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  • यरुशलम में भारतीय प्रवासी की हत्या से सनसनी, इजराइली संदिग्ध गिरफ्तार; दुनिया भर में कई अहम घटनाक्रमों पर नजर

    यरुशलम में भारतीय प्रवासी की हत्या से सनसनी, इजराइली संदिग्ध गिरफ्तार; दुनिया भर में कई अहम घटनाक्रमों पर नजर

    नई दिल्ली । इजराइल के यरुशलम शहर में एक भारतीय प्रवासी की हत्या का मामला सामने आने के बाद स्थानीय पुलिस ने एक इजराइली नागरिक को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जांच में घटना को आपराधिक प्रकृति का माना जा रहा है। इस बीच यूरोप और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनमें सऊदी शाही परिवार से जुड़ा मामला, ऑस्ट्रिया में ऐतिहासिक इमारत का नया उपयोग, स्विट्जरलैंड में एक वरिष्ठ नेता पर गंभीर आरोप और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय से जुड़ा अहम फैसला शामिल है।

    यरुशलम के कटामोन इलाके में गुरुवार को 40 वर्षीय भारतीय प्रवासी कामगार का शव एक मकान के भीतर मिला। पुलिस के अनुसार शव फर्श पर पड़ा था और घटनास्थल पर बड़ी मात्रा में खून मिला। मामले की सूचना मिलने के बाद जांच एजेंसियां तुरंत मौके पर पहुंचीं और साक्ष्य जुटाने का काम शुरू किया गया। पुलिस ने हत्या के संदेह में 31 वर्षीय एक इजराइली नागरिक को हिरासत में लिया है। फिलहाल मृतक और आरोपी की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण कर विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।

    उधर ब्रिटेन की राजधानी लंदन में सऊदी शाही परिवार के 29 वर्षीय राजकुमार अब्दुल्ला बिन फहद बिन अब्दुल्ला बिन अब्दुलअजीज बिन जलावी अल सऊद की मौत की जांच पूरी हो गई है। अदालत में पेश रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु अत्यधिक शराब, पार्टी ड्रग और प्रिस्क्रिप्शन दवाओं के संयुक्त प्रभाव से कार्डियक अरेस्ट होने के कारण हुई। जांच में इस घटना को ‘मिसएडवेंचर’ यानी अनजाने में हुई घातक दुर्घटना माना गया और आत्महत्या के कोई प्रमाण नहीं मिले। टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट में शरीर में अल्कोहल की मात्रा सामान्य कानूनी सीमा से कई गुना अधिक पाई गई।

    ऑस्ट्रिया में एडॉल्फ हिटलर के जन्मस्थान के रूप में पहचानी जाने वाली ऐतिहासिक इमारत को अब पुलिस स्टेशन में बदल दिया गया है। सरकार का उद्देश्य इस स्थान को नव-नाजी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने से रोकना है। वर्षों तक विवादों में रहने वाली इस इमारत को सरकार ने अपने नियंत्रण में लेकर इसका नया उपयोग तय किया। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम इतिहास के नकारात्मक प्रतीकों को महिमामंडित होने से रोकने की दिशा में उठाया गया है।

    स्विट्जरलैंड में बाल सुरक्षा कानूनों के समर्थक रहे पूर्व दक्षिणपंथी नेता पैट्रिक फ्राई गंभीर कानूनी संकट में घिर गए हैं। उन पर नाबालिग से दुष्कर्म, महिलाओं को नशीली दवा देकर यौन शोषण करने और हत्या के प्रयास जैसे कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अभियोजन पक्ष ने अदालत से उनके लिए उम्रकैद की मांग की है। जांच एजेंसियों का दावा है कि मामले से जुड़े कई डिजिटल और अन्य साक्ष्य बरामद किए गए हैं। आरोपी वर्ष 2023 से हिरासत में है और मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।

    वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के मुख्य अभियोजक करीम खान को पद से हटाने के प्रस्ताव पर सदस्य देशों के बीच मतदान होना है। उन पर लगाए गए यौन दुराचार के आरोपों के बाद यह प्रक्रिया शुरू हुई है, हालांकि उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया है। सदस्य देशों के मतदान के बाद उनके भविष्य पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। इस मुद्दे पर कई प्रमुख देशों ने उन्हें पद से हटाने के समर्थन का संकेत दिया है।

  • ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल

    ट्रंप की ‘पीस डील’ बनाम नेतन्याहू का ‘सर्वाइवल’: ईरान के साथ अमेरिकी समझौते की सुगबुगाहट के बीच क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं है इजरायल


    नई दिल्ली ।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ एक नई शांति संधि की कोशिशों के बीच मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बड़ा वैचारिक टकराव उभरकर सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत की सुगबुगाहटों के बीच इजरायल ने अपने रुख को बेहद आक्रामक बनाए रखा है। वाशिंगटन के लिए जहां यह युद्ध वैश्विक कूटनीति और हितों का एक हिस्सा मात्र हो सकता है, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वहां की एक बड़ी आबादी के लिए यह देश के वजूद और अस्तित्व को बचाए रखने की एक अनिवार्य लड़ाई बन चुकी है।

    यरुशलम की रणनीतिक सोच और वाशिंगटन के नजरिए में बुनियादी फर्क यह है कि अमेरिका इस सैन्य संघर्ष की शुरुआत को हालिया तारीखों से जोड़कर देखता है, जबकि इजराइली अवाम के लिए यह लड़ाई अक्टूबर दो हजार तेईस के उस काले दिन से शुरू हो चुकी है जब उनकी सीमाओं के भीतर घुसकर बर्बरता को अंजाम दिया गया था। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन जब भी शांति और समझौते की बात आगे बढ़ाता है, इजरायली रक्षा बल अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पड़ोसी मुल्कों में बने आतंकी ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई और तेज कर देते हैं।

    बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक जीवन और उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी है कि दुश्मनों के सामने रियायतें देना आत्मघाती साबित होता है। संयुक्त राष्ट्र में देश के सबसे युवा राजदूत के रूप में काम कर चुके नेतन्याहू के पास सुरक्षा मामलों का लंबा व्यावहारिक अनुभव है, जिसके दम पर वे कई बार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के दबाव को भी खारिज कर चुके हैं। इजरायल में यह माना जाता है कि जब भी किसी कमजोर सरकार ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर कदम पीछे खींचे हैं, देश को और बड़े संकटों का सामना करना पड़ा है।

    इजरायल की अंदरूनी राजनीति भले ही बेहद जटिल और मिली-जुली सरकारों के दौर से गुजरती रही हो, लेकिन बाहरी खतरों के समय वहां का समाज पूरी तरह एकजुट हो जाता है। वर्तमान में देश की साठ फीसदी से अधिक जनता राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर सरकार की इस सैन्य नीति के साथ मजबूती से खड़ी है कि ईरान समर्थित उग्रवादी संगठनों का पूरी तरह सफाया किया जाए। गाजा पट्टी से वर्ष दो हजार पांच में सेना हटाने के बाद जिस तरह वहां हमास का गढ़ तैयार हुआ, उसने इजरायली सुरक्षा तंत्र को यह सबक सिखाया है कि जमीन के बदले शांति की नीति हमेशा बेअसर रहती है।

    सैन्य मोर्चे पर इजरायल इस समय चारों तरफ से खतरनाक हथियारों से लैस गैर-राज्य अभिकर्ताओं से घिरा हुआ है। एक तरफ गाजा में सक्रिय नेटवर्क है, तो दूसरी तरफ लेबनान की सीमा पर आधुनिक मिसाइलों से लैस हिजबुल्लाह मौजूद है, जिसने उत्तरी इजरायल के नागरिकों का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर रखा है। इजरायली सेना की रणनीति अब बिल्कुल साफ है कि वे किसी भी मोर्चे पर कमजोरी नहीं दिखाएंगे और उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए लितानी नदी तक के पूरे क्षेत्र को हमेशा के लिए पूरी तरह खामोश कर देंगे ताकि भविष्य में रॉकेट हमलों का खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो सके।

    कूटनीतिक स्तर पर यरुशलम इस बात को भली-भांति समझता है कि महाशक्तियों की नीतियां उनके तात्कालिक राजनीतिक फायदों के हिसाब से बदलती रहती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए युद्ध को बीच में रोकना एक कूटनीतिक जीत हो सकती है, लेकिन इजरायल के लिए युद्ध को अधूरा छोड़ना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। यदि यह जंग बिना किसी ठोस नतीजे के रुकती है, तो तेहरान से हथियारों की आपूर्ति दोबारा शुरू हो जाएगी और सीमावर्ती इलाकों से विस्थापित हुए लाखों इजरायली नागरिक कभी भी अपने घरों को सुरक्षित वापस नहीं लौट पाएंगे।