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  • बांग्लादेश में नई सरकार के बाद तुर्की की सक्रियता, बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा चर्चा में

    बांग्लादेश में नई सरकार के बाद तुर्की की सक्रियता, बिलाल एर्दोगन का ढाका दौरा चर्चा में

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में तारिक रहमान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद तुर्की के राष्ट्रपतिरेसेप तैयप एर्दोगन के बेटे Bilal Erdogan का अचानक ढाका दौरा क्षेत्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की पृष्ठभूमि में हुए इस दौरे को रणनीतिक नजर से देखा जा रहा है।

    बिलाल एर्दोगन एक निजी विमान से ढाका पहुंचे। उनके साथ तुर्की के पूर्व फुटबॉलर मेसुट ओज़िल और तुर्की की सरकारी सहायता एजेंसी तुर्की सहयोग और समन्वय एजेंसी TIKA के चेयरमैन अब्दुल्ला आरोन भी मौजूद थे। ढाका पहुंचने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने ढाका विश्वविद्यालय में TIKA द्वारा वित्तपोषित एक मेडिकल सेंटर का उद्घाटन किया। बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट की पहल जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई ने की थी।

    बांग्लादेश के हालिया चुनावों मेंबांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने गठबंधन के जरिए 77 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की है और वह अब संसद में प्रभावशाली विपक्ष के रूप में उभरी है। हालांकि सरकार BNP के नेतृत्व में बनी है, लेकिन माना जा रहा है कि नीतिगत फैसलों पर जमात का असर बढ़ सकता है।

    विश्लेषकों के अनुसार, दक्षिण एशिया में TIKA की बढ़ती मौजूदगी और तुर्की की सक्रियता को भारत की सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जा रहा है। खासकर रोहिंग्या कैंपों की यात्राओं और इस्लामिक संगठनों के साथ संपर्क को क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    इस संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका भी चर्चा में है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी Inter-Services Intelligence (ISI) पर पहले भी बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में दखल के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में पाकिस्तान, तुर्की और बांग्लादेश के बीच बढ़ती नजदीकियों को भारत के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

    फिलहाल, बिलाल एर्दोगन का यह दौरा तुर्की और बांग्लादेश के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक संकेत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि इस कूटनीतिक सक्रियता का दक्षिण एशिया की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

  • बांग्लादेश चुनाव: जमात-ए-इस्लामी का घोषणापत्र जारी, पड़ोसी देशों के साथ अच्‍छे संबंध बनाने का वादा

    बांग्लादेश चुनाव: जमात-ए-इस्लामी का घोषणापत्र जारी, पड़ोसी देशों के साथ अच्‍छे संबंध बनाने का वादा


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव से पहले इस्लामिक कंजर्वेटिव पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी किया है। पार्टी ने इसमें भारत और अन्य पड़ोसी देशों के साथ सहयोगात्मक और रचनात्मक संबंध बनाने का वादा किया है। घोषणापत्र के मुताबिक ये संबंध आपसी सम्मान और निष्पक्षता पर आधारित होंगे।

    पार्टी ने भारत, भूटान, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव और थाइलैंड के साथ शांतिपूर्ण और मित्रतापूर्ण रिश्तों को प्राथमिकता देने का भरोसा दिया है। इसके जरिए क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और साझा समृद्धि को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने और देश के पासपोर्ट की वैश्विक स्वीकार्यता मजबूत करने का भी वादा किया है। इसका उद्देश्य बांग्लादेशी नागरिकों के लिए अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाना और देश की छवि को सुदृढ़ करना है।

    मुस्लिम दुनिया और अन्य क्षेत्रीय संबंध
    घोषणापत्र में मुस्लिम देशों के साथ मजबूत सहयोग और पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों के साथ कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।

    संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सक्रियता
    जमात-ए-इस्लामी ने शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार और आर्थिक विकास जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में बांग्लादेश की सक्रिय भूमिका जारी रखने का संकल्प दोहराया।

    रोहिंग्या संकट और शांति मिशन
    पार्टी ने रोहिंग्या शरणार्थियों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी सुनिश्चित करने और संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भागीदारी जारी रखने का भी वादा किया है।इस चुनाव में सत्तारूढ़ आवामी लीग को भाग लेने से रोका गया है। ऐसे में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी प्रमुख प्रतियोगी हैं। जुलाई 2024 में हुए ‘जुलाई जनआंदोलन’ के बाद से देश के राजनीतिक परिदृश्य में बड़े बदलाव आए हैं। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने भी चुनाव की विश्वसनीयता और संभावित तनाव को लेकर चिंता जताई है। कुल मिलाकर 12 फरवरी का चुनाव बांग्लादेश के भविष्य और विदेश नीति की दिशा तय करेगा, और जमात-ए-इस्लामी का घोषणापत्र इस महत्वपूर्ण समय में जारी हुआ है।