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  • इमरान खान की छह डॉक्टरों ने की मेडिकल जांच, अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, फिर अदियाला जेल भेजे गए

    इमरान खान की छह डॉक्टरों ने की मेडिकल जांच, अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया, फिर अदियाला जेल भेजे गए

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को मेडिकल जांच के बाद एक बार फिर अदियाला जेल भेज दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया था। वहां छह विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने उनकी स्वास्थ्य संबंधी जांच की। जांच पूरी होने के बाद डॉक्टरों ने फिलहाल उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं बताई, जिसके बाद उन्हें वापस जेल भेज दिया गया।

    इमरान खान लंबे समय से अदियाला जेल में बंद हैं और उनकी स्वास्थ्य स्थिति को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उनकी मेडिकल जांच कराने का मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से जुड़ा हुआ था। अदालत ने उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए निर्धारित समय के भीतर मेडिकल जांच कराने और जरूरत पड़ने पर उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने को कहा था।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इमरान खान को शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। अदालत की ओर से मेडिकल जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने की बात भी कही गई थी। जांच और उपचार के दौरान डॉ. उजमा तथा इमरान खान के निजी चिकित्सक को भी मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी। उनके इलाज से संबंधित खर्च उनके परिवार द्वारा वहन किए जाने की बात सामने आई थी।

    इमरान खान के अस्पताल पहुंचने से पहले वहां सुरक्षा व्यवस्था को काफी बढ़ा दिया गया था। अस्पताल के आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी मौके पर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया। अस्पताल में इमरान खान की मौजूदगी को देखते हुए प्रवेश और आवाजाही पर विशेष निगरानी रखी गई।

    छह विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति का परीक्षण किया। मेडिकल जांच पूरी होने के बाद डॉक्टरों की राय के आधार पर उन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था के बीच उन्हें वापस अदियाला जेल ले जाया गया। फिलहाल उनकी स्वास्थ्य निगरानी जेल में ही किए जाने की बात सामने आई है।

    इमरान खान को निजी अस्पताल में जांच के लिए भेजे जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पाकिस्तान सरकार ने पहले असहमति जताई थी। केंद्र सरकार ने अदालत के आदेश पर पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा था कि इमरान खान की स्वास्थ्य जांच पहले भी कई बार हो चुकी है और उनके लिए मेडिकल बोर्ड गठित किए जा चुके हैं।

    सरकार का तर्क था कि किसी कैदी को अस्पताल भेजने का फैसला उसकी वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति और डॉक्टरों की सलाह के आधार पर होना चाहिए। सरकार ने निजी अस्पताल में जांच के आदेश पर सवाल उठाते हुए इसे लेकर अदालत में पुनर्विचार की कोशिश की थी।

    हालांकि, सरकार की पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय ने कुछ कमियां बताते हुए वापस कर दिया था। इसके बाद अदालत के निर्देश के तहत इमरान खान को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाया गया।

    मेडिकल जांच के बाद अस्पताल में भर्ती न किए जाने से फिलहाल इमरान खान को वापस जेल भेज दिया गया है। इस घटनाक्रम में अदालत के निर्देश, सरकार की आपत्ति और डॉक्टरों की मेडिकल राय तीनों महत्वपूर्ण पहलू रहे। इमरान खान की आगे की स्वास्थ्य निगरानी अदियाला जेल में ही किए जाने की संभावना है।

  • पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट से इमरान खान को बड़ी राहत, मेडिकल जांच के लिए दो दिन में अस्पताल शिफ्ट करने का आदेशपरिवार की हर सप्ताह मुलाकात होगी

    पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट से इमरान खान को बड़ी राहत, मेडिकल जांच के लिए दो दिन में अस्पताल शिफ्ट करने का आदेशपरिवार की हर सप्ताह मुलाकात होगी

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लंबे समय बाद सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। जेल में बंद इमरान खान के स्वास्थ्य से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उन्हें मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया है कि उन्हें दो दिन के भीतर इस्लामाबाद स्थित शिफा इंटरनेशनल अस्पताल में जांच के लिए ले जाया जाए।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इमरान खान के परिवार के सदस्यों से मुलाकात की व्यवस्था को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार के सदस्यों को उनसे प्रत्येक सप्ताह मुलाकात करने की सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस व्यवस्था को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी।

    मामले की सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ ने की। पीठ की अध्यक्षता जस्टिस शाहिद वाहिद ने की, जबकि जस्टिस नईम अख्तर अफगान और जस्टिस इश्तियाक इब्राहिम भी इसमें शामिल थे। इमरान खान के स्वास्थ्य और मेडिकल जांच से जुड़े मामले में दायर याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद अदालत ने ये निर्देश जारी किए।

    अदालत ने संबंधित अधिकारियों से इमरान खान की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए आवश्यक मेडिकल जांच कराने को कहा है। अस्पताल में उनकी जांच कराने का उद्देश्य उनके स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति का चिकित्सकीय आकलन करना है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ परिवार से नियमित संपर्क के अधिकार को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था करने का निर्देश दिया है।

    इससे पहले रावलपिंडी की अदियाला जेल के अधिकारियों ने अदालत को इमरान खान की आंखों की स्थिति के बारे में जानकारी दी थी। जेल अधिकारियों के मुताबिक उनकी आंखों की रोशनी अब लगभग सामान्य हो गई है और पहले की तुलना में उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल जांच के लिए अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया है।

    इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में बंद हैं। उन्हें पांच अगस्त 2023 को तोशाखाना मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में उन पर प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए विदेशी मेहमानों से मिले महंगे उपहारों का कथित तौर पर गलत तरीके से निपटान करने और उनसे संबंधित जानकारी छिपाने के आरोप लगे थे।

    इमरान खान की जेल में लंबी अवधि के दौरान उनके स्वास्थ्य और परिवार से मुलाकात का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है। उनके समर्थक और परिवार समय समय पर उनके स्वास्थ्य तथा जेल में उपलब्ध सुविधाओं को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से उनके मेडिकल परीक्षण और परिवार से नियमित मुलाकात को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनने की उम्मीद है।

    अदालत के निर्देश के बाद संबंधित जेल और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने अब इमरान खान को निर्धारित समयसीमा में अस्पताल ले जाने और उनके परिवार की साप्ताहिक मुलाकात सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। मेडिकल जांच के बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति से जुड़ी आगे की व्यवस्था चिकित्सकीय रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के आकलन पर निर्भर करेगी।

    सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इमरान खान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे उन्हें जेल से बाहर अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच कराने का अवसर मिलेगा। साथ ही परिवार से हर सप्ताह मुलाकात की व्यवस्था उनके परिजनों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखने में मदद करेगी। अब संबंधित अधिकारियों द्वारा अदालत के निर्देशों के पालन पर नजर रहेगी।

  • इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    इस्लामाबाद में लश्कर कमांडर की अचानक मौत से उठे सवाल, मस्जिद पहुंचने से पहले आखिर कहां खाया था खाना

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक वरिष्ठ कमांडर कारी सईद अब्दुल अजीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि वह नमाज पढ़ने के लिए कुबा मस्जिद पहुंचा था, जहां मस्जिद के गेट के पास अचानक गिर पड़ा। उसकी मौत के वास्तविक कारण की आधिकारिक तौर पर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

    कारी सईद अब्दुल अजीज को लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख सदस्यों में शामिल बताया जाता था। उसके जिम्मे जम्मू-कश्मीर में मुठभेड़ के दौरान मारे गए आतंकवादियों के परिवारों की सहायता से जुड़ा काम था। संगठन के भीतर उसकी भूमिका को देखते हुए उसकी अचानक हुई मौत को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, मस्जिद पहुंचने से पहले कारी सईद ने एक अनजान रेस्टोरेंट में खाना खाया था। इसके बाद वह नमाज के लिए कुबा मस्जिद गया। वहां पहुंचने के बाद वह अचानक गिर पड़ा और उसकी मौत हो गई। हालांकि, इस घटनाक्रम और उसकी मौत के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है।

    कारी सईद की मौत ऐसे समय हुई है जब पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कई सदस्यों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत को लेकर चर्चा बनी हुई है। संगठन से जुड़े रिजवान हनीफ ने हाल में एक वीडियो में दावा किया था कि पिछले तीन से चार वर्षों के दौरान लश्कर के करीब 30 से अधिक सदस्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मारे गए हैं।

    रिजवान के अनुसार, पेशावर, कराची, रावलपिंडी, रावलाकोट और मुजफ्फराबाद जैसे इलाकों में संगठन के कई सदस्यों की हत्या हुई। उसने इन घटनाओं के पीछे अज्ञात लोगों के होने की बात कही थी। लश्कर से जुड़े किसी सदस्य की ओर से संगठन के इतने लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार किए जाने को भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत विरोधी गतिविधियों से जुड़े कुछ आतंकवादियों की संदिग्ध मौत के मामलों में अज्ञात हमलावरों का जिक्र सामने आता रहा है। हालांकि, इन घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं और उनके उद्देश्यों क्या हैं, इसे लेकर सार्वजनिक स्तर पर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। ऐसे मामलों में ठोस निष्कर्ष के लिए जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी होती है।

