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  • ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    नई दिल्ली । बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के न्यू BEL रोड परिसर को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह सतर्क कर दी गई। धमकी भरा ईमेल प्राप्त होते ही एहतियात के तौर पर पूरे परिसर को तत्काल खाली कराया गया और सुरक्षा एजेंसियों ने व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया। घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई तथा सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं पर निगरानी बढ़ा दी गई।

    सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, बम निरोधक दस्ता और अन्य सुरक्षा इकाइयों की टीमें मौके पर पहुंचीं। इसके बाद भवन और परिसर के प्रत्येक हिस्से की सावधानीपूर्वक जांच की गई। कई घंटों तक चले सर्च ऑपरेशन के दौरान किसी भी प्रकार का विस्फोटक, संदिग्ध सामग्री या सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली वस्तु बरामद नहीं हुई। प्रारंभिक जांच में धमकी को फर्जी माना जा रहा है, हालांकि सुरक्षा एजेंसियां मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं।

    अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों से जुड़ी किसी भी प्रकार की धमकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यही कारण है कि सूचना मिलते ही निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार परिसर को खाली कराया गया और विशेषज्ञ टीमों की निगरानी में विस्तृत तलाशी अभियान चलाया गया। जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था को अतिरिक्त रूप से मजबूत रखा गया।

    जांच एजेंसियां अब धमकी भरे ईमेल के स्रोत, उसकी तकनीकी जानकारी और उसे भेजने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान करने में जुटी हैं। डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ईमेल किस माध्यम से भेजा गया और इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है। साइबर विशेषज्ञ भी तकनीकी जांच में सहयोग कर रहे हैं।

    हाल के समय में कई सरकारी संस्थानों, न्यायिक परिसरों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को भी इसी प्रकार के धमकी भरे ईमेल प्राप्त होने की घटनाएं सामने आई हैं। अधिकांश मामलों में तलाशी के दौरान कोई विस्फोटक नहीं मिला, लेकिन प्रत्येक सूचना पर सुरक्षा एजेंसियां पूरी सतर्कता के साथ कार्रवाई कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।

    इसी क्रम में एक संदिग्ध व्यक्ति को विभिन्न संस्थानों को कथित रूप से फर्जी बम धमकी वाले ईमेल भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या वर्तमान घटना का उससे कोई संबंध है या यह मामला अलग है। फिलहाल इस संबंध में विस्तृत जांच जारी है और सभी तथ्यों का सत्यापन किया जा रहा है।

    सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि संबंधित परिसर पूरी तरह सुरक्षित है और सामान्य स्थिति बहाल करने की प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अपुष्ट जानकारी या अफवाह पर विश्वास न करें तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। मामले की जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जाएगी।

  • IIT इंदौर का 14वां दीक्षांत समारोह 27 जून को: इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. सिवन करेंगे अध्यक्षता, प्रो. अभय करांदिकर होंगे मुख्य अतिथि

    IIT इंदौर का 14वां दीक्षांत समारोह 27 जून को: इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. सिवन करेंगे अध्यक्षता, प्रो. अभय करांदिकर होंगे मुख्य अतिथि


    मध्य प्रदेश। देश के प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थानों में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर अपने 14वें दीक्षांत समारोह के आयोजन की तैयारियों में जुट गया है। संस्थान का यह बहुप्रतीक्षित समारोह 27 जून 2026 (शनिवार) को आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों के विद्यार्थियों को डिग्रियां और प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए जाएंगे।

    आईआईटी इंदौर प्रशासन के अनुसार इस वर्ष के दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि नीति आयोग के सदस्य तथा भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के पूर्व सचिव प्रो. अभय करांदिकर होंगे। वहीं समारोह की अध्यक्षता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व चेयरमैन और आईआईटी इंदौर बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के वर्तमान चेयरपर्सन डॉ. के. सिवन करेंगे।

