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  • वैवाहिक विवाद में हर अपमान आपराधिक क्रूरता नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने 498A की कानूनी सीमा स्पष्ट की

    वैवाहिक विवाद में हर अपमान आपराधिक क्रूरता नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने 498A की कानूनी सीमा स्पष्ट की

    नई दिल्ली । झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति के खिलाफ धारा 498A के तहत चल रही आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी। पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति उसके रंग, शर्मीले स्वभाव, समझ और बातचीत करने के तरीके को लेकर लगातार ताने देता था। अदालत ने माना कि इस तरह की टिप्पणियां अनुचित और दुख पहुंचाने वाली हो सकती हैं, लेकिन केवल इन्हीं आरोपों के आधार पर धारा 498A के तहत आपराधिक क्रूरता का मामला नहीं बनता।

    मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी ऑनलाइन मैट्रिमोनियल वेबसाइट के माध्यम से हुई थी। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद शुरू हो गए। पत्नी का आरोप था कि पति उसके रंग को लेकर टिप्पणी करता था और उसके व्यक्तित्व, कम IQ तथा बातचीत करने के तरीके का मजाक उड़ाता था। विवाद बढ़ने के बाद पति ने उसे अलग रहने के लिए कहा।

    इसके बाद पत्नी पहले बेंगलुरु में अपनी छोटी बहन के पास रहने लगी और बाद में कोलकाता में अपनी बड़ी बहन के पास चली गई। इसी दौरान पति ने रांची की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की। वैवाहिक संबंधों में बढ़ते विवाद के बीच पत्नी ने भी पति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की।

    पत्नी ने धारा 498A के तहत क्रूरता का आरोप लगाने के अलावा करीब 35 लाख रुपये के स्त्रीधन को वापस नहीं करने की शिकायत भी की। उसका कहना था कि पति ने वैवाहिक जीवन जारी रखने में भी बाधा डाली। दूसरी ओर, पति ने अपने बचाव में पत्नी पर एक बीमारी से संबंधित आरोप लगाया और कहा कि विवाद के कारण परिस्थितियां खराब हुईं।

    11 जून 2024 को रांची की निचली अदालत ने शिकायत और उपलब्ध सामग्री के आधार पर पति को समन जारी किया। इसके बाद पति ने इस कार्रवाई को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी और आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने की मांग की।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की पीठ ने की। अदालत ने धारा 498A में परिभाषित क्रूरता की कानूनी कसौटी पर आरोपों को परखा। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत ऐसे जानबूझकर किए गए व्यवहार को देखा जाता है, जिससे महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो सकती हो या उसके जीवन, शरीर अथवा स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता हो। इसके अलावा गैरकानूनी संपत्ति या दहेज की मांग से जुड़ा उत्पीड़न भी इस प्रावधान के दायरे में आता है।

    अदालत ने पाया कि शिकायत में पति की ओर से किसी गैरकानूनी संपत्ति या दहेज की मांग का आरोप नहीं था। साथ ही ऐसे व्यवहार का स्पष्ट आरोप भी नहीं था, जिससे पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर होने या गंभीर शारीरिक अथवा स्वास्थ्य संबंधी खतरे का सामना करना पड़ा हो।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी के रंग, IQ और बातचीत करने की क्षमता पर टिप्पणी करना अपने आप में उचित व्यवहार नहीं माना जा सकता। हालांकि, केवल इन आरोपों को धारा 498A के तहत आपराधिक क्रूरता मानने के लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों का पूरा होना जरूरी है।

    अदालत ने कहा कि आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने के बाद भी इस मामले में धारा 498A के तहत अपराध स्थापित नहीं होता। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का समन आदेश और पति के खिलाफ संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

    फैसले का मुख्य संदेश यह है कि वैवाहिक जीवन में अपमानजनक व्यवहार और आपराधिक क्रूरता के बीच कानूनी अंतर होता है। हर वैवाहिक विवाद या ताने को स्वतः धारा 498A के अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पति-पत्नी के बीच अपमानजनक या असम्मानजनक व्यवहार उचित है। अदालत ने इस मामले में केवल यह तय किया कि उपलब्ध आरोप धारा 498A की कानूनी कसौटी पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।