    लश्कर-ए-तैयबा को आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। संगठन लंबे समय से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों और भारत विरोधी हिंसा से जुड़ा रहा है। ऐसे में उसके किसी वरिष्ठ कमांडर की पाकिस्तान में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े घटनाक्रम के लिहाज से भी ध्यान आकर्षित करती है।

    फिलहाल कारी सईद अब्दुल अजीज की मौत की सटीक वजह स्पष्ट नहीं है। उसके द्वारा मौत से पहले किए गए संपर्कों, रेस्टोरेंट में खाने और मस्जिद पहुंचने के बीच की घटनाओं की जानकारी सामने आने के बाद ही मामले की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। साथ ही, संगठन के अन्य सदस्यों की संदिग्ध मौतों से इस घटना का कोई संबंध है या नहीं, यह भी जांच का विषय बना हुआ है।

  • पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर कारी सईद की संदिग्ध मौत, हाफिज सईद से तीन दशक पुराना था संबंध

    पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर कारी सईद की संदिग्ध मौत, हाफिज सईद से तीन दशक पुराना था संबंध

    नई दिल्ली । पाकिस्तान में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कमांडर कारी सईद उर्फ अब्दुल अजीज की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद स्थित लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी एक मस्जिद में नमाज से पहले वह अचानक जमीन पर गिर गया। मौके पर मौजूद लोगों ने उसे संभालने और प्राथमिक उपचार देने की कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हुआ। बाद में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। उसकी मौत के कारणों को लेकर फिलहाल अलग-अलग तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं।

    कारी सईद को लश्कर-ए-तैयबा के पुराने और प्रभावशाली कमांडरों में गिना जाता था। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वह संगठन के साथ लंबे समय से जुड़ा हुआ था और आतंकी सरगना हाफिज सईद के करीबी लोगों में शामिल था। बताया जाता है कि कारी सईद वर्ष 1990 से हाफिज सईद के साथ जुड़ा हुआ था। शुरुआती वर्षों में उसने संगठन के लिए सक्रिय भूमिका निभाई और आतंकियों की भर्ती जैसे कामों में भी उसकी जिम्मेदारी रही।

    रिपोर्ट के अनुसार, कारी सईद वर्ष 2017 तक लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी गतिविधियों से जुड़े कामों में सक्रिय रहा। बाद के वर्षों में संगठन ने उसे प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंप दी थीं। वह दक्षिण पंजाब क्षेत्र में संगठन से जुड़े एक विभाग की जिम्मेदारी संभालता था। इस विभाग का काम भारत में मारे गए आतंकियों के परिवारों तक आर्थिक सहायता पहुंचाने और संगठन से जुड़े लोगों का रिकॉर्ड तैयार करने से संबंधित बताया जाता है।

    कारी सईद की मौत से जुड़ी घटनाओं का क्रम भी सामने आया है। बताया गया है कि वह इस्लामाबाद की मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए पहुंचा था। वहां उसने अपना बैग एक साथी को सौंपा और वुजू किया। इसके बाद जब वह नमाज के लिए मुख्य हॉल की ओर बढ़ा और चप्पल उतारने के लिए बैठा, तभी अचानक जमीन पर गिर पड़ा। आसपास मौजूद लश्कर के अन्य सदस्यों ने उसे उठाया और मदद की कोशिश की। उसकी सांस रुकने के बाद कथित तौर पर सीपीआर भी दिया गया, लेकिन उसे होश नहीं आया।

    इसके बाद कारी सईद को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसकी अचानक हुई मौत ने उसके संगठन से जुड़े लोगों के बीच भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, मौत की वास्तविक वजह को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में इस घटना को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच और मेडिकल जानकारी का इंतजार करना जरूरी है।

    बताया जाता है कि सक्रिय आतंकी भूमिका से हटने के बाद कारी सईद को लश्कर-ए-तैयबा के प्रशासनिक नेटवर्क में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई थीं। दक्षिण पंजाब के मुल्तान, बहावलपुर और डेरा गाजी खान जैसे क्षेत्रों से जुड़े आतंकियों के बारे में जानकारी जुटाना और उनके परिवारों तक आर्थिक सहायता पहुंचाना उसकी जिम्मेदारियों में शामिल था। उसकी मौत ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान में आतंकी संगठनों से जुड़े कई पुराने चेहरों की गतिविधियों और उनके नेटवर्क को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। कारी सईद की संदिग्ध मौत के कारण और उससे जुड़े अन्य पहलुओं पर आगे मिलने वाली जानकारी से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

