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  • वाल्मीकि जयंती 2026 कब है? जानें तारीख, धार्मिक महत्व और रामायण के रचयिता से जुड़ी खास बातें

    वाल्मीकि जयंती 2026 कब है? जानें तारीख, धार्मिक महत्व और रामायण के रचयिता से जुड़ी खास बातें

    नई दिल्ली । महर्षि वाल्मीकि जयंती हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक अवसरों में शामिल है। यह दिन रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जीवन, साहित्यिक योगदान और आध्यात्मिक विचारों को याद करने के लिए मनाया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, उनकी जयंती आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में वाल्मीकि जयंती सोमवार, 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन देश के विभिन्न हिस्सों में पूजा-अर्चना, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

    महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का आदि कवि कहा जाता है। उन्हें रामायण जैसे महाकाव्य की रचना का श्रेय दिया जाता है। रामायण में भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों, माता सीता के संघर्ष, लक्ष्मण की निष्ठा और हनुमान की भक्ति का वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखता है। इसकी कथाओं और पात्रों ने पीढ़ियों से लोगों के जीवन, विचारों और सामाजिक मूल्यों को प्रभावित किया है।

    वाल्मीकि जयंती की तारीख निर्धारित करने में पूर्णिमा तिथि और उदया तिथि का महत्व माना जाता है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह समाप्त होगी। उदया तिथि की परंपरा के आधार पर कई पंचांगों में 26 अक्टूबर को जयंती मनाने की तारीख बताई गई है। धार्मिक आयोजन करने वाले लोग स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और कार्यक्रमों का समय निर्धारित कर सकते हैं।

    महर्षि वाल्मीकि का धार्मिक महत्व केवल रामायण की रचना तक सीमित नहीं है। उन्हें ज्ञान, साधना, चिंतन और साहित्यिक प्रतिभा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। उनकी रचना में सत्य, कर्तव्य, धैर्य, करुणा और मर्यादा जैसे मूल्यों को प्रमुखता दी गई है। भगवान श्रीराम का जीवन कठिन परिस्थितियों में भी आदर्शों पर बने रहने की प्रेरणा देता है, जबकि रामायण के अन्य पात्र त्याग, निष्ठा और जिम्मेदारी के अलग-अलग उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इसी कारण यह महाकाव्य धार्मिक पाठ के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

    वाल्मीकि जयंती के अवसर पर अनेक स्थानों पर महर्षि वाल्मीकि के मंदिरों और धार्मिक स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु उनकी प्रतिमा के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। कई जगहों पर शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। रामायण का पाठ, भजन-कीर्तन और सामुदायिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि के योगदान और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।

    महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुड़ी प्रचलित कथाएं आत्मचिंतन और सकारात्मक बदलाव के महत्व पर जोर देती हैं। उनसे संबंधित परंपरागत जीवनगाथा यह संदेश देती है कि व्यक्ति अपने विचारों और कर्मों में परिवर्तन लाकर बेहतर मार्ग अपना सकता है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं पर आधारित हैं, इसलिए उन्हें उसी संदर्भ में समझा जाता है।

    वाल्मीकि जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि साहित्य, ज्ञान और मानवीय मूल्यों को याद करने का अवसर भी है। इस दिन रामायण का अध्ययन करना, बच्चों को इसकी प्रेरक कथाओं से परिचित कराना और सत्य, करुणा तथा अच्छे आचरण को अपनाने का संकल्प लेना उपयोगी माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि की रचनात्मक विरासत आज भी भारतीय संस्कृति और साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

  • 4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    4 सितंबर को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग से बढ़ा पर्व का महत्व

    नई दिल्ली ।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व इस वर्ष 4 सितंबर को मनाया जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू हुई और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। धार्मिक परंपरा में जन्माष्टमी की तारीख निर्धारित करते समय केवल अष्टमी तिथि ही नहीं, बल्कि मध्यरात्रि और रोहिणी नक्षत्र की स्थिति को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इन्हीं पंचांग गणनाओं के आधार पर शुक्रवार को जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव और विशेष पूजा की जाएगी। इस बार पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है, क्योंकि ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार कई शुभ संयोग एक साथ बन रहे हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र और वृष राशि के संयोग में हुआ था। वर्ष 2026 में जन्माष्टमी पर भी अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष मेल बताया जा रहा है। इसी कारण इस संयोग को जयंती योग के रूप में विशेष महत्व दिया जा रहा है।

    इस वर्ष जन्माष्टमी पर जयंती योग के अलावा सर्वार्थ सिद्धि योग, हर्षण योग, हंस योग, मालव्य योग, बुधादित्य राजयोग और नवपंचम राजयोग बनने की बात कही गई है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में शुभ योगों को पूजा, व्रत, भक्ति और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अनुकूल माना जाता है।

    जन्माष्टमी की सबसे महत्वपूर्ण पूजा मध्यरात्रि के निशीथ काल में की जाती है। इस वर्ष निशीथ काल रात 11 बजकर 58 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। यानी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मुख्य पूजा के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 46 मिनट का समय मिलेगा।

    अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को देखते हुए इस अवधि में श्रीकृष्ण की पूजा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान भगवान का अभिषेक, पूजन, आरती और जन्मोत्सव से जुड़े धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई भक्त जन्माष्टमी पर व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं।

    4 सितंबर के दिन की शुरुआत हर्षण योग से होगी, जो दोपहर 3 बजकर 44 मिनट तक रहने की जानकारी दी गई है। इसके बाद अन्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार दिन और रात में अलग-अलग योगों की स्थिति रहेगी। इन योगों को लेकर धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग हैं और श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर समेत कई शहरों में जन्माष्टमी को लेकर मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं। राजधानी के इस्कॉन मंदिर, खाटू श्याम मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिरों में शुक्रवार सुबह से ही धार्मिक कार्यक्रम, भजन और अन्य आयोजन शुरू होने की तैयारी है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के श्रृंगार, झांकी और जन्मोत्सव के लिए व्यवस्थाएं पूरी कर ली गई हैं।

    जन्माष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि श्रीकृष्ण के जीवन, उनके उपदेशों और धर्म तथा कर्म की अवधारणा को स्मरण करने का अवसर भी माना जाता है। इस दिन देशभर में श्रद्धालु भगवान कृष्ण की बाल रूप में पूजा करते हैं और मध्यरात्रि में उनके जन्म का उत्सव मनाते हैं। इस बार बनने वाले विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण पर्व का धार्मिक महत्व और अधिक चर्चा में है।

  • मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की जयंती पर दी श्रद्धांजलि, विधानसभा में पुष्पांजलि अर्पित

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की जयंती पर दी श्रद्धांजलि, विधानसभा में पुष्पांजलि अर्पित


    भोपाल । मध्यप्रदेश विधानसभा भवन में बुधवार को एक भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। विधानसभा परिसर में स्थापित उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई और उनके जीवन एवं कार्यों को याद किया गया। इस मौके पर विधायक एवं पूर्व प्रोटेम स्पीकर श्री रामेश्वर शर्मा, पूर्व मंत्री श्री पी.सी. शर्मा, पूर्व विधायक श्री सुदर्शन गुप्ता और स्व. श्री शुक्ला के परिवारजन भी उपस्थित रहे और उन्होंने भी चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि 10 फरवरी 1930 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्मे राजेंद्र प्रसाद शुक्ला ने लोकतंत्र की सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1985 से 1990 तक वे मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे और इसके बाद राज्य सरकार में विधि-विधायी एवं सामान्य प्रशासन मंत्री के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में पदयात्राओं के माध्यम से जन जागरण का कार्य किया और एक लोकप्रिय जन नेता के रूप में पहचाने गए।

    छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद, स्व. शुक्ला ने 14 दिसंबर 2000 से 19 दिसंबर 2003 तक छत्तीसगढ़ के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष के रूप में सेवाएँ दीं। उनके नेतृत्व में विधानसभा की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती को नई दिशा मिली। उन्होंने ‘असंसदीय अभिव्यक्तियां’ नामक पुस्तक की संकल्पना की, जो विधायी कामकाज पर एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन गई। इसके अलावा उन्होंने संसदीय मामलों सहित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जो विधि और संसदीय इतिहास के लिए अमूल्य स्रोत हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष श्री तोमर की सराहना की और कहा कि प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री तथा विधानसभा अध्यक्ष जैसे व्यक्तित्वों की जयंती और पुण्यतिथि पर विधानसभा भवन में उन्हें स्मरण करने की परंपरा स्थापित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष का आभार व्यक्त किया। इस प्रकार यह कार्यक्रम न केवल स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला को श्रद्धांजलि देने का अवसर था, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और विधायी परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना को भी मजबूती देने वाला आयोजन साबित हुआ।