  • Jharkhand: धनबाद में फिर धंसी जमीन…. 13 घरों को नुकसान, रहवासियों ने भागकर बचाई जान

    Jharkhand: धनबाद में फिर धंसी जमीन…. 13 घरों को नुकसान, रहवासियों ने भागकर बचाई जान


    धनबाद।
    झारखंड (Jharkhand) के धनबाद (Dhanbad) में जमीन धंसने (Land subsidence) की एक और घटना सामने आई है। बस्ताकोला क्षेत्र (Bastakola area) अंतर्गत बंद झरिया आरएसपी कॉलेज के समीप स्थित कामिनी कल्याण बस्ती में शनिवार की दोपहर जोरदार आवाज के साथ जमीन धंस गई। इससे करीब एक दर्जन घरों में दरार पड़ गई। घटना से पूरी बस्ती में अफरा-तफरी और दहशत का माहौल बन गया। इस घटना के बाद लोग अपने घरों से निकलकर जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे।

    भू-धंसान इतना भीषण था कि कई घरों की भूमिगत पाइपलाइन टूट गई, जिससे बस्ती में जलापूर्ति पूरी तरह ठप हो गई है। माइंस रेस्क्यू की पूरी तकनीकी टीम ने भी घटनास्थल पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है। घटना से आक्रोशित लोगों ने झरिया-धनबाद मुख्य मार्ग पर आकर जोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस दौरान लोगों ने सड़क के बीचोंबीच खड़े होकर आवागमन पूरी तरह ठप कर दिया। इससे मुख्य मार्ग पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

    मेयर संजीव सिंह सबसे पहले पहुंचे। उन्होंने बीसीसीएल अधिकारियों को तत्काल मौके पर पहुंचकर युद्धस्तर पर राहत कार्य शुरू करने के लिए कहा। इसके बाद बस्ताकोला जीएम एसके गायकवाड़ और राजापुर परियोजना पदाधिकारी एम कुंडू पहुंचे। अधिकारियों ने प्रभावित स्थल का निरीक्षण कर पीड़ितों के साथ वार्ता की। मौके पर सिंदरी डीएसपी प्रकाश चंद महतो दलबल के साथ मौजूद थे। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने आक्रोशित लोगों को समझा-बुझाकर और उचित कार्रवाई का भरोसा देकर किसी तरह शांत कराया।


    मेयर संजीव के समझाने पर शांत हुए प्रभावित

    मेयर संजीव सिंह ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। कहा कि सभी प्रभावितों को सुरक्षित जगहों पर बसाया जाएगा। तत्काल राहत के तौर पर मेयर ने बेघर हुए आशीष रवानी, निरंजन रवानी, बेबी देवी और विश्वजीत दे के परिवार को रात गुजारने के लिए बस्ताकोला रेस्क्यू स्कूल स्थित जीएम ऑफिस में रहने की व्यवस्था कराई।

  • झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी छात्र आंदोलन में शामिल हुए अभिनेता पीयूष मिश्रा, दिया समर्थन

    झारखंड में जेपीएससी-जेएसएससी छात्र आंदोलन में शामिल हुए अभिनेता पीयूष मिश्रा, दिया समर्थन

    नई दिल्ली । झारखंड की राजधानी रांची में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का विरोध प्रदर्शन लगातार गहराता जा रहा है। जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों को लेकर छात्र अनिश्चितकालीन आंदोलन और भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। इस बीच, प्रसिद्ध अभिनेता और गायक पीयूष मिश्रा ने आंदोलन स्थल पहुंचकर प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात की और उनकी मांगों का प्रत्यक्ष समर्थन किया।

    रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में एकत्र हुए अभ्यर्थियों के बीच पहुंचे पीयूष मिश्रा ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले युवाओं के संघर्ष और पीड़ा को देखकर वे उनके साथ खड़े होने आए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी विशेष एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि छात्रों की तकलीफों और उनके आंसुओं को देखकर वे इस आंदोलन से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं के साथ एकजुटता दर्शाने के लिए वे अपनी ओर से हर संभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

    आंदोलनकारी छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के दौरान अभिनेता ने अपनी चर्चित फिल्म का क्रांतिकारी गीत ‘आरंभ है प्रचंड’ भी गाया, जिससे पूरे प्रदर्शन स्थल पर मौजूद युवाओं में भारी उत्साह देखा गया। यह गीत अपने प्रेरणादायक और संघर्षशील बोलों के लिए जाना जाता है। पीयूष मिश्रा ने बताया कि प्रदर्शनकारी छात्रों के लिए भोजन, तिरपाल और अन्य आवश्यक सामग्रियां उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए हैं, ताकि उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया जा सके।

    उल्लेखनीय है कि झारखंड में वर्ष 2019 के बाद आयोजित हुई कई प्रमुख भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्र बेहद असंतोष व्यक्त कर रहे हैं। अभ्यर्थियों का आरोप है कि जेएसएससी सीजीएल, जेएसएससी जेई और पीजीटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में व्यापक पैमाने पर धांधली और लीक के मामले सामने आए हैं, जिससे योग्य उम्मीदवारों का भविष्य अधर में लटक गया है।

    प्रदर्शन कर रहे छात्रों की मुख्य मांगों में विवादित परीक्षाओं को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाना, पूरे प्रकरण की केंद्रीय जांच ब्यूरो से निष्पक्ष जांच कराया जाना और इसमें संलिप्त दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई किया जाना शामिल है। छात्र संगठनों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक यह अनिश्चितकालीन आंदोलन और भूख हड़ताल जारी रहेगी।

    प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग को लेकर चल रहे इस आंदोलन को अब विभिन्न सामाजिक व सांस्कृतिक वर्गों का भी समर्थन मिलने लगा है। युवाओं के इस विरोध-प्रदर्शन ने राज्य में प्रशासनिक एवं परीक्षा प्रणाली में सुधारों को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • झारखंड भर्ती परीक्षा विवाद में 14वें दिन भी छात्रों का आंदोलन जारी, अनशनकारी राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में भर्ती

    झारखंड भर्ती परीक्षा विवाद में 14वें दिन भी छात्रों का आंदोलन जारी, अनशनकारी राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल में भर्ती

    नई दिल्ली । झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। शुक्रवार को आंदोलन का 14वां दिन रहा। बड़ी संख्या में छात्र अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि कई छात्र भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इसी बीच अनशन कर रहे छात्र राहुल क्रांति की तबीयत अचानक बिगड़ गई। हालत ज्यादा खराब होने पर उन्हें रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम से तत्काल सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें भर्ती कराया गया। इस घटना के बाद आंदोलन कर रहे छात्रों में चिंता बढ़ गई है। दूसरी ओर, भर्ती परीक्षा विवाद को लेकर झारखंड विधानसभा के बाहर और सदन के भीतर भी राजनीतिक माहौल गरम रहा।

    भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों में राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई। बताया गया कि राज्य में छह छात्र अनशन पर बैठे हैं। आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि लंबे समय से प्रदर्शन और अनशन के बावजूद सरकार की ओर से उनकी मांगों पर बातचीत के लिए कोई आधिकारिक बुलावा नहीं भेजा गया है। छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर विधानसभा तक मार्च निकालने का भी ऐलान किया है। इससे आने वाले दिनों में आंदोलन के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

    छात्रों की सबसे प्रमुख मांग 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा को रद्द करने की है। प्रदर्शनकारी छात्रों का आरोप है कि भर्ती परीक्षा की प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। छात्रों की मांग है कि मामले की जांच सीबीआई या राज्य के बाहर के सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों की टीम से कराई जाए। इसके अलावा छात्र झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की कार्यप्रणाली में बड़े सुधार की मांग भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों का भरोसा बहाल करना जरूरी है।

    भर्ती परीक्षा विवाद का असर झारखंड विधानसभा में भी दिखाई दिया। विपक्षी विधायकों ने छात्रों के आंदोलन को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और जोरदार विरोध किया। विपक्षी विधायक नारेबाजी करते हुए मामले की सीबीआई और ईडी से जांच कराने की मांग करने लगे। विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि छात्रों की मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए और पूरे मामले में उचित कार्रवाई होनी चाहिए।

    वहीं सरकार की ओर से भी विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया गया। सरकार ने कहा कि भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मामलों को गंभीरता से देखा जा रहा है। साथ ही सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि पहले से सामने आए पुरानी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मामलों पर भी जवाब दिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने कहा कि सरकार छात्रों के मुद्दे को गंभीरता से देख रही है।

    फिलहाल छात्र अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं और आंदोलन समाप्त करने के संकेत नहीं दिए हैं। अनशनकारी राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ने से आंदोलन का मामला और संवेदनशील हो गया है। अब छात्रों की नजर सरकार की ओर से होने वाली किसी औपचारिक बातचीत पर है। वहीं सरकार के सामने भी छात्रों की मांगों और लगातार बढ़ते आंदोलन के बीच समाधान निकालने की चुनौती है। आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर और बाहर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और छात्र आंदोलन दोनों के और तेज होने की संभावना बनी हुई है।

  • रांची छात्र आंदोलन के बीच सीआईडी की बड़ी कार्रवाई, पांच और गिरफ्तार; वार्ता को लेकर सक्रिय हुई हेमंत सरकार

    रांची छात्र आंदोलन के बीच सीआईडी की बड़ी कार्रवाई, पांच और गिरफ्तार; वार्ता को लेकर सक्रिय हुई हेमंत सरकार

    नई दिल्ली । झारखंड में प्रतियोगी परीक्षा में कथित धांधली को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। एक तरफ जहां जांच एजेंसियां अपनी कार्रवाई तेज कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच वार्ता के रास्ते तलाशने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। आपराधिक जांच विभाग यानी सीआईडी ने इस प्रकरण में पांच और आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जिससे इस मामले में अब तक हुई गिरफ्तारियों का दायरा और बढ़ गया है।

    इस हालिया कार्रवाई में परीक्षा आयोजन से जुड़े एक पूर्व अधिकारी के कार्यालय में तैनात कर्मचारी, कुछ अभ्यर्थी और बिचौलिए पुलिस की गिरफ्त में आए हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और जब्त दस्तावेजों के आधार पर यह गिरफ्तारियां की गई हैं। सीआईडी की टीमें पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने के उद्देश्य से लगातार विभिन्न ठिकानों पर दबिश दे रही हैं और आने वाले दिनों में कुछ और बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

    इस बीच राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पूरे मामले पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए आंदोलनकारी छात्रों से संवाद की पेशकश की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार युवाओं के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि योग्य अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और सभी जायज मांगों पर नियमानुसार विचार किया जाएगा।

    दूसरी ओर, आंदोलन की अगुवाई कर रहे छात्र नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे बंद कमरे में वार्ता के पक्षधर नहीं हैं। छात्रों की मांग है कि बातचीत किसी सार्वजनिक मंच पर हो या फिर पूरी प्रक्रिया का सीधा प्रसारण किया जाए, ताकि सभी अभ्यर्थियों के सामने पूरी पारदर्शिता बनी रहे। कुछ छात्र प्रतिनिधियों का कहना है कि मुख्यमंत्री को स्वयं अनशन स्थल पर आकर छात्रों की समस्याएं सुननी चाहिए और तुरंत समाधान की घोषणा करनी चाहिए।

