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  • गोल्डन बॉय की राह में चोट बनी रोड़ा! नीरज चोपड़ा एशियन गेम्स से बाहर, भारत की गोल्ड की उम्मीदों को लगा झटका

    गोल्डन बॉय की राह में चोट बनी रोड़ा! नीरज चोपड़ा एशियन गेम्स से बाहर, भारत की गोल्ड की उम्मीदों को लगा झटका


    नई दिल्ली । भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर और दो बार के ओलंपिक पदक विजेता नीरज चोपड़ा को लेकर खेल जगत से बेहद निराश करने वाली खबर सामने आई है। नीरज चोपड़ा चोट के कारण 2026 के बाकी बचे सीजन से बाहर हो गए हैं। इसका सीधा असर सितंबर में जापान के आइची नागोया में होने वाले एशियन गेम्स पर भी पड़ा है जहां नीरज अपने जैवलिन थ्रो के खिताब का बचाव करने उतरने वाले थे। नीरज की गैरमौजूदगी भारत के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है क्योंकि वह देश के सबसे मजबूत पदक दावेदारों में शामिल थे और एशियन गेम्स में उनसे एक बार फिर शानदार प्रदर्शन की उम्मीद थी।

    नीरज ने खुद सोशल मीडिया के जरिए अपनी चोट की जानकारी फैन्स के साथ साझा की है। उन्होंने बताया कि लुसाने डायमंड लीग में 88.05 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो करने के बाद वह शानदार लय महसूस कर रहे थे। लंबे समय से जिस मोमेंटम की उन्हें तलाश थी वह उन्हें वापस मिलता नजर आ रहा था लेकिन इसी दौरान ट्रेनिंग में उनके टखने के लिगामेंट में टियर हो गया। चोट के बाद उन्होंने अपनी मेडिकल टीम और डॉक्टरों के साथ विस्तार से चर्चा की और इसके बाद इस सीजन के बाकी मुकाबलों से दूर रहने का फैसला किया।

    नीरज के लिए यह फैसला आसान नहीं रहा होगा क्योंकि चोट ऐसे समय पर आई जब उनका प्रदर्शन धीरे धीरे बेहतर होता दिखाई दे रहा था। ग्लासगो में हुए मुकाबले में उन्होंने पोडियम फिनिश हासिल किया था लेकिन श्रीलंका के रुमेश पथिरागे ने 89.75 मीटर का शानदार थ्रो करते हुए उनसे गोल्ड मेडल छीन लिया था। इसके बाद लुसाने डायमंड लीग में भी नीरज ने हिस्सा लिया और 88.05 मीटर का थ्रो उनके लिए सीजन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। वह क्वालिफिकेशन की रेस में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे लेकिन चोट ने उनके पूरे सीजन पर ब्रेक लगा दिया।

    एशियन गेम्स 2026 का आयोजन 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक जापान के आइची नागोया में होना है। नीरज के बाहर होने का सबसे बड़ा झटका यह है कि वह जैवलिन थ्रो में अपने पिछले खिताब का बचाव नहीं कर पाएंगे। उनके नाम की मौजूदगी ही भारत के लिए पदक की बड़ी उम्मीद मानी जाती थी। ऐसे में उनकी अनुपस्थिति से भारतीय एथलेटिक्स टीम पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।

    हालांकि नीरज ने इस मुश्किल वक्त में भी सकारात्मक रवैया दिखाया है। उनका कहना है कि चोट और मुश्किलें खेल के सफर का हिस्सा हैं और फिलहाल उनका पूरा ध्यान रिकवरी पर है। वह पूरी तरह फिट होकर पहले से ज्यादा मजबूती के साथ मैदान पर वापसी करना चाहते हैं। अब नीरज की गैरमौजूदगी में भारत की उम्मीदें रोहित यादव पर टिक गई हैं। रोहित ने हाल ही में भुवनेश्वर में 87.68 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए जीत दर्ज की थी। नीरज के बाहर होने के बाद रोहित एशियन गेम्स में भारत के प्रमुख जैवलिन पदक दावेदार के रूप में नजर आएंगे।

  • नीरज चोपड़ा ने 14 महीने बाद फेंका 88 मीटर पार भाला, जीत से 9 सेंटीमीटर दूर; श्रीलंकाई स्टार ने फिर हराया

    नीरज चोपड़ा ने 14 महीने बाद फेंका 88 मीटर पार भाला, जीत से 9 सेंटीमीटर दूर; श्रीलंकाई स्टार ने फिर हराया


    नई दिल्ली। भारत के स्टार भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने लुसाने डायमंड लीग में शानदार वापसी करते हुए 88.05 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो किया। नीरज ने अपने दूसरे प्रयास में यह दूरी हासिल की और कुछ समय के लिए प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। हालांकि श्रीलंका के युवा स्टार रुमेश थरंगा पथिरागे ने तीसरे प्रयास में 88.14 मीटर का थ्रो कर नीरज को पीछे छोड़ दिया। इस तरह नीरज को रजत पदक से संतोष करना पड़ा और वह गोल्ड से सिर्फ 9 सेंटीमीटर दूर रह गए।

    लुसाने में नीरज का प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि यह इस सीजन में उनका सबसे लंबा थ्रो है। इससे पहले उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था और वह 2026 में 88 मीटर के आंकड़े को पार नहीं कर पाए थे। लुसाने में 88.05 मीटर का प्रयास उनके लिए बड़ा आत्मविश्वास बढ़ाने वाला प्रदर्शन माना जा रहा है। यह जून 2025 में पेरिस डायमंड लीग में 88.16 मीटर फेंकने के बाद उनका एक साल से अधिक समय में सबसे लंबा थ्रो भी रहा।

    मुकाबले में नीरज ने शुरुआत 83.54 मीटर के थ्रो से की थी। इसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने अपना प्रदर्शन अचानक काफी बेहतर किया और 88.05 मीटर तक भाला पहुंचाकर शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। इस थ्रो के बाद नीरज की जीत लगभग तय होती नजर आ रही थी लेकिन रुमेश पथिरागे ने कुछ ही देर बाद शानदार जवाब दिया। श्रीलंकाई खिलाड़ी ने तीसरे प्रयास में 88.14 मीटर का थ्रो किया और महज 9 सेंटीमीटर के अंतर से नीरज को दूसरे स्थान पर धकेल दिया।

    रुमेश पथिरागे के लिए यह जीत बेहद खास रही। 23 वर्षीय श्रीलंकाई खिलाड़ी इस समय शानदार फॉर्म में चल रहे हैं और इस सीजन में नीरज के खिलाफ लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लुसाने की जीत से पहले भी पथिरागे ने नीरज को दो अहम मुकाबलों में पीछे छोड़ा था। दोनों की प्रतिद्वंद्विता अब जैवलिन थ्रो में एक नई कहानी बनती नजर आ रही है।

    ग्रेनेडा के एंडरसन पीटर्स ने 86.69 मीटर के सर्वश्रेष्ठ प्रयास के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। उन्होंने यह दूरी अपने छठे और आखिरी प्रयास में दर्ज की। त्रिनिदाद और टोबैगो के मौजूदा विश्व चैंपियन केशॉर्न वालकॉट 83.71 मीटर के साथ चौथे स्थान पर रहे। इस तरह नीरज और पथिरागे के बीच मुकाबला बाकी खिलाड़ियों की तुलना में काफी आगे रहा।

    नीरज के लिए लुसाने का यह प्रदर्शन भले ही गोल्ड में नहीं बदल सका लेकिन 88 मीटर के पार पहुंचना उनके लिए बड़ी सकारात्मक खबर है। 2026 सीजन की शुरुआत में संघर्ष करने के बाद उन्होंने अब अपनी पुरानी लय की झलक दिखाई है। इससे आगे होने वाली बड़ी प्रतियोगिताओं के लिए उनकी तैयारी को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं। नीरज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस प्रदर्शन को लगातार बनाए रखना और आने वाले मुकाबलों में 90 मीटर के आंकड़े के करीब पहुंचना होगी।

    लुसाने डायमंड लीग का नतीजा नीरज के लिए एक करीबी हार जरूर रहा लेकिन उनका 88.05 मीटर का थ्रो बताता है कि भारतीय स्टार अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म की ओर लौट रहे हैं। दूसरी तरफ पथिरागे की लगातार चुनौती ने पुरुष जैवलिन थ्रो में मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है। नीरज अब इस प्रदर्शन से मिले आत्मविश्वास के साथ सीजन के अगले बड़े मुकाबलों में नजर आएंगे।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले नीरज का दमदार संदेश, कहा- विदेशी खिलाड़ियों से अब नहीं घबराते भारतीय

    कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले नीरज का दमदार संदेश, कहा- विदेशी खिलाड़ियों से अब नहीं घबराते भारतीय


    नई दिल्ली । भारत के स्टार जैवलिन थ्रोअर और ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 से पहले भारतीय खिलाड़ियों के बढ़ते आत्मविश्वास को देश के खेलों के लिए सबसे बड़ा बदलाव बताया है। ग्लासगो पहुंचने के बाद मीडिया से बातचीत में नीरज ने कहा कि अब भारतीय खिलाड़ी विदेशी एथलीटों से डरते नहीं हैं, बल्कि पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ मुकाबला करते हैं। उनका मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय खेलों की तस्वीर बदली है और इसका सबसे बड़ा कारण खिलाड़ियों का मानसिक रूप से मजबूत होना है।

    नीरज ने कहा कि पहले भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में विदेशी खिलाड़ियों को खुद से बेहतर मान लेते थे। इससे प्रदर्शन पर भी असर पड़ता था, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। आज भारतीय एथलीट कड़ी मेहनत, आधुनिक प्रशिक्षण और बेहतर तैयारी के दम पर दुनिया के किसी भी खिलाड़ी को चुनौती देने का माद्दा रखते हैं। यही आत्मविश्वास अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सफलता की सबसे बड़ी ताकत बन रहा है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी तैयारियों को लेकर नीरज ने कहा कि ग्लासगो की ठंडी हवाएं और मौसम निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन ये परिस्थितियां सभी खिलाड़ियों के लिए समान हैं। ऐसे में मौसम को बहाना बनाने के बजाय मानसिक रूप से मजबूत रहना ज्यादा जरूरी है। उनका कहना है कि किसी भी कठिन परिस्थिति में यह सोचना चाहिए कि उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे किया जाए।

    उन्होंने कहा कि किसी भी प्रतियोगिता में उनका लक्ष्य केवल पदक जीतना नहीं होता, बल्कि अपनी तकनीक और रणनीति को पूरी तरह लागू करना होता है। यदि खिलाड़ी मैदान पर अपना शत-प्रतिशत दे देता है तो परिणाम अपने आप बेहतर आते हैं। नीरज ने कहा कि वह हर बार भारत की जर्सी पहनकर मैदान में उतरते हैं तो वह प्रतियोगिता उनके लिए खास बन जाती है और इस बार भी उनका प्रयास देश के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का रहेगा।

    फिटनेस को लेकर नीरज ने भरोसा जताया कि वह पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं। उन्होंने बताया कि विश्व चैंपियनशिप और दोहा प्रतियोगिता के बाद उन्होंने अपनी कमजोरियों पर लगातार काम किया है। अब वह खुद को पहले से ज्यादा फिट और तैयार महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स के तुरंत बाद एशियन गेम्स होने हैं, इसलिए लगातार फिट रहना और प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।

    90 मीटर से ज्यादा का थ्रो करने के बाद हर प्रतियोगिता में उसी प्रदर्शन को दोहराने के दबाव के सवाल पर नीरज ने कहा कि उनका ध्यान किसी एक दूरी पर नहीं रहता। उनका लक्ष्य हर बार अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर करना और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के बीच अपनी पहचान मजबूत बनाए रखना है। उन्होंने स्वीकार किया कि ग्लासगो में मुकाबला बेहद कठिन होगा क्योंकि यहां ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और डायमंड लीग के कई चैंपियन खिलाड़ी मौजूद हैं, लेकिन वह पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरेंगे।

    नीरज चोपड़ा ने खिलाड़ियों को मिल रहे सरकारी सहयोग की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में प्रशिक्षण, विदेशों में अभ्यास और अन्य सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है। इससे भारतीय खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में बड़ी मदद मिली है। उनका मानना है कि यदि यही समर्थन और तैयारी आगे भी जारी रही तो भारतीय खिलाड़ी आने वाले वर्षों में वैश्विक खेल मंच पर और अधिक बड़ी सफलताएं हासिल करेंगे।

  • हादसे ने छीना एक हाथ, हौसले ने दिलाए तीन पैरालंपिक पदक: देवेंद्र झाझरिया की प्रेरक कहानी

    हादसे ने छीना एक हाथ, हौसले ने दिलाए तीन पैरालंपिक पदक: देवेंद्र झाझरिया की प्रेरक कहानी


    नई दिल्ली । भारत के खेल इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अपनी उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि अपने संघर्ष और जज्बे के लिए भी हमेशा याद किए जाते हैं। देवेंद्र झाझरिया ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। एक दर्दनाक हादसे में बचपन में अपना बायां हाथ गंवाने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और दुनिया को दिखा दिया कि मजबूत इरादों के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती।

    राजस्थान के चुरू जिले में 10 जून 1981 को जन्मे देवेंद्र झाझरिया का बचपन सामान्य बच्चों की तरह बीत रहा था। लेकिन महज आठ साल की उम्र में एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। एक दिन पेड़ पर चढ़ते समय उनका संपर्क हाई वोल्टेज बिजली के तार से हो गया। गंभीर रूप से झुलसने के बाद डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए उनका बायां हाथ काटना पड़ा। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी, लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ सकी।

    हादसे के बाद देवेंद्र को सामाजिक उपेक्षा और मानसिक संघर्ष का भी सामना करना पड़ा। साथी बच्चों के बीच खुद को अलग महसूस करने वाले देवेंद्र ने धीरे-धीरे खेलों की ओर रुख किया। स्कूल स्तर पर भाला फेंक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए उनकी प्रतिभा सामने आने लगी। वर्ष 1997 में एक पैरा एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान कोच रिपुदमन सिंह की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने देवेंद्र को इस खेल को गंभीरता से अपनाने की सलाह दी और यहीं से एक महान खिलाड़ी के सफर की शुरुआत हुई।

    सिर्फ 23 वर्ष की उम्र में देवेंद्र ने 2004 एथेंस पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया। उन्होंने एफ-46 भाला फेंक स्पर्धा में 62.15 मीटर का विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता और भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन किया। यह उपलब्धि भारतीय पैरा खेलों के इतिहास में एक नया अध्याय साबित हुई।

    इसके बाद कई वर्षों तक उनकी स्पर्धा पैरालंपिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं रही, लेकिन उन्होंने अभ्यास और मेहनत जारी रखी। 2016 रियो पैरालंपिक में उन्होंने 63.97 मीटर का थ्रो कर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा और दूसरा स्वर्ण पदक जीत लिया। इसके साथ ही वे पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए।

    देवेंद्र के जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब पिता की गंभीर बीमारी ने उन्हें खेल छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। लेकिन उनके पिता ने ही उन्हें हार न मानने और देश के लिए खेलने की प्रेरणा दी। पिता की इसी सीख ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। वर्ष 2020 पैरालंपिक में उन्होंने 64.35 मीटर के थ्रो के साथ रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वे पैरालंपिक में तीन पदक जीतने वाले भारत के पहले व्यक्तिगत एथलीट बने।

    देवेंद्र झाझरिया ने केवल पैरालंपिक ही नहीं, बल्कि एशियन पैरा गेम्स और विश्व चैंपियनशिप में भी भारत का गौरव बढ़ाया। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री, मेजर ध्यानचंद खेल रत्न और पद्म भूषण जैसे देश के सर्वोच्च सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।

    देवेंद्र झाझरिया की कहानी यह साबित करती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो तो सफलता जरूर मिलती है। उनका जीवन आज लाखों युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।