Tag: Jabalpur High Court

  • एमपी के रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर, 6 महीने में ट्रांसफर भत्ते और HRA की नीति बनाएगी सरकार

    एमपी के रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर, 6 महीने में ट्रांसफर भत्ते और HRA की नीति बनाएगी सरकार


    जबलपुर । मध्य प्रदेश की ग्राम पंचायतों में काम करने वाले करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जबलपुर हाईकोर्ट ने उनके तबादले से जुड़े आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार यदि किसी ग्राम रोजगार सहायक का तबादला करती है तो उसे नियमानुसार अनिवार्य यात्रा भत्ता सहित यात्रा भत्ता और घरेलू भत्ता देना होगा। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को रोजगार सहायकों के लिए छह महीने के भीतर भत्तों से संबंधित नीति तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से प्रदेशभर के रोजगार सहायकों को भविष्य में आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

    पांच रोजगार सहायकों ने दायर की थी याचिका

    इस मामले में सिंगरौली के अमित कुमार मिश्रा और शहडोल के शिवाकांत मिश्रा व राजेश कुमार सहित सागर के रानू राजपूत तथा टीकमगढ़ के अभिषेक पटेरिया ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पांचों याचिकाकर्ताओं ने 18 जुलाई 2025 को याचिका दायर कर तबादले से जुड़ी समस्याओं और आर्थिक नुकसान का मुद्दा उठाया था। मामले की सुनवाई जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ में हुई। अदालत ने 14 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब इस पर आदेश जारी कर दिया गया है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गोपेश यश तिवारी ने पक्ष रखा। मामले में रोजगार सहायकों के वेतन और तबादले के बाद होने वाले अतिरिक्त खर्च का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले रोजगार सहायकों को सीमित वेतन में अपने परिवार और दूसरी जरूरतों का खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी कर्मचारी को मौजूदा कार्यस्थल से काफी दूर भेज दिया जाता है तो उसके सामने आवागमन और रहने की व्यवस्था से जुड़ी आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

    18 हजार रुपये वेतन में दूर तबादला बन सकता है परेशानी

    याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता के अनुसार ग्राम रोजगार सहायकों को लगभग 18 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है। ऐसी स्थिति में यदि किसी कर्मचारी का तबादला 100 किलोमीटर दूर कर दिया जाता है तो उसे आने जाने और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। सीमित आय के कारण यह खर्च कर्मचारी के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

    इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को यात्रा भत्ते और हाउस रेंट अलाउंस यानी एचआरए से संबंधित नीति बनाने के निर्देश दिए हैं। आदेश के अनुसार राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को छह महीने के भीतर इस संबंध में नीति तैयार करनी होगी। नीति तैयार होने से यह तय करने में मदद मिलेगी कि तबादले की स्थिति में रोजगार सहायकों को किस प्रकार के भत्ते और आर्थिक सुविधाएं दी जाएंगी।

    तबादले पर रोक नहीं लेकिन भत्तों पर बनानी होगी नीति

    हाईकोर्ट के आदेश में यह भी महत्वपूर्ण है कि रोजगार सहायकों की तबादले नहीं किए जाने की मांग को स्वीकार नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि राज्य सरकार प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार रोजगार सहायकों का तबादला कर सकेगी। हालांकि तबादले के कारण कर्मचारियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को देखते हुए भत्तों के संबंध में नीति तैयार करनी होगी।

    प्रदेश में करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायक ग्राम पंचायतों में विभिन्न कार्यों से जुड़े हैं। ऐसे में इस फैसले का असर बड़ी संख्या में कर्मचारियों पर पड़ सकता है। अब सभी की नजर राज्य सरकार और राज्य रोजगार गारंटी परिषद की ओर से तैयार की जाने वाली नीति पर रहेगी। छह महीने की समयसीमा में बनने वाली यह नीति तय करेगी कि तबादले की स्थिति में कर्मचारियों को किन शर्तों पर आर्थिक लाभ मिलेगा।

  • अनूपपुर को मिलेगी आधुनिक जिला अदालत की सौगात, ₹44.85 करोड़ स्वीकृत, हाईकोर्ट ने निर्माण में तेजी लाने के दिए निर्देश

    अनूपपुर को मिलेगी आधुनिक जिला अदालत की सौगात, ₹44.85 करोड़ स्वीकृत, हाईकोर्ट ने निर्माण में तेजी लाने के दिए निर्देश


    अनूपपुर । मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में लंबे समय से किराए के भवन में संचालित हो रही जिला अदालत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने जिला अदालत के नए भवन के निर्माण के लिए 44.85 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दे दी है। इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर होने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है। हाईकोर्ट ने स्वीकृति की जानकारी मिलने के बाद भवन निर्माण का काम जल्द शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इससे जिला अदालत के लिए स्थायी भवन उपलब्ध कराने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।
    अनूपपुर जिला अदालत के भवन निर्माण का मामला गुरुवार को जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ के समक्ष मामले से जुड़ी जानकारी रखी गई। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने भवन निर्माण के लिए 44.85 करोड़ रुपये की वित्तीय मंजूरी दे दी है। इसके बाद हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य जल्द शुरू कराने के निर्देश जारी किए। लंबे समय से किराए के भवन में संचालित हो रही अदालत के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
    इस मामले में शहडोल निवासी अधिवक्ता वासुदेव चटर्जी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया था कि अनूपपुर की जिला अदालत लंबे समय से किराए के भवन में चल रही है। अदालत के लिए स्थायी भवन की आवश्यकता को देखते हुए यह मामला हाईकोर्ट के सामने उठाया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत रूप से चर्चा करने के निर्देश दिए थे। मुख्यमंत्री से चर्चा के बाद राज्य सरकार की ओर से अदालत को वित्तीय स्वीकृति की जानकारी दी गई। सरकार के इस कदम के बाद हाईकोर्ट ने निर्माण कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।
    सुनवाई के दौरान प्रदेश की अन्य जिला अदालतों के भवन निर्माण से जुड़े मामलों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए। खंडपीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश में जिला अदालतों के लंबित निर्माण कार्यों से संबंधित याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष प्रस्तुत की जाएं। इन निर्माण कार्यों से जुड़ी याचिकाओं पर पहले से ही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच में सुनवाई चल रही है। ऐसे में संबंधित याचिकाओं को उसी बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है ताकि मामलों की सुनवाई निर्धारित व्यवस्था के तहत हो सके।
    अनूपपुर जिला अदालत के भवन के लिए वित्तीय मंजूरी मिलने और हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद अब निर्माण कार्य शुरू होने की प्रक्रिया पर नजर रहेगी। स्थायी भवन उपलब्ध होने से अदालत के संचालन के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि निर्माण कार्य शुरू होने की वास्तविक तारीख और परियोजना पूरी होने की समयसीमा को लेकर अभी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल हाईकोर्ट ने सरकार को जल्द निर्माण शुरू करने के निर्देश दिए हैं और जिला अदालतों के लंबित भवन निर्माण से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर भी व्यवस्था स्पष्ट कर दी है।

  • धान परिवहन में 43.03 करोड़ की कथित गड़बड़ी 28 जिलों तक पहुंचा मामला हाईकोर्ट ने मांगी जांच रिपोर्ट

    धान परिवहन में 43.03 करोड़ की कथित गड़बड़ी 28 जिलों तक पहुंचा मामला हाईकोर्ट ने मांगी जांच रिपोर्ट


    जबलपुर । मध्य प्रदेश में धान के परिवहन और आपूर्ति में कथित अनियमितताओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी है। जबलपुर में सामने आई कार्रवाई के बाद यह मामला प्रदेश के कई जिलों तक पहुंचने का दावा किया गया है। याचिका में करीब 43.03 करोड़ रुपए की कथित गड़बड़ी का उल्लेख किया गया है। हाईकोर्ट ने सरकार को प्रदेश के 28 जिलों से संबंधित जांच की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि रिपोर्ट की एक प्रति याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को उपलब्ध कराई जाए ताकि वह उसमें सामने आए तथ्यों का अध्ययन कर अपना पक्ष रख सकें। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।

