई आयातकों की टेंशन… गैस टैंकरों का किराया एक ही दिन में हुआ दोगुना

    Iran-Israel War ने बढ़ाई आयातकों की टेंशन… गैस टैंकरों का किराया एक ही दिन में हुआ दोगुना


    तेहरान
    । अटलांटिक बेसिन (Atlantic Basin) में एलएनजी टैंकरों (LNG Tankers) के किराए में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। मामले से वाकिफ सूत्रों के मुताबिक, जहाज मालिक और ब्रोकर (Shipowner and Broker) अब इन टैंकरों के लिए 200,000 डॉलर प्रतिदिन से अधिक की मांग कर रहे हैं, जो कि 24 घंटे से भी कम समय पहले मांगे जा रहे किराए से लगभग दोगुना है।


    कतर में उत्पादन ठप होने से बढ़ी मांग

    ब्लूमबर्ग की खबर के मुताबिक किराए में यह उछाल ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बढ़ने के कारण कतर द्वारा अपना एलएनजी उत्पादन बंद करने के बाद आया है। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इतनी ऊंची दरों पर अभी तक किसी भी सौदे के होने की पुष्टि नहीं हुई है।


    पिछले दरों के मुकाबले तीन गुना ज्यादा

    यह ऑफर की जा रही दरें शिपिंग फर्म स्पार्क कमोडिटीज द्वारा सोमवार की शुरुआत में एलएनजी टैंकर के लिए आंकलित अंतिम दर 61,500 डॉलर से कम से कम तीन गुना अधिक हैं। यह भारी उछाल बाजार में अस्थिरता और अनिश्चितता को दर्शाता है।


    विशेषज्ञों की राय में अभी संभलकर चलने की जरूरत

    प्रिसिजन एलएनजी कंसल्टिंग एलएलसी के सलाहकार रिचर्ड प्रैट का मानना है कि अगर कतर और अबू धाबी जैसी जगहों पर उत्पादन में लंबे समय तक कटौती नहीं होती है, तो टैंकरों की दरों में यह भारी उछाल वास्तविक लेन-देन में तब्दील होने की संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका से एशिया तक जहाजों को चलने के लिए आवश्यक अतिरिक्त दूरी भी किराए पर दबाव बनाने में एक भूमिका निभा सकती है।


    शिपिंग कंपनियों ने लगाया इमर्जेंसी चार्ज

    खबर यह भी है कि हमलों से बढ़े खतरे के चलते शिपिंग कंपनियों ने खाड़ी और पश्चिम एशियाई देशों को जाने वाले और वहां से आने वाले माल पर 2000 डॉलर से लेकर 4000 डॉलर प्रति कंटेनर इमर्जेंसी कॉनफ्लिक्ट चार्जेज लगा दिए हैं। यह चार्जेज 2 मार्च से ही लागू हो गए हैं। यह खबर रूरल वॉयस सरकार में उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से दी है।

    रूरल वॉयस के मुताबिक शिपिंग कंपनियों ने कहा कि शिपिंग के लिए होने वाली बुकिंग पर इमर्जेंसी कॉनफ्लिक्ट चार्जेज लागू होंगे। इराक, बहरीन, कुवैत, यमन, कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), किंगडम ऑफ सऊदी अरब, जार्डन, मिस्र (पोर्ट ऑफ आइन सोखाना), दजिबुती, सूडान और इरिटिया के पोर्ट के लिए भारत से होने वाले निर्यात या इन देशों से भारत के आयात की लोडिंग पर इमर्जेंसी चार्जेज लागू होंगे।

    इमर्जेंसी चार्जेज के तहत 20 फीट के ड्राई कंटेनर पर 2000 डॉलर, 40 फीट के कंटेनर पर 3000 डॉलर और रीफर या स्पेशल इक्विपमेंट पर 4000 डॉलर प्रति कंटेनर का चार्ज फ्रेट रेट में जोड़ा जाएगा।