    दोपहर 2:30 बजे शुरू होने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत संस्थान के निदेशक के स्वागत संबोधन और वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुति के साथ होगी। इसके बाद बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरपर्सन डॉ. के. सिवन विद्यार्थियों, शिक्षकों और अतिथियों को संबोधित करेंगे। कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण के रूप में प्रो. अभय करांदिकर का दीक्षांत भाषण होगा, जिसमें वे विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के संबंध में मार्गदर्शन देंगे।

    समारोह के दौरान स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध कार्यक्रमों के विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के आधार पर डिग्रियां प्रदान की जाएंगी। इसके साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक और अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी दिए जाएंगे। संस्थान की परंपरा के अनुसार डिग्री प्राप्त करने वाले विद्यार्थी सामूहिक रूप से शपथ ग्रहण करेंगे और समाज तथा राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन का संकल्प लेंगे।

    आईआईटी इंदौर ने समारोह में शामिल होने वाले अभिभावकों, शोधकर्ताओं और अन्य अतिथियों की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की है। संस्थान ने इंदौर एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन से सीधे कैंपस तक पहुंचने के लिए डिजिटल क्यूआर कोड आधारित नेविगेशन सुविधा उपलब्ध कराई है। इससे बाहरी राज्यों और अन्य देशों से आने वाले मेहमानों को संस्थान तक पहुंचने में आसानी होगी।

    जो लोग किसी कारणवश समारोह में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकेंगे, उनके लिए भी संस्थान ने विशेष व्यवस्था की है। दीक्षांत समारोह का सीधा प्रसारण आईआईटी इंदौर की आधिकारिक वेबसाइट पर किया जाएगा। दर्शक दोपहर 2:30 बजे से लाइव स्ट्रीमिंग के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को देख सकेंगे।

    आईआईटी इंदौर का यह दीक्षांत समारोह केवल डिग्री वितरण का कार्यक्रम नहीं बल्कि विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत, शोध और उपलब्धियों का उत्सव भी माना जाता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी संस्थान को उम्मीद है कि यहां से निकलने वाले युवा देश और दुनिया में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुएंगे।

  • ISRO से टक्कर की कोशिश या प्रोपेगेंडा? EO-3 सैटेलाइट की ‘फर्जी तस्वीरों’ पर उठे सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर बहस तेज

    ISRO से टक्कर की कोशिश या प्रोपेगेंडा? EO-3 सैटेलाइट की ‘फर्जी तस्वीरों’ पर उठे सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर बहस तेज

    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने 25 अप्रैल 2026 को अपने EO-3 सैटेलाइट लॉन्च को बड़ी तकनीकी उपलब्धि और आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम बताया, लेकिन लॉन्च के कुछ ही दिनों बाद इससे जुड़ी तस्वीरों और दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल की गई एक कथित ‘पहली तस्वीर’ को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं, जिससे पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने EO-3 को रिमोट सेंसिंग और इमेजिंग क्षमताओं में बड़ा सुधार करने वाला बताया था। साथ ही इसमें एडवांस पेलोड, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोसेसिंग और मल्टी-स्पेक्ट्रल इमेजिंग जैसी क्षमताओं का दावा किया गया। हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि इन दावों की पुष्टि के लिए अभी ठोस तकनीकी प्रमाण सामने नहीं आए हैं।

    विवाद तब गहराया जब कराची बंदरगाह की एक तस्वीर को EO-3 से ली गई पहली इमेज बताकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) विशेषज्ञों ने जांच में पाया कि यही तस्वीर पहले से 2025 में ही ऑनलाइन उपलब्ध थी। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान के दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।

    पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय से बाहरी सहयोग, खासकर चीन पर निर्भर रहा है। उसकी अंतरिक्ष एजेंसी SUPARCO ने अतीत में भी कई प्रोजेक्ट विदेशी तकनीक के सहारे पूरे किए हैं। उदाहरण के तौर पर Paksat-1 उपग्रह, जिसे मूल रूप से इंडोनेशिया का Palapa-C1 बताया जाता है, बाद में पाकिस्तान ने अपने नाम से प्रस्तुत किया था। इसी तरह Paksat-1R का निर्माण और प्रक्षेपण भी चीन के सहयोग से हुआ था।

