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  • 1948 में जब पूर्वी पंजाब ने रोका था पाकिस्तान जाने वाला सिंधु तंत्र का पानी, नेहरू ने फैसले को बताया था अमानवीय, बातचीत से निकला समाधान

    1948 में जब पूर्वी पंजाब ने रोका था पाकिस्तान जाने वाला सिंधु तंत्र का पानी, नेहरू ने फैसले को बताया था अमानवीय, बातचीत से निकला समाधान

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के विभाजन के कुछ ही महीनों बाद वर्ष 1948 में दोनों देशों के बीच सिंधु नदी तंत्र को लेकर पहला बड़ा जल विवाद सामने आया। उस समय पूर्वी पंजाब सरकार ने अपने क्षेत्र में स्थित प्रमुख हेडवर्क्स से पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी की आपूर्ति अस्थायी रूप से रोक दी थी। इस निर्णय का तत्काल प्रभाव पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था पर पड़ा और दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन का मुद्दा गंभीर कूटनीतिक विषय बन गया। हालांकि बाद में बातचीत के माध्यम से समाधान निकाला गया और पानी की आपूर्ति फिर से बहाल कर दी गई।

    विभाजन के बाद सीमा निर्धारण के कारण माधोपुर और फिरोजपुर जैसे महत्वपूर्ण हेडवर्क्स भारत के हिस्से में आए। इन संरचनाओं से उन नहरों का संचालन होता था जिनके माध्यम से पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र के बड़े हिस्से में सिंचाई होती थी। अंतरिम व्यवस्था की अवधि समाप्त होने और नया समझौता नहीं होने के बाद पूर्वी पंजाब सरकार ने 1 अप्रैल 1948 से पानी की आपूर्ति रोकने का निर्णय लिया। उस समय यह कदम राज्य स्तर पर उठाया गया था और इसका उद्देश्य अपने अधिकार क्षेत्र में उपलब्ध जल संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना बताया गया।

    इतिहासकारों और जल नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय के बाद पाकिस्तान के सामने गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई क्योंकि उसकी कृषि भूमि का एक हिस्सा इन नहरों पर निर्भर था। उस समय दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सैन्य विकल्प के बजाय वार्ता को प्राथमिकता दी गई। इसी कारण दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू हुई और समाधान तलाशने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण इस विषय पर पूर्वी पंजाब सरकार से अलग माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, नेहरू ने इस कदम के मानवीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभावों पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने माना कि कृषि के लिए पानी रोकना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता और ऐसे कदम केवल असाधारण परिस्थितियों, जैसे युद्ध, में ही विचारणीय हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि इस प्रकार की कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।

    दूसरी ओर, पूर्वी पंजाब के नेतृत्व का तर्क था कि विभाजन के बाद नई परिस्थितियों में राज्य को अपने क्षेत्र से बहने वाले जल पर कानूनी अधिकार प्राप्त था और बिना किसी नए समझौते के पूर्व व्यवस्था को जारी रखना आवश्यक नहीं था। इस प्रकार केंद्र और राज्य के दृष्टिकोण में प्राथमिकताओं का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। जहां राज्य सरकार स्थानीय परिस्थितियों और संसाधनों के नियंत्रण पर जोर दे रही थी, वहीं केंद्र सरकार व्यापक कूटनीतिक और मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व दे रही थी।

    करीब पांच सप्ताह तक चले इस विवाद का समाधान मई 1948 में नई दिल्ली में आयोजित अंतर-डोमिनियन सम्मेलन के दौरान निकला। बातचीत के बाद भारत ने पाकिस्तान की ओर पानी की आपूर्ति दोबारा शुरू कर दी। इसी प्रक्रिया ने भविष्य में दोनों देशों के बीच स्थायी जल व्यवस्था विकसित करने की दिशा में आधार तैयार किया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि 1948 का यह विवाद दक्षिण एशिया के जल इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। बाद के वर्षों में दोनों देशों के बीच नदी जल प्रबंधन को लेकर जो संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई, उसकी प्रारंभिक पृष्ठभूमि इसी घटनाक्रम से जुड़ी मानी जाती है। यह प्रकरण आज भी सीमा-पार जल संसाधनों के प्रबंधन, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

  • भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री

    भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ते हुए देश के सबसे लंबे समय तक कार्यरत निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं और इसी के साथ उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार सबसे लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद वर्ष 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी उनके नेतृत्व में एनडीए को सफलता मिली और उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 9 जून 2026 तक उनके कार्यकाल के 4398 दिन पूरे हो चुके हैं, जो किसी निर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल माना जा रहा है।

    इससे पहले यह रिकॉर्ड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम था। नेहरू ने 1952 के पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अपना निर्वाचित कार्यकाल शुरू किया था और लगातार 4397 दिनों तक इस पद पर बने रहे थे। हालांकि वह 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में वह अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्य कर रहे थे। इसी कारण निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल की गणना अलग आधार पर की जाती है।

    प्रधानमंत्री मोदी की इस उपलब्धि को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी हैं जिन्होंने लगातार दो बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व किया और तीसरे कार्यकाल में भी सत्ता की कमान संभाल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उपलब्धि भारतीय राजनीति में उनके लंबे प्रभाव और जनसमर्थन को दर्शाती है।

    एनडीए सरकार इस अवसर को विशेष रूप से चिह्नित करने की तैयारी में है। 10 जून को गठबंधन शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सहयोगी दलों के नेताओं की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में पिछले 12 वर्षों के दौरान सरकार की प्रमुख उपलब्धियों, विकास योजनाओं और नीतिगत पहलों पर चर्चा किए जाने की संभावना है। गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुए कार्यों को रेखांकित करने वाला प्रस्ताव भी पेश किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इससे पहले जुलाई 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगातार प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा था। वहीं मार्च 2026 में उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल की, जब गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कुल शासनकाल ने भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाले नेताओं की सूची में उन्हें शीर्ष स्थान पर पहुंचा दिया।

    राजनीतिक इतिहास में प्रधानमंत्री मोदी का नाम लगातार तीन लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर सरकार बनाने वाले चुनिंदा नेताओं में भी शामिल हो चुका है। जवाहरलाल नेहरू के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने, जिन्होंने लगातार तीन आम चुनावों में अपने नेतृत्व में गठबंधन को जीत दिलाकर तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

    प्रधानमंत्री मोदी की एक और विशेष पहचान यह है कि वे स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था, जबकि उनसे पहले देश के सभी प्रधानमंत्रियों का जन्म स्वतंत्रता से पूर्व हुआ था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक राजनीतिक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय से भारतीय राजनीति में बने नेतृत्व, चुनावी सफलता और प्रशासनिक निरंतरता का भी प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाएगा।