Tag: Jai Bhim

  • OTT पर दबकर रह गई सिराई, जय भीम जैसा टॉर्चर और इंसाफ की लड़ाई हिला देगी अंदर तक

    OTT पर दबकर रह गई सिराई, जय भीम जैसा टॉर्चर और इंसाफ की लड़ाई हिला देगी अंदर तक


    नई दिल्ली । ओटीटी की भीड़ में कई बार बेहतरीन फिल्में चुपचाप आकर निकल जाती हैं। साल 2026 में ZEE5 पर रिलीज हुई तमिल फिल्म सिराई भी कुछ ऐसी ही फिल्म है जो बड़े स्टार्स की फिल्मों के शोर में दब गई। कहा जा रहा है कि धुरंधर की चर्चा के बीच इस फिल्म पर कम लोगों की नजर पड़ी लेकिन कंटेंट के मामले में यह किसी से कम नहीं। IMDb पर 8.2 की दमदार रेटिंग के साथ सिराई उन फिल्मों में गिनी जा रही है जो सिस्टम की सच्चाई को बेधड़क सामने रखती हैं।

    फिल्म में लीड रोल निभाया है विक्रम प्रभु ने। उनके साथ कई अनुभवी तमिल कलाकार नजर आते हैं जो कहानी को मजबूत आधार देते हैं। यह फिल्म तमिल में बनी है लेकिन अच्छी बात यह है कि ओटीटी पर यह हिंदी में भी उपलब्ध है इसलिए भाषा दर्शकों के लिए रुकावट नहीं बनती।

    सिराई का अर्थ है जेल या कैद और फिल्म का मूल भी इसी विचार के इर्द-गिर्द घूमता है। कहानी एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की है जिसे एक हाई-प्रोफाइल कैदी को एक जेल से दूसरी जेल में ट्रांसफर करने की जिम्मेदारी मिलती है। शुरुआत में यह एक सामान्य ड्यूटी लगती है लेकिन सफर के दौरान उसे पता चलता है कि जिस कैदी को वह ले जा रहा है वह असल में निर्दोष है। उसे कुछ ताकतवर लोगों ने अपने फायदे के लिए फंसाया है।

    यहीं से कहानी में असली संघर्ष शुरू होता है। एक तरफ सिस्टम का दबाव और वर्दी की जिम्मेदारी दूसरी तरफ इंसानियत और अंतरात्मा की आवाज। क्या वह आदेश का पालन करेगा या सच का साथ देगा? फिल्म इसी नैतिक दुविधा को बेहद सधे हुए अंदाज में पेश करती है।

    इस फिल्म की खास बात यह है कि इसमें मसाला एंटरटेनमेंट वाला ओवर-द-टॉप एक्शन नहीं है। यहां सब कुछ रियलिस्टिक है पुलिसिया पूछताछ मानसिक दबाव सत्ता का खेल और कानून की खामियां। यही यथार्थवाद फिल्म को असरदार बनाता है।

    अगर आपको जय भीम और विसरानई जैसी फिल्में पसंद आई थीं तो सिराई भी आपको जरूर प्रभावित करेगी। यह सिर्फ पुलिस और कैदी की कहानी नहीं है बल्कि यह न्याय व्यवस्था की परतें खोलती है और सवाल पूछती है कि सच की कीमत आखिर कितनी भारी होती है।

    विक्रम प्रभु ने अपने किरदार में गजब की गंभीरता दिखाई है। उनके चेहरे के भाव आंखों की बेचैनी और भीतर चल रहे द्वंद्व को उन्होंने बारीकी से निभाया है। फिल्म आपको अंत तक बांधे रखती है और सोचने पर मजबूर करती है। 

  • यादव जी की लव स्टोरी’ पर बवाल, रिलीज से पहले जाति और ‘लव जिहाद’ के आरोपों में घिरी फिल्म

    यादव जी की लव स्टोरी’ पर बवाल, रिलीज से पहले जाति और ‘लव जिहाद’ के आरोपों में घिरी फिल्म


    नई दिल्ली । 27 फरवरी को रिलीज के लिए तैयार फिल्म यादव जी की लव स्टोरी सिनेमाघरों तक पहुंचने से पहले ही विवादों के भंवर में फंस गई है। फिल्म की कहानी एक यादव समाज की लड़की और एक मुस्लिम लड़के की प्रेम कहानी पर आधारित बताई जा रही है, जिसे लेकर यादव समाज के कुछ संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि फिल्म उनकी जातीय पहचान को गलत संदर्भ में पेश करती है और समाज में भ्रम फैलाने की आशंका पैदा करती है। कुछ लोगों ने इसे लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दे से जोड़ते हुए आरोप लगाया है कि फिल्म एक खास नैरेटिव को बढ़ावा देती है। विरोध करने वाले समूहों ने चेतावनी दी है कि यदि फिल्म को रिलीज किया गया तो आंदोलन तेज किया जाएगा।

    फिल्म के मेकर्स की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विवाद के कारण यह फिल्म चर्चा के केंद्र में आ गई है। भारतीय सिनेमा में यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है। जब भी कहानी जाति, धर्म या सामाजिक पहचान जैसे विषयों को छूती है, तो संवेदनशीलता और विरोध साथ-साथ चलते हैं। इससे पहले भी कई फिल्में इसी तरह के आरोपों और प्रदर्शनों का सामना कर चुकी हैं।

    पद्मावत इसका प्रमुख उदाहरण है। फिल्म के निर्माण के दौरान ही राजपूत संगठनों और करणी सेना ने यह आरोप लगाया था कि रानी पद्मावती के चरित्र को गलत ढंग से चित्रित किया जाएगा और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की जाएगी। विरोध इतना तीव्र हुआ कि सेट पर तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं और बाद में फिल्म में कुछ बदलाव भी किए गए। इसी तरह सैराट ने भी अंतरजातीय प्रेम कहानी को पर्दे पर उतारा, जिसमें एक दलित लड़के और मराठा लड़की के रिश्ते को दिखाया गया था। इस पर कुछ मराठा संगठनों ने आपत्ति जताई और प्रदर्शन किए।

    आर्टिकल 15 ने जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय के मुद्दे को उठाया था। फिल्म को सराहना के साथ-साथ विरोध भी झेलना पड़ा, क्योंकि कुछ संगठनों का मानना था कि इसमें समाज के एक वर्ग की छवि नकारात्मक रूप में पेश की गई है। वहीं जय भीम को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ, जब वन्नियार समुदाय के कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि फिल्म में उनके समाज को गलत तरीके से दर्शाया गया है। मामला कानूनी नोटिस और सार्वजनिक बहस तक पहुंच गया।

    महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित फुले को भी महाराष्ट्र में कुछ ब्राह्मण संगठनों के ोविरोध का सामना करना पड़ा था। आरोप लगाया गया कि फिल्म इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है और एक समुदाय विशेष को नकारात्मक रूप में दिखाती है।

    इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सिनेमा जब सामाजिक यथार्थ को छूता है, तो वह सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहता, बल्कि बहस और टकराव का कारण भी बन जाता है। यादव जी की लव स्टोरी का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि मेकर्स और विरोध कर रहे समूहों के बीच संवाद स्थापित होता है या नहीं। फिलहाल इतना तय है कि फिल्म ने रिलीज से पहले ही समाज और सिनेमा के रिश्ते पर एक नई बहस छेड़ दी है।