    EO-3 को लेकर भी यही चर्चा है कि इसमें चीन की तकनीकी भूमिका अहम रही है। ऐसे में “स्वदेशी क्षमता” के दावे पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम की असली ताकत उसकी तकनीकी आत्मनिर्भरता और डेटा की विश्वसनीयता से तय होती है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत के अंतरिक्ष संगठन Indian Space Research Organisation और पाकिस्तान की एजेंसी SUPARCO के बीच तुलना की बहस को भी फिर से हवा दे दी है। जहां ISRO को उसकी स्वदेशी तकनीक और लगातार सफल मिशनों के लिए वैश्विक स्तर पर सराहना मिलती रही है, वहीं पाकिस्तान के दावों पर बार-बार सत्यापन की जरूरत सामने आती रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी होती है। ऐसे में अधूरी या संदिग्ध जानकारी के आधार पर किए गए दावे न केवल अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करते हैं, बल्कि भविष्य के सहयोग और विश्वास पर भी असर डाल सकते हैं।

    कुल मिलाकर EO-3 सैटेलाइट को लेकर उठा यह विवाद सिर्फ एक तस्वीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या पाकिस्तान का अंतरिक्ष कार्यक्रम वास्तविक प्रगति कर रहा है या फिर यह सिर्फ छवि निर्माण की कोशिश है? आने वाले समय में इस सवाल का जवाब और स्पष्ट हो सकता है।

  • ISRO ने की अगले चंद्र मिशन की तैयारी…. चंद्रयान 4 और 5 को लेकर आई बड़ी खुशखबरी

    ISRO ने की अगले चंद्र मिशन की तैयारी…. चंद्रयान 4 और 5 को लेकर आई बड़ी खुशखबरी


    नई दिल्ली।
    देश के अगले चंद्र मिशन (Lunar Mission) को लेकर दोहरी खुशखबरी सामने आई है। भारत चंद्रयान-4 (Chandrayaan 4) के तहत चांद से सैंपल इकट्ठा करके उन्हें धरती पर वापस लाने की योजना बना रहा है, जबकि चंद्रयान-5 (Chandrayaan 5) में ज्यादा वजन वाला लैंडर होगा, जिसकी मिशन लाइफ ज्यादा। यह जानकारी इसरो चेयरमैन वी नारायणन (ISRO Chairman V Narayanan) ने बुधवार को दी। उन्होंने ISRO के भविष्य के मिशनों के बारे में भी बात की, जिसमें वीनस की स्टडी और दूसरा मार्स लैंडिंग मिशन शामिल है। इसरो के स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी अवेयरनेस ट्रेनिंग (START 2026) प्रोग्राम के चौथे एडिशन के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा, “अब हम चंद्रयान प्रोग्राम को जारी रखने पर काम कर रहे हैं। चंद्रयान-4 में, हम सैंपल इकट्ठा करके उन्हें वापस लाने की योजना बना रहे हैं। चंद्रयान-5 में ज्यादा वजन वाला लैंडर होगा, जिसकी मिशन लाइफ ज्यादा होगी।”

    उन्होंने याद दिलाया कि चंद्रयान-3 में लैंडर की मिशन लाइफ सिर्फ 14 दिन थी। नारायणन ने कहा, “आने वाले मिशन में, हम लगभग 100 दिनों की लाइफ की बात कर रहे हैं। रोवर भी भारी होगा। चंद्रयान-3 में लगभग 25 किलो का रोवर था, जबकि आने वाले मिशन में लगभग 350 किलो का रोवर होगा।” वीनस ऑर्बिटर मिशन जैसे इसरो के आने वाले प्रोग्राम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “हमने मार्स ऑर्बिटर मिशन पहले ही पूरा कर लिया है, और अब हम मार्स लैंडिंग मिशन पर काम कर रहे हैं।”