    प्रदर्शन स्थल पर अनशन पर बैठे छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। आंदोलनकारी मुख्य रूप से विवादित परीक्षा को पूरी तरह रद्द करने, दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करने और भविष्य की भर्ती परीक्षाओं के लिए सख्त कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों के छात्र संगठन भी झारखंड के इस घटनाक्रम पर अपनी नजर बनाए हुए हैं और लगातार सोशल मीडिया के माध्यम से आंदोलन को समर्थन मिल रहा है।

    संभावित विधानसभा घेराव और प्रदर्शन को देखते हुए राजधानी में पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए हैं। शहर के प्रमुख चौराहों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। फिलहाल सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बने इस गतिरोध का नतीजा क्या निकलता है, इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं।

  • JPPSC-JSSC विवाद पर झारखंड सरकार का वार्ता प्रस्ताव, छात्रों ने सार्वजनिक बातचीत की मांग रखकर आंदोलन जारी रखा

    JPPSC-JSSC विवाद पर झारखंड सरकार का वार्ता प्रस्ताव, छात्रों ने सार्वजनिक बातचीत की मांग रखकर आंदोलन जारी रखा

    नई दिल्ली । झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर जारी छात्र आंदोलन आठवें दिन भी जारी रहा। राजधानी रांची में आंदोलनरत छात्र झारखंड लोक सेवा आयोग (JPPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) से जुड़ी परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा अपनी विभिन्न मांगों को लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के बीच राज्य सरकार ने छात्रों को बातचीत का प्रस्ताव दिया है, जिससे पूरे घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया है।

    बुधवार को रांची के धरना स्थल पर प्रशासनिक अधिकारी पहुंचे और प्रदर्शनकारी छात्रों से सरकार की ओर से वार्ता का संदेश दिया। अधिकारियों ने छात्रों से पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल बनाकर सरकार के साथ बातचीत करने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से सर्किट हाउस में वार्ता का प्रस्ताव भेजा गया, ताकि छात्रों की मांगों पर चर्चा कर समाधान का रास्ता निकाला जा सके।

    हालांकि प्रदर्शनकारी छात्रों ने बंद कमरे में बातचीत करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में उनकी बात सुनना चाहती है तो बातचीत सार्वजनिक रूप से और मीडिया की मौजूदगी में होनी चाहिए। छात्रों ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं धरना स्थल पर आकर उनसे संवाद करें, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे और जनता भी बातचीत को देख सके।

    धरना स्थल पर प्रशासन और छात्रों के बीच लगातार संवाद की कोशिशें जारी रहीं। प्रशासन प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से वार्ता शुरू कराने का प्रयास करता रहा, जबकि प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर कायम रहे। छात्रों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर ठोस और स्पष्ट निर्णय के बिना आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा। उनका उद्देश्य केवल निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

    इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दलों ने भी प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन जताया है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में विपक्षी प्रतिनिधियों ने आंदोलन स्थल पहुंचकर छात्रों से मुलाकात की और उनकी मांगों पर चर्चा की। इसके अलावा कई सामाजिक और साहित्यिक हस्तियां भी आंदोलन को समर्थन देने के लिए धरना स्थल पहुंचीं और छात्रों का मनोबल बढ़ाया।

    झारखंड में चल रहे इस आंदोलन को राज्य के युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है। अब सभी की नजर सरकार और छात्रों के बीच संभावित वार्ता पर टिकी हुई है। यदि दोनों पक्ष सहमति के साथ किसी समाधान पर पहुंचते हैं तो लंबे समय से जारी गतिरोध समाप्त हो सकता है। फिलहाल प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत की संभावनाएं बनी हुई हैं, जबकि छात्र अपनी मांगों पर अडिग हैं और आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं।

  • झारखंड : भूख हड़ताल के तीसरे दिन बिगड़ी देवेंद्र नाथ महतो की तबीयत, बोले- युवाओं को न्याय मिलने तक रहेगा संघर्ष जारी

    झारखंड : भूख हड़ताल के तीसरे दिन बिगड़ी देवेंद्र नाथ महतो की तबीयत, बोले- युवाओं को न्याय मिलने तक रहेगा संघर्ष जारी


    रांची। झारखंड में JPSC–JSSