Tag: ISRO

  • ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, NavIC से सेना की नेविगेशन क्षमता होगी मजबूत, 1500 किलोमीटर तक बढ़ेगी पहुंच

    ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट, NavIC से सेना की नेविगेशन क्षमता होगी मजबूत, 1500 किलोमीटर तक बढ़ेगी पहुंच


    नई दिल्ली ।भारत ने अंतरिक्ष और स्वदेशी नेविगेशन तकनीक के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर की देर रात GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अगली पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 का सफल प्रक्षेपण किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से यह मिशन पूरा किया गया। इस प्रक्षेपण से भारत के स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूती मिलने की उम्मीद है। इसका लाभ नागरिक सेवाओं के साथ रक्षा और रणनीतिक गतिविधियों में भी मिल सकता है।

    NVS-03 को भारत की भौगोलिक सीमा से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक फैले NavIC के कवरेज क्षेत्र में नेविगेशन सेवाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस प्रणाली के जरिए सशस्त्र बलों को रणनीतिक अभियानों के दौरान स्थान और दिशा से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है। इसके अलावा सड़क, हवाई और समुद्री परिवहन सहित कई नागरिक क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

    ISRO के अनुसार, GSLV-F18 रॉकेट की यह 20वीं उड़ान थी। प्रक्षेपण के लगभग 18 मिनट 40 सेकंड बाद रॉकेट ने 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित कर दिया। हालांकि, सैटेलाइट को पूरी तरह सक्रिय होने से पहले अपनी निर्धारित परिचालन कक्षा तक पहुंचने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सफल प्रक्षेपण पर ISRO के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के समर्पण और उनकी तकनीकी क्षमता की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयास देश को लगातार गौरवान्वित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के मिशन महत्वपूर्ण तकनीकों में भारत की आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाते हैं।

    NVS-03 दूसरी पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट समूह का तीसरा उपग्रह है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक शामिल है। सैटेलाइट में भारत में विकसित एटॉमिक क्लॉक के साथ आयातित एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई हैं। नेविगेशन प्रणाली में सटीक समय की गणना बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर उपग्रहों से मिलने वाले संकेतों के जरिए किसी स्थान की स्थिति निर्धारित की जाती है।

    इस सैटेलाइट में L1 फ्रीक्वेंसी का नया सिग्नल भी शामिल किया गया है। इससे पहले NavIC में L5 और S-बैंड सिग्नल का इस्तेमाल किया जाता था। L1 सिग्नल जुड़ने से इस प्रणाली की अनुकूलता अधिक उपकरणों और नेविगेशन रिसीवर के साथ बढ़ेगी। इससे आम नागरिकों के लिए मोबाइल और अन्य नेविगेशन सेवाओं में भी इसका उपयोग आसान हो सकता है।

    NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। इसे ISRO ने भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित किया है। अमेरिका के GPS, रूस के GLONASS, यूरोप के Galileo और चीन के BeiDou की तरह यह भी लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाएं उपलब्ध कराता है। इसकी दो प्रमुख सेवाएं हैं। Standard Positioning Service आम नागरिकों और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए है, जबकि Restricted Service अधिकृत रणनीतिक और रक्षा उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड सेवा प्रदान करती है।

    भारत को अपने स्वतंत्र नेविगेशन सिस्टम की जरूरत 1999 के कारगिल युद्ध के अनुभव के बाद विशेष रूप से महसूस हुई थी। उस समय दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सटीक लोकेशन और सैन्य गतिविधियों की जानकारी के लिए आधुनिक नेविगेशन तकनीक की आवश्यकता सामने आई। विदेशी GPS सेवाओं पर निर्भरता ने भी स्वतंत्र प्रणाली विकसित करने के रणनीतिक महत्व को उजागर किया। इसी दिशा में Indian Regional Navigation Satellite System परियोजना शुरू हुई, जिसे बाद में NavIC नाम दिया गया।

    NVS-03 का प्रक्षेपण जनवरी 2025 में NVS-02 मिशन के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद भी महत्वपूर्ण है। NVS-02 को ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया था, लेकिन तकनीकी समस्या के कारण वह निर्धारित परिचालन कक्षा तक नहीं पहुंच सका। जांच में ऑर्बिट बढ़ाने वाले इंजन की ऑक्सीडाइजर लाइन के पायरो वाल्व तक जरूरी ड्राइव सिग्नल नहीं पहुंचने की बात सामने आई थी। इसके बाद भविष्य के मिशनों में सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ाने की सिफारिशें की गई थीं।

    NVS-03 अब अपनी निर्धारित जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचने के लिए ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से ऑर्बिट मैन्यूवर करेगा। इसके बाद उपकरणों और नेविगेशन संकेतों की जांच होगी। इन प्रक्रियाओं के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद ही इसकी नियमित सेवाएं शुरू हो सकेंगी। दूसरी पीढ़ी के इस कार्यक्रम में NVS-01 और NVS-02 के बाद NVS-03 को शामिल किया गया है। आगे NVS-04 और NVS-05 के प्रक्षेपण की भी योजना है। इन उपग्रहों के जरिए भारत NavIC की क्षमता, विश्वसनीयता और सेवाओं की निरंतरता को और मजबूत करना चाहता है।

  • भारत की अंतरिक्ष में एक और लंबी छलांग… ISRO ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया NVS-03 उपग्रह

    भारत की अंतरिक्ष में एक और लंबी छलांग… ISRO ने सफलतापूर्वक लॉन्च किया NVS-03 उपग्रह


    श्रीहरिकोटा।
    अंतरिक्ष (Space) के क्षेत्र में भारत (India) ने एक और लंबी छलांग (Another Giant Leap) लगाई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian Space Research Organisation – ISRO) ने अपने महत्वाकांक्षी नेविगेशन उपग्रह एनवीएस-03 को सफलतापूर्वक भूस्थिर स्थानांतरण कक्षा (जीटीओ) में पहुंचा दिया है। यह भारत की अंतरिक्ष और तकनीकी ताकत को दिखाता है।

    आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे प्रक्षेपण स्थल (लॉन्च पैड) से जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट ने शुक्रवार रात 11:51 बजे उड़ान भरी। यह अपने साथ 2,232 किलोग्राम वजनी एनवीएस-03 उपग्रह लेकर गया।

    मिशन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए इसरो ने 24 घंटे की उलटी गिनती शुरू की थी। यह उलटी गिनती गुरुवार रात 11:51 बजे शुरू हुई थी। जीएसएलवी-एफ18 रॉकेट 50 मीटर ऊंचा है। इसका वजन 420 टन है। यह तीन चरणों वाला रॉकेट है।

    इसरो के अनुसार, उपग्रह की तय कक्षा में पृथ्वी से सबसे कम दूरी (निकटतम) 170 किलोमीटर होगी। वहीं, पृथ्वी से इसकी सबसे अधिक दूरी (अधिकतम) 37,023 किलोमीटर होगी। इसके बाद उपग्रह अपनी कक्षा को आगे बढ़ाएगा। यह 32.5 डिग्री पूर्व में अपने अंतिम निर्धारित स्थान पर पहुंचेगा।

    जीटीओ एक अंडाकार कक्षा होती है। इसका इस्तेमाल उपग्रहों को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में पहुंचाने के लिए किया जाता है। यह पृथ्वी की निचली कक्षा से भूस्थिर कक्षा तक पहुंचने का बीच का रास्ता है।


    नेविगेशन को बनाएगा और सटीक

    एनवीएस-03 अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रहों की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। यह भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (एनएवीआईसी) का अहम हिस्सा है। इसे भारत का अपना जीपीएस भी कहा जा सकता है। इसका इस्तेमाल कई जरूरी सेवाओं में होता है। इनमें लोकेशन पता करना, रास्ता खोजना और सही समय की जानकारी देना शामिल है।

    यह उपग्रह भारत और उसकी सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर दूर तक के इलाके में सटीक जानकारी देने में मदद करेगा। इससे लोकेशन, रास्ते और समय का पता लगाने की सुविधा मिलेगी।


    एनवीएस-03 की क्या है खासियत?

    इस उपग्रह की सबसे बड़ी खासियत इसमें लगी स्वदेशी परमाणु घड़ी है। इसे भारत में ही बनाया गया है। यह बेहद सटीक समय बताने का काम करती है। इसके अलावा, इसमें नया एल1 सिग्नल भी जोड़ा गया है। इससे आम लोगों के स्मार्टफोन और गाड़ियों में नेविगेशन सेवाएं और बेहतर होंगी। इससे रास्ता खोजने में ज्यादा सटीक जानकारी मिल सकेगी।


    ‘एक देश, एक समय’ पहल को मिलेगी गति

    यह मिशन केंद्र सरकार की ‘एक देश, एक समय’ पहल को आगे बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम है। सरकार ने 29 अगस्त को विधिक मापविज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 अधिसूचित किए थे। ये नियम राजपत्र में प्रकाशित होने के 180 दिन बाद लागू होंगे।

    विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, सटीक और एक समान समय बहुत जरूरी है। यह दूरसंचार, डिजिटल वित्तीय लेनदेन, बिजली ग्रिड, परिवहन और डेटा केंद्रों के सुरक्षित संचालन का आधार है। एनवीएस-03 का सफल प्रक्षेपण देश को समय की जानकारी के लिए विदेशी स्रोतों पर निर्भरता से पूरी तरह मुक्त करने की दिशा में अहम कदम है।


    पिछली विफलता से क्या सीखा?

    इसरो ने इस मिशन में एक बड़ा तकनीकी बदलाव किया है। जनवरी 2025 में एनवीएस-02 मिशन के दौरान एक कनेक्टर में खराबी आ गई थी। इस बार ऐसी समस्या से बचने के लिए उपग्रह में बदलाव किए गए हैं। इसके अलावा, एक उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर सुरक्षा से जुड़े सुधार भी लागू किए गए हैं।

  • गगनयान मिशन को मिली नई ताकत, ISRO ने परखी अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी की तकनीक, 2026 के मानवरहित मिशन पर नजरें

    गगनयान मिशन को मिली नई ताकत, ISRO ने परखी अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी की तकनीक, 2026 के मानवरहित मिशन पर नजरें


    नई दिल्ली। भारत के अंतरिक्ष अभियान के लिए गगनयान मिशन एक ऐतिहासिक उपलब्धि साबित हो सकता है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO इस मिशन को सफल बनाने के लिए लगातार महत्वपूर्ण परीक्षण कर रहा है। इसी कड़ी में इसरो ने क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल को अलग करने से जुड़े अहम परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। यह परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य में जब भारतीय अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे तो उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने में इस तकनीक की बड़ी भूमिका होगी। इस सफलता से गगनयान के पहले मानवरहित मिशन G1 की तैयारियों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
    गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने और मिशन पूरा होने के बाद सुरक्षित वापस लाने की योजना है। इस अभियान में अंतरिक्ष यान के अलग-अलग हिस्सों का सही तरीके से काम करना बेहद जरूरी है। गगनयान के ऑर्बिटल मॉड्यूल में मुख्य रूप से दो हिस्से होते हैं। पहला क्रू मॉड्यूल है जिसमें अंतरिक्ष यात्री यात्रा करेंगे। दूसरा सर्विस मॉड्यूल है जो मिशन के दौरान जरूरी सेवाएं और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराता है। अंतरिक्ष यान के उड़ान भरने के समय दोनों मॉड्यूल एक साथ जुड़े रहते हैं और अपने निर्धारित कार्य करते हैं।
    मिशन का सबसे महत्वपूर्ण चरण तब आता है जब क्रू मॉड्यूल को पृथ्वी पर वापस लाना होता है। इस दौरान उसे सर्विस मॉड्यूल से अलग करना पड़ता है। दोनों मॉड्यूल के बीच बिजली और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए कई कनेक्शन होते हैं जिन्हें तय प्रक्रिया के तहत अलग किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई तकनीकी उपकरण एक साथ काम करते हैं। यदि किसी कनेक्शन या अलग करने वाले सिस्टम में गड़बड़ी होती है तो अंतरिक्ष यान की वापसी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इसरो पहले ही इन प्रणालियों की क्षमता और विश्वसनीयता को परख रहा है ताकि वास्तविक मिशन के दौरान किसी भी संभावित जोखिम को कम किया जा सके।
    यह परीक्षण केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में किया गया। यहां क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल को जोड़कर ऐसी व्यवस्था तैयार की गई जिससे वास्तविक उड़ान के दौरान होने वाली प्रक्रिया का आकलन किया जा सके। परीक्षण में यह जांचा गया कि दोनों मॉड्यूल को जोड़ने वाले कनेक्शन निर्धारित समय पर अलग हो सकते हैं या नहीं। इसके साथ ही अलगाव के दौरान उत्पन्न होने वाले झटकों और उनके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए विभिन्न तकनीकी प्रणालियों की मजबूती भी परखी गई।
    इसरो ने एवियोनिक्स इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम हीट शील्ड और तैनात होने वाली अंबिलिकल शील्ड जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों की कार्यक्षमता की भी जांच की। ये सिस्टम अंतरिक्ष यान को सही दिशा में बनाए रखने और पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय जरूरी सुरक्षा प्रदान करने में मदद करते हैं। वापसी के दौरान क्रू मॉड्यूल को अत्यधिक तापमान का सामना करना पड़ता है इसलिए उसकी सुरक्षा व्यवस्था का सही तरीके से काम करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा तापमान और नमी नियंत्रित करने वाले उपकरणों की भी जांच की गई।
    अब इसरो की नजर गगनयान के पहले मानवरहित मिशन G1 पर है। वर्ष 2026 में इस मिशन को भेजने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें अंतरिक्ष यात्रियों के बिना यान को अंतरिक्ष में भेजकर विभिन्न प्रणालियों और सुरक्षा प्रक्रियाओं का परीक्षण किया जाएगा। इस उड़ान से मिलने वाले परिणाम आगे के मिशनों की तैयारियों में मदद करेंगे। गगनयान की सफलता भारत को मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकती है। साथ ही यह देश की वैज्ञानिक क्षमता और स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

  • रॉकेट से सैटेलाइट तक देश में बनेंगे अहम पुर्जे, इसरो ने जारी किए टेंडर; फ्लाइट सोलर पैनल भी होंगे स्वदेशी

    रॉकेट से सैटेलाइट तक देश में बनेंगे अहम पुर्जे, इसरो ने जारी किए टेंडर; फ्लाइट सोलर पैनल भी होंगे स्वदेशी

    नई दिल्ली । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन रॉकेट और सैटेलाइट में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पुर्जे देश में बनाएगा। इसरो के अलग-अलग केंद्रों ने इन तकनीकी कामों के लिए टेंडर जारी किए हैं। इनमें सबसे अहम रॉड एंड बेयरिंग का स्वदेशी विकास है।

    विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र ने इसके लिए अलग से टेंडर जारी किया है। खास बात यह है कि इसमें विदेशी मूल के उपकरण निर्माताओं और उनके एजेंटों को बोली लगाने की अनुमति नहीं है। इससे इस तकनीकी क्षेत्र में देश के भीतर विकास और निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।

    इसरो के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर ने वाइब्रेशन टेस्ट फिक्स्चर के लिए टेंडर जारी किया है। इसका इस्तेमाल कंपन की स्थिति में अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपकरणों और संरचनाओं को जांचने के लिए किया जाता है। अंतरिक्ष अभियानों के दौरान उपकरणों को विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए उनकी जांच के लिए ऐसे परीक्षण महत्वपूर्ण होते हैं।

    सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र ने एचपीएस3 एक्सियल थ्रस्ट मेजरमेंट सिस्टम के लिए टेंडर निकाला है। यह रॉकेट से जुड़े परीक्षणों में महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा अंतरिक्ष संचार केंद्र ने एक्स-बैंड सिमुलेशन अप-कन्वर्टर और एक्साइटर के लिए भी टेंडर जारी किया है। ये उपकरण अंतरिक्ष संचार से जुड़े तकनीकी कार्यों में उपयोग किए जाते हैं।

    फ्लाइट सोलर पैनल का फैब्रिकेशन और टेस्टिंग भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। यूआरएससी ने फ्लाइट सोलर पैनल के निर्माण और परीक्षण के लिए टेंडर मांगा है। इसमें ऐसे सौर पैनलों के निर्माण और उनकी जांच से जुड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाएगा, जिनका इस्तेमाल वास्तविक अंतरिक्ष मिशन में किया जाना है।

    सैटेलाइटों में सौर पैनल सूर्य की रोशनी से बिजली बनाने का मुख्य साधन होते हैं। अंतरिक्ष मिशनों में इनका उपयोग उपग्रहों के लिए आवश्यक विद्युत ऊर्जा उपलब्ध कराने में किया जाता है। इसलिए इनके निर्माण और परीक्षण की प्रक्रिया अंतरिक्ष अभियानों की तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है।

    इसरो की ओर से अलग-अलग तकनीकी जरूरतों के लिए जारी किए गए ये टेंडर रॉकेट और सैटेलाइट से जुड़े उपकरणों के देश में विकास और निर्माण की दिशा में उठाए गए कदम हैं। रॉड एंड बेयरिंग से लेकर परीक्षण उपकरणों और संचार प्रणालियों तक कई क्षेत्रों में घरेलू क्षमता विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

    फ्लाइट सोलर पैनल के निर्माण और परीक्षण को भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है। इससे अंतरिक्ष मिशनों में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण उपकरणों और प्रणालियों के लिए देश के भीतर निर्माण तथा परीक्षण क्षमता को आगे बढ़ाने का प्रयास दिखाई देता है।

  • देश के तटीय क्षेत्रों में आने वाले हैं 3 शक्तिशाली चक्रवाती तूफान…. ISRO ने जारी की चेतावनी

    देश के तटीय क्षेत्रों में आने वाले हैं 3 शक्तिशाली चक्रवाती तूफान…. ISRO ने जारी की चेतावनी


    नई दिल्ली।
    देश के तटीय इलाकों के लिए आने वाले तीन महीने बेहद संवेदनशील होंगे। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian Space Research Organisation – ISRO) ने अपने उपग्रहों और मौसम निगरानी प्रणालियों से मिले डाटा के आधार पर चेतावनी जारी की है कि अक्तूबर से दिसंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) और अरब सागर (Arabian Sea) में तीन शक्तिशाली चक्रवाती तूफान (Powerful Cyclonic Storm) बन सकते हैं। इसरो ने आगाह किया है कि चक्रवात के साथ तेज हवाएं, भारी बारिश और समुद्र में ऊंची लहरें आ सकती हैं।

    इसरो के अनुसार, चक्रवातों की ताकत का सूचकांक 44 साल के औसत से 83 फीसदी ज्यादा रह सकता है। मतलब ये पहले के मुकाबले ज्यादा तबाही मचा सकते हैं। रिपोर्ट में अक्तूबर-दिसंबर के लिए 1.30 करोड़ का पीडीआई (पावर डिसिपेशन इंडेक्स) बताया गया है। 1982-2025 के दौरान औसत पीडीआई 71 लाख रहा है। पीडीआई एक ऐसा वैज्ञानिक पैमाना है जो किसी चक्रवात की विनाशकारी क्षमता, उसकी अवधि और संख्या को मिलाकर उसकी कुल ऊर्जा का आकलन करता है। पीडीआई की इकाई नॉट्स क्यूब होती है।


    44 साल के बाद सबसे ज्यादा तीव्रता

    रिपोर्ट में 1982 से 2025 तक उत्तर हिंद महासागर में मानसून सीजन के बाद आए चक्रवातों की संख्या और उनके पीडीआई का अध्ययन किया गया है। इस अवधि में पीडीआई का औसत 7.15×10 नॉट्स क्यूब रहा। 2026 के अक्तूबर-दिसंबर में इसके 13.06×10 नॉट्स क्यूब तक पहुंचने का अनुमान है।

    आसान भाषा में कहें तो इस बार सिर्फ यह नहीं देखा जा रहा कि कितने चक्रवात बन सकते हैं। बल्कि यह अनुमान लगाया गया है कि वे कितनी तेज हवा के साथ बनेंगे और कितने समय तक टिक सकते हैं।


    केंद्र सरकार ने निगरानी शुरू की

    इसरो की चेतावनी के बाद केंद्र सरकार, मौसम विभाग और तटीय राज्यों के आपदा प्रबंधन विभागों ने स्थिति पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी है। तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए मौसम विभाग की चेतावनी जारी की जाएगी। मछुआरों और समुद्र में काम करने वाले लोगों के लिए भी ऐसे मौसमी अनुमान महत्वपूर्ण हैं।

  • ईओएस-05 की सफलता के बाद इसरो ने गगनयान की तैयारी तेज की, इसी साल पहले मानवरहित मिशन के प्रक्षेपण की योजना

    ईओएस-05 की सफलता के बाद इसरो ने गगनयान की तैयारी तेज की, इसी साल पहले मानवरहित मिशन के प्रक्षेपण की योजना


    नई दिल्ली ।
    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने ईओएस-05 उपग्रह के सफल प्रक्षेपण के बाद अपने अगले बड़े लक्ष्य की दिशा में तैयारियां तेज कर दी हैं। इसरो प्रमुख वी नारायणन ने कहा है कि इसी कैलेंडर वर्ष में देश के पहले मानवरहित गगनयान मिशन के प्रक्षेपण के लिए व्यवस्थित तरीके से काम किया जा रहा है। इस मिशन को भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है।

    ईओएस-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट तक पहुंचाने में मिली सफलता इसरो के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट ने प्रक्षेपण के करीब 18 मिनट बाद उपग्रह को सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया। यह कक्षा निर्धारित जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से लगभग 5,000 किलोमीटर नीचे है। यहां से उपग्रह अपने निर्धारित अंतिम कक्षीय स्थान तक पहुंचने की प्रक्रिया पूरी करेगा।

    इस मिशन में रॉकेट ने निर्धारित लक्ष्य से अधिक ऊंचाई हासिल की। उसे जीटीओ में 28,934 किलोमीटर के उच्चतम बिंदु तक पहुंचना था, लेकिन वह 31,026 किलोमीटर तक पहुंचा। इस तरह रॉकेट ने तय ऊंचाई से 2,092 किलोमीटर अधिक दूरी तय की।

    ईओएस-05 का वजन 2,367 किलोग्राम है और यह जीएसएलवी रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया अब तक का सबसे भारी पेलोड बताया गया है। इस उपलब्धि से इसरो की भारी उपग्रहों को निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करने की क्षमता को मजबूती मिली है।

    इसरो प्रमुख वी नारायणन ने बताया कि पहले मानवरहित गगनयान मिशन की तैयारी में संगठन के साथ उद्योग जगत और अन्य संस्थाएं भी काम कर रही हैं। उन्होंने इस वित्त वर्ष में नौवहन उपग्रह एनवीएस-03 सहित छह और प्रक्षेपणों का लक्ष्य भी बताया। उन्होंने ईओएस-05 को जासूसी उपग्रह बताए जाने की धारणा को खारिज किया।

    गगनयान की तैयारी ऐसे समय आगे बढ़ रही है जब इसरो को पिछले कुछ वर्षों में कुछ मिशनों में तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। जीएसएलवी-एफ10 और ईओएस-03 मिशन अगस्त 2021 में क्रायोजेनिक चरण में तकनीकी समस्या के कारण सफल नहीं हो सका था। इसके बाद जनवरी 2026 में पीएसएलवी-सी62 और ईओएस-एन1 मिशन भी तीसरे चरण के अंत में नियंत्रण प्रणाली में आई खराबी के कारण निर्धारित उड़ान पथ से भटक गया था।

    इन घटनाओं के बाद इसरो ने जांच और तकनीकी समीक्षा के आधार पर आवश्यक बदलाव किए। ईओएस-05 का सफल प्रक्षेपण इसी सुधार प्रक्रिया के बाद हासिल हुई महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। इससे आगामी अभियानों के लिए संगठन का आत्मविश्वास भी मजबूत हुआ है।

    गगनयान मिशन के तहत भारत का उद्देश्य मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता विकसित करना है। उससे पहले मानवरहित मिशनों के माध्यम से रॉकेट, अंतरिक्ष यान, जीवन समर्थन प्रणाली और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों का परीक्षण किया जाना है। इसलिए पहला मानवरहित मिशन आगे के मानवयुक्त मिशन की तैयारी में अहम भूमिका निभाएगा।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ईओएस-05 के सफल प्रक्षेपण को भारत की अंतरिक्ष क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उन्होंने इस सफलता को नवाचार, तकनीकी दक्षता और देश के बढ़ते अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ा।

    ईओएस-05 मिशन की सफलता के बाद इसरो के सामने अब लगातार सफल प्रक्षेपण बनाए रखने और गगनयान की समयसीमा के अनुसार तैयारियां पूरी करने की चुनौती है। यदि मानवरहित गगनयान मिशन इस वर्ष सफलतापूर्वक पूरा होता है, तो यह भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम को अगले महत्वपूर्ण चरण की ओर ले जाएगा।

  • सात महीने से ISRO की लॉन्चिंग पर ब्रेक, सितंबर में GISAT-1A से फिर शुरू होगा अभियान, नवंबर में NVS-03 की तैयारी

    सात महीने से ISRO की लॉन्चिंग पर ब्रेक, सितंबर में GISAT-1A से फिर शुरू होगा अभियान, नवंबर में NVS-03 की तैयारी


    नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) करीब सात महीने के अंतराल के बाद एक बार फिर अपने लॉन्च अभियान को रफ्तार देने की तैयारी में है। तकनीकी दिक्कतों के चलते लगातार मिशनों में सामने आई समस्याओं के बाद लॉन्चिंग पर ब्रेक लगा हुआ था। अब अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट GISAT-1A को सितंबर के पहले सप्ताह में लॉन्च करने की तैयारी है। इसके बाद नवंबर में NVS-03 को लॉन्च किए जाने की संभावना है।

    GISAT-1A क्यों है अहम?
    GISAT-1A को जियो इमेजिंग सैटेलाइट और नई नामकरण व्यवस्था के तहत EOS-05 भी कहा जाता है। यह 2021 में लॉन्च किए गए GISAT-1 यानी EOS-03 का रिप्लेसमेंट है। पिछला मिशन रॉकेट के अंतिम प्रोपल्सिव सेगमेंट के इग्नाइट नहीं होने के कारण अपनी तय कक्षा तक नहीं पहुंच सका था।

    नया GISAT-1A करीब 10 साल की मिशन लाइफ के लिए तैयार किया गया है। यह बड़े इलाकों की बार-बार तस्वीरें लेने में सक्षम होगा। इससे प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के साथ कृषि और वानिकी से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलेगी।

    नवंबर में NVS-03 की लॉन्चिंग संभव
    GISAT-1A के बाद NVS-03 को लॉन्च किया जा सकता है। अधिकारियों के मुताबिक यह सैटेलाइट श्रीहरिकोटा में ईंधन भरने के बाद लॉन्च के लिए तैयार है। इसकी लॉन्चिंग नवंबर में संभावित है।

    NVS-03 का मिशन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले लॉन्च किए गए NVS-02 को तय कक्षा तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिली थी। इसके चलते भारत के NavIC नेविगेशन सिस्टम की स्वतंत्र कवरेज प्रभावित हुई है।

    जनवरी में PSLV-C62 मिशन हुआ था फेल
    2026 में ISRO ने अब तक सिर्फ एक लॉन्च किया है। 12 जनवरी को PSLV-C62/EOS-N1 मिशन के तहत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट EOS-N1 को कक्षा में स्थापित किया जाना था, लेकिन रॉकेट के तीसरे चरण में आई तकनीकी ‘एनोमली’ के कारण मिशन असफल हो गया। इसकी जांच के लिए बनाई गई फेलियर एनालिसिस कमेटी की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।

    2025 में भी दो बड़े मिशनों को झटका
    2025 में ISRO ने पांच लॉन्च किए थे। इनमें PSLV-C61 से EOS-9 की लॉन्चिंग भी शामिल थी, लेकिन तीसरे चरण में आई एनोमली के कारण यह मिशन भी विफल हो गया था। ISRO ने दोनों घटनाओं को एक-दूसरे से असंबंधित बताया था।

    वहीं GSLV-F16 से NASA के साथ विकसित NISAR सैटेलाइट का लॉन्च सफल रहा। GSLV-F15 से NVS-02 को भी लॉन्च किया गया, लेकिन ऑर्बिट बढ़ाने की प्रक्रिया में समस्या के कारण सैटेलाइट तय कक्षा तक नहीं पहुंच सका। इसके अलावा LVM3 के जरिए Bluebird-2 और CMS-03 के लॉन्च भी किए गए।

    लॉन्चिंग के लक्ष्य से पीछे चल रहा ISRO
    ISRO की वार्षिक योजना के मुताबिक 2025-26 में 15 और 2026-27 में 27 मिशन का लक्ष्य रखा गया था। मौजूदा लॉन्चिंग इस लक्ष्य से काफी पीछे है। 2026-27 में ISRO ने कम से कम पांच SSLV, चार PSLV, तीन GSLV और एक LVM3 मिशन की योजना बनाई है। इसके अलावा गगनयान कार्यक्रम के तहत भी कई मिशन निर्धारित हैं।

    अब सितंबर में GISAT-1A की लॉन्चिंग ISRO के लिए सिर्फ एक सैटेलाइट मिशन नहीं, बल्कि लगातार सामने आई तकनीकी चुनौतियों के बाद लॉन्च कार्यक्रम को फिर पटरी पर लाने की बड़ी परीक्षा होगी।

  • ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    नई दिल्ली । बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के न्यू BEL रोड परिसर को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह सतर्क कर दी गई। धमकी भरा ईमेल प्राप्त होते ही एहतियात के तौर पर पूरे परिसर को तत्काल खाली कराया गया और सुरक्षा एजेंसियों ने व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया। घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई तथा सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं पर निगरानी बढ़ा दी गई।

    सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, बम निरोधक दस्ता और अन्य सुरक्षा इकाइयों की टीमें मौके पर पहुंचीं। इसके बाद भवन और परिसर के प्रत्येक हिस्से की सावधानीपूर्वक जांच की गई। कई घंटों तक चले सर्च ऑपरेशन के दौरान किसी भी प्रकार का विस्फोटक, संदिग्ध सामग्री या सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली वस्तु बरामद नहीं हुई। प्रारंभिक जांच में धमकी को फर्जी माना जा रहा है, हालांकि सुरक्षा एजेंसियां मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं।

    अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों से जुड़ी किसी भी प्रकार की धमकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यही कारण है कि सूचना मिलते ही निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार परिसर को खाली कराया गया और विशेषज्ञ टीमों की निगरानी में विस्तृत तलाशी अभियान चलाया गया। जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था को अतिरिक्त रूप से मजबूत रखा गया।

    जांच एजेंसियां अब धमकी भरे ईमेल के स्रोत, उसकी तकनीकी जानकारी और उसे भेजने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान करने में जुटी हैं। डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ईमेल किस माध्यम से भेजा गया और इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है। साइबर विशेषज्ञ भी तकनीकी जांच में सहयोग कर रहे हैं।

    हाल के समय में कई सरकारी संस्थानों, न्यायिक परिसरों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को भी इसी प्रकार के धमकी भरे ईमेल प्राप्त होने की घटनाएं सामने आई हैं। अधिकांश मामलों में तलाशी के दौरान कोई विस्फोटक नहीं मिला, लेकिन प्रत्येक सूचना पर सुरक्षा एजेंसियां पूरी सतर्कता के साथ कार्रवाई कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।

    इसी क्रम में एक संदिग्ध व्यक्ति को विभिन्न संस्थानों को कथित रूप से फर्जी बम धमकी वाले ईमेल भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या वर्तमान घटना का उससे कोई संबंध है या यह मामला अलग है। फिलहाल इस संबंध में विस्तृत जांच जारी है और सभी तथ्यों का सत्यापन किया जा रहा है।

    सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि संबंधित परिसर पूरी तरह सुरक्षित है और सामान्य स्थिति बहाल करने की प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अपुष्ट जानकारी या अफवाह पर विश्वास न करें तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। मामले की जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जाएगी।

  • IIT इंदौर का 14वां दीक्षांत समारोह 27 जून को: इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. सिवन करेंगे अध्यक्षता, प्रो. अभय करांदिकर होंगे मुख्य अतिथि

    IIT इंदौर का 14वां दीक्षांत समारोह 27 जून को: इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. सिवन करेंगे अध्यक्षता, प्रो. अभय करांदिकर होंगे मुख्य अतिथि


    मध्य प्रदेश। देश के प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थानों में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर अपने 14वें दीक्षांत समारोह के आयोजन की तैयारियों में जुट गया है। संस्थान का यह बहुप्रतीक्षित समारोह 27 जून 2026 (शनिवार) को आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों के विद्यार्थियों को डिग्रियां और प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए जाएंगे।

    आईआईटी इंदौर प्रशासन के अनुसार इस वर्ष के दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि नीति आयोग के सदस्य तथा भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के पूर्व सचिव प्रो. अभय करांदिकर होंगे। वहीं समारोह की अध्यक्षता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व चेयरमैन और आईआईटी इंदौर बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के वर्तमान चेयरपर्सन डॉ. के. सिवन करेंगे।

    दोपहर 2:30 बजे शुरू होने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान के निदेशक के स्वागत संबोधन और वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुति के साथ होगी। इसके बाद बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरपर्सन डॉ. के. सिवन विद्यार्थियों, शिक्षकों और अतिथियों को संबोधित करेंगे। कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण के रूप में प्रो. अभय करांदिकर का दीक्षांत भाषण होगा, जिसमें वे विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के संबंध में मार्गदर्शन देंगे।