    उन्होंने आगे कहा, “ये कुछ ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिन पर सरकार की मंजूरी के लिए बात हो रही है। इसलिए साइंस एरिया में बहुत दिलचस्पी है।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तहत, स्पेस प्रोग्राम के विजन को बढ़ाया गया है और कहा, “हम अभी गगनयान प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं और अपने एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस में भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने की प्लानिंग कर रहे हैं, शायद अगले दो सालों में।” उन्होंने आगे कहा, “हम 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन बनाने की भी प्लानिंग कर रहे हैं। इसके अलावा, हम भारतीयों को चांद पर उतारने और 2040 तक उन्हें सुरक्षित वापस लाने पर काम कर रहे हैं। ब्रेनस्टॉर्मिंग एक्टिविटीज पहले ही शुरू हो चुकी हैं। इसलिए स्पेस सेक्टर में कई एक्टिविटीज हो रही हैं। नागरिकों के लिए फ़ूड सिक्योरिटी, वॉटर सिक्योरिटी, कम्युनिकेशन और सेफ्टी पक्का करने वाली एप्लीकेशन से जुड़ी एक्टिविटीज के अलावा, साइंस एरिया में भी कई इनिशिएटिव प्लान किए गए हैं।”

    नारायणन ने बताया कि भारत के स्पेस प्रोग्राम ने अब तक 10 साइंटिफिक मिशन पूरे किए हैं, जिसमें एस्ट्रोसैट भी शामिल है, जिसने हाल ही में ऑर्बिट में एक दशक पूरा किया है और अभी भी बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा है। उन्होंने भारत के अलग-अलग लूनर एक्सप्लोरेशन मिशन – चंद्रयान-1, चंद्रयान-2, और चंद्रयान-3- के बारे में भी बताया और कहा कि इनसे कई साइंटिफिक खोजें हुईं। उन्होंने आगे कहा, “हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं।” साल 2023 में चंद्रयान-3 मिशन की सफलता के बारे में बताते हुए, इसरो चेयरमैन ने कहा कि भारत चांद के साउथ पोल के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बन गया है।

  • ISRO का निसार उपग्रह करेगा किसानों की बड़ी मदद… मिलेगी मिट्टी की नमी की सटीक जानकारी

    ISRO का निसार उपग्रह करेगा किसानों की बड़ी मदद… मिलेगी मिट्टी की नमी की सटीक जानकारी


    नई दिल्ली।
    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organization- ISRO) ने निसार (NISAR) उपग्रह के बारे में अहम जानकारी साझा की है। यह उपग्रह भारत (India) और अमेरिका (NASA) का संयुक्त प्रोजेक्ट है, जो एस-बैंड और एल-बैंड रडार की मदद से पृथ्वी की सतह की निगरानी करता है। निसार का मुख्य उद्देश्य मिट्टी में नमी का सटीक और नियमित आकलन करना है। इसरो के अनुसार, यह उपग्रह हर 12 दिनों में भारत के पूरे भू-भाग का उच्च रिजॉल्यूशन (100 मीटर) डेटा प्रदान करेगा। इससे किसानों, वैज्ञानिकों और सरकार को मिट्टी की नमी की लगभग वास्तविक समय की जानकारी मिल सकेगी।

    मिट्टी में नमी की जानकारी कृषि के लिए बहुत उपयोगी है। यह फसलों की सेहत, सिंचाई की कितनी जरूरत है, सूखे का खतरा कितना है और जल प्रबंधन जैसे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में अलग-अलग इलाकों जैसे सिंचित मैदान, वर्षा पर निर्भर खेत, अर्ध-शुष्क क्षेत्र और ज्यादा बारिश वाले इलाकों में मिट्टी की नमी अलग-अलग होती है। निसार का डेटा इन सभी क्षेत्रों में एकसमान और भरोसेमंद अनुमान देगा। इसरो ने एक भौतिकी-आधारित एल्गोरिदम विकसित किया है, जो इस डेटा को और अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाता है।


    NISAR के पास क्या है टारगेट

    निसार हर 12 दिनों में दो बार (दो अलग-अलग दिशाओं से) अवलोकन करेगा, जिससे मिट्टी की नमी में होने वाले बदलावों की निगरानी आसान हो जाएगी। इससे किसान सिंचाई की बेहतर योजना बना सकेंगे, सूखे से पहले तैयारी कर सकेंगे, मौसम आधारित कृषि सलाह ले सकेंगे और पानी के संसाधनों का सही प्रबंधन कर सकेंगे। यह डेटा जिलों, कृषि समुदायों और योजनाकारों के लिए बहुत मददगार साबित होगा।


