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  • हरिद्वार से दिल्ली तक निकली अनोखी कांवड़ यात्रा, मैकलारेन जैसी डमी कार में भगवान शिव की प्रतिमा ने खींचा सबका ध्यान

    हरिद्वार से दिल्ली तक निकली अनोखी कांवड़ यात्रा, मैकलारेन जैसी डमी कार में भगवान शिव की प्रतिमा ने खींचा सबका ध्यान

    नई दिल्ली । सावन माह में जारी कांवड़ यात्रा के बीच उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अनोखी कांवड़ ने श्रद्धालुओं और राहगीरों का विशेष ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मैकलारेन स्पोर्ट्स कार जैसी दिखने वाली विशेष डमी संरचना में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कर निकाली गई इस कांवड़ को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़क किनारे रुकते नजर आए। दूर से देखने पर यह किसी वास्तविक लग्जरी स्पोर्ट्स कार जैसी दिखाई देती थी, लेकिन पास आने पर लोगों को पता चला कि यह श्रद्धालुओं द्वारा विशेष रूप से तैयार कराया गया प्रतिरूप है।

    यह अनोखी कांवड़ दिल्ली के नवादा गांव से आए छह शिवभक्तों द्वारा तैयार कराई गई है। श्रद्धालुओं ने 28 जुलाई को हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी से लगभग 40 लीटर गंगाजल लेकर अपनी यात्रा आरंभ की थी। यात्रा के दौरान गंगाजल को इसी विशेष रूप से डिजाइन की गई कांवड़ के भीतर सुरक्षित रखा गया। श्रद्धालुओं का उद्देश्य दिल्ली पहुंचकर अपने गांव के शिव मंदिर में भगवान शिव का विधि-विधान से जलाभिषेक करना है।

    श्रद्धालुओं के अनुसार, हर वर्ष कांवड़ यात्रा में नई-नई थीम और रचनात्मक डिज़ाइन देखने को मिलते हैं। इसी सोच के साथ इस बार उन्होंने पारंपरिक कांवड़ को आधुनिक स्वरूप देने का निर्णय लिया। सामूहिक चर्चा के बाद स्पोर्ट्स कार की थीम पर कांवड़ तैयार करने का विचार सामने आया और फिर भगवान शिव की प्रतिमा को उसके केंद्र में स्थापित कर इसे अंतिम रूप दिया गया। उनका कहना है कि उद्देश्य केवल अपनी आस्था को एक अलग और आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना था।

    जानकारी के अनुसार जिस स्पोर्ट्स कार से प्रेरणा लेकर यह मॉडल बनाया गया है, उसकी वास्तविक कीमत करोड़ों रुपये बताई जाती है। हालांकि यात्रा में शामिल वाहन पूरी तरह डमी मॉडल है और इसे केवल धार्मिक यात्रा के लिए तैयार किया गया है। श्रद्धालुओं ने बताया कि इस विशेष प्रतिरूप को बनाने और सजाने में लगभग सात से आठ लाख रुपये का खर्च आया। आकर्षक रंग-सज्जा, आधुनिक डिज़ाइन और भगवान शिव की प्रतिमा के संयोजन ने इसे पूरी यात्रा का प्रमुख आकर्षण बना दिया।

    मुजफ्फरनगर से गुजरते समय इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कई राहगीरों ने पहली नजर में इसे असली स्पोर्ट्स कार समझ लिया। जब उन्हें इसके डमी मॉडल होने की जानकारी मिली तो उत्सुकता और बढ़ गई। बड़ी संख्या में लोगों ने इस अनूठी प्रस्तुति के साथ तस्वीरें और वीडियो बनाए। श्रद्धालुओं ने भी लोगों का अभिवादन करते हुए अपनी यात्रा जारी रखी।

    कांवड़ यात्रा के दौरान हर वर्ष श्रद्धालु अपनी आस्था को अलग-अलग कलात्मक और रचनात्मक स्वरूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। कहीं धार्मिक झांकियां तैयार की जाती हैं तो कहीं विशेष थीम पर आधारित कांवड़ बनाई जाती हैं। इस वर्ष मैकलारेन जैसी स्पोर्ट्स कार के रूप में तैयार की गई यह कांवड़ भी उसी रचनात्मक परंपरा का नया उदाहरण बनकर सामने आई है, जिसने धार्मिक आस्था के साथ आधुनिक डिज़ाइन का अनोखा मेल प्रस्तुत किया।

    हरिद्वार से गंगाजल लेकर विभिन्न राज्यों और शहरों की ओर बढ़ रहे लाखों शिवभक्तों के बीच यह विशेष कांवड़ चर्चा का विषय बनी हुई है। श्रद्धालुओं का कहना है कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति है, जबकि यह अनूठी प्रस्तुति उसी भावना को अलग अंदाज में व्यक्त करने का माध्यम है। निर्धारित स्थान पर पहुंचकर वे भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे और सावन माह की धार्मिक परंपरा का विधिवत पालन करेंगे।

  • सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम

    सावन का महीना आज से शुरू, जानें जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि और पूरे महीने के जरूरी नियम


    नई दिल्ली । भगवान शिव को समर्पित पवित्र सावन मास का शुभारंभ आज से हो गया है, जो 28 अगस्त तक चलेगा। हिंदू धर्म में इस पूरे महीने को शिव आराधना, तप, व्रत और भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि सावन में विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा और जलाभिषेक करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस वर्ष सावन के पहले दिन कई शुभ योग भी बन रहे हैं, जिससे इसका धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

    आज जलाभिषेक के शुभ मुहूर्त
    सावन के पहले दिन भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए कई शुभ समय निर्धारित हैं—
    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:36 बजे से 5:24 बजे तक
    प्रातः संध्या: सुबह 4:39 बजे से 5:41 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:20 बजे से 1:12 बजे तक
    विजय मुहूर्त: शाम 4:28 बजे से 5:29 बजे तक
    प्रदोष काल: शाम 5:32 बजे से रात 8:30 बजे तक

    पहले दिन बन रहे हैं कई शुभ योग
    सावन के आरंभ पर श्रवण नक्षत्र, आयुष्मान योग, शश महापुरुष राजयोग, हंस राजयोग और गुरु-आदित्य राजयोग का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इन योगों में शिव पूजा और जलाभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    सावन सोमवार की तिथियां
    3 अगस्त – पहला सावन सोमवार
    10 अगस्त – दूसरा सावन सोमवार
    17 अगस्त – तीसरा सावन सोमवार
    24 अगस्त – चौथा सावन सोमवार

    ऐसे करें भगवान शिव की पूजा
    सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर तांबे के पात्र से शुद्ध जल, गंगाजल और कच्चा दूध अर्पित करें। बेलपत्र, धतूरा, भांग, आंकड़े के फूल, शमी के पत्ते, सफेद चंदन, अक्षत और शहद चढ़ाकर धूप-दीप करें। फिर शिव चालीसा, रुद्राष्टकम का पाठ तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। अंत में फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाकर आरती करें।

    सावन में क्या करें
    – प्रतिदिन शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करें।
    – सात्विक भोजन का पालन करें।
    – जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करें।
    – ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का नियमित जाप करें।

    किन बातों से करें परहेज
    – मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और बासी भोजन का सेवन न करें।
    – बाल, नाखून और दाढ़ी कटवाने से बचें।
    – घर में कलह और किसी का अपमान करने से परहेज करें।
    – मन, वचन और कर्म से पवित्रता बनाए रखें।

    सावन का धार्मिक महत्व
    हिंदू मान्यता के अनुसार सावन भगवान शिव की आराधना का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था, जिसके कारण उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था। तभी से सावन में शिवलिंग पर जलाभिषेक की परंपरा चली आ रही है।

  • शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र

    शिव पूजा का महत्व: आखिर क्यों प्रिय हैं भगवान भोलेनाथ को जल और बेलपत्र


    नई दिल्ली । भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। मान्यता है कि शिवजी अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की जरूरत नहीं होती, बल्कि केवल जल और बेलपत्र अर्पित करने से भी भोलेनाथ कृपा बरसाते हैं। यही कारण है कि हर सोमवार और विशेष रूप से सावन माह में शिव मंदिरों में जलाभिषेक और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है।लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर भगवान शिव पर जल और बेलपत्र ही क्यों चढ़ाया जाता है? इसके पीछे एक बेहद रोचक और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

    समुद्र मंथन से जुड़ी है यह पौराणिक कथा
    पुराणों के अनुसार, एक समय देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ। इस मंथन से अमृत सहित कई दिव्य वस्तुएं निकलीं, लेकिन सबसे पहले एक भयंकर विष निकला, जिसे “हलाहल विष” कहा गया। यह विष इतना घातक था कि उसके प्रभाव से पूरा संसार संकट में पड़ गया। देवता और दानव दोनों ही उसके प्रभाव को रोकने में असमर्थ थे। तब सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। भगवान शिव ने विष को अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और तभी से उन्हें “नीलकंठ” कहा जाने लगा।

     जल और बेलपत्र से शांत हुई महादेव की तपन
    हलाहल विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि भगवान शिव का शरीर अत्यधिक गर्म हो गया। उनके शरीर की तपन से वातावरण भी प्रभावित होने लगा। मान्यता है कि उस समय देवताओं ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर जल अर्पित किया। वहीं बेलपत्र को विषनाशक और शीतल माना जाता है, इसलिए शिवजी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। जल और बेलपत्र से भगवान शिव को राहत मिली और तभी से शिवलिंग पर जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा शुरू हो गई, जो आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

     जलाभिषेक करते समय रखें इन नियमों का ध्यान
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है-

    जलाभिषेक हमेशा शिवलिंग का ही करें
    जल में तुलसी पत्र न डालें, क्योंकि शिव पूजा में तुलसी वर्जित मानी जाती है
    शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए
    जलाभिषेक के दौरान शिवलिंग को बार-बार स्पर्श करने से बचें
    पूजा के समय शांत और श्रद्धापूर्ण वातावरण बनाए रखें
    मान्यता है कि उचित विधि और मंत्रोच्चार के साथ किया गया जलाभिषेक विशेष फलदायी होता है।

     बेलपत्र चढ़ाने का धार्मिक महत्व
    बेलपत्र को भगवान शिव का सबसे प्रिय पत्र माना गया है। इसकी तीन पत्तियों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है। बेलपत्र चढ़ाने से मन की शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

    आस्था और श्रद्धा से जुड़ी सनातन परंपरा
    भगवान शिव पर जल और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक भावनाओं से भी जुड़ी हुई है। यह परंपरा हमें त्याग, संरक्षण और श्रद्धा का संदेश देती है। मान्यता है कि सच्चे मन से किए गए जलाभिषेक से भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं।

  • मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व

    मासिक शिवरात्रि आज: भोलेनाथ की पूजा से दूर होती हैं बाधाएं, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में हर माह आने वाली मासिक शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। चैत्र माह की मासिक शिवरात्रि आज 17 मार्च को मनाई जा रही है। यह दिन भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और अभिषेक करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत विशेष फलदायी होता है। कहा जाता है कि इस दिन भोलेनाथ अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। विशेष रूप से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है और अविवाहित लोगों को योग्य जीवनसाथी मिलने की भी मान्यता है।

    शुभ मुहूर्त और पूजा का समय

    वैदिक पंचांग के अनुसार चतुर्दशी तिथि का आरंभ 17 मार्च सुबह 9:23 बजे से हुआ है, जो 18 मार्च सुबह 8:25 बजे तक रहेगी। शिव पूजा के लिए निशिता काल का विशेष महत्व होता है। इस दिन निशिता काल रात 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस समय की गई पूजा को अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

    जलाभिषेक का महत्व

    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि अर्पित कर अभिषेक करने से ग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही रुद्राष्टकम या अन्य शिव स्तोत्रों का पाठ करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।मासिक शिवरात्रि का यह पावन अवसर भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

  • देशभर में महाशिवरात्रि पूर्व की धूम…. जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    देशभर में महाशिवरात्रि पूर्व की धूम…. जानिए पूजा-जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि


    नई दिल्ली।
    देश भर में आज रविवार को फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर महाशिवरात्रि का पर्व (Mahashivratri festival) धूमधाम से मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि में त्रयोदशी-चतुर्दशी का मेल होता है, त्रयोदशी समाप्त होकर चतुर्दशी शुरू होती है, वही समय महाशिवरात्रि का विशेष पुण्यकाल (Special Auspicious time.) माना जाता है। ज्योतिषचार्यों के अनुसार 15 फरवरी को दिन में त्रयोदशी तिथि रहेगी, लेकिन शाम 5:04 बजे चतुर्दशी तिथि आरंभ हो जाएगी। ऐसे में पूरी रात्रि में चतुर्दशी ही व्याप्त रहेगी। इसलिए महाशिवरात्रि पर्व 15 फरवरी को मनाया जा रहा है।

    इस वर्ष महाशिवरात्रि पर व्यतिपात, वरियान व अमृत नामक महा औदायिक योग व निशीथ काल भी बन रहा है। पं. शरद चंद मिश्र के अनुसार, इस दिन सूर्योदय प्रातः 6 बजकर 25 मिनट पर होगा। फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी सायं 4 बजकर 23 मिनट तक रहेगी, इसके बाद चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होकर रात्रि भर रहेगी। उत्तराषाढ़ नक्षत्र सायं 7 बजकर 26 मिनट तक रहेगा, इसके बाद श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होगा। व्यतिपात योग दोपहर 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा, इसके पश्चात वरियान योग लगेगा। साथ ही अमृत सिद्धि योग पूरे दिन-रात्रि विद्यमान रहेगा। निशीथ काल रात्रि 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा, जो भगवान शिव की विशेष पूजा के लिए सर्वोत्तम समय माना गया है। प. नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 6:25 से सायं 7:26 तक रहेगा। व्यतिपात योग साधना और जप-तप के लिए विशेष फलदायी माना गया है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर में रहेगा, जिसमें पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है।

    महाशिवरात्रि का महत्त्व : पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि में भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या कालरात्रि भी कहा गया है। पौराणिक व्याख्यानों के अनुसार इसे शिव विवाह महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। महाशिवरात्रि को वर्षभर में पड़ने वाली सिद्ध रात्रियों में से एक माना गया है।

    मुहूर्त
    ● चतुर्दशी तिथि उपस्थित : 15 फरवरी शाम 5:04 से 16 फरवरी शाम 5:34 बजे
    ● शिवरात्रि का विशष पुण्यकाल : 15 की शाम 5:04 से आरम्भ
    ● जलाभिषेक का समय : 15 को प्रातःकाल से आरम्भ
    ● विशेष पुण्यकाल : शाम 5:04 के बाद विशेष पुण्यकाल का अभिषेक होगा

    शिव पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त-
    निशिता काल पूजा समय – 12:37 ए एम से 01:32 ए एम, फरवरी 16
    अवधि – 55 मिनट
    शिवरात्रि पारण समय – 16 फरवरी को 07:57 ए एम से 01:04 पी एम तक।
    रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 06:11 पी एम से 09:38 पी एम
    रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:38 पी एम से 01:04 ए एम, फरवरी 16
    रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 01:04 ए एम से 04:31 ए एम, फरवरी 16
    रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 04:31 ए एम से 07:57 ए एम, फरवरी 16