  • भारत विरोधी साजिशों के बीच पाकिस्तान-यूक्रेन का सीक्रेट गठजोड़: 'ऑपरेशन सिंदूर' में मुंह की खाने के बाद ड्रोन तकनीक के लिए मुनीर सेना ने थामा कीव का हाथ

    भारत विरोधी साजिशों के बीच पाकिस्तान-यूक्रेन का सीक्रेट गठजोड़: 'ऑपरेशन सिंदूर' में मुंह की खाने के बाद ड्रोन तकनीक के लिए मुनीर सेना ने थामा कीव का हाथ

    नई दिल्ली । भारतीय सीमाओं पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत रची गई एक बहुत बड़ी सैन्य साजिश के पूरी तरह विफल होने के बाद पाकिस्तानी सेना और उसके प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की बौखलाहट साफ नजर आ रही है। भारत द्वारा रणनीतिक मोर्चे पर मात खाने और सिंधु जल समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाने के बाद पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अब सीधे युद्ध की धमकियां देने पर उतर आया है। इस करारी शिकस्त और भारी नाकामी के बावजूद पाकिस्तानी सेना के इस अप्रत्याशित आक्रामक तेवर और बढ़े हुए आत्मविश्वास के पीछे एक नया अंतरराष्ट्रीय कोण सामने आ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक हलकों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, पाकिस्तान ने अब रूस के साथ भीषण युद्ध में लगे यूक्रेन के साथ एक गुप्त सैन्य समझौता किया है।

    इस गुप्त सैन्य गठजोड़ के तहत यूक्रेन की सेना पाकिस्तानी मिलिट्री को आधुनिक ड्रोन ऑपरेशन्स और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की सीक्रेट ट्रेनिंग दे रही है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना ने भारत के खिलाफ एक अत्यंत आधुनिक और घातक साजिश रचने का प्रयास किया था, जिसके तहत भारतीय सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने के लिए एक साथ करीब 600 ड्रोन्स को लॉन्च करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, भारतीय सुरक्षा बलों की मुस्तैदी और अचूक रक्षा प्रणाली के सामने पाकिस्तानी सेना का यह ‘मेगा ड्रोन प्लान’ पूरी तरह मटियामेट हो गया।

    पाकिस्तानी सेना के अधिकांश लड़ाकू ड्रोन्स को भारतीय सेना ने सीमा पर ही मार गिराया, जबकि कई ड्रोन तकनीकी खामियों के कारण स्वयं ही क्रैश हो गए। इस रणनीतिक विफलता ने पाकिस्तानी जनरलों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि उनकी मौजूदा सैन्य तकनीक और परिचालन क्षमता भारत के आधुनिक रक्षा तंत्र के सामने बेहद कमजोर और अपर्याप्त है। इसी कमजोरी को छिपाने और आधुनिक युद्ध कौशल सीखने के लिए पाकिस्तान ने अपने पुराने रणनीतिक सहयोगी यूक्रेन का रुख किया है, जो पिछले कई वर्षों से रूस के खिलाफ अत्यधिक हाई-टेक और ड्रोन-आधारित युद्ध लड़ रहा है।

    लगातार जारी इस युद्ध ने यूक्रेन को ‘कामिकेजे ड्रोन्स’ (आत्मघाती ड्रोन) और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-मेजर्स के क्षेत्र में दुनिया का सबसे अनुभवी और युद्ध-प्रशिक्षित देश बना दिया है। अब यूक्रेन अपनी इस सैन्य महारत और युद्ध के अनुभवों को एक कमर्शियल एसेट के रूप में इस्तेमाल करते हुए आर्थिक लाभ के लिए पाकिस्तानी सेना को प्रशिक्षित कर रहा है। पाकिस्तान इस ड्रोन ट्रेनिंग को अपने लिए एक संजीवनी बूटी की तरह देख रहा है, जिसके बल पर वह भारत के हाथों मिली तकनीकी शिकस्त का बदला लेने का सपना देख रहा है। यही मुख्य कारण है कि जनरल मुनीर का कॉन्फिडेंस अचानक बढ़ा हुआ नजर आ रहा है।

    रणनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो सोवियत संघ से अलग होने के बाद यूक्रेन का भारत के प्रति रुख हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पूर्व के वर्षों में यूक्रेन ने कई महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों और संयुक्त राष्ट्र में भारत के परमाणु परीक्षणों तथा कश्मीर मुद्दे पर नई दिल्ली की नीतियों के खिलाफ रुख अपनाया था। हालांकि, बाद के वर्षों में यूक्रेन की आधिकारिक नीति में बड़ा कूटनीतिक बदलाव देखा गया और उसने जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच का एक द्विपक्षीय मामला मानते हुए इसे 1972 के शिमला समझौते के तहत सुलझाने की बात कही थी। परंतु, वर्तमान में पाकिस्तान के साथ उसका यह गुप्त सैन्य सहयोग भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाने वाला है।

  • पाकिस्तान में 500 किलो मानव प्लेसेंटा बरामद, भेड़ की नाल बताकर विदेश भेजने की थी तैयारी

    पाकिस्तान में 500 किलो मानव प्लेसेंटा बरामद, भेड़ की नाल बताकर विदेश भेजने की थी तैयारी


    नई दिल्ली । पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से मानव अंगों की कथित तस्करी से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पाकिस्तान की संघीय जांच एजेंसी एफआईए ने दावा किया है कि उसने छापेमारी के दौरान करीब 500 किलोग्राम मानव प्लेसेंटा यानी गर्भनाल बरामद की है। जांच एजेंसियों के अनुसार इस प्लेसेंटा को भेड़ की गर्भनाल बताकर विदेश भेजने की तैयारी की जा रही थी। मामले में तीन चीनी नागरिकों और दो पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ केस दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया गया है।

    प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपी अस्पतालों से मानव प्लेसेंटा एकत्र कर उसे पशु उत्पाद के रूप में घोषित करते थे ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी तस्करी की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि जब्त किए गए सभी नमूनों को वैज्ञानिक जांच के लिए अस्पताल भेजा गया है ताकि यह पुष्टि की जा सके कि बरामद सामग्री वास्तव में मानव प्लेसेंटा ही है।

    जांच एजेंसियों के मुताबिक यह पाकिस्तान में अपनी तरह का पहला बड़ा मामला माना जा रहा है। आरोप है कि इस नेटवर्क के सदस्य इस्लामाबाद और रावलपिंडी के अस्पतालों से प्रत्येक प्लेसेंटा बेहद कम कीमत पर खरीदते थे और बाद में उसे विदेश भेजकर भारी मुनाफा कमाने की योजना बनाते थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें पूछताछ के लिए रिमांड पर भेज दिया गया।

    क्या होता है प्लेसेंटा

    प्लेसेंटा गर्भावस्था के दौरान बनने वाला एक अस्थायी अंग होता है जो मां और गर्भ में पल रहे शिशु के बीच पोषण और ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। यह गर्भनाल के माध्यम से भ्रूण से जुड़ा रहता है और बच्चे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रसव के बाद इसकी आवश्यकता समाप्त हो जाती है और यह शरीर से बाहर निकल जाता है।

    किस काम आता है प्लेसेंटा

    दुनिया के कई देशों में प्लेसेंटा का उपयोग चिकित्सा अनुसंधान और कुछ विशेष उपचारों में किया जाता है। इससे प्राप्त ऊतकों का इस्तेमाल गंभीर जलन, गहरे घाव, अल्सर और आंखों से जुड़ी कुछ सर्जरी में किया जाता है। कुछ शोधों में प्लेसेंटा से प्राप्त जैविक तत्वों के संभावित चिकित्सीय उपयोगों पर भी अध्ययन जारी हैं। हालांकि इसके संग्रह, संरक्षण और उपयोग के लिए अधिकांश देशों में सख्त कानूनी और नैतिक नियम लागू हैं।

    कुछ देशों में पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर प्लेसेंटा का उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है, लेकिन ऐसे उपयोग वैज्ञानिक रूप से सार्वभौमिक रूप से स्वीकार नहीं किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मानव जैविक ऊतकों का किसी भी प्रकार का व्यापार या निर्यात केवल संबंधित कानूनों और चिकित्सा मानकों के तहत ही किया जाना चाहिए।

    फिलहाल पाकिस्तान की जांच एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि कथित तस्करी का अंतिम गंतव्य कौन सा देश था और इसमें किन लोगों या संस्थाओं की भूमिका हो सकती है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला मानव जैविक सामग्री की अवैध तस्करी के सबसे बड़े मामलों में शामिल हो सकता है।

  • अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका चर्चा में, शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर के साथ कूटनीतिक सफलता का किया दावा

    अमेरिका-ईरान समझौते में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका चर्चा में, शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर के साथ कूटनीतिक सफलता का किया दावा


    नई दिल्ली ।
    पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। इस समझौते को लेकर पाकिस्तान भी वैश्विक चर्चा का हिस्सा बन गया है, क्योंकि उसने इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा किया है। समझौते पर अमेरिका और ईरान के शीर्ष नेतृत्व द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी मध्यस्थ के रूप में दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और इसे क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

    समझौते के बाद पाकिस्तान सरकार की ओर से जारी संदेशों में इसे ऐतिहासिक कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि यह समझौता कई महीनों से जारी तनाव और टकराव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। उनके अनुसार, दोनों देशों द्वारा संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाना इस बात का संकेत है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान बातचीत के माध्यम से भी संभव है।

    समझौते के प्रमुख बिंदुओं में क्षेत्रीय समुद्री मार्गों की सामान्य स्थिति बहाल करने और तनाव कम करने से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बनी अनिश्चितता समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और पिछले कुछ समय से इसके संचालन को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बनी हुई थी। समझौते के बाद ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार गतिविधियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस अवसर पर अमेरिका और ईरान दोनों देशों के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि समझौते तक पहुंचना आसान प्रक्रिया नहीं थी। उन्होंने इसे धैर्य, संवाद और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि निरंतर कूटनीतिक प्रयासों और आपसी विश्वास निर्माण से सुनिश्चित की जा सकती है।

    हालांकि इस समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता तत्काल तनाव कम करने में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित पक्ष इसके प्रावधानों का किस प्रकार पालन करते हैं। पिछले वर्षों में अमेरिका और ईरान के संबंधों में उतार-चढ़ाव और अविश्वास का लंबा इतिहास रहा है, जिसके कारण समझौते की स्थिरता को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियां अत्यंत जटिल हैं, जहां कई क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी भी समझौते की सफलता केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय संतुलन पर भी पड़ता है। इसी कारण आने वाले दिनों में विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाओं और आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाएगी।

    फिलहाल इस समझौते ने संघर्ष और टकराव के माहौल में संवाद की संभावना को मजबूत किया है। पाकिस्तान इसे अपनी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात पर ध्यान केंद्रित किए हुए है कि समझौते के बाद क्षेत्र में वास्तविक स्थिरता और शांति स्थापित होती है या नहीं। आने वाले सप्ताह इस समझौते की प्रभावशीलता और इसके व्यापक परिणामों को समझने के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे।

  • पाकिस्तान में ‘टारगेट किलिंग’ से दहशत: भारत विरोधी आतंकियों का एक हफ्ते में खात्मा, खुफिया नेटवर्क पर उठे सवाल

    पाकिस्तान में ‘टारगेट किलिंग’ से दहशत: भारत विरोधी आतंकियों का एक हफ्ते में खात्मा, खुफिया नेटवर्क पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठनों से जुड़े कमांडरों और कार्यकर्ताओं की रहस्यमयी मौतों ने सुरक्षा तंत्र में हलचल मचा दी है। पिछले एक सप्ताह के भीतर हिजबुल, लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कम से कम तीन आतंकियों की हत्या या संदिग्ध परिस्थितियों में मौत सामने आई है, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।

    सबसे ताजा मामला हिजबुल आतंकी सज्जाद अहमद का है, जिसे इस्लामाबाद में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी। सज्जाद लंबे समय से भारत विरोधी गतिविधियों में सक्रिय माना जाता था और उसे हिजबुल का स्थानीय कमांडर बताया जा रहा था। उसकी मौत की पुष्टि उसके पड़ोसी द्वारा की गई, जबकि आधिकारिक स्तर पर अभी तक कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है।

    लगातार निशाने पर आतंकी नेटवर्क
    इसके कुछ दिन पहले जैश-ए-मोहम्मद के टॉप कमांडर सलमान अजहर की मौत की खबर आई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक उसकी मौत एक संदिग्ध सड़क हादसे में हुई, हालांकि कई सुरक्षा विशेषज्ञ इसे सामान्य घटना मानने से इनकार कर रहे हैं। सलमान को जैश प्रमुख मसूद अजहर का करीबी सहयोगी माना जाता था और संगठन की कई अहम गतिविधियों की जिम्मेदारी उसके पास थी।

    इसी तरह, लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े शेख यूसुफ अफरीदी की भी खैबर पख्तूनख्वा में अज्ञात बंदूकधारियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा मार्च में मसूद अजहर के भाई ताहिर अजहर की भी रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।

    20 से अधिक मौतों का पैटर्न
    सूत्रों के अनुसार 2019 के बाद से पाकिस्तान में इस तरह की टारगेट किलिंग की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। अब तक 20 से अधिक आतंकी या तो मारे जा चुके हैं या संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो चुकी है। खास बात यह है कि इन मामलों में पाकिस्तान सरकार या उसकी खुफिया एजेंसियां कोई स्पष्ट जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करतीं।

    सुरक्षा तंत्र पर सवाल
    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाएं पाकिस्तान के भीतर चल रहे गुप्त संघर्ष और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों की ओर इशारा करती हैं। आतंकियों के खिलाफ हो रही इन लगातार घटनाओं ने एक अनदेखे नेटवर्क की मौजूदगी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

    पाकिस्तान में लश्कर और जैश जैसे संगठनों से जुड़े हजारों आतंकी सक्रिय बताए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में इनकी अचानक हो रही मौतें क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी असर डाल सकती हैं।

    रहस्य बरकरार
    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन लगातार हो रही हत्याओं के पीछे कौन है और क्या यह किसी संगठित रणनीति का हिस्सा है या आंतरिक संघर्ष का परिणाम। पाकिस्तान सरकार की चुप्पी ने इस रहस्य को और गहरा कर दिया है।

  • पाकिस्तान पर भरोसा नहीं, ईरान ने इस्लामाबाद भेजे कई नकली विमान?

    पाकिस्तान पर भरोसा नहीं, ईरान ने इस्लामाबाद भेजे कई नकली विमान?


    इस्‍लामाबाद। पाकिस्तान आतंकवाद का प्रयाय बन चुका है। यही कारण है कि ईरान जैसे मुस्लिम देश को भी भरोसा नहीं है। पाकिस्तान भले ही अमेरिका के साथ ईरान की शांति वार्ता का केंद्र होने का दावा कर रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही सामने आ रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान को पाकिस्तान में हवाई हमले का डर सता रहा था। इसलिए ईरान ने अपने वार्ताकारों की सुरक्षा के लिए इस्लामाबाद के लिए कई नकली विमान भेजे, जिनमें से केवल एक में ही प्रतिनिधिमंडल सवार था।
    आपको बता दें कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ कर रहे हैं जो हाल ही में ईरानी सरकार में एक प्रमुख व्यक्ति बनकर उभरे हैं। इस प्रतिनिधिमंडल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी शामिल हैं।

    इस्लामाबाद जाते समय गालिबफ ने अपने विमान की अगली कतारों को खाली रखा। इन खाली सीटों पर मीनाब स्कूल स्ट्राइक (Minab school strike) में मारे गए बच्चों और पीड़ितों की तस्वीरें और उनका सामान (स्कूल बैग, जूते, कपड़े) रखे गए थे।

    यह हमला हाल ही में ईरान के मीनाब क्षेत्र में हुआ था, जिसे तेहरान अमेरिकी-इजरायली हमला बताता है। इसमें कई स्कूली बच्चों की जान गई थी। इस विजुअल स्टेटमेंट के जरिए ईरान यह संदेश देना चाहता है कि वह बातचीत की मेज पर केवल एक देश के रूप में नहीं, बल्कि अपने उन निर्दोष नागरिकों के दर्द के साथ जा रहा है जिन्होंने इस युद्ध की कीमत चुकाई है।

    वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान जा रहा है, जिसमें ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर भी शामिल हैं। अमेरिकी वार्ताकारों के साथ अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, विदेश विभाग और पेंटागन के विशेषज्ञ भी हैं।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आठ अप्रैल की रात को घोषणा की थी कि ईरान के साथ दो सप्ताह के युद्धविराम पर समझौता हो गया है। बाद में खबर आई कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए वार्ता शनिवार को पाकिस्तान में होगी।
    लेबनान पर जारी है तकरार

    यह प्रतिनिधिमंडल ऐसे समय में इस्लामाबाद पहुंचा है जब लेबनान में इजराइल के हमलों के कारण ईरानी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा को लेकर अनिश्चितता जताई जा रही थी और सोशल मीडिया पर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे।

    कुछ खबरों में ईरानी मीडिया के हवाले से कहा गया था कि प्रतिनिधिमंडल तभी वार्ता में हिस्सा लेगा, जब युद्धविराम समझौते में तय शर्तें पूरी होंगी।