    यह जनहित याचिका नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि धान के परिवहन और आपूर्ति की निगरानी के लिए पहले से GPS व्यवस्था के दिशा निर्देश मौजूद हैं। इसके बावजूद परिवहन प्रक्रिया में बड़े स्तर पर कथित गड़बड़ियां होने का आरोप लगाया गया है। याचिका में पूरे प्रदेश में मामले की जांच कराने की मांग की गई है।

    मामले की शुरुआत जबलपुर में जिला प्रशासन की कार्रवाई से हुई बताई गई है। उपलब्ध अदालती रिपोर्ट के अनुसार जबलपुर प्रशासन की जांच में 43.03 करोड़ रुपए से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता सामने आने का दावा किया गया था। इसके बाद FIR दर्ज होने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी अदालत के सामने रखी गई। याचिका में यह भी कहा गया कि गड़बड़ी केवल जबलपुर तक सीमित नहीं हो सकती है और दूसरे जिलों में भी इसी तरह की अनियमितताओं की जांच जरूरी है।

    याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जिन वाहनों के जरिए धान को निर्धारित स्थान तक पहुंचाया जाना था उनकी निगरानी व्यवस्था का प्रभावी इस्तेमाल नहीं हुआ। याचिका में दावा किया गया कि कुछ मामलों में धान निर्धारित स्थान तक पहुंचने के बजाय रास्ते में ही बेच दिए जाने की आशंका है। इन आरोपों की वास्तविकता जांच रिपोर्ट और आगे की कानूनी प्रक्रिया में सामने आए तथ्यों से स्पष्ट होगी।

    याचिका में एथनोल के लिए आवंटित धान के परिवहन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता पक्ष का दावा है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत भेजे जाने वाले धान को रास्ते में ही दूसरी जगह बेचने की कथित अनियमितता सामने आई। इसी आधार पर पूरे प्रदेश में जांच की मांग की गई है। पहले की सुनवाई में राज्य की ओर से कार्रवाई शुरू होने और FIR दर्ज होने की जानकारी भी अदालत को दी गई थी।

    धान की खरीद से लेकर मिलिंग और आपूर्ति तक की प्रक्रिया में कई स्तरों पर निगरानी व्यवस्था होती है। इसमें रिलीज ऑर्डर परिवहन से जुड़े दस्तावेज और परिवहन वाहनों की जानकारी दर्ज करने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। याचिका में आरोप है कि इन व्यवस्थाओं के बावजूद कथित गड़बड़ियां हुईं। अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार को अलग अलग जिलों में हुई जांच और कार्रवाई से जुड़े तथ्यों को विस्तृत रिपोर्ट के रूप में अदालत के सामने रखना होगा।

    अदालत ने जांच रिपोर्ट की प्रति याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया है। इससे याचिकाकर्ता पक्ष रिपोर्ट में सामने आने वाले तथ्यों का अध्ययन कर अगली सुनवाई में अपना पक्ष रख सकेगा। अब 16 नवंबर को होने वाली सुनवाई में सरकार की रिपोर्ट और उसमें सामने आए तथ्यों पर आगे की न्यायिक कार्रवाई की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

  • कटनी की पूर्व सीएसपी नेहा की याचिका पर आज डिवीजन बेंच में सुनवाई सरकार ने जांच में सहयोग नहीं करने का लगाया आरोप

    कटनी की पूर्व सीएसपी नेहा की याचिका पर आज डिवीजन बेंच में सुनवाई सरकार ने जांच में सहयोग नहीं करने का लगाया आरोप


    कटनी । कटनी की पूर्व सीएसपी नेहा पच्चीसिया की जमानत याचिका पर मंगलवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। हत्या के आरोपी की करीब 1 करोड़ रुपए की जमीन हड़पने के मामले में दर्ज एफआईआर को उन्होंने चुनौती दी है। मामले की सुनवाई अब सिंगल बेंच के बजाय डिवीजन बेंच के समक्ष होगी। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से मामले को दूसरी उपयुक्त बेंच में भेजने की मांग की गई थी। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने केस डायरी देखी और मामले को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच के समक्ष भेजने का निर्णय लिया।

    नेहा पच्चीसिया की ओर से दाखिल याचिका में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर के आरोपों को बेबुनियाद बताया गया है। उनकी ओर से अदालत से अंतरिम राहत की मांग भी की गई है। याचिका में कहा गया है कि मामले में उनके खिलाफ कोई सीधा सबूत मौजूद नहीं है और एफआईआर में उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं होती है। अब डिवीजन बेंच के समक्ष होने वाली सुनवाई में उनकी ओर से रखी गई इन दलीलों पर विचार किया जाएगा।

    इससे पहले 21 सितंबर को मामले की सुनवाई जस्टिस हिमांशु जोशी की बेंच में प्रस्तावित थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने मामले को दूसरी उपयुक्त बेंच के सामने भेजने का अनुरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एफआईआर में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं भी शामिल हैं। इसी आधार पर सरकार का कहना था कि मामले की सुनवाई ऐसी बेंच में होनी चाहिए जिसे इस तरह के मामलों की सुनवाई का अधिकार है।

    नेहा की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने सरकार की इस मांग का विरोध किया। उनकी ओर से दलील दी गई कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं पिछली सुनवाई के बाद एफआईआर में जोड़ी गई हैं। इसलिए मामले की सुनवाई पहले से निर्धारित बेंच में ही की जानी चाहिए। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अदालत ने केस डायरी का अवलोकन किया और मामले को संबंधित उपयुक्त बेंच के समक्ष भेजने का निर्णय लिया।

    राज्य सरकार ने नेहा की जमानत याचिका का विरोध करते हुए जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप भी लगाया है। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अदालत को बताया गया था कि नेहा के विदेश जाने की आशंका को देखते हुए उनके खिलाफ लुक आउट सर्कुलर की कार्रवाई की गई है। सरकार ने मामले में सह आरोपियों के साथ मिलीभगत का आरोप भी लगाया है।

    सरकार के मुताबिक जिला अदालत से नेहा की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है। इसके अलावा मामले में नेहा सहित अन्य आरोपियों पर इनाम घोषित किए जाने की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई है। अब 22 सितंबर को नई बेंच के समक्ष होने वाली सुनवाई में उनकी याचिका पर आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

    यह मामला करीब 1 करोड़ रुपए की जमीन से जुड़े आरोपों के कारण पहले से चर्चा में है। पूर्व सीएसपी की ओर से एफआईआर को चुनौती दिए जाने के बाद अब हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर दोनों पक्षों की नजर है। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से एफआईआर और आरोपों को लेकर दलीलें रखी जाएंगी जबकि राज्य सरकार अपनी ओर से जांच और अब तक सामने आए तथ्यों के आधार पर याचिका का विरोध करेगी।

  • रिटायर्ड पुलिसकर्मी की मौत के बाद 2.24 लाख की रिकवरी का मामला आदेश नहीं माना तो एसपी को कोर्ट ने किया तलब

    रिटायर्ड पुलिसकर्मी की मौत के बाद 2.24 लाख की रिकवरी का मामला आदेश नहीं माना तो एसपी को कोर्ट ने किया तलब


    जबलपुर । जबलपुर हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए छिंदवाड़ा के पुलिस अधीक्षक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। कोर्ट ने जबलपुर रेंज के आईजी को वारंट की तामील कराने की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही छिंदवाड़ा एसपी को 1 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया गया है। मामला एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी की मृत्यु के बाद विभाग की ओर से की गई 2.24 लाख रुपए की रिकवरी और हाईकोर्ट के पुराने आदेश के पालन से जुड़ा है।

    जबलपुर निवासी सीता तिवारी ने अधिवक्ता सचिन पांडे के माध्यम से अवमानना याचिका दायर की है। याचिका के मुताबिक उनके पति संतोष तिवारी छिंदवाड़ा में पुलिस विभाग में पदस्थ थे। सेवाकाल के दौरान 14 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया था। पति की मृत्यु के बाद पुलिस विभाग की ओर से उनके खिलाफ 2.24 लाख रुपए की रिकवरी निकाली गई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और रिकवरी की कार्रवाई को चुनौती दी गई।

    मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की कोर्ट में हुई थी। हाईकोर्ट ने रिकवरी का आदेश निरस्त कर दिया था। साथ ही विभाग को संबंधित राशि 8 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद विभाग की ओर से राशि वापस करने और आदेश का पालन करने की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई।

    इसी मामले में वर्ष 2025 में अवमानना नोटिस भी जारी किया गया था। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह बात रखी गई कि नोटिस जारी होने के बावजूद आदेश के अनुपालन से संबंधित रिपोर्ट अब तक पेश नहीं की गई। अदालत को यह भी बताया गया कि छिंदवाड़ा एसपी ने 11 फरवरी 2026 को गृह विभाग के अपर सचिव को पत्र भेजा था। पत्र में नोटिस मिलने और आगे की आवश्यक मंजूरी से संबंधित जानकारी दी गई थी।

    हालांकि इसके बाद भी हाईकोर्ट के आदेश के पालन की कार्रवाई पूरी नहीं होने पर अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया। कोर्ट के समक्ष यह स्थिति सामने आई कि आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट पेश नहीं की गई और संबंधित राशि वापस करने की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने छिंदवाड़ा एसपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया।

    कोर्ट ने जबलपुर रेंज के आईजी को वारंट की तामील कराने के निर्देश दिए हैं। अब छिंदवाड़ा एसपी को 1 अक्टूबर को हाईकोर्ट के समक्ष पेश होना होगा। इस सुनवाई में अदालत के पिछले आदेश के अनुपालन और अब तक की कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

    यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें विभागीय रिकवरी को लेकर हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी अनुपालन नहीं होने का आरोप है। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि अदालत के आदेश के बावजूद उन्हें निर्धारित राशि नहीं मिली। वहीं विभाग की ओर से गृह विभाग को पत्र भेजे जाने की जानकारी अदालत के सामने रखी गई है। अब आगे की सुनवाई में अदालत इस मामले में विभाग की कार्रवाई और आदेश के पालन की स्थिति देखेगी।

  • मेडिकल यूनिवर्सिटी के 250 करोड़ के फंड पर भी विवाद उज्जैन को 70 फीसदी राशि देने पर आपत्ति

    मेडिकल यूनिवर्सिटी के 250 करोड़ के फंड पर भी विवाद उज्जैन को 70 फीसदी राशि देने पर आपत्ति


    जबलपुर। जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। विश्वविद्यालय को दो हिस्सों में बांटने की प्रक्रिया को लेकर जबलपुर निवासी डॉ. पीजी नाजपांडे सहित अन्य लोगों ने याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदेश की इकलौती मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी के पुनर्गठन में जबलपुर के साथ समान व्यवहार नहीं किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग को नोटिस जारी किया है और चार सप्ताह के भीतर जवाब पेश करने को कहा है।

    याचिका में मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पुनर्गठन से जुड़े राजपत्र में प्रकाशित संशोधन अधिनियम के साथ मध्य प्रदेश धन्वंतरि विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 की वैधानिकता को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए ढांचे के तहत जबलपुर विश्वविद्यालय के हिस्से में चार संभाग रखे गए हैं जबकि उज्जैन में गठित धन्वंतरि विश्वविद्यालय को छह संभाग दिए गए हैं। याचिका में इसी व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं और कहा गया है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया समानता के संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने अदालत में पुनर्गठन की प्रक्रिया को लेकर कई आपत्तियां रखीं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के विभाजन से पहले किसी विशेषज्ञ समिति से विस्तृत अध्ययन नहीं कराया गया। इसके अलावा प्रक्रिया की व्यवहार्यता को लेकर भी कोई रिपोर्ट तैयार नहीं कराई गई। याचिका में दावा किया गया है कि इतने बड़े संस्थागत बदलाव से पहले प्रशासनिक और शैक्षणिक प्रभाव का विशेषज्ञ स्तर पर आकलन किया जाना जरूरी था। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने पुनर्गठन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

    मामले में विश्वविद्यालय की आर्थिक संपत्तियों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बन गया है। याचिका के अनुसार मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के पास करीब 250 करोड़ रुपए का रिजर्व फंड है। याचिकाकर्ताओं ने इस राशि के बंटवारे को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई है। आरोप है कि रिजर्व फंड की करीब 70 प्रतिशत राशि उज्जैन में गठित धन्वंतरि विश्वविद्यालय को दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है। याचिका में इस राशि के हस्तांतरण पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई है।

    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय का पुनर्गठन केवल प्रशासनिक सीमाओं का बदलाव नहीं है बल्कि इसका सीधा असर मेडिकल शिक्षा से जुड़े संस्थानों और विद्यार्थियों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में संभागों के बंटवारे और आर्थिक संसाधनों के वितरण को लेकर स्पष्ट और समान नीति जरूरी है। हाईकोर्ट ने फिलहाल सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग से जवाब मांगा है। अब मामले की अगली सुनवाई में सरकार का पक्ष सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि पुनर्गठन की प्रक्रिया को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर उसका क्या रुख है।

  • छतरपुर गोलीकांड में बड़ा अपडेट शालिगराम गर्ग को मिली जमानत 50 हजार के मुचलके पर रिहाई के निर्देश

    छतरपुर गोलीकांड में बड़ा अपडेट शालिगराम गर्ग को मिली जमानत 50 हजार के मुचलके पर रिहाई के निर्देश

    जबलपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर में हुए चर्चित गोलीकांड के आरोपी शालिगराम गर्ग उर्फ छोटे सरकार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली है। बागेश्वर धाम के संत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिगराम की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने उन्हें 50 हजार रुपए के मुचलके पर रिहा करने के निर्देश दिए हैं। मंगलवार को जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की सिंगल बेंच ने पहले से सुरक्षित रखा गया फैसला सुनाया। अदालत के आदेश के बाद अब शालिगराम की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।

    शालिगराम गर्ग के खिलाफ आरोप है कि उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर छतरपुर के कोड़ा गांव निवासी मोतीलाल कुशवाहा पर जानलेवा हमला किया था। शिकायत के मुताबिक घटना के दौरान गोली भी चलाई गई थी और एक गोली मोतीलाल के सीने में जाकर फंस गई थी। घायल मोतीलाल का जिला अस्पताल में ऑपरेशन किया गया था जिसके बाद गोली निकाल दी गई थी। इस मामले में रघुराजनगर थाना पुलिस ने जांच के बाद शालिगराम को 15 जुलाई 2026 को गिरफ्तार किया था।

    जमानत याचिका पर हाईकोर्ट में शालिगराम की ओर से अधिवक्ता रोहित रघुवंशी और अमित दवे ने पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने अदालत में आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि शालिगराम को राजनीतिक दबाव और पुरानी रंजिश के चलते मामले में फंसाया गया है। वकीलों ने यह भी दलील दी कि आरोपी को बदनाम करने के उद्देश्य से उसके खिलाफ मामला बनाया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। मंगलवार को कोर्ट ने जमानत मंजूर करते हुए 50 हजार रुपए के मुचलके पर रिहाई के निर्देश दिए।

    पूरा मामला जुलाई 2026 में सामने आया था। मोतीलाल कुशवाहा ने आरोप लगाया था कि शालिगराम गर्ग अपने साथियों के साथ उनके घर पहुंचे थे। शिकायत के अनुसार उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें घर से बाहर खींचकर लाठी डंडों से पीटा गया। इसके बाद गोली चलाए जाने का आरोप लगाया गया। मोतीलाल के सीने में गोली लगने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पुलिस ने शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले की जांच शुरू की थी।

    मामले से जुड़ा एक वीडियो भी सामने आने की बात कही गई थी। पुलिस जांच में CCTV फुटेज और अन्य साक्ष्यों को भी शामिल किया गया। एक तस्वीर में शालिगराम के हाथ में हथियार दिखाई देने का दावा किया गया था। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई और बाद में शालिगराम को गिरफ्तार कर लिया।

    इस मामले में जमीन विवाद की बात भी सामने आई थी। घायल मोतीलाल ने आरोप लगाया था कि शालिगराम उनकी जमीन पर कब्जा करना चाहते थे। हालांकि यह आरोप मामले की शिकायत और बयान का हिस्सा हैं और अदालत में मामले की अंतिम सुनवाई के दौरान इन पर निर्णय होना बाकी है।

    मामले पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। उन्होंने कहा था कि शालिगराम गर्ग से उनका कोई संबंध नहीं है और वह इस बात को पहले भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर चुके हैं। उन्होंने घटना को लेकर दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की बात कही थी। फिलहाल हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद शालिगराम की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है जबकि मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रहेगी।

  • हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: ट्रैफिक सुधार के लिए वन-वे और पिक-ड्रॉप सिस्टम अनिवार्य

    हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: ट्रैफिक सुधार के लिए वन-वे और पिक-ड्रॉप सिस्टम अनिवार्य


    जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जबलपुर शहर में बढ़ती ट्रैफिक अव्यवस्था और अदालत परिसरों के आसपास हो रही अवैध पार्किंग को गंभीर समस्या मानते हुए प्रशासन को तत्काल प्रभाव से अंतरिम यातायात व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक प्रस्तावित मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक ट्रैफिक दबाव कम करने के लिए विशेष व्यवस्थाएं लागू की जाएं।

    ‘पिक एंड ड्रॉप’ सिस्टम अपनाने पर जोर

    हाईकोर्ट ने अदालत आने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए ‘पिक एंड ड्रॉप’ व्यवस्था को बढ़ावा देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के आदेश के अनुसार, एडवोकेट जनरल राज्य सरकार के सभी विभागों के प्रमुखों को एडवाइजरी जारी करेंगे, ताकि कोर्ट आने वाले अधिकारी अपनी गाड़ियों को लंबे समय तक पार्क करने के बजाय ‘पिक एंड ड्रॉप’ प्रणाली का उपयोग करें।

    इसी तरह, केंद्र सरकार के अधिकारियों के लिए असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल भी आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेंगे। न्यायालय का मानना है कि इससे अदालतों के आसपास वाहनों की संख्या कम होगी और ट्रैफिक जाम की समस्या में राहत मिलेगी।

    वकीलों से कार-पूलिंग की अपील

    कोर्ट ने अधिवक्ताओं से भी सहयोग की अपेक्षा जताई है। जिन वकीलों के पास निजी ड्राइवर उपलब्ध हैं, उन्हें ‘पिक एंड ड्रॉप’ सिस्टम अपनाने की सलाह दी गई है। साथ ही पार्किंग पर दबाव कम करने के लिए कार-पूलिंग को प्रोत्साहित करने की अपील की गई है।

    सुबह 10 से शाम 6 बजे तक रहेगा ‘वन-वे’

    यातायात को सुचारू बनाने के लिए हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि कलेक्टर ऑफिस क्रॉसिंग से तहसील क्रॉसिंग तक का मार्ग सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक वन-वे घोषित किया जाए। इस दौरान वाहनों की आवाजाही एक ही दिशा में नियंत्रित की जाएगी, जिससे सड़क पर जाम की स्थिति कम हो सके।

    इसके अलावा हाईकोर्ट और जिला अदालत के सामने ट्रैफिक नियंत्रण के लिए पर्याप्त संख्या में ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की तैनाती सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए गए हैं।

    फ्लाईओवर निर्माण पर भी नजर

    याचिका में अदालत के सामने से गुजरने वाली मुख्य सड़क पर फ्लाईओवर निर्माण की मांग भी उठाई गई है। इस संबंध में पहले से दो याचिकाएं न्यायालय में लंबित हैं। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बताते हुए अगली सुनवाई 20 जुलाई को निर्धारित की है।

    शहरवासियों को मिल सकती है राहत

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘पिक एंड ड्रॉप’, कार-पूलिंग और ‘वन-वे’ जैसी व्यवस्थाओं का प्रभावी ढंग से पालन कराया गया, तो अदालत क्षेत्र और आसपास की सड़कों पर लगने वाले जाम में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासन द्वारा इन निर्देशों के क्रियान्वयन पर टिकी हैं।
  • शाहजहांनाबाद मासूम हत्याकांड: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दोषी अतुल निहाले का तिहरा मृत्युदंड बरकरार

    शाहजहांनाबाद मासूम हत्याकांड: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दोषी अतुल निहाले का तिहरा मृत्युदंड बरकरार


    जबलपुर/भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी को झकझोर देने वाले शाहजहांनाबाद मासूम बलात्कार और हत्याकांड मामले में न्याय की जीत हुई है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी अतुल निहाले 30 को मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी के परिजनों द्वारा दायर की गई अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

    यह मामला न केवल अपनी संवेदनशीलता के लिए, बल्कि कानूनी इतिहास के लिए भी विशेष है। भोपाल की विशेष अदालत ने दोषी अतुल निहाले को अपहरण बलात्कार और हत्या, इन तीनों अलग-अलग धाराओं में ‘तिहरा मृत्युदंड सुनाया था। यानी उसे प्रत्येक जघन्य अपराध के लिए अलग से फांसी की सजा दी गई थी। भारतीय न्याय संहिता के लागू होने के बाद मध्यप्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जहां किसी अपराधी को एक साथ तीन मृत्युदंड मिले हों।

    क्या थी दिल दहला देने वाली वह घटना

    घटना भोपाल के शाहजहांनाबाद क्षेत्र की है, जहां एक 5 वर्षीय मासूम बच्ची अचानक लापता हो गई थी। सघन तलाशी के बाद बच्ची का शव पड़ोस में रहने वाले मजदूर अतुल निहाले के घर में पानी की टंकी से बरामद हुआ था। जांच में यह बात सामने आई थी कि आरोपी ने बच्ची का अपहरण किया, उसके साथ हैवानियत की और पकड़े जाने के डर से उसकी बेरहमी से हत्या कर शव को छिपा दिया।

    हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर दुर्लभ से दुर्लभतम की श्रेणी में माना। न्यायालय ने कहा कि ऐसे जघन्य कृत्य समाज के लिए खतरा हैं और मासूमों की सुरक्षा के प्रति कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता। आरोपी के परिजनों ने उसकी पृष्ठभूमि और कम उम्र का हवाला देकर सजा कम करने की गुहार लगाई थी जिसे अदालत ने अपराध की वीभत्सता को देखते हुए ठुकरा दिया। भोपाल पुलिस और अभियोजन पक्ष ने इस मामले में बेहद कम समय में वैज्ञानिक साक्ष्य और पुख्ता गवाह पेश किए थे, जिसकी बदौलत यह सजा बरकरार रह सकी। इस फैसले के बाद पीड़िता के परिवार और स्थानीय नागरिकों ने न्यायपालिका के प्रति आभार व्यक्त किया है।