    महाशिवरात्रि की पूजा विधि (घर और मंदिर में कैसे करें पूजा)-
    महाशिवरात्रि की पूजा विधि: घर में कैसे करें पूजा- महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। घर में पूजा करने से पहले पूजा की जगह अच्छे से साफ कर लें। शिवलिंग को भी पानी से धोकर साफ जगह पर रखें। सबसे पहले शिवलिंग पर साफ जल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी और शहद से एक-एक करके अभिषेक किया जा सकता है। अभिषेक करते समय मन में “ॐ नमः शिवाय” का जप करते रहें। अगर सब चीजें उपलब्ध न हों तो सिर्फ जल और दूध से भी पूजा पूरी मानी जाती है। अभिषेक के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र जरूर चढ़ाएं। साथ में धतूरा, आक के फूल और सफेद फूल चढ़ा सकते हैं। फूल चढ़ाते समय मन में अपनी इच्छा रखें और शिवजी को याद करें। इसके बाद धूप-दीप जलाएं और थोड़ी देर शांत बैठकर शिव मंत्रों का जप करें। मन की बात भगवान शिव से कहें। शिव चालीसा या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ भी कर सकते हैं। जो लोग रात में जागकर पूजा कर पाते हैं, वे घर पर ही सरल तरीके से रुद्राभिषेक कर सकते हैं।

    घर में शिवलिंग रखने की सही बात-
    घर में बहुत बड़ा शिवलिंग रखने की परंपरा नहीं है। आमतौर पर मिट्टी, पत्थर, पीतल या चांदी का छोटा शिवलिंग घर के लिए ठीक माना जाता है। शिवलिंग के साथ गणेश जी, माता पार्वती और नंदी की छोटी मूर्ति रखकर पूजा करना अच्छा माना जाता है।

    महाशिवरात्रि की पूजा विधि: मंदिर में कैसे करें पूजा-
    अगर मंदिर जाकर पूजा कर रहे हैं तो सुबह स्नान करके साफ कपड़ों में मंदिर जाएं। मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। कई जगहों पर दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक की व्यवस्था होती है, वहां श्रद्धा से अभिषेक करें। “ॐ नमः शिवाय” का मन ही मन जप करते रहें।शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और सफेद फूल चढ़ाएं। पुजारी जी के बताए नियमों का पालन करें। धूप-दीप दिखाकर भगवान शिव का ध्यान करें। अगर संभव हो तो रात में मंदिर जाकर रुद्राभिषेक या विशेष पूजा में शामिल हों। मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात की पूजा का खास फल मिलता है।

    महाशिवरात्रि पर करें इन मंत्रों का जप-
    महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की कृपा पाने के लिए कुछ आसान और असरदार मंत्रों का जप किया जा सकता है। सबसे पहले “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें। यह शिव जी का सबसे सरल और शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। इस पावन दिन महामृत्युंजय मंत्र का जप भी किया जाता है–
    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
    उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

    शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं और क्या नहीं- महाशिवरात्रि या रोज की पूजा में शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए जल, दूध, दही, घी और शहद से अभिषेक किया जाता है और इसके बाद बेलपत्र जरूर अर्पित करें, क्योंकि यह शिवजी को सबसे प्रिय माना जाता है। साथ में सफेद फूल, आक और धतूरा भी चढ़ाए जाते हैं। धूप-दीप जलाकर सादे मन से पूजा करें। वहीं शिवलिंग पर केतकी का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए, क्योंकि मान्यता के अनुसार यह शिव पूजा में वर्जित माना गया है। तुलसी के पत्ते भी शिवलिंग पर नहीं चढ़ाए जाते, इन्हें विष्णु पूजा के लिए रखा जाता है। लाल रंग के तेज खुशबू वाले फूल, टूटे या मुरझाए फूल, बासी फूल और चढ़ाया हुआ प्रसाद दोबारा शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।