    ईरान की अर्ध-सरकारी ‘तसनीम’ समाचार एजेंसी ने खबर दी थी कि ”पहले रखी गई शर्तें” पूरी होने तक बातचीत शुरू नहीं होगी। यह बात इस्लामाबाद रवाना होने से पहले गालिबफ द्वारा ‘एक्स’ पर दिए गए संदेश से भी मेल खाती है।

    गालिबफ ने ‘एक्स’ पर कहा था, ”दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से तय किए गए दो कदम अभी लागू नहीं हुए हैं- लेबनान में युद्धविराम और वार्ता शुरू होने से पहले ईरान की संपत्तियों पर लगी रोक हटाना।”

  • US-ईरान आज युद्धविराम को लेकर इस्लाबाद में होंगे आमने-सामने, ट्रंप बोले- अपने आप खुल जाएगा होर्मुज

    US-ईरान आज युद्धविराम को लेकर इस्लाबाद में होंगे आमने-सामने, ट्रंप बोले- अपने आप खुल जाएगा होर्मुज


    वाशिंगटन।
    दुनिया इस वक्त सांसें थामकर पाकिस्तान (Pakistan) की राजधानी इस्लामाबाद (Islamabad.) की ओर देख रही है, जहां अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच युद्धविराम को एक स्थायी शांति समझौते (Ceasefire Permanent Peace Agreement) में बदलने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। हालांकि, बातचीत की मेज सजने से पहले ही बयानों की तल्खी और जमीन पर जारी हिंसा ने इस मिशन को ‘करो या मरो’ की स्थिति में ला खड़ा किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने जहां विश्वास जताया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बहुत जल्द अपने आप खुल जाएगा, वहीं ईरान ने अपनी पूर्व शर्तों पर अड़कर कूटनीतिक पेच फंसा दिया है।

    वाशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जब पूछा गया कि उनके लिए एक अच्छा समझौता क्या होगा तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में जवाब दिया, “कोई परमाणु हथियार नहीं। बस, 99% समझौता यही है।”

    ट्रंप ने वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे बड़ी वजह बने स्ट्रेट हॉर्मुज पर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा, “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अपने आप खुल जाएगा। हम इसे बहुत जल्द खोल देंगे।” ट्रंप का यह बयान उन वैश्विक बाजारों के लिए राहत की उम्मीद लेकर आया है जो तेल की आपूर्ति रुकने से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं।


    इस्लामाबाद में आमने-सामने

    शुक्रवार को ईरानी संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद पहुंच गया। दूसरी ओर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी अमेरिका का प्रतिनिधित्व करने के लिए पाकिस्तान के रास्ते में हैं।


    ईरान की शर्तें, अमेरिका की चेतावनी

    ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वार्ता तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका लेबनान में इजराइली हमलों को रुकवाएगा और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को बहाल करेगा। जेडी वेंस ने इस्लामाबाद पहुंचने से पहले ही तेहरान को चेतावनी दी है कि वह वाशिंगटन के साथ खेलने की कोशिश न करे।

    पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कहा, “अस्थायी युद्धविराम तो हो गया, लेकिन अब असली चुनौती इसे स्थायी शांति में बदलने की है। यह बातचीत का वह चरण है जिसे ‘मेक ऑर ब्रेक’ कहा जाता है।”


    शांति वार्ता के बीच 357 मौतें

    एक तरफ इस्लामाबाद में शांति की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ लेबनान में इजराइली हवाई हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। शुक्रवार को दक्षिणी शहर नबातीह में एक हमले में लेबनान के 13 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, बुधवार से जारी बड़े हमलों में मरने वालों की संख्या 357 तक पहुंच गई है, जबकि 1,223 लोग घायल हुए हैं। हिंसा का यह दौर ईरान के लिए वार्ता की मेज पर सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है।


    क्या ईरान वाकई खत्म हो चुका है?

    ट्रंप प्रशासन लगातार दावा कर रहा है कि हफ्तों तक चले युद्ध में ईरानी सैन्य क्षमता पूरी तरह तबाह हो चुकी है। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष जनरल डैन केन के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के 13,000 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है, जिसमें उसकी वायु सेना और हथियार फैक्ट्रियां शामिल हैं। हालांकि, स्वतंत्र डेटा और जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

    अमेरिकी ग्रुप ACLED के आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध के बाद से बुधवार तक ईरानी हमलों की रफ्तार में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही ईरान को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन वह अब भी जवाबी हमला करने या अपना बचाव करने की क्षमता रखता है।