    समारोह के दौरान स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों के विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के आधार पर डिग्रियां प्रदान की जाएंगी। इसके साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक और अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी दिए जाएंगे। संस्थान की परंपरा के अनुसार डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थी सामूहिक रूप से शपथ ग्रहण करेंगे और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन का संकल्प लेंगे।

    आईआईटी इंदौर ने समारोह में शामिल होने वाले अभिभावकों, शोधकर्ताओं और अन्य अतिथियों की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की है। संस्थान ने इंदौर एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन से सीधे कैंपस तक पहुंचने के लिए डिजिटल क्यूआर कोड आधारित नेविगेशन सुविधा उपलब्ध कराई है। इससे बाहरी राज्यों और अन्य देशों से आने वाले मेहमानों को संस्थान तक पहुंचने में आसानी होगी।

    जो लोग किसी कारणवश समारोह में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकेंगे, उनके लिए भी संस्थान ने विशेष व्यवस्था की है। दीक्षांत समारोह का सीधा प्रसारण आईआईटी इंदौर की आधिकारिक वेबसाइट पर किया जाएगा। दर्शक दोपहर 2:30 बजे से लाइव स्ट्रीमिंग के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को देख सकेंगे।

    आईआईटी इंदौर का यह दीक्षांत समारोह केवल डिग्री वितरण का कार्यक्रम नहीं बल्कि विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत, शोध और उपलब्धियों का उत्सव भी माना जाता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी संस्थान को उम्मीद है कि यहां से निकलने वाले युवा देश और दुनिया में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।

  • ISRO से टक्कर की कोशिश या प्रोपेगेंडा? EO-3 सैटेलाइट की ‘फर्जी तस्वीरों’ पर उठे सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर बहस तेज

    ISRO से टक्कर की कोशिश या प्रोपेगेंडा? EO-3 सैटेलाइट की ‘फर्जी तस्वीरों’ पर उठे सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर बहस तेज

    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने 25 अप्रैल 2026 को अपने EO-3 सैटेलाइट लॉन्च को बड़ी तकनीकी उपलब्धि और आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम बताया, लेकिन लॉन्च के कुछ ही दिनों बाद इससे जुड़ी तस्वीरों और दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल की गई एक कथित ‘पहली तस्वीर’ को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं, जिससे पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने EO-3 को रिमोट सेंसिंग और इमेजिंग क्षमताओं में बड़ा सुधार करने वाला बताया था। साथ ही इसमें एडवांस पेलोड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोसेसिंग और मल्टी-स्पेक्ट्रल इमेजिंग जैसी क्षमताओं का दावा किया गया। हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि इन दावों की पुष्टि के लिए अभी ठोस तकनीकी प्रमाण सामने नहीं आए हैं।

    विवाद तब गहराया जब कराची बंदरगाह की एक तस्वीर को EO-3 से ली गई पहली इमेज बताकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) विशेषज्ञों ने जांच में पाया कि यही तस्वीर पहले से 2025 में ही ऑनलाइन उपलब्ध थी। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।

    पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से बाहरी सहयोग, खासकर चीन पर निर्भर रहा है। उसकी अंतरिक्ष एजेंसी SUPARCO ने अतीत में भी कई प्रोजेक्ट विदेशी तकनीक के सहारे पूरे किए हैं। उदाहरण के तौर पर Paksat-1 उपग्रह, जिसे मूल रूप से इंडोनेशिया का Palapa-C1 बताया जाता है, बाद में पाकिस्तान ने अपने नाम से प्रस्तुत किया था। इसी तरह Paksat-1R का निर्माण और प्रक्षेपण भी चीन के सहयोग से हुआ था।

    EO-3 को लेकर भी यही चर्चा है कि इसमें चीन की तकनीकी भूमिका अहम रही है। ऐसे में “स्वदेशी क्षमता” के दावे पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की असली ताकत उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता और डेटा की विश्वसनीयता से तय होती है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के अंतरिक्ष संगठन Indian Space Research Organisation और पाकिस्तान की एजेंसी SUPARCO के बीच तुलना की बहस को भी फिर से हवा दे दी है। जहां ISRO को उसकी स्वदेशी तकनीक और लगातार सफल मिशनों के लिए वैश्विक स्तर पर सराहना मिलती रही है, वहीं पाकिस्तान के दावों पर बार-बार सत्यापन की जरूरत सामने आती रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है। ऐसे में अधूरी या संदिग्ध जानकारी के आधार पर किए गए दावे न केवल अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि भविष्य के सहयोग और विश्वास पर भी असर डाल सकते हैं।

    कुल मिलाकर EO-3 सैटेलाइट को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ एक तस्वीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम वास्तविक प्रगति कर रहा है या फिर यह सिर्फ छवि निर्माण की कोशिश है? आने वाले समय में इस सवाल का जवाब और स्पष्ट हो सकता है।