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  • 120 साल से नहीं टूटी देवास की ये शाही परंपरा, पालकी में विराजे लड्डू गोपाल तो जयकारों से गूंजा शहर

    120 साल से नहीं टूटी देवास की ये शाही परंपरा, पालकी में विराजे लड्डू गोपाल तो जयकारों से गूंजा शहर


    देवास । देवास में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस बार भी आस्था और वर्षों पुरानी परंपरा के साथ मनाया गया। शहर में जन्माष्टमी के अवसर पर देवास राज परिवार की 120 साल पुरानी दिंडी यात्रा निकाली गई। शनिवार 5 सितंबर की शाम आयोजित इस ऐतिहासिक यात्रा में भगवान लड्डू गोपाल को विशेष रूप से सजाई गई पालकी में विराजित किया गया। पालकी के साथ राज परिवार के सदस्य और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। यात्रा जिस रास्ते से होकर गुजरी वहां भक्तों का उत्साह और भगवान के दर्शन की लालसा साफ दिखाई दी।

    देवास में दिंडी यात्रा की यह परंपरा संत तुकाराम महाराज की प्रेरणा से शुरू होने की बात कही जाती है। राज परिवार द्वारा पिछले 119 वर्षों से इस परंपरा को लगातार निभाया जाता रहा है और इस वर्ष यह यात्रा 120वीं बार आयोजित की गई। इतनी लंबी अवधि से चली आ रही यह परंपरा देवास की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। हर वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर श्रद्धालु इस यात्रा का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

    जन्माष्टमी के दिन शाम करीब 6 बजे सीनियर राजवाड़े स्थित मंदिर में भगवान लड्डू गोपाल की विधिवत पूजा अर्चना की गई। इसके बाद उन्हें पालकी में विराजित किया गया। जन्माष्टमी को देखते हुए राजवाड़े के मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया था। पूजा के बाद जैसे ही भगवान लड्डू गोपाल की पालकी यात्रा के लिए निकली तो श्रद्धालुओं में उत्साह बढ़ गया। लोगों ने भगवान के दर्शन किए और सुख समृद्धि की कामना की।

    इस धार्मिक यात्रा में राज परिवार के सदस्य विक्रमसिंह पवार सहित शाही परिवार के अन्य सदस्य भी शामिल हुए। उनके साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु और धर्मप्रेमी नागरिक यात्रा का हिस्सा बने। शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए दिंडी यात्रा आगे बढ़ी। रास्ते में श्रद्धालुओं ने भगवान लड्डू गोपाल के दर्शन किए और धार्मिक भाव के साथ यात्रा का स्वागत किया। पालकी के साथ चल रहे श्रद्धालुओं के कारण पूरे मार्ग पर भक्तिमय माहौल बना रहा।

    दिंडी यात्रा सीनियर राजवाड़े से शुरू होकर शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए मीठा तालाब पहुंची। यहां भगवान लड्डू गोपाल की दोबारा पूजा अर्चना की गई। इसके बाद धार्मिक आयोजन का समापन हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और लोगों ने भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

    देवास की यह 120वीं दिंडी यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा की झलक भी है। बदलते समय के बावजूद राज परिवार और श्रद्धालुओं द्वारा इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया जाना शहर की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है। जन्माष्टमी के मौके पर निकली इस यात्रा ने एक बार फिर देवास में भक्ति और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिला।

  • मध्यप्रदेश में कान्हा की भक्ति का महासंगम: 7500+ मंदिरों में आज गूंजेगा जय श्रीकृष्ण

    मध्यप्रदेश में कान्हा की भक्ति का महासंगम: 7500+ मंदिरों में आज गूंजेगा जय श्रीकृष्ण

    भोपाल। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर शुक्रवार को पूरा मध्यप्रदेश कृष्ण भक्ति के रंग में रंगा नजर आएगा। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जन-जन का पर्व बनाने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग के श्रीकृष्ण पाथेय न्यास की ओर से प्रदेशभर में व्यापक स्तर पर श्रीकृष्ण पर्व का आयोजन किया जा रहा है। घर-घर गोकुल घर-घर गोपाल की संकल्पना के साथ 55 जिलों के 111 स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। इस दौरान प्रदेश के 7500 से अधिक श्रीकृष्ण मंदिरों को विशेष रूप से सजाया गया है और श्रद्धालुओं के लिए भव्य दर्शन की व्यवस्थाएं की गई हैं।

    श्रीकृष्ण पर्व के दौरान 1500 से अधिक स्थानीय कलाकार भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं भक्ति लोक परंपराओं और जीवन दर्शन पर आधारित प्रस्तुतियां देंगे। नृत्य-नाटिका रासलीला भजन लोकगायन और शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से श्रीकृष्ण के जीवन के अलग-अलग प्रसंग मंच पर जीवंत किए जाएंगे। प्रदेश के 82 मंदिरों में विशेष सांस्कृतिक प्रस्तुतियां प्रस्तावित हैं। इस आयोजन का उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ मध्यप्रदेश की समृद्ध लोक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी व्यापक मंच प्रदान करना है।

    मुख्यमंत्री निवास पर श्रीकृष्ण पर्व का विशेष आयोजन आकर्षण का केंद्र रहेगा। यहां 101 से अधिक बच्चे राधा-कृष्ण की वेशभूषा में शामिल होंगे। जन्मोत्सव के दौरान मटकी फोड़ कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बच्चों को माखन-मिश्री लड्डू गोपाल की प्रतिमा और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर केंद्रित पुस्तक भेंट करेंगे। इसके बाद मुख्यमंत्री महू के जानापाव पहुंचकर परशुराम-श्रीकृष्ण लोक का भूमिपूजन करेंगे। यहां भगवान परशुराम द्वारा श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र प्रदान किए जाने के प्रसंग पर आधारित नृत्य-नाटिका और प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी।

    भोपाल में इस्कॉन पटेल नगर हरे कृष्ण लैंड रायसेन रोड पर जन्माष्टमी महोत्सव भव्य रूप से मनाया जाएगा। यहां करीब एक लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई गई है। मंदिर को जैसलमेर की पारंपरिक थीम पर सजाया जा रहा है और थाईलैंड से मंगाए गए विशेष ऑर्किड फूलों का उपयोग भी किया जाएगा। हरे कृष्ण महामंत्र का निरंतर कीर्तन होगा जबकि श्रीकृष्ण कथा और रुक्मिणी कल्याणम् नामक भक्तिमय नाट्य प्रस्तुति प्रमुख आकर्षण रहेगी।

    उज्जैन के नारायणा धाम में पांच दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन के दौरान श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता गुरु सांदीपनि आश्रम माखन चोरी जन्म और बाल लीलाओं से लेकर गीता उपदेश तक के प्रसंग प्रस्तुत किए जाएंगे। सांदीपनि आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा और श्रीकृष्ण द्वारा 64 कलाओं व 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने की परंपरा को नृत्य-नाटिका के जरिए जीवंत किया जाएगा।

    पन्ना अमझेरा और महिदपुर सहित प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में भी श्रीकृष्ण के अलग-अलग प्रसंगों पर आधारित कार्यक्रम होंगे। मथुरा प्रवेश गोवर्धन धारण सुदामा मिलन और कालियानाग मानमर्दन जैसे प्रसंग लोक प्रस्तुतियों और नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से मंचित किए जाएंगे। ग्वालियर रायसेन इंदौर गुना छतरपुर शिवपुरी झाबुआ नीमच मंदसौर और मुरैना सहित कई जिलों में शाम को विशेष कार्यक्रम होंगे।

    जन्माष्टमी की रात भोपाल के इस्कॉन मंदिरों गोपाल मंदिर बांके बिहारी मंदिर बिड़ला मंदिर करुणा धाम और अन्य कृष्ण मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। मंदिरों में विशेष श्रृंगार अभिषेक भजन-कीर्तन और जन्मोत्सव के आयोजन होंगे। कुल मिलाकर इस बार श्रीकृष्ण पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत लोक कला और नई पीढ़ी को भगवान श्रीकृष्ण के जीवन मूल्यों से जोड़ने का एक बड़ा प्रयास भी बनेगा।

  • Janmashtami 2026: MP के इंदौर जिले का अनोखा मंदिर…. जहां विराजमान हैं मूछों वाले कृष्ण

    Janmashtami 2026: MP के इंदौर जिले का अनोखा मंदिर…. जहां विराजमान हैं मूछों वाले कृष्ण


    इंदौर।
    देशभर में आज भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) के जन्मोत्सव (Janmashtami 2026) की धूम मची हुई है. सभी मंदिरों में विशेष साज-सज्जा की गई है और कान्हा के जन्म की तैयारियां चल रही हैं. लेकिन आज हम आपको मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के इंदौर जिले (Indore district) के एक ऐसे अनोखे कृष्ण मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। आइए जानते हैं इस मंदिर की खासियत….

    इंदौर जिले के सबसे आखिरी गांव गिरोता में भगवान श्रीकृष्ण का एक ऐसा मंदिर है, जहां कान्हा अपने सामान्य स्वरूप से बिल्कुल अलग मूंछों वाले कृष्ण के रूप में विराजमान हैं. ये मूंछें आन-बान-शान का प्रतीक मानी जाती हैं. मूंछें आत्मसम्मान और मर्यादा का भी प्रतीक मानी जाती हैं. इसी रूप में यहां भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हैं. इतना ही नहीं, इस मंदिर को लेकर कई ऐसी मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं, जो इसे बेहद खास बनाती हैं।


    अनोखी प्रतिमा विराजमान

    गांव के मुख्य चौराहे पर स्थित इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की अनोखी प्रतिमा विराजमान है. भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा में मूंछें हैं. यही वजह है कि यहां कान्हा को ‘मूंछों वाले कृष्ण’ के नाम से जाना जाता है. गांव के मुख्य चौराहे पर स्थित होने के कारण इस मंदिर को ‘चौराहे वाले बा के मंदिर’ के रूप में भी श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।


    मंदिर से जुड़ी मान्यताएं

    इस मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं और कथाएं भी हैं. इसको लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों पहले गांव में ज्यादातर घर लकड़ी के बने हुआ करते थे. इसी दौरान एक बार गांव में अचानक भीषण आग लग गई. आग की लपटों ने मंदिर के आसपास बने कई घरों को अपनी चपेट में ले लिया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि मंदिर भी लकड़ी का होने के बावजूद आग से सुरक्षित रहा. बताया जाता है कि जब पुजारी ने आग की लपटों को बढ़ते देखा तो भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को वहां से हटाने का प्रयास किया, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली. इसके बाद लोगों की आस्था इस मंदिर के प्रति और भी मजबूत हो गई।


    मंदिर की बनावट अलग

    इस मंदिर की बनावट भी इसे दूसरे मंदिरों से अलग दिखती है. मंदिर एक तरह से द्वार के आकार में बना हुआ है. यही वजह है कि गांव के लोग मंदिर के नीचे से होकर गुजरते हैं. स्थानीय मान्यता है कि मंदिर के नीचे से होकर गुजरने से भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और श्रद्धालुओं के मनोरथ एवं कार्य सिद्ध होते हैं।


    जन्माष्टमी पर आयोजन

    मंदिर के पुजारी का कहना है कि वैसे तो मंदिर में प्रतिदिन पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता है, लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और एकादशी के मौके पर यहां विशेष आयोजन किए जाते हैं. जन्माष्टमी पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और रात तक भजन-कीर्तन का दौर चलता है।


    बारिश से जुड़ी मान्यता

    इस मंदिर से जुड़ी एक और बेहद खास मान्यता है. बताया जाता है कि जब आसपास के इलाकों में बारिश नहीं होती और लोग परेशान हो जाते हैं, तब मंदिर में विशेष रूप से डोल सजाया जाता है. श्रद्धालु इस डोल के आसपास कुछ दिनों तक फेरे लगाते हैं और ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ का संकीर्तन करते हैं. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है।

  • वृंदावन जाने से पहले कर लें पूरी तैयारी मंदिर में क्या ले जाएं और बंदरों से कैसे बचें जानें जरूरी Travel Tips

    वृंदावन जाने से पहले कर लें पूरी तैयारी मंदिर में क्या ले जाएं और बंदरों से कैसे बचें जानें जरूरी Travel Tips


    उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां बांके बिहारी मंदिर इस्कॉन मंदिर प्रेम मंदिर निधिवन और रंगनाथ मंदिर जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। खासतौर पर जन्माष्टमी और होली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान यहां देश के अलग अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। अगर आप भी वृंदावन जाने की तैयारी कर रहे हैं तो यात्रा शुरू करने से पहले कुछ जरूरी बातों की जानकारी रखना बेहद फायदेमंद रहेगा।

    वृंदावन घूमने के लिए मौसम का ध्यान रखना भी जरूरी है। अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है और इस दौरान घूमना आसान हो सकता है। वहीं जन्माष्टमी और होली जैसे अवसरों पर धार्मिक उत्साह अपने चरम पर होता है लेकिन भारी भीड़ के कारण यात्रा चुनौतीपूर्ण भी हो सकती है। ऐसे समय में होटल परिवहन और मंदिर दर्शन की योजना पहले से बनाना बेहतर रहता है।

    यात्रा पर निकलते समय अपने साथ जरूरत से ज्यादा सामान ले जाने से बचें। हल्का बैग रखें जिसमें पानी की बोतल मोबाइल चार्जर जरूरी दवाइयां पहचान पत्र और कुछ नकद पैसे जैसी आवश्यक चीजें हों। भारी सामान के साथ मंदिरों और भीड़भाड़ वाली गलियों में घूमना मुश्किल हो सकता है।

    वृंदावन के मंदिरों में स्थानीय धार्मिक परंपराओं और व्यवस्थाओं का सम्मान करना जरूरी है। अलग अलग मंदिरों के अपने नियम हो सकते हैं। कुछ स्थानों पर मोबाइल फोन कैमरा या बैग ले जाने पर पाबंदी हो सकती है। इसलिए जिस मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे हैं वहां के मौजूदा नियमों की जानकारी पहले ले लेना बेहतर होगा।

    अगर पहली बार वृंदावन जा रहे हैं तो प्रमुख धार्मिक स्थलों की सूची पहले से बना लें। बांके बिहारी मंदिर के अलावा इस्कॉन मंदिर प्रेम मंदिर निधिवन और रंगनाथ मंदिर जैसे स्थानों को अपनी यात्रा योजना में शामिल किया जा सकता है। भीड़ वाले दिनों में सभी जगहों पर जाना आसान नहीं होता इसलिए प्राथमिकता के हिसाब से प्लान बनाना ज्यादा बेहतर रहेगा।

    लंबी यात्रा और भीड़भाड़ के बीच स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें। सिरदर्द पेट की परेशानी या दूसरी सामान्य दिक्कतों के लिए डॉक्टर द्वारा बताई गई जरूरी दवाइयां साथ रखना उपयोगी हो सकता है। बुजुर्गों बच्चों और ज्यादा देर तक चलने में परेशानी वाले लोगों के लिए पर्याप्त आराम की व्यवस्था करना भी जरूरी है।

    वृंदावन में बंदरों की मौजूदगी भी यात्रियों के लिए चुनौती बन सकती है। बंदर अक्सर खाने पीने की चीजों या हाथ में मौजूद सामान की तरफ आकर्षित हो सकते हैं। इसलिए उनके सामने खाना न दिखाएं और मोबाइल चश्मा पर्स या दूसरी जरूरी वस्तुएं संभालकर रखें। बंदरों के बहुत करीब जाने या उन्हें छेड़ने से भी बचना चाहिए।

    भीड़भाड़ वाले धार्मिक आयोजनों के दौरान अपने सामान और साथ आए लोगों पर नजर बनाए रखें। बच्चों को अकेला न छोड़ें और किसी भी आपात स्थिति में स्थानीय प्रशासन या पुलिस की मदद लें। मंदिर परिसर में धक्का मुक्की से बचते हुए कतार और सुरक्षा व्यवस्था का पालन करें।

    वृंदावन की यात्रा सिर्फ दर्शन तक सीमित नहीं होती बल्कि यहां की गलियों और धार्मिक माहौल का अनुभव भी लोगों को आकर्षित करता है। हालांकि त्योहारों के दौरान भीड़ और यातायात व्यवस्था को देखते हुए धैर्य रखना जरूरी है। समय का अतिरिक्त मार्जिन रखें और प्रशासन की ओर से जारी ट्रैफिक डायवर्जन या यात्रा संबंधी ताजा निर्देशों का पालन करें। थोड़ी सी तैयारी और सावधानी के साथ वृंदावन की धार्मिक यात्रा को सुरक्षित और यादगार बनाया जा सकता है।

  • Krishna Janmashtami 2026: कब होगा लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव? जानें अष्टमी तिथि महानिशीथ काल और पूजा का सही समय

    Krishna Janmashtami 2026: कब होगा लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव? जानें अष्टमी तिथि महानिशीथ काल और पूजा का सही समय


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बेहद खास माना जाता है। हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस दिन देशभर में भक्त व्रत रखते हैं और रात के समय भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विशेष पूजा करते हैं। इस बार जन्माष्टमी की तारीख को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है लेकिन पंचांग गणना के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज 4 सितंबर 2026 शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन मंदिरों और घरों में कान्हा के जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां की जाएंगी।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी की पूजा में मध्यरात्रि के समय का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन भक्त सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन भगवान कृष्ण का स्मरण करते हैं। घरों में लड्डू गोपाल के लिए पालना सजाया जाता है। उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और फूलों से श्रृंगार किया जाता है। मंदिरों में भी जन्माष्टमी के लिए विशेष सजावट की जाती है।

    पंचांग के अनुसार इस वर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि और जन्मोत्सव की परंपरा को ध्यान में रखते हुए 4 सितंबर को ही जन्माष्टमी का व्रत रखा जाएगा। इसी वजह से 3 सितंबर या 5 सितंबर को लेकर जो भ्रम है उसे दूर किया जा सकता है।

    जन्माष्टमी के दिन पूजा के लिए कई शुभ समय बताए गए हैं। सुबह 5 बजकर 46 मिनट से 10 बजकर 26 मिनट तक पूजा का समय रहेगा। इसके बाद दोपहर 12 बजकर 5 मिनट से 1 बजकर 33 मिनट तक भी पूजा की जा सकती है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 36 मिनट से दोपहर 12 बजकर 24 मिनट तक बताया गया है। शाम के समय 4 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 14 मिनट तक और रात में 9 बजकर 7 मिनट से 10 बजकर 33 मिनट तक पूजा का समय रहेगा। इसके अलावा रात 12 बजकर 5 मिनट से सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक भी पूजा के लिए समय बताया गया है।

    जन्माष्टमी की सबसे खास पूजा महानिशीथ काल में मानी जाती है। इस साल महानिशीथ काल रात 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इसी दौरान भक्त श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएंगे। लड्डू गोपाल का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करने के बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाएंगे। मुकुट मोरपंख आभूषण और फूलों की माला से उनका श्रृंगार किया जाएगा। इसके बाद भगवान को पालने में विराजमान कर झूला झुलाया जाएगा और माखन मिश्री पंजीरी सहित सात्विक भोग अर्पित किया जाएगा।

    इस साल जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बताया गया है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार श्रीकृष्ण का रोहिणी नक्षत्र से विशेष संबंध माना जाता है। पंचांग के अनुसार रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर की रात 12 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर रात 11 बजकर 4 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा हर्षण योग बुधादित्य योग हंस योग और मालव्य योग जैसे शुभ योग बनने की बात भी कही गई है।

    जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले भक्त अगले दिन यानी 5 सितंबर को पारण करेंगे। धर्मशास्त्रीय परंपरा के अनुसार सूर्योदय के बाद सुबह 6 बजे के पश्चात पारण किया जा सकता है। हालांकि अलग अलग क्षेत्रों में पंचांग और स्थानीय परंपरा के अनुसार इसमें थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण का समय देखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जन्माष्टमी पर श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से सुख शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।

  • Janmashtami Wishes 2026: राधे-कृष्ण के प्रेम से सजे ये संदेश भेजकर अपनों को दें जन्माष्टमी की बधाई

    Janmashtami Wishes 2026: राधे-कृष्ण के प्रेम से सजे ये संदेश भेजकर अपनों को दें जन्माष्टमी की बधाई


    नई दिल्ली। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है और भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का श्रृंगार कर आधी रात को जन्मोत्सव मनाया जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और रात में कान्हा के जन्म के बाद पूजा अर्चना कर उन्हें भोग अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। उन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है।

    श्रीकृष्ण का जीवन प्रेम भक्ति कर्म और धर्म का संदेश देता है। बचपन में उनकी नटखट लीलाएं भक्तों को आनंदित करती हैं तो वहीं महाभारत में दिया गया गीता का ज्ञान जीवन में सही कर्म और कर्तव्य का मार्ग दिखाता है। यही वजह है कि जन्माष्टमी का पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रहता बल्कि लोगों के बीच प्रेम और खुशियां बांटने का अवसर भी बन जाता है।

    अगर आप भी इस जन्माष्टमी पर अपने प्रियजनों को खास अंदाज में शुभकामनाएं देना चाहते हैं तो इन संदेशों को WhatsApp Facebook या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भेज सकते हैं।

    1.
    कान्हा की बंसी से जीवन में मधुरता छाए
    राधे कृष्ण की कृपा से हर सपना मुस्काए
    आपके घर सुख शांति और समृद्धि आए
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

    2.
    नटखट नंदलाल आपके सारे दुख हर लें
    अपने आशीर्वाद से जीवन को खुशियों से भर दें
    हर दिन नई उम्मीद और नई खुशी लेकर आए
    आपको और आपके परिवार को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं।

    3.
    राधा के प्रेम और कृष्ण की मुस्कान
    आपके जीवन को बना दें खुशियों का जहान
    कान्हा की कृपा हमेशा आपके साथ रहे
    जन्माष्टमी का यह पर्व मंगलमय रहे।

    4.
    मुरलीधर की मधुर धुन जीवन में रंग भर दे
    गोविंद की कृपा हर परेशानी को दूर कर दे
    घर आंगन में सुख और प्रेम बना रहे
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं।

    5.
    नंद के घर फिर से खुशियों की बहार आए
    यशोदा के लल्ला का आशीर्वाद आपके घर आए
    जीवन से हर चिंता और परेशानी दूर हो
    जन्माष्टमी का त्योहार आपके लिए शुभ हो।

    6.
    जिसके सिर पर मोर मुकुट और हाथों में बांसुरी है
    जिसकी मुस्कान में दुनिया की सारी खुशी है
    वही कान्हा आपके जीवन में प्रेम और सुख बरसाएं
    जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई।

    7.
    कृष्ण नाम की गूंज से मन को सुकून मिले
    कान्हा की भक्ति से जीवन को नई दिशा मिले
    हर कदम पर उनका आशीर्वाद बना रहे
    आपको जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

    8.
    माखन मिश्री जैसी मीठी हो आपकी हर खुशी
    कान्हा की कृपा से पूरी हो दिल की हर आरजू
    राधे कृष्ण का प्रेम हमेशा आपके साथ रहे
    जन्माष्टमी का पर्व आपके लिए शुभ और मंगलमय रहे।

    9.
    कान्हा की बंसी बजती रहे
    आपके आंगन में खुशियां सजती रहें
    जीवन में प्रेम और शांति बनी रहे
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

    10.
    नटखट कान्हा आपके जीवन में खुशियां लाएं
    हर मुश्किल को आसान बनाएं
    सुख समृद्धि और शांति से भर जाए आपका संसार
    आपको और आपके परिवार को जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई।

  • 120 करोड़ के बेशकीमती गहनों से होगा राधा-कृष्ण का श्रृंगार लॉकर से निकलेंगे अनमोल मोती पन्ने और हीरे

    120 करोड़ के बेशकीमती गहनों से होगा राधा-कृष्ण का श्रृंगार लॉकर से निकलेंगे अनमोल मोती पन्ने और हीरे


    ग्वालियर । ग्वालियर के ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में इस बार जन्माष्टमी का उत्सव बेहद खास होने जा रहा है। 4 सितंबर को भगवान राधा-कृष्ण का राजसी श्रृंगार बेशकीमती सोने चांदी हीरे मोती और पन्नों से जड़े आभूषणों से किया जाएगा। इन आभूषणों की कुल कीमत 120 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। साल में चुनिंदा विशेष अवसरों पर ही बैंक लॉकर से बाहर निकाले जाने वाले इन गहनों के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। इस बार करीब डेढ़ लाख श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है।

    जन्माष्टमी के दिन सुबह करीब 10 बजे आभूषणों को सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के लॉकर से निकालने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए नगर निगम आयुक्त की ओर से गठित विशेष समिति बैंक पहुंचेगी। सुरक्षा व्यवस्था के बीच आभूषणों को मंदिर तक लाया जाएगा। मंदिर पहुंचने के बाद सभी गहनों की सफाई की जाएगी और इसके बाद इन्हें भगवान राधा-कृष्ण के श्रृंगार में शामिल किया जाएगा।

    गोपाल मंदिर में रखे इन आभूषणों की खासियत सिर्फ उनकी कीमत नहीं बल्कि उनका ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व भी है। भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार में सोने का मुकुट शामिल किया जाता है जिसमें पुखराज माणिक और पन्ने जैसे कीमती रत्न जड़े हैं। वहीं राधारानी का करीब तीन तोला वजन का रत्नजड़ित मुकुट भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहता है।

    इन आभूषणों में सबसे ज्यादा चर्चा सात लड़ियों वाले उस हार की होती है जिसमें 62 असली मोती और 55 पन्ने जड़े हुए हैं। इस हार की कीमत करीब 35 करोड़ रुपए आंकी गई है। इसके अलावा रत्नजड़ित मुकुट की कीमत करीब 25 करोड़ रुपए बताई जाती है। भगवान के श्रृंगार में शामिल सोने के मुकुट की कीमत भी करीब 1.25 करोड़ रुपए बताई गई है। अलग अलग आभूषणों में जड़े कीमती रत्न इस पूरे श्रृंगार को और भव्य बना देते हैं।

    जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर की सजावट भी खास अंदाज में की जाएगी। गोपाल मंदिर परिसर को आकर्षक रोशनी से सजाने के साथ फूल बंगला और रंगोली तैयार की जाएगी। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में एलईडी स्क्रीन भी लगाई जाएंगी। इन स्क्रीन के जरिए भगवान के दर्शन का लाइव प्रसारण किया जाएगा ताकि भीड़ के कारण सभी श्रद्धालुओं को गर्भगृह तक पहुंचने में परेशानी न हो।

    श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम किए जा रहे हैं। मंदिर में पुलिसकर्मियों की तैनाती रहेगी और सीसीटीवी कैमरों से पूरे परिसर पर नजर रखी जाएगी। श्रद्धालुओं के आने और जाने के लिए अलग अलग व्यवस्था रखने की तैयारी है ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके और दर्शन व्यवस्था सुचारु बनी रहे।

    गोपाल मंदिर का इतिहास भी बेहद खास है। इस मंदिर का निर्माण सिंधिया राजवंश की महारानी बैजाबाई ने वर्ष 1843 में कराया था। सफेद संगमरमर से बने इस मंदिर की वास्तुकला में मराठा शैली के साथ यूरोपीय प्रभाव भी नजर आता है। मंदिर के गर्भगृह में चांदी से मढ़े दरवाजे इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

    जन्माष्टमी पर जब इन दुर्लभ आभूषणों से राधा-कृष्ण का श्रृंगार होगा तो गोपाल मंदिर में राजसी परंपरा और धार्मिक आस्था का अनोखा संगम देखने को मिलेगा। यही वजह है कि इस विशेष दर्शन को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह है।