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  • ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा

    ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा


    तेहरान।
    पेट्रोल-डीजल (Petrol and Diesel) के सस्ता होने की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए बुरी खबर है। ईरान और अमेरिका में जंग (Iran -America War) तेज हो गई है। मिसाइलों की बारिश ने क्रूड की कीमतों (Crude oil Prices) में आग लगा दी है। अब इंटरनेशन बेंचमार्क (International benchmark) ब्रेंट क्रूड तेजी से 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर भाग रहा है। ऐसे में दुनिया भर में एक बार फिर ऊर्जा संकट के और बढ़ने के खतरे बढ़ गए हैं।

    बुधवार सुबह कारोबार शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 1.5% से अधिक की बढ़ोतरी हुई। यह उछाल मंगलवार के तेज उछाल के बाद आया है, जब दोनों तरह के तेल 4 डॉलर से ज्यादा महंगे हो गए थे। ब्लूमबर्ग के अनुसार वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का दाम सुबह 7 बजे के 1.61 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 91.83 डॉलर पर कारोबार कर रहा था और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1.91 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 96.56 डॉलर पर था।


    अमेरिका-ईरान के बीच रातभर मिसाइलों की बारिश

    अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके जवाब में ईरान ने पलटवार किया। दोनों देशों के बीच हफ्तों में यह सबसे गंभीर झड़प है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ये हमले ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की उन हालिया हरकतों के जवाब में किए गए, जिसमें उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों और अमेरिकी सैनिकों पर हमले की कोशिश की थी।


    होर्मुज पर संकट गहरा

    ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी हमलों से होर्मुज के रास्ते और भी ज्यादा बंद हो जाएंगे। गौरतलब है कि इसी रास्ते से दुनिया की कुल पांचवीं तेल खपत गुजरती थी, लेकिन अब ईरान ने इसे व्यावसायिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद कर दिया है।


    ईरान की जवाबी कार्रवाई और नए हमले

    IRGC ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और दावा किया कि बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरानी मीडिया के मुताबिक, बहरीन में अमेरिकी बेस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला किया गया। जॉर्डन की सेना ने 13 में से 10 मिसाइलें हवा में ही नष्ट कर दीं। अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक किसी भी नुकसान की पुष्टि नहीं की है। कुवैत ने भी दुश्मन ड्रोन गतिविधि के खिलाफ अपनी सेना तैनात कर दी है।


    टैंकरों पर हमले

    पिछले सप्ताहांत (जुलाई के बाद पहली बार) झड़पें तेज हुईं। सोमवार को होर्मुज से निकलते दो टैंकरों पर भी हमले हुए, जिससे तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है और कारोबारी वैकल्पिक रास्ते तलाशने पर मजबूर हैं।

  • ईरान के खिलाफ अमेरिका ने बदली चाल, नए हमले से पीछे हटे रुबियो; होर्मुज में नौसैनिक दबाव और प्रतिबंधों पर फोकस

    ईरान के खिलाफ अमेरिका ने बदली चाल, नए हमले से पीछे हटे रुबियो; होर्मुज में नौसैनिक दबाव और प्रतिबंधों पर फोकस


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच वॉशिंगटन की रणनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कई सहयोगी देशों के विदेश मंत्रियों को बताया है कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर नए सैन्य हमले शुरू करने की तैयारी नहीं कर रहा है। रुबियो के इस बयान से संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका तत्काल सैन्य कार्रवाई बढ़ाने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों समुद्री दबाव और रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही को सामान्य करने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। हालांकि ईरान की तरफ से किसी हमले की स्थिति में अमेरिका ने सैन्य विकल्प को पूरी तरह बंद नहीं किया है।

    अमेरिका की बदली रणनीति में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा बन गया है। अमेरिकी नौसेना इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है और समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि सैन्य अभियान के चलते ईरान की उस क्षमता को काफी कमजोर किया गया है जिसके जरिए वह वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना सकता था। होर्मुज में बारूदी सुरंगों को हटाने की कोशिश भी की जा रही है और कुछ तेल टैंकरों ने दक्षिणी समुद्री रास्ते से आवाजाही शुरू कर दी है। इसके बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

    अमेरिका की ओर से ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए नए प्रतिबंधों का सहारा लिया जा रहा है। वॉशिंगटन ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों और कंपनियों को भी चेतावनी दी है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर उन्हें कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इस रणनीति का मकसद ईरान की आर्थिक ताकत को कमजोर करना और उसे सीधे सैन्य टकराव के बजाय दबाव के जरिए बातचीत की मेज पर लाना बताया जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह नीति नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव तक जारी रह सकती है।

    दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी दबाव और समुद्री कार्रवाई को गैरकानूनी बताते हुए खारिज किया है। ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल जहाजों की आवाजाही पर फीस लगाने की योजना को भी लगभग अंतिम रूप दिए जाने की बात सामने आई है। संसदीय समिति की ओर से कहा गया है कि जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से मेंटेनेंस और नेविगेशन फीस ली जा सकती है। हालांकि यह व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है। अगर ऐसा कदम उठाया जाता है तो वैश्विक तेल कारोबार पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।

    इसी बीच ईरान और ओमान ने होर्मुज में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अस्थायी समुद्री कॉरिडोर बनाने पर चर्चा की है। दोनों देश जलमार्ग से बारूदी सुरंगें हटाने की दिशा में भी काम करने की बात कर चुके हैं। हालांकि तनाव के बीच एक तेल टैंकर पर प्रोजेक्टाइल से हमला होने की खबर ने समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। ऐसे में होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच दबाव की स्थिति बनी हुई है।

    इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान भी अहम भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के ईरान दौरे और वहां नेताओं के साथ बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की संभावना को लेकर चर्चा तेज हुई है। फिलहाल अमेरिका की रणनीति को सीधे नए हमले की बजाय आर्थिक और समुद्री दबाव के रूप में देखा जा रहा है। रुबियो के बयान से इतना जरूर साफ है कि वॉशिंगटन तत्काल सैन्य कार्रवाई को आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है लेकिन ईरान पर दबाव कम करने की भी उसकी कोई तैयारी नहीं दिख रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में होर्मुज और अमेरिकी प्रतिबंध इस टकराव की अगली दिशा तय कर सकते हैं।

  • ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग

    ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच चल रहा सैन्य टकराव (Military confrontation) अब तेल के कुओं और सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच जून में हुआ इस्लामाबाद समझौता (Islamabad Agreement) पूरी तरह से टूट चुका है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में फिर से भीषण जंग छिड़ गई है।

    इस बार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को घुटनों पर लाने के लिए पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे यानी पानी के सप्लाई सिस्टम को अपना मुख्य निशाना बनाया है। पारंपरिक हवाई हमलों के साथ-साथ अब पानी साफ करने वाले प्लांटों को नष्ट करने की होड़ मची है, जिसने सीधे तौर पर आम नागरिकों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया है।


    पानी को क्यों बनाया जा रहा है युद्ध का नया मैदान?

    फारस की खाड़ी दुनिया के उन चुनिंदा हिस्सों में से है, जहां प्राकृतिक रूप से पीने का पानी न के बराबर है। ऐसे में पानी का उत्पादन और उसका वितरण सिस्टम किसी भी देश के वजूद के लिए सबसे संवेदनशील नस है।

    तेल रिफाइनरी या कच्चे तेल के जहाजों पर हमला करने से वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। लेकिन जब समंदर के खारे पानी को पीने लायक बनाने वाले डिसेलिनेशन प्लांट को तबाह किया जाता है, तो सीधे तौर पर आम जनता के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाता है।

    ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इनमें से एक बड़ा हमला कुवैत के मुख्य बिजली उत्पादन और डिसेलिनेशन प्लांट पर हुआ। इस हमले से बिजली की कई इकाइयां ठप हो गईं और भयंकर आग लग गई। कुवैत सरकार को आपातकालीन योजनाएं लागू करनी पड़ीं और नागरिकों से पानी व बिजली का इस्तेमाल कम करने की अपील करनी पड़ी है।

    कुवैत अपनी जरूरत का 90 फीसदी पीने का पानी समंदर के पानी को साफ करके हासिल करता है। ऐसे में इन प्लांट्स पर होने वाले हमले देश की पूरी घरेलू जल आपूर्ति को पंगु बना सकते हैं। यह हमला दिखाता है कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश कितने संवेदनशील हैं, क्योंकि उनके ज्यादातर बड़े वॉटर प्लांट समुद्र तटों पर हैं, जो ईरानी मिसाइलों की सीधी जद में आते हैं।


    अमेरिका का पलटवार: ईरान के बुंजी गांव में प्लांट तबाह

    कुवैत पर हमले के लगभग साथ ही, अमेरिकी सेना ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए सैन्य ठिकानों के अलावा नागरिक और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी होर्मोजगान प्रांत के बुंजी गांव में स्थित एक प्रमुख डिसेलिनेशन प्लांट पर हवाई हमला किया।

    होर्मोजगान वॉटर एंड वेस्टवॉटर कंपनी के मुताबिक, अमेरिकी हमले में प्लांट का पूरा फिल्ट्रेशन इक्विपमेंट (पानी छानने वाले उपकरण) और पंपिंग सिस्टम पूरी तरह तबाह हो गया है। इसके कारण भीषण गर्मी के इस मौसम में 20 से ज्यादा गांवों के लगभग 10,000 लोग बिना पीने के पानी के रहने को मजबूर हो गए हैं, जिससे इलाके में बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो गया है।

    इससे पहले भी युद्ध के दौरान कुवैत के ‘दोहा वेस्ट’ डिसेलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा था। वहीं ईरान ने अमेरिका पर 8 मार्च को ‘केशम द्वीप’ के वॉटर प्लांट पर भी हमला करने का आरोप लगाया था, जिससे 30 गांवों की पानी सप्लाई रुकी थी। हालांकि, वाशिंगटन ने इसकी पुष्टि नहीं की थी।

    खाड़ी देश पानी के लिए डिसेलिनेशन पर इतने निर्भर क्यों हैं?
    संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानकों के अनुसार, अगर किसी देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 500 क्यूबिक मीटर से कम रिन्यूएबल ताजा पानी उपलब्ध है, तो उसे ‘पूर्ण जल कमी’ की श्रेणी में रखा जाता है। खाड़ी (GCC) देशों में यह आंकड़ा 100 क्यूबिक मीटर से भी कम है।

    प्राकृतिक संसाधनों की इस कमी के बावजूद, इस क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण, औद्योगिक विकास और आबादी बढ़ी है। इस चकाचौंध को जिंदा रखने के लिए प्राकृतिक स्रोतों के बजाय पूरी तरह आर्टिफिशयल वाटर सप्लाई का जाल बिछाया गया।

    अगर ये प्लांट काम करना बंद कर दें, तो क्या होगा?
    किसी तेल रिफाइनरी के बंद होने से केवल व्यावसायिक गतिविधियां रुकती हैं, लेकिन वॉटर प्लांट बंद होने का असर अस्पतालों, आपातकालीन सेवाओं और घरों पर हर सेकंड पड़ता है। अगर युद्ध के कारण ये प्लांट लंबे समय के लिए बंद हो जाएं, तो संकट का टाइमलाइन कुछ इस तरह बदल सकता है:

    बहरीन और कतर जैसे बहुत ज्यादा निर्भर देशों को तुरंत पानी की सख्त लिमिट लागू करनी होगी। उद्योगों और कमर्शियल इलाकों का पानी रोककर केवल घरेलू उपयोग को प्राथमिकता दी जाएगी।

    अगर हफ्ते भर में मरम्मत न हुई, तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगा। खाड़ी की 45°C से ज्यादा की झुलसाने वाली गर्मी में पानी न मिलना बड़े पैमाने पर डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) और पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को जन्म दे देगा।


    पानी की सुरक्षा और ऊर्जा का आपस में क्या कनेक्शन है?

    खाड़ी देशों में बिजली और पानी के प्लांट अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए ‘कोग्नरेशन सिस्टम’ के तहत काम करते हैं। थर्मल डिसेलिनेशन प्लांट पानी साफ करने के लिए पास के तेल या गैस से चलने वाले बिजलीघरों से निकलने वाली गर्म भाप का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, वे बिजलीघर अपने बॉयलरों को ठंडा रखने और सुरक्षित संचालन के लिए इसी साफ किए गए पानी पर निर्भर होते हैं।

    अगर किसी वॉटर प्लांट के इनटेक पंप या फिल्टर को निशाना बनाया जाता है, तो थर्मल डैमेज से बचने के लिए बिजलीघर को भी अपनी क्षमता कम करनी पड़ती है या उसे बंद करना पड़ता है। यानी पानी पर हमला सीधे तौर पर बिजली ग्रिड को ठप कर देता है।

    आधुनिक वॉटर प्लांट ‘रिवर्स ऑस्मोसिस’ (RO) तकनीक पर चलते हैं, जिसमें बेहद बारीक पॉलीमर मेम्ब्रेन के जरिए नमक को अलग किया जाता है। ये मेम्ब्रेन बेहद नाजुक और महंगी होती हैं। अगर युद्ध के कारण समुद्र में कच्चे तेल का रिसाव होता है और वह दूषित पानी इनटेक पॉइंट तक पहुंच जाता है, तो ये मेम्ब्रेन हमेशा के लिए खराब हो जाती हैं। इन्हें बदलने में महीनों का समय लग सकता है।


    साइबर वॉरफेयर का नया खतरा

    फिजिकल मिसाइल हमलों के अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि ईरानी साइबर हैकर्स अमेरिकी पानी और वेस्टवॉटर सिस्टम को निशाना बना रहे हैं। इसके लिए FBI, NSA और CISA ने अलर्ट जारी किया है।

    हैकर्स किसी वायरस या मालवेयर का इस्तेमाल करने के बजाय सिस्टम के प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स में सेंध लगाते हैं, जो पंपों और फिल्टरेशन को ऑटोमैटिक कंट्रोल करते हैं। हैकर्स प्रोग्रामिंग टूल्स का इस्तेमाल करके सामान्य मेंटेनेंस स्टाफ की तरह नेटवर्क में छिप जाते हैं।

    वे उन फाइलों को डिलीट कर देते हैं जो तय करती हैं कि पंप कब चालू या बंद होना है। साथ ही, वे ह्यूमन-मशीन इंटरफेस यानी ऑपरेटर की डिजिटल स्क्रीन पर झूठा डेटा दिखा देते हैं, जिससे अधिकारियों को लगता है कि सब ठीक चल रहा है, जबकि अंदर ही अंदर सिस्टम फेल हो चुका होता है। इससे पहले इजरायल के वॉटर सिस्टम पर भी ऐसा ही हमला हुआ था, जहां पानी में क्लोरीन की मात्रा को चुपके से बढ़ाने की कोशिश की गई थी।


    इंटरनेशनल कानून और CIA की पुरानी चेतावनी

    पेंटागन और अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को सालों से इस कमजोरी का अंदाजा था। साल 2010 में CIA की एक गोपनीय रिपोर्ट में आगाह किया गया था कि खाड़ी के 90% से ज्यादा पानी का उत्पादन केवल 56 संवेदनशील प्लांट्स में केंद्रित है। इन पर किया गया कोई भी बड़ा हमला पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय आपातकाल ला सकता है।

    जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन, अनुच्छेद 54 (पैराग्राफ 2) के तहत इंटरनेशनल मानवीय कानून साफ तौर पर कहता है कि- नागरिक आबादी के जिंदा रहने के लिए अपरिहार्य वस्तुओं, जैसे कि भोजन, कृषि क्षेत्र… और पीने के पानी के प्रतिष्ठानों और सप्लाई को नष्ट करना, हटाना या बेकार करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।”

  • ट्रंप की एक पोस्ट से फिर गरमाया पश्चिम एशिया! ईरान पर नए हमले की अटकलों से दुनिया में हलचल

    ट्रंप की एक पोस्ट से फिर गरमाया पश्चिम एशिया! ईरान पर नए हमले की अटकलों से दुनिया में हलचल


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोशल मीडिया पोस्ट ने नए सैन्य टकराव की आशंकाओं को हवा दे दी है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक तस्वीर साझा की, जिसमें वह युद्धपोत पर सैन्य अधिकारियों के साथ खड़े नजर आए। तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा— “तूफान से पहले की शांति।” इस एक लाइन ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है और माना जा रहा है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ फिर बड़ा कदम उठा सकता है।

    तस्वीर में ट्रंप समुद्र के बीच युद्धपोत पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। पीछे ईरान का झंडा लगे जहाज और तूफानी मौसम जैसे दृश्य नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पोस्ट केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि ईरान को सीधी चेतावनी भी हो सकती है। खास बात यह है कि हाल के दिनों में ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अगर ईरान के साथ समझौता नहीं हुआ तो उसे “गंभीर परिणाम” भुगतने पड़ सकते हैं।

    इसी बीच अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स ने तनाव और बढ़ा दिया है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी रक्षा विभाग ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी 2.0” नाम की योजना तैयार की है। रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना में ईरान के सैन्य ठिकानों और अहम बुनियादी ढांचे पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा विशेष सैन्य अभियान और रणनीतिक इलाकों पर कब्जे जैसे विकल्पों पर भी चर्चा चल रही है।

    अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने भी संकेत दिए हैं कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका सैन्य कार्रवाई तेज कर सकता है। हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि हमला कब और किस स्तर पर हो सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना के पास कई विकल्प तैयार हैं, लेकिन अंतिम फैसला अब भी राष्ट्रपति ट्रंप के हाथ में है।

    दूसरी तरफ ईरान ने भी कड़ा रुख अपना लिया है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान किसी भी हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने गलत कदम उठाया तो उसका जवाब भी उसी भाषा में मिलेगा। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन युद्ध की स्थिति में पीछे हटने वाला नहीं है।

    गौरतलब है कि अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान से जुड़े ठिकानों पर संयुक्त कार्रवाई की थी। इसके बाद 8 अप्रैल को अस्थायी सीजफायर जरूर हुआ, लेकिन दोनों पक्षों के बीच तनाव खत्म नहीं हुआ। अब ट्रंप की नई पोस्ट और अमेरिकी सैन्य तैयारियों की खबरों ने पश्चिम एशिया में फिर बड़े संघर्ष की आशंका बढ़ा दी है। दुनिया की नजरें अब वॉशिंगटन और तेहरान पर टिकी हैं, क्योंकि एक गलत फैसला पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकता है।

  • ईरान की 'शर्तों' पर भड़के ट्रंप: बोले-बिल्कुल मंजूर नहीं! जंग या समझौता? फैसला अब अमेरिका के हाथ

    ईरान की 'शर्तों' पर भड़के ट्रंप: बोले-बिल्कुल मंजूर नहीं! जंग या समझौता? फैसला अब अमेरिका के हाथ

    नई दिल्ली। मध्य पूर्व (Middle East) की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ी नजर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा भेजे गए कूटनीतिक प्रस्ताव को ‘कचरे के डिब्बे’ में डालते हुए उसे “पूरी तरह अस्वीकार्य” करार दिया है। इस एक बयान ने दुनिया भर के बाजारों और कूटनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

    ट्रंप का ‘ट्रुथ सोशल’ धमाका: “मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं!”
    सोमवार रात डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान के प्रस्ताव की धज्जियां उड़ाते हुए लिखा। “मैंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है। मुझे यह जरा भी पसंद नहीं आया बिल्कुल भी मंजूर नहीं!”

    ट्रंप के इस कड़े तेवर के बाद उनके करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने संकेत दिया कि अब बातचीत का समय खत्म हो चुका है और ‘प्रोजेक्ट फ़्रीडम प्लस’ (सैन्य विकल्प) ही एकमात्र रास्ता बचा है।

    ईरान की ‘रेड लाइन’: वो शर्तें जिन पर भड़का अमेरिका
    लेबनानी नेटवर्क ‘अल-मयादीन’ के अनुसार, ईरान ने समझौते के बदले जो मांगें रखी हैं, वे अमेरिका के लिए किसी ‘सरेंडर’ से कम नहीं थीं:

    आर्थिक घेराबंदी का अंत: ईरान ने मांग की है कि उसके तेल निर्यात पर लगी रोक तुरंत हटाई जाए।

    फ्रीज फंड की रिहाई: विदेशों में जप्त ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को तत्काल मुक्त किया जाए।

    होर्मुज पर कब्ज़ा: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पर ईरान का पूर्ण नियंत्रण हो।

    लेबनान युद्धविराम: ईरान ने इसे अपनी ‘रेड लाइन’ घोषित किया है।

    परमाणु दांव: क्या यह ईरान की चाल है?
    दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने पहली बार ‘लचीलापन’ दिखाते हुए 30 दिनों के भीतर परमाणु मुद्दे पर चर्चा करने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध टालने या वक्त हासिल करने की एक सोची-झीली रणनीति हो सकती है।

    दूसरी ओर, अमेरिका की मांग बेहद सख्त है: “ईरान अपना 60% शुद्ध यूरेनियम सौंप दे, परमाणु प्लांट नष्ट करे और अगले 20 साल तक संवर्धन भूल जाए।”

    ईरान का पलटवार: “हम ट्रंप को खुश करने के लिए नहीं बैठे”
    तेहरान ने भी साफ कर दिया है कि वह दबाव में नहीं झुकेगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा कि ईरान ट्रंप को खुश करने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाता। सरकारी मीडिया ने तो यहां तक कह दिया कि ट्रंप की मांगें “बेतुकी” हैं और ईरान उनके आगे घुटने नहीं टेकेगा।

     युद्ध या कूटनीति?
    दुनिया के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं:इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करे। युद्ध के बिना ईरान का दम घोंटने के लिए समुद्र में उसकी घेराबंदी और सख्त की जाए। ट्रंप अपनी ‘आर्ट ऑफ द डील’ का इस्तेमाल कर ईरान से कोई ऐसी बड़ी रियायत छीन लें जो अब तक असंभव मानी जाती थी।अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की जेब पर पड़ेगा।

  • कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा..

    कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा..


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है, जहां मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को तेजी से ऊपर पहुंचा दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में सैन्य गतिविधियों और टकराव की स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को झकझोर कर रख दिया है। इसी अस्थिरता के बीच कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर $100 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।

    तेल बाजार में यह तेजी अचानक नहीं आई है, बल्कि पिछले कुछ दिनों से जारी तनाव और अनिश्चितता का सीधा परिणाम है। समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे और आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसी वजह से बाजार में घबराहट का माहौल है और कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब तक बाजार में स्थिरता की उम्मीद कम है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण लाइफलाइन माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य हलचल का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर पड़ता है। यही कारण है कि इस समय बाजार में जोखिम बढ़ा हुआ है और कीमतें लगातार ऊपर-नीचे हो रही हैं।

    तेल की कीमतों में इस उछाल ने महंगाई की चिंता को भी बढ़ा दिया है। कच्चे तेल के महंगे होने का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ता है। इससे दुनिया भर में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। खासकर आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण बन सकती है।

    भारत जैसे देशों पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल और डीजल की लागत बढ़ती है, जिसका असर आम जनता की जेब पर पड़ता है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ने से वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति बेहद अस्थिर है और निवेशक बड़े फैसलों से बच रहे हैं। हर नई राजनीतिक या सैन्य खबर के साथ तेल बाजार में तेजी या गिरावट देखी जा रही है। यदि तनाव और बढ़ता है तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, जबकि कूटनीतिक समाधान से बाजार को राहत मिल सकती है।

    फिलहाल दुनिया की नजर इस क्षेत्र में होने वाली आगे की घटनाओं पर टिकी हुई है, क्योंकि यहां का हर बदलाव सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

  • वैश्विक तनाव की मार से डगमगाया बाजार: सेंसेक्स 516 अंक टूटा, निवेशकों की संपत्ति पर बड़ा असर

    वैश्विक तनाव की मार से डगमगाया बाजार: सेंसेक्स 516 अंक टूटा, निवेशकों की संपत्ति पर बड़ा असर

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव का असर अब सीधे भारतीय शेयर बाजार पर साफ नजर आने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती राजनीतिक और रणनीतिक तनातनी ने वैश्विक निवेश माहौल को अस्थिर कर दिया, जिसका सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ा। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन बाजार ने कमजोरी के साथ समापन किया और पूरे दिन बिकवाली का दबाव बना रहा।

    कारोबार की शुरुआत से ही बाजार में अनिश्चितता का माहौल देखने को मिला। निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया और जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ा, बिकवाली का दबाव बढ़ता गया। प्रमुख सूचकांक लगातार नीचे खिसकते रहे और अंत में बड़ी गिरावट के साथ बंद हुए। बाजार में यह लगातार दूसरा दिन रहा जब कमजोरी का रुख बना रहा, जिससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई।

    सेंसेक्स पूरे दिन उतार-चढ़ाव के बीच रहा, लेकिन अंततः यह महत्वपूर्ण अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। निफ्टी ने भी समान रुझान दिखाते हुए कमजोरी दर्ज की। शुरुआती कारोबार में थोड़ी स्थिरता जरूर दिखी, लेकिन वैश्विक संकेतों के दबाव ने बाजार की दिशा को पूरी तरह बदल दिया।

    हालांकि पूरे बाजार में गिरावट का माहौल रहा, लेकिन कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में हल्की खरीदारी भी देखने को मिली। सूचना प्रौद्योगिकी और कुछ उपभोक्ता आधारित सेक्टरों में मामूली तेजी रही, जिसने बाजार को पूरी तरह टूटने से बचाया। इसके विपरीत बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, धातु, तेल और गैस जैसे क्षेत्रों में भारी दबाव देखा गया, जिसने कुल मिलाकर बाजार को नीचे खींच दिया।

    कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई, खासकर बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों में दबाव ज्यादा रहा। वहीं कुछ उपभोक्ता और तकनीकी कंपनियों में हल्की बढ़त देखने को मिली, लेकिन यह पूरे बाजार के नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं थी।

    दिन के अंत में निवेशकों की संपत्ति में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। बाजार पूंजीकरण में कमी आने से एक ही सत्र में निवेशकों को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक घटनाएं अब भारतीय बाजार को तेजी से प्रभावित कर रही हैं और निवेशक भावनाएं अंतरराष्ट्रीय समाचारों से सीधे जुड़ गई हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय तनाव और भू-राजनीतिक स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। ऐसे माहौल में निवेशकों को सावधानी के साथ आगे बढ़ने की सलाह दी जा रही है।

    फिलहाल बाजार की नजरें वैश्विक घटनाक्रम और आर्थिक संकेतों पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि बाजार स्थिरता की ओर लौटता है या उतार-चढ़ाव का दौर अभी और लंबा चलता है।

  • ट्रंप-ईरान आमने-सामने: ‘गेंद अमेरिका के पाले में’, शांति प्रस्ताव के साथ तेहरान की दो टूक, युद्ध भी मंजूर

    ट्रंप-ईरान आमने-सामने: ‘गेंद अमेरिका के पाले में’, शांति प्रस्ताव के साथ तेहरान की दो टूक, युद्ध भी मंजूर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के रिश्ते एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। तेहरान ने जहां शांति की पहल करते हुए 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजा है, वहीं सख्त लहजे में यह भी साफ कर दिया है कि अब फैसला वॉशिंगटन को करना है कूटनीति या टकराव। पाकिस्तान के जरिए भेजे गए इस प्रस्ताव को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं।

    ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि “गेंद अब अमेरिका के पाले में है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि तेहरान ने शांति का रास्ता खोल दिया है, लेकिन अगर अमेरिका टकराव चाहता है तो ईरान भी हर स्थिति के लिए तैयार है। उनका कहना है कि देश अपने हितों और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और जरूरत पड़ी तो जवाब भी उसी अंदाज में दिया जाएगा।

    दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव पर संदेह जताते हुए साफ संकेत दिए हैं कि इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। ट्रंप ने कहा कि वह प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि यह अमेरिका के लिए स्वीकार्य होगा। उन्होंने ईरान पर पिछले कई दशकों के व्यवहार को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तेहरान ने अभी तक “पर्याप्त कीमत” नहीं चुकाई है।

    दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता बार-बार विफल हो रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत की कोशिशें भी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी हैं। अमेरिका का रुख साफ है कि वह तब तक युद्ध खत्म नहीं करेगा जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ठोस और विश्वसनीय नियंत्रण सुनिश्चित नहीं हो जाता। वहीं ईरान की प्राथमिकता है कि पहले युद्ध पूरी तरह खत्म हो, नाकेबंदी हटे और उसके बाद ही अन्य मुद्दों पर चर्चा हो।

    ईरान के 14 सूत्रीय प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल हैं। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य से अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, क्षेत्र से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, जब्त ईरानी संपत्तियों की रिहाई, युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा और भविष्य में हमले न करने की गारंटी जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। इसके अलावा लेबनान समेत सभी मोर्चों पर संघर्ष समाप्त करने और होर्मुज में नया तंत्र लागू करने की बात भी कही गई है।

    इसी बीच अमेरिका ने शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है कि यदि वे होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के लिए ईरान को किसी भी रूप में भुगतान करती हैं, तो उन्हें कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस चेतावनी में नकद के साथ डिजिटल और अनौपचारिक लेन-देन भी शामिल हैं, जिससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

    कुल मिलाकर, एक तरफ शांति प्रस्ताव है तो दूसरी ओर सख्त बयानबाजी—ऐसे में मिडिल ईस्ट का माहौल अभी भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि हालात बातचीत की मेज तक पहुंचते हैं या फिर टकराव और गहराता है।

  • तेल संकट और कर्ज का दबाव: युद्ध की आंच में झुलसा पाकिस्तान, PM शरीफ का बड़ा बयान

    तेल संकट और कर्ज का दबाव: युद्ध की आंच में झुलसा पाकिस्तान, PM शरीफ का बड़ा बयान


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी साफ नजर आने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद स्वीकार किया है कि मौजूदा हालात ने देश की आर्थिक प्रगति को बुरी तरह प्रभावित किया है।

    शहबाज शरीफ ने एक बयान में कहा कि पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान ने जो आर्थिक सुधार हासिल किए थे, वे इस क्षेत्रीय संकट के चलते कमजोर पड़ गए हैं। खासतौर पर तेल की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी ने देश की कमर तोड़ दी है। उनके मुताबिक, जहां पहले पाकिस्तान हर सप्ताह तेल आयात पर लगभग 30 करोड़ डॉलर खर्च करता था, वहीं अब यह खर्च बढ़कर करीब 80 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार और बजट संतुलन पर भारी दबाव पड़ा है।

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि देश में ऊर्जा संकट के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के पास कच्चे तेल का भंडार बेहद सीमित रह गया है और यह सिर्फ कुछ दिनों की जरूरत ही पूरी कर सकता है। हालात को संभालने के लिए सरकार को असाधारण कदम उठाने पड़े हैं, जिनमें ईंधन की खपत कम करने के उपाय, सरकारी खर्चों में कटौती और वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

    इन चुनौतियों के बीच पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशें भी जारी हैं। वह लगातार ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत शुरू कराने का प्रयास कर रहा है, ताकि क्षेत्र में तनाव कम हो सके। हालांकि अब तक इन प्रयासों को सफलता नहीं मिली है। खुद शहबाज शरीफ ने भी माना है कि यह काम किसी एक देश के बस की बात नहीं है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

    दूसरी ओर, आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं। पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे देश को अब बाहरी सहायता पर और अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। खाड़ी देशों के साथ संबंधों में आई खटास ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में पाकिस्तान को नए कर्ज लेकर पुराने कर्ज चुकाने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जो लंबे समय में अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

    कुल मिलाकर, क्षेत्रीय संघर्ष का असर अब केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आर्थिक स्थिरता और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है। पाकिस्तान के लिए यह समय आर्थिक प्रबंधन, कूटनीति और आंतरिक सुधारों के बीच संतुलन बनाने की बड़ी परीक्षा बन गया है।

     पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी साफ नजर आने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच जारी टकराव ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद स्वीकार किया है कि मौजूदा हालात ने देश की आर्थिक प्रगति को बुरी तरह प्रभावित किया है।

    शहबाज शरीफ ने एक बयान में कहा कि पिछले दो वर्षों में पाकिस्तान ने जो आर्थिक सुधार हासिल किए थे, वे इस क्षेत्रीय संकट के चलते कमजोर पड़ गए हैं। खासतौर पर तेल की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी ने देश की कमर तोड़ दी है। उनके मुताबिक, जहां पहले पाकिस्तान हर सप्ताह तेल आयात पर लगभग 30 करोड़ डॉलर खर्च करता था, वहीं अब यह खर्च बढ़कर करीब 80 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार और बजट संतुलन पर भारी दबाव पड़ा है।

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि देश में ऊर्जा संकट के संकेत भी दिखाई देने लगे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के पास कच्चे तेल का भंडार बेहद सीमित रह गया है और यह सिर्फ कुछ दिनों की जरूरत ही पूरी कर सकता है। हालात को संभालने के लिए सरकार को असाधारण कदम उठाने पड़े हैं, जिनमें ईंधन की खपत कम करने के उपाय, सरकारी खर्चों में कटौती और वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

    इन चुनौतियों के बीच पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशें भी जारी हैं। वह लगातार ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत शुरू कराने का प्रयास कर रहा है, ताकि क्षेत्र में तनाव कम हो सके। हालांकि अब तक इन प्रयासों को सफलता नहीं मिली है। खुद शहबाज शरीफ ने भी माना है कि यह काम किसी एक देश के बस की बात नहीं है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

    दूसरी ओर, आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं। पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे देश को अब बाहरी सहायता पर और अधिक निर्भर होना पड़ रहा है। खाड़ी देशों के साथ संबंधों में आई खटास ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में पाकिस्तान को नए कर्ज लेकर पुराने कर्ज चुकाने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, जो लंबे समय में अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

    कुल मिलाकर, क्षेत्रीय संघर्ष का असर अब केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव आर्थिक स्थिरता और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है। पाकिस्तान के लिए यह समय आर्थिक प्रबंधन, कूटनीति और आंतरिक सुधारों के बीच संतुलन बनाने की बड़ी परीक्षा बन गया है।

  • ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका

    ईरान अमेरिका तनाव के बाद यूरोप का बड़ा कदम होर्मुज मिशन बिना अमेरिका


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर खतरे के बीच यूरोपीय संघ अब एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय देश होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए एक नया मिशन तैयार कर रहे हैं जिसमें अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं होगी। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक महीने से अधिक समय तक चला संघर्ष वैश्विक राजनीति और ट्रांस अटलांटिक संबंधों को नया रूप दे चुका है।

    द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रस्ताव का नेतृत्व ब्रिटेन और फ्रांस कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संघर्ष के बाद समुद्री व्यापार में भरोसा बहाल करना और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।

    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि यह मिशन पूरी तरह रक्षात्मक होगा और यूरोपीय नौसेना किसी अमेरिकी कमांड के तहत काम नहीं करेगी। इसका मकसद शिपिंग कंपनियों को यह भरोसा दिलाना है कि युद्ध के बाद क्षेत्र में व्यापार करना सुरक्षित रहेगा।

    इस प्रस्ताव में कई अहम कदम शामिल हैं जैसे समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना नेवल एस्कॉर्ट्स तैनात करना और सर्विलांस सिस्टम को मजबूत करना। खास बात यह है कि इस गठबंधन में अमेरिका इजरायल और ईरान जैसे सीधे संघर्ष में शामिल देशों को बाहर रखा जाएगा।

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन नोएल बैरोट के अनुसार यह मिशन तभी शुरू होगा जब क्षेत्र में शांति स्थापित हो जाएगी। साथ ही ओमान और ईरान जैसे तटीय देशों के सहयोग की भी जरूरत होगी। इस मिशन में जर्मनी की भी अहम भूमिका मानी जा रही है जो जहाज और निगरानी संसाधन उपलब्ध करा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना तीन मुख्य उद्देश्यों पर आधारित है पहला फंसे हुए जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना दूसरा समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाना और तीसरा सुरक्षित समुद्री मार्ग सुनिश्चित करना।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम मार्ग है जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है जिसमें भारत जैसे बड़े आयातक देश भी शामिल हैं।

    यह पहल इस बात का संकेत है कि यूरोपीय संघ अब वैश्विक सुरक्षा में अपनी स्वतंत्र भूमिका बढ़ाना चाहता है। साथ ही यह अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेदों को भी दर्शाता है जहां यूरोपीय देश अब अपनी रणनीति खुद तय करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।