    किस तरह की मिलेगी मदद

    इसरो ने बताया कि 100 मीटर रिजॉल्यूशन वाला यह लेवल-4 मिट्टी नमी डेटा राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र में तैयार किया जाएगा। फिर इसे भूनिधि पोर्टल के जरिए पूरे देश के किसानों, शोधकर्ताओं, सरकारी विभागों और गैर-सरकारी संगठनों को आसानी से उपलब्ध कराया जाएगा। इस तरह निसार उपग्रह भारत की कृषि और जल संसाधन प्रबंधन को मजबूत बनाने में बड़ा योगदान देगा। इस तरह इसरो लगातार बड़े-बड़े कारनामे कर रहा है।

  • चंद्रयान-4 मिशन धरती पर वापस लौटेगा भारत, ISRO ने लैंडिंग के लिए खोजी जगह

    चंद्रयान-4 मिशन धरती पर वापस लौटेगा भारत, ISRO ने लैंडिंग के लिए खोजी जगह


    नई दिल्ली।
    चंद्रयान-4 मिशन (Chandrayaan-4 Mission) को लेकर ISRO को बड़ी सफलता हाथ लगी है। इसरो के स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर (Space Applications Center-SAC) ने अब तक के सबसे कठिन मून मिशन के लिए लैंडिंग की जगह खोज ली है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लगभग 1 वर्ग किलोमीटर का पैच है जहां चंद्रयान-4 की सफल लैंडिंग करवाई जा सकती है। बता दें कि यह इसरो का पहला रिटर्न मिशन होगा। यानी चंद्रयान-4 को वापस धरती पर भी लाना है।

    चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से भजी गई हाई रिजोल्यूशन तस्वीरों से इस जगह को खोजा है जहां चंद्रयान-4 को उतारा जा सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यह पूरा अध्ययन अमिताभ के सुरेश, अजय के पाराशर, कनन वी अय्यर, अब्दुल एस, श्वेता वर्मा त्रिवेदी और नितांत दुबे ने की है। इस मिशन में प्रोपल्सन मॉड्यूल के अलावा डिसेंटर और असेंडर मॉड्यूल भी होंगे। इसके अलावा ट्रांसफर मॉड्यूल और रीएंट्री मॉड्यूल भी काम करेगा।


    क्या होगी चंद्रयान- 4 की खासियत

    यह मिशन भारत के लिए बहुत खास होने वाला है। इसका उद्देश्य चंद्रमा पर लैंडिंग करके मिट्टी और पत्थरों के सैंपल इकट्ठे करना और फिर वापस धरती पर लौटना है। इसरो का चंद्रयान -3 मिशन पूरी तरह से सफल हुआ था। इसके बाद इसरो ने यह कठिन कदम उठाने का फैसला किया है। चंद्रयान-4 अगर सफलतापूर्वक वापस लौटता है तो आगे मानव मिशन का भी रास्ता खुल जाएगा।


    चंद्रयान-4 कहां उतरेगा

    वैज्ञानिकों ने ऑर्बिटर से भेजी गई तस्वीरों में से चार जगहों के बारे में अध्ययन किया था। इसमें एमएम-4 नाम की जगह को सुरक्षित पाया गया है। यह जगह नॉविस माउटन पहाड़ी के पास है लेकिन समतल है। ऐसे में लैंडर को नुकसान पहु्ंचने का खतरा नहीं है। इस जगह पर सूरज की रोशनी भी अच्छी रहती है। ऐसे में लैंडिंग के लिए जगह उपयुक्त है। यहां बड़े गड्ढे ना होने की वजह से लैंडर को चलने में भी आसानी होगी।

    अब तक के अध्ययन से इतना स्पष्ट हो गया है कि इसी इलाके में चंद्रयान-4 को उतारा जाएगा। यह शिव-शक्ति पॉइंट से बहुत दूर नहीं है। वहीं इस इलाके में गड्ढों के पास अंधेरा रहता है। इसरो का कहना है कि इस इलाके में पानी या बर्फ के सैंपल भी मिल सकतेहैं। इसके अलावा यहां से मिले सैंपल से चंद्रमा के निर्माण और यहां उपस्थिति संसाधनों के बारे में जानकारी मिलेगी।

