Tag: Jaishankar

  • जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति

    जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में नई दिशा देने के उद्देश्य से व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक मॉस्को में हुई। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। इस दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग से जुड़े अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए और कई प्रमुख क्षेत्रों में व्यावहारिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

    दो दिवसीय रूस यात्रा पर पहुंचे जयशंकर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव से मुलाकात की। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद भारत और रूस के संबंधों में लगातार मजबूती और अनुकूलन क्षमता दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच आपसी हित और विश्वास को रणनीतिक साझेदारी का आधार बताया गया।

    जयशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2021-22 में करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार 2025-26 में बढ़कर लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। व्यापार में यह वृद्धि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन इसके साथ व्यापार असंतुलन भी काफी बढ़ा है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि व्यापार घाटे का अंतर करीब 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। उन्होंने इस असंतुलन को दूर करना भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंधों की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताया। दोनों पक्षों के बीच व्यापार को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के लिए नए अवसर तलाशने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

    बैठक में ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु सहयोग, कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और मानव संसाधन की आवाजाही जैसे क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया। जयशंकर ने कहा कि बदलते वैश्विक आर्थिक और तकनीकी माहौल में दोनों देशों को नए क्षेत्रों की संभावनाओं की पहचान करते हुए सहयोग का दायरा बढ़ाना होगा।

    उन्होंने भारत और रूस के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में उद्योग जगत की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार सरकारें व्यापार और निवेश के लिए आवश्यक ढांचा तैयार कर सकती हैं, लेकिन वास्तविक निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन में कारोबारी क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका रहती है। इसलिए संस्थागत तंत्र को उद्योग की प्राथमिकताओं के साथ लगातार जोड़े रखने की आवश्यकता है।

    जयशंकर ने कहा कि अंतर-सरकारी आयोग के विभिन्न कार्य समूहों और उप-समूहों को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तय लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने समस्या समाधान और व्यावहारिक परिणामों को भविष्य की बैठकों की सफलता का प्रमुख आधार बताया।

    बैठक के बाद जयशंकर ने मंटुरोव को आयोग की सह-अध्यक्षता के लिए धन्यवाद दिया और चर्चा को उत्पादक बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बैठक उपयोगी रही। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों में आर्थिक सहयोग को और व्यापक बनाने तथा नई तकनीकी और रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप साझेदारी विकसित करने पर दोनों पक्षों का जोर रहा।

  • टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    टैरिफ दबाव के बीच जयशंकर का रूस दौरा अहम, लावरोव से मुलाकात में तेल व्यापार और रणनीतिक सहयोग पर चर्चा संभव

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री एस. जयशंकर 23 अगस्त से दो दिन के रूस दौरे पर जा रहे हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और रूस के संबंधों के साथ-साथ भारत के ऊर्जा हित भी अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच चर्चा में हैं। यात्रा के दौरान जयशंकर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर बातचीत करेंगे।

    जयशंकर व्यापार, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति से जुड़े भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक की सह-अध्यक्षता भी करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आर्थिक और कारोबारी सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में चल रही साझेदारी की समीक्षा किए जाने की उम्मीद है।

    जयशंकर का रूस दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूस से तेल, गैस और यूरेनियम खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी के बीच हो रहा है। ऐसे में भारत-रूस ऊर्जा कारोबार इस यात्रा के महत्वपूर्ण संदर्भों में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और रूस पिछले कुछ समय में उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है।

    यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की पाबंदियों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलाव के बीच भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी थी। हालांकि अमेरिकी दबाव और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच रूसी तेल आयात में बदलाव की स्थिति बनी रही। इसके बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने से ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और भारत के लिए रूसी तेल का महत्व फिर बढ़ गया।

    जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक पहुंचने की बात सामने आई। यह आंकड़ा बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा में रूसी आपूर्ति कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा के दौरान ऊर्जा सहयोग और व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत को विशेष महत्व मिल सकता है।

    दौरे का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रक्षा और सैन्य तकनीकी सहयोग है। भारत और रूस लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में साझेदार रहे हैं। हाल ही में दोनों देशों के अंतर-सरकारी आयोग के सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग से जुड़े कार्य समूह की बैठक भी हुई थी। इसमें दोनों पक्षों ने सशस्त्र बलों के बीच सहयोग बढ़ाने और आगामी गतिविधियों की योजना पर चर्चा की थी।

    इस पृष्ठभूमि में जयशंकर की रूस यात्रा दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और सैन्य साझेदारी से जुड़े विषय भी द्विपक्षीय बातचीत के एजेंडे में रह सकते हैं, हालांकि किसी विशेष नई रक्षा डील की पुष्टि अभी नहीं हुई है।

    भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश व्यापार, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति और आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अंतर-सरकारी आयोग की बैठक इसी व्यापक सहयोग को संस्थागत स्तर पर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।

    रूसी नेतृत्व भी हाल के समय में भारत के आर्थिक और तकनीकी विकास की सराहना करता रहा है। ऐसे में जयशंकर की यात्रा को दोनों देशों के बीच पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिकी टैरिफ दबाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत के लिए रूस के साथ संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

  • कारगिल विजय दिवस पर देश ने याद किया वीरों का शौर्य, जयशंकर और राजनाथ सिंह ने बलिदान को दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

    कारगिल विजय दिवस पर देश ने याद किया वीरों का शौर्य, जयशंकर और राजनाथ सिंह ने बलिदान को दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

    नई दिल्ली । देश ने रविवार को 27वां कारगिल विजय दिवस पूरे सम्मान और गर्व के साथ मनाया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने कारगिल युद्ध के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिकों के अदम्य साहस और समर्पण को नमन करते हुए कहा कि उनका शौर्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

    विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर अपने संदेश में कहा कि यह दिन उन बहादुर सैनिकों के साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति को याद करने का अवसर है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों की सेवा और त्याग को देश हमेशा सम्मान और गर्व के साथ याद रखेगा। उनके अनुसार कारगिल के वीरों की गाथा केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प और आत्मविश्वास की पहचान भी है।

    कारगिल विजय दिवस भारत की उस ऐतिहासिक जीत की याद दिलाता है, जब वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए दुश्मन के कब्जे से रणनीतिक चोटियों को दोबारा अपने नियंत्रण में लिया था। बर्फ से ढकी ऊंची पहाड़ियों, प्रतिकूल मौसम और लगातार हो रही गोलाबारी के बीच भारतीय जवानों ने अद्वितीय साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया। 26 जुलाई को मिली इस विजय ने भारतीय सेना की क्षमता और राष्ट्र की एकजुटता का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया।

    कारगिल विजय दिवस के अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कारगिल युद्ध स्मारक पहुंचकर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने ध्वजारोहण समारोह में भाग लिया और शौर्य विजय यात्रा के समापन कार्यक्रम में भी शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना के जवानों को संबोधित करते हुए कहा कि कारगिल युद्ध स्मारक पर लहराता तिरंगा उन वीर सैनिकों के अद्वितीय बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

    रक्षा मंत्री ने कहा कि वर्ष 1999 में भारतीय सीमा पर हुई घुसपैठ का भारतीय सेना ने अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल के साथ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दुश्मन ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाने की कोशिश की थी, लेकिन भारतीय सैनिकों ने असाधारण वीरता का परिचय देते हुए सभी चुनौतियों को परास्त कर दिया। उन्होंने कहा कि कारगिल के योद्धाओं ने केवल ऊंची चोटियां ही नहीं जीतीं, बल्कि पूरे देश का विश्वास और सम्मान भी मजबूत किया।

    राजनाथ सिंह ने कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडे सहित अनेक वीर सैनिकों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी वीरगाथाएं आज भी देश के युवाओं को राष्ट्रसेवा, कर्तव्य और त्याग का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि कारगिल विजय दिवस केवल एक सैन्य जीत का स्मरण नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को देश के प्रति अपने दायित्वों का एहसास कराने वाला अवसर भी है। उनके अनुसार सेवा, समर्पण और बलिदान जैसे मूल्य ही किसी भी मजबूत राष्ट्र की आधारशिला होते हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सशस्त्र बल लगातार देश की सुरक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हर मोर्चे पर सजग हैं। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर पूरे देश ने वीर शहीदों के अद्वितीय योगदान को स्मरण करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। यह दिवस एक बार फिर देशवासियों को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने और वीर सैनिकों के बलिदान से प्रेरणा लेने का संदेश देता है।

  • मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    मनीला में जयशंकर की कूटनीतिक सक्रियता, श्रीलंका-बांग्लादेश समेत कई देशों के नेताओं से अहम मुलाकातें

    नई दिल्ली । विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित आसियान से जुड़ी उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान कई देशों के विदेश मंत्रियों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ व्यापक कूटनीतिक संवाद किया। इस दौरान उन्होंने श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान तथा यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास से अलग-अलग मुलाकात कर द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़े विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इन बैठकों को भारत की सक्रिय विदेश नीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक भागीदारी के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    दो दिवसीय मनीला दौरे के दौरान विदेश मंत्री ने आसियान-इंडिया, ईस्ट एशिया समिट और आसियान रीजनल फोरम की विदेश मंत्री स्तरीय बैठकों में हिस्सा लिया। इन बैठकों का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करना, सुरक्षा चुनौतियों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करना तथा आर्थिक और समुद्री साझेदारी को नई दिशा देना रहा। भारत ने इन मंचों पर अपने सहयोगी देशों के साथ बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    श्रीलंका और बांग्लादेश के विदेश मंत्रियों के साथ मुलाकात के दौरान आपसी संबंधों, क्षेत्रीय विकास और सहयोग के विभिन्न आयामों पर चर्चा हुई। भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ पारस्परिक विश्वास और सहयोग को आगे बढ़ाने की नीति पर जोर दिया। इसके साथ ही यूरोपीय संघ की वरिष्ठ प्रतिनिधि काजा कैलास के साथ हुई बैठक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक चुनौतियों तथा साझा हितों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

    मनीला प्रवास के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने कई अन्य प्रमुख देशों के विदेश मंत्रियों से भी द्विपक्षीय मुलाकातें कीं। इनमें फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, चीन, अमेरिका, रूस, सिंगापुर, कनाडा, थाईलैंड और न्यूजीलैंड के विदेश मंत्री शामिल रहे। इसके अलावा उन्होंने आसियान के महासचिव से भी मुलाकात कर क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की। इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न देशों के साथ भारत के रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई गति देना था।

    विदेश मंत्री ने क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी भाग लिया। इस दौरान हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वर्तमान स्थिति, क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री सहयोग और हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में नई दिल्ली में पहले हुई क्वाड वार्ता के निर्णयों की समीक्षा की गई और स्वतंत्र, समावेशी तथा नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई गई। साथ ही आसियान की केंद्रीय भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

    भारत सरकार का मानना है कि यह दौरा एक्ट ईस्ट नीति के तहत आसियान देशों के साथ बढ़ते सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत और आसियान के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से दोनों पक्ष व्यापार, संपर्क, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को लगातार विस्तार दे रहे हैं। वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, जिससे समुद्री संपर्क, ब्लू इकोनॉमी और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच सहयोग को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। मनीला में हुई ये बैठकें भारत की सक्रिय कूटनीति और बहुपक्षीय मंचों पर उसकी बढ़ती भूमिका को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं।

  • भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में जारी प्रयासों के बीच विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के रिश्तों में स्थायी सुधार तभी संभव है, जब सीमा क्षेत्रों में पूरी तरह शांति और स्थिरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांतिपूर्ण माहौल दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और सामान्य संबंधों की सबसे पहली तथा अनिवार्य शर्त है। यह संदेश उन्होंने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान दिया, जिसमें दोनों देशों के संबंधों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

    बैठक के दौरान भारत ने यह भी दोहराया कि दोनों देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान, समान हितों और संवेदनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और चीन जैसे बड़े तथा प्रभावशाली पड़ोसी देशों के बीच स्थिर और संतुलित संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एशिया और वैश्विक स्तर पर भी उनका व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को मजबूत करने के लिए संवेदनशील मुद्दों का समाधान जिम्मेदारी और संवाद के माध्यम से किया जाना आवश्यक है।

    विदेश मंत्री ने सीमा क्षेत्रों में हालात सुधारने के लिए पिछले कुछ समय में उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने विभिन्न स्तरों पर संवाद और समन्वय के जरिए कई सकारात्मक पहल की हैं। इसके बावजूद सीमा क्षेत्रों में स्थायी शांति बनाए रखने के लिए सैन्य और राजनयिक तंत्र के बीच निरंतर संपर्क तथा सक्रिय सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के तनाव की संभावना कम हो सके।

    भारत ने बैठक के दौरान आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया। विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय कंपनियों को चीन के बाजार में निष्पक्ष और पारदर्शी अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार असंतुलन पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे संतुलित करने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने भरोसेमंद और स्थिर सप्लाई चेन की अहमियत पर बल देते हुए कहा कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक सहयोग को अधिक पारदर्शी और संतुलित बनाना समय की मांग है।

    बैठक में दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता पर भी सहमति जताई गई। विदेश मंत्री ने कहा कि नियमित संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, यात्रा सुविधाओं में सुधार और विभिन्न द्विपक्षीय तंत्रों की सक्रिय बैठकों से आपसी विश्वास को और मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर संवाद बनाए रखना भविष्य के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें विवाद या टकराव में बदलने से रोकना दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। विदेश मंत्री ने कहा कि संवाद और कूटनीति ही ऐसे मुद्दों का सबसे प्रभावी समाधान है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत रचनात्मक सहयोग और सकारात्मक संबंधों का पक्षधर है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा की स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    हाल के समय में दोनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में संवाद और सहयोग बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक पहल देखने को मिली है। हालांकि भारत का स्पष्ट मानना है कि सीमा पर स्थायी शांति और विश्वास का वातावरण ही भविष्य में मजबूत, संतुलित और दीर्घकालिक भारत-चीन संबंधों की वास्तविक आधारशिला बन सकता है।

  • जयशंकर और जांजीबार के राष्ट्रपति म्विनी की अहम मुलाकात, शिक्षा, एआई और डिजिटल सहयोग को नई गति देने पर बनी सहमति

    जयशंकर और जांजीबार के राष्ट्रपति म्विनी की अहम मुलाकात, शिक्षा, एआई और डिजिटल सहयोग को नई गति देने पर बनी सहमति

    नई दिल्ली । भारत और तंजानिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने की दिशा में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार को जांजीबार, यूनाइटेड रिपब्लिक ऑफ तंजानिया के राष्ट्रपति और रिवोल्यूशनरी काउंसिल के चेयरमैन डॉ. हुसैन अली म्विनी से नई दिल्ली में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने शिक्षा, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, जल आपूर्ति और अन्य विकासोन्मुख क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब भारत और तंजानिया अपने दीर्घकालिक संबंधों को नई तकनीकी और शैक्षणिक साझेदारियों के माध्यम से आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।

    बैठक के बाद विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने बातचीत को सकारात्मक और उपयोगी बताते हुए कहा कि भारत जांजीबार और तंजानिया के साथ अपनी विकास साझेदारी को लगातार मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने उच्च शिक्षा, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की है। उनका कहना था कि ये ऐसे क्षेत्र हैं जो भविष्य की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    विदेश मंत्री ने विशेष रूप से शिक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आईआईटी जांजीबार भारत और तंजानिया के बीच मजबूत होते शैक्षणिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक है। उनके अनुसार यह परियोजना न केवल दोनों देशों की साझेदारी को नई ऊंचाई देती है, बल्कि अफ्रीका में शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है। उन्होंने इसे ज्ञान आधारित सहयोग का प्रभावी उदाहरण बताया।

    राष्ट्रपति डॉ. हुसैन अली म्विनी भारत के आधिकारिक दौरे पर हैं और इससे पहले उन्होंने चेन्नई में आयोजित आईआईटी मद्रास के 63वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया था। अपने चेन्नई प्रवास के दौरान उन्होंने भारत और जांजीबार के बीच शैक्षणिक सहयोग की सराहना करते हुए आईआईटी मद्रास के जांजीबार परिसर को दोनों देशों के संबंधों की ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। यह भारत का पहला विदेशी आईआईटी परिसर है, जिसे दोनों देशों के बीच ज्ञान और नवाचार आधारित सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    नई दिल्ली पहुंचने पर राष्ट्रपति म्विनी का औपचारिक स्वागत किया गया। इस अवसर पर भारत और तंजानिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोगों के बीच संपर्क और साझा विकास प्राथमिकताओं को भी रेखांकित किया गया। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि शिक्षा, डिजिटल नवाचार, स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से दोनों देशों के विकास संबंधों को और मजबूती मिलेगी।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से अफ्रीकी देशों के साथ विकास साझेदारी को व्यापक रूप देने पर लगातार कार्य कर रहा है। इसी नीति के तहत शिक्षा, प्रौद्योगिकी, डिजिटल परिवर्तन और कौशल विकास को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। जांजीबार के राष्ट्रपति की यह यात्रा भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि इस दौरे से भारत और तंजानिया के बीच रणनीतिक, शैक्षणिक और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी तथा दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विकास साझेदारी और अधिक सुदृढ़ होगी।

  • एस. जयशंकर ने रखा भारत का वैश्विक विजन; बोले- संघर्ष और अस्थिरता के दौर में संयुक्त राष्ट्र को निभानी होगी निर्णायक भूमिका

    एस. जयशंकर ने रखा भारत का वैश्विक विजन; बोले- संघर्ष और अस्थिरता के दौर में संयुक्त राष्ट्र को निभानी होगी निर्णायक भूमिका

    नई दिल्ली । भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की 2028-29 की गैर-स्थायी सदस्यता के लिए अपना औपचारिक अभियान शुरू करते हुए वैश्विक मंच पर अपनी प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को स्पष्ट किया है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अभियान की शुरुआत के दौरान कहा कि वर्तमान समय में दुनिया अभूतपूर्व संघर्ष, हिंसा और अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। ऐसे माहौल में संयुक्त राष्ट्र और विशेष रूप से सुरक्षा परिषद की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि वैश्विक शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप कार्य करना होगा।

    डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत का उद्देश्य केवल सुरक्षा परिषद की सदस्यता हासिल करना नहीं, बल्कि वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी और व्यावहारिक बनाने में सक्रिय योगदान देना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है जहां सभी देशों की आवाज को समान महत्व मिले और विकासशील देशों, विशेषकर ग्लोबल साउथ, को निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। उनके अनुसार बदलती वैश्विक परिस्थितियों में बहुपक्षीय संस्थाओं को भी समय के अनुरूप स्वयं को ढालना आवश्यक है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि भारत का पूरा अभियान एसएचएएनटीआई दृष्टिकोण पर आधारित होगा, जिसका उद्देश्य विश्वास, पारदर्शिता, अंतरराष्ट्रीय मानकों और सहयोग के माध्यम से समग्र प्रगति सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि भारत विभिन्न देशों के बीच संवाद, सहयोग और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास करेगा ताकि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीकों से संभव हो सके। उनका मानना है कि स्थायी शांति केवल बातचीत और सहयोग से ही सुनिश्चित की जा सकती है।

    उन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए पीसकीपिंग मिशनों को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रशिक्षण और स्पष्ट रणनीति से लैस करना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत महिला, शांति और सुरक्षा एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा तथा शांति अभियानों में महिला शांति सैनिकों की भूमिका को और मजबूत करने का समर्थन करेगा।

    नई और उभरती तकनीकों का उल्लेख करते हुए डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मानव-केंद्रित और जिम्मेदार उपयोग का समर्थक है। उन्होंने कहा कि एआई का उपयोग समावेशी विकास, सार्वजनिक हित और सुरक्षा के लिए किया जाना चाहिए। साथ ही इसके दुरुपयोग को रोकने और अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा पर संभावित खतरों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग की आवश्यकता भी उन्होंने रेखांकित की।

    समुद्री सुरक्षा को भारत की महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल बताते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि नियम-आधारित और स्वतंत्र समुद्री व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। उन्होंने सुरक्षित समुद्री व्यापार, समुद्री डकैती पर नियंत्रण, नाविकों की सुरक्षा तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों को निरंतर समर्थन देने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। साथ ही उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण पर प्रभावी रोक लगाने और आतंकी संगठनों के खिलाफ पारदर्शी एवं साक्ष्य-आधारित वैश्विक प्रतिबंध प्रणाली की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    अपने संबोधन के अंत में डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज की चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, उत्तरदायी और परिणामोन्मुख बने। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत का अभियान वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक समावेशी, संतुलित और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देगा तथा विश्व समुदाय के सामने मौजूद नई चुनौतियों से सामूहिक रूप से निपटने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

  • कतर दौरे में भारत-कतर रिश्तों को नई मजबूती, एस. जयशंकर ने प्रधानमंत्री अल थानी के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर की व्यापक चर्चा

    कतर दौरे में भारत-कतर रिश्तों को नई मजबूती, एस. जयशंकर ने प्रधानमंत्री अल थानी के साथ ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय मुद्दों पर की व्यापक चर्चा


    नई दिल्ली।
    विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कतर की अपनी आधिकारिक यात्रा पूरी करते हुए दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बातचीत की। दौरे के दौरान उन्होंने कतर के प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से मुलाकात कर ऊर्जा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और लोगों के बीच संबंधों सहित द्विपक्षीय सहयोग के विभिन्न आयामों की व्यापक समीक्षा की। दोनों नेताओं ने भविष्य में सहयोग के नए अवसरों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श किया।

    यह यात्रा विदेश मंत्री के बहु-देशीय पश्चिम एशिया दौरे का पहला चरण थी। इस दौरे का उद्देश्य क्षेत्र के प्रमुख देशों के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना, क्षेत्रीय हालात पर चर्चा करना तथा साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाना है। कतर के बाद उनका कार्यक्रम बहरीन, कुवैत और ओमान की यात्राओं का भी है।

    बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक सहयोग, निवेश बढ़ाने की संभावनाओं और आपसी संपर्क को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के कई मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विषय भी चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे।

    विदेश मंत्री ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी संवाद में कतर की सक्रिय मध्यस्थता भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों में कतर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। दोनों नेताओं ने साझा हितों वाले बहुपक्षीय विषयों पर भी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

    दोहा प्रवास के दौरान डॉ. जयशंकर ने भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। उन्होंने कतर के विकास और समाज में भारतीय समुदाय के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी भारतीय नागरिकों ने अपने दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन किया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि विदेशों में रह रहे भारतीयों का कल्याण सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

    विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय समुदाय के अनुभव, सुझाव और सहभागिता भारत-कतर संबंधों को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर मजबूत होते संबंधों को द्विपक्षीय साझेदारी की बड़ी ताकत बताया और भविष्य में इसे और विस्तार देने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    उन्होंने कतर नेतृत्व का भारत के नागरिकों की सुरक्षा और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए आभार भी व्यक्त किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक सहयोग के साथ-साथ सुरक्षा, कनेक्टिविटी और मानवीय संबंधों को भी आगे बढ़ाने से रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती मिलेगी।

    विदेश मंत्री का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच भारत क्षेत्र के देशों के साथ अपने सहयोग को और गहरा करने की दिशा में सक्रिय कूटनीतिक पहल कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा से भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश तथा क्षेत्रीय सहयोग के क्षेत्रों में भविष्य की साझेदारी को नया विस्तार मिलने की संभावना मजबूत हुई है।

  • दुनिया में बढ़ा भारत का सम्मान’, पीएम मोदी के 12 साल पर विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया बड़ा बदलाव

    दुनिया में बढ़ा भारत का सम्मान’, पीएम मोदी के 12 साल पर विदेश मंत्री जयशंकर ने बताया बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की विदेश नीति और वैश्विक स्थिति में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले एक दशक से अधिक समय में देश ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान और प्रभाव को उल्लेखनीय रूप से मजबूत किया है। उनके अनुसार इस अवधि में विदेश मंत्रालय की कार्यप्रणाली अधिक नागरिक-केंद्रित, तकनीक-सक्षम और वैश्विक चुनौतियों के प्रति अधिक सक्रिय बनी है।

    विदेश मंत्री ने कहा कि पिछले 12 वर्षों के दौरान विदेश मंत्रालय ने आम नागरिकों तक अपनी पहुंच बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया है। पासपोर्ट सेवाओं को सरल और सुलभ बनाया गया, जिससे देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों को पहले की तुलना में अधिक सुविधा मिली। दस्तावेजों के सत्यापन और अन्य प्रक्रियाओं को भी आसान बनाया गया, जिससे विदेश जाने वाले नागरिकों को राहत मिली है।

    जयशंकर ने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और सहायता सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रही है। इसी उद्देश्य से कई देशों में नए भारतीय दूतावास और कॉन्सुलेट स्थापित किए गए। साथ ही भारतीय समुदाय के लिए उपलब्ध सहायता तंत्र को भी मजबूत किया गया, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में त्वरित सहयोग सुनिश्चित किया जा सके।

    उन्होंने विशेष रूप से उन अभियानों का उल्लेख किया जिनमें युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता या मानवीय संकट के दौरान भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया। यूक्रेन, इजरायल, अफगानिस्तान और सूडान जैसे देशों से हजारों भारतीयों की वापसी को उन्होंने सरकार की सक्रिय कूटनीति और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता का उदाहरण बताया। इन अभियानों ने विदेशों में फंसे भारतीयों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाया।

    विदेश मंत्री के अनुसार डिजिटल तकनीक के उपयोग ने विदेश मंत्रालय की कार्यक्षमता को नई दिशा दी है। शिकायत निवारण, नागरिक सहायता और फीडबैक के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए गए, जिससे विदेशों में रहने वाले भारतीयों और मंत्रालय के बीच संवाद अधिक प्रभावी हुआ है। इससे समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया भी तेज हुई है।

    जयशंकर ने यह भी कहा कि सरकार ने भारतीय युवाओं और पेशेवरों के लिए वैश्विक अवसरों का विस्तार करने पर ध्यान दिया है। विभिन्न देशों के साथ किए गए मोबिलिटी समझौतों के माध्यम से भारतीयों को रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास के नए अवसर उपलब्ध हुए हैं। इससे भारतीय प्रतिभाओं की वैश्विक भागीदारी बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजारों तक उनकी पहुंच मजबूत हुई है।

    व्यापार और आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में भी भारत की भूमिका विस्तारित हुई है। विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय निर्यातकों और उद्योगों को नए बाजार उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए गए। विभिन्न विकास परियोजनाओं और आर्थिक साझेदारियों के माध्यम से भारतीय उत्पादों तथा सेवाओं की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को बढ़ावा मिला है। इससे भारत की आर्थिक कूटनीति को भी नई मजबूती मिली है।

    उन्होंने भारतीय संस्कृति और विरासत के वैश्विक प्रचार-प्रसार को भी महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। विभिन्न देशों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक सहयोग और जनसंपर्क पहलों के माध्यम से भारत की परंपराओं, मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति सम्मान और समझ को बढ़ाने का प्रयास किया गया है। इससे भारत की सॉफ्ट पावर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है।

    विदेश मंत्री ने कहा कि आज भारतीय नागरिक विदेश यात्रा के दौरान पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वास और गर्व महसूस करते हैं। उनके अनुसार भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, मजबूत कूटनीतिक उपस्थिति और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका ने देश की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले वर्षों में भी भारत वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका को और अधिक सशक्त बनाएगा।

  • जयशंकर ने ब्राजील के राष्ट्रपति लूला से की मुलाकात, रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने पर हुई चर्चा

    जयशंकर ने ब्राजील के राष्ट्रपति लूला से की मुलाकात, रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने पर हुई चर्चा


    नई दिल्ली/ भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की मुलाकात के बाद जयशंकर ने कहा कि भारत के राजकीय दौरे पर आए राष्ट्रपति लूला से मिलकर सम्मानित महसूस कर रहा हूं उन्होंने बताया कि लूला ने साझा हितों और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने के लिए अपनी गाइडेंस और गर्मजोशी भरी भावनाओं का प्रदर्शन किया उन्होंने यह भी कहा कि आज बाद में पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बैठक से द्विपक्षीय संबंधों को नई रफ्तार मिलेगी इसके बाद ब्राजील के राष्ट्रपति ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और पीएम मोदी से भी मुलाकात की और उसके बाद दोनों नेता द्विपक्षीय बैठक करेंगे विदेश मंत्रालय ने पहले ही बताया था
    कि दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं की समीक्षा करेंगे प्रधानमंत्री आने वाले गणमान्य व्यक्ति के सम्मान में लंच होस्ट करेंगे और आपसी हितों के क्षेत्रीय और ग्लोबल मुद्दों पर विचार करेंगे जिसमें बहुपक्षीय फोरम में सहयोग रिफॉर्म्ड मल्टीलेटरलिज्म ग्लोबल गवर्नेंस और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दे शामिल हैं राष्ट्रपति लूला दूसरे एआई इम्पैक्ट समिट के लिए 18 फरवरी को भारत आए उनके साथ करीब 14 मंत्री और ब्राजील की कंपनियों के टॉप सीईओ का डेलीगेशन भी है जो अपने भारतीय समकक्षों के साथ मीटिंग करेंगे
    यह राष्ट्रपति लूला का भारत का छठा दौरा है वे पहली बार 2004 में रिपब्लिक डे सेलिब्रेशन के गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में भारत आए थे और आखिरी बार सितंबर 2023 में जी20 समिट के लिए भारत आए थे प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति लूला अक्सर मिलते रहे हैं प्रधानमंत्री 7 से 8 जुलाई 2025 तक राजकीय दौरे पर ब्रासीलिया में थे और नवंबर 2025 में जी20 के दौरान जोहान्सबर्ग में भी उनकी मुलाकात हुई भारत और ब्राजील के बीच करीबी और रणनीतिक साझेदारी साझा डेमोक्रेटिक मूल्यों लोगों के बीच गहरे रिश्तों और खास सेक्टरों में बढ़ते सहयोग पर आधारित है दोनों देश 2006 से रणनीतिक साझेदार हैं
    ब्राजील एलएसी इलाके में भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और व्यापार निवेश रक्षा कृषि स्वास्थ्य फार्मास्यूटिकल्स ऊर्जा जिसमें रिन्यूएबल्स जरूरी मिनरल्स रेयर अर्थ मटीरियल्स साइंस टेक्नोलॉजी और नवाचार शामिल हैं जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का जुड़ाव लगातार गहरा होता जा रहा है
    इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एआई स्पेस और लोगों के बीच जुड़ाव के क्षेत्र में सहयोग भी शामिल है दोनों देश यूएन रिफॉर्म्स क्लाइमेट चेंज और आतंकवाद से लड़ने जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर समान विचार रखते हैं विदेश मंत्रालय ने बताया कि राष्ट्रपति लूला का यह राजकीय दौरा दोनों पक्षों को आपसी फायदे के मुद्दों पर रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने और द्विपक्षीय क्षेत्रीय और ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर सहयोग को और गहरा करने का अवसर देगा