  • ISRO के बाहुबाली LVM3-M6 से विश्व का सबसे भारी सेटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-3 सफलतापूर्वक लॉन्च

    ISRO के बाहुबाली LVM3-M6 से विश्व का सबसे भारी सेटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-3 सफलतापूर्वक लॉन्च


    नई दिल्ली।
    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian Space Research Organisation – ISRO) बुधवार सुबह 8.55 बजे अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 (Most Powerful Rocket, LVM3) से अमेरिकी कंपनी AST स्पेसमोबाइल की ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 संचार सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया. यह इस रॉकेट की छठी ऑपरेशनल उड़ान (LVM3-M6) है।

    ये मिशन है न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और AST स्पेसमोबाइल के बीच हुए समझौते के तहत किया जा रहा है. इस मिशन से लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में दुनिया का सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट तैनात होगा, जो सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड इंटरनेट प्रदान करेगा।


    ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट की विशेषताएं

    ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 AST स्पेसमोबाइल की अगली पीढ़ी की संचार सैटेलाइट्स सीरीज का हिस्सा है. यह सैटेलाइट दुनिया भर में उन इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए डिजाइन की गई है जहां ग्राउंड नेटवर्क नहीं पहुंच पाता. मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं…
    वजन: लगभग 6100 से 6500 किलोग्राम (यह LVM3 द्वारा भारतीय मिट्टी से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी पेलोड है).
    आकार: इसमें 223 वर्ग मीटर (लगभग 2,400 स्क्वायर फीट) का फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो इसे लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात होने वाला सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट बनाता है.
    क्षमता: यह 4G और 5G नेटवर्क सपोर्ट करता है. सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड प्रदान करेगा.
    स्पीड: प्रति कवरेज सेल में 120 Mbps तक की पीक डेटा स्पीड, जो वॉइस कॉल, वीडियो कॉल, टेक्स्ट, स्ट्रीमिंग और डेटा सर्विसेज को सपोर्ट करेगी.
    उद्देश्य: यह सैटेलाइट AST स्पेसमोबाइल की ग्लोबल कांस्टेलेशन का हिस्सा है, जो दुनिया भर में 24/7 कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगी. इससे दूरदराज के इलाकों, समुद्रों और पहाड़ों में भी मोबाइल नेटवर्क पहुंचेगा.
    पिछली सैटेलाइट्स: कंपनी ने सितंबर 2024 में ब्लूबर्ड 1-5 सैटेलाइट्स लॉन्च की थीं, जो अमेरिका और कुछ अन्य देशों में कंटीन्यूअस इंटरनेट कवरेज प्रदान कर रही हैं. ब्लॉक-2 इससे 10 गुना ज्यादा बैंडविड्थ कैपेसिटी वाली है.
    यह सैटेलाइट लगभग 600 किलोमीटर की ऊंचाई वाली लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात की जाएगी।


    LVM3 रॉकेट की विशेषताएं

    LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3), जिसे पहले GSLV Mk-III कहा जाता था, इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसे इसरो ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किया है. मुख्य स्पेसिफिकेशंस…
    ऊंचाई: 43.5 मीटर
    लिफ्ट-ऑफ वजन: 640 टन
    स्टेज: तीन स्टेज वाला रॉकेट
    दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर्स (S200)
    लिक्विड कोर स्टेज (L110)
    क्रायोजेनिक अपर स्टेज (C25)
    पेलोड क्षमता: जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में: 4,200 किलोग्राम तक. लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में: 8,000 किलोग्राम तक.
    पिछले सफल मिशन: LVM3 ने चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और दो वनवेब मिशनों (कुल 72 सैटेलाइट्स) को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. इसका पिछला मिशन LVM3-M5/CMS-03 था, जो 2 नवंबर 2025 को सफल रहा.

    यह रॉकेट भारत की अंतरिक्ष क्षमता का प्रतीक है और भविष्य में गगनयान मानव मिशन के लिए भी इस्तेमाल होगा. यह मिशन इसरो के कॉमर्शियल लॉन्चेस में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा. AST स्पेसमोबाइल दुनिया की पहली स्पेस-बेस्ड सेल्युलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बना रही है, जो स्टारलिंक जैसी सेवाओं से कॉम्पीट करेगी. भारत से लॉन्च होने से इसरो की ग्लोबल लॉन्च सर्विसेज में मजबूती आएगी।

  • इसरो के अगले साल के सात प्रमुख मिशन: गगनयान से लेकर क्वांटम-की वितरण तक

    इसरो के अगले साल के सात प्रमुख मिशन: गगनयान से लेकर क्वांटम-की वितरण तक


    नई दिल्ली । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो ने अगले साल मार्च तक सात महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशनों की योजना बनाई है। इनमें कई नई प्रौद्योगिकियां और भारतीय अंतरिक्ष यात्रा के प्रमुख मील के पत्थर शामिल हैं। इनमें से एक प्रमुख मिशन 2026 में होने वाला गगनयान का पहला मानवरहित अभियान होगाजो भारत के मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान की शुरुआत का संकेत देगा। इसके अलावाइसरो द्वारा स्वदेशी रूप से निर्मित इलेक्ट्रिक प्रणोदन प्रणालियों और क्वांटम-की वितरण जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का परीक्षण भी किया जाएगा।
    इसरो के मुताबिकपहले मिशन की शुरुआत अगले हफ्ते की संभावना हैजिसमें भारत का सबसे भारी रॉकेटएलवीएम3‘ब्लूबर्ड-6’ संचार उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित करेगा। यह रॉकेट इसरो की न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड और अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच एक वाणिज्यिक करार के तहत उड़ान भरेगा। एलवीएम3जिसे ह्यूमन रेटेड माना जाता है2026 की शुरुआत में फिर से उड़ान भरेगा और गगनयान के तहत भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन का पहला मानवरहित यानव्योममित्रलेकर अंतरिक्ष की कक्षा में प्रवेश करेगा।
    गगनयान मिशन के तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 2027 में पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजे जाने की योजना है। इसके पहलेअगले साल एक और मानवरहित मिशन लॉन्च किया जाएगाजो गगनयान के विभिन्न पहलुओं का आकलन करेगा। इस मिशन में ह्यूमन रेटेड प्रक्षेपण वाहन के वायुगतिकीय पैमानेकक्षीय मॉड्यूल के प्रदर्शन और चालक दल मॉड्यूल के पुनः प्रवेश एवं पुनर्प्राप्ति की प्रक्रिया को परखा जाएगा।
    इसके अलावाइसरो द्वारा पहली बार उद्योग जगत द्वारा निर्मित ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी का प्रक्षेपण भी किया जाएगा। इस मिशन में ओशनसैट उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया जाएगासाथ ही भारत-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह और ध्रुव स्पेस का लीप-2 उपग्रह भी भेजा जाएगा। पीएसएलवी रॉकेट में एक अन्य महत्वपूर्ण मिशनईओएस-एन1और 18 छोटे उपग्रहों को कक्षा में भेजने की योजना है।
    इसरो के अनुसार2026 में और भी महत्वपूर्ण मिशन हो सकते हैंजिनमें क्वांटम-की वितरण और स्वदेशी यात्रा-तरंग नली प्रवर्धक जैसी नई प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन शामिल है। इसरो द्वारा किए गए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते के तहत एचएएल-एलएंडटी कंसोर्टियम को पांच पीएसएलवी रॉकेट के निर्माण का ठेका भी दिया गया हैजिससे उपग्रहों के वाणिज्यिक प्रक्षेपण को बढ़ावा मिलेगा।
    इसरो के इन मिशनों से न केवल भारत की अंतरिक्ष यात्रा की दिशा स्पष्ट होगीबल्कि ये वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में भारत की ताकत को भी प्रमाणित करेंगे। इसरो की ये योजनाएं आने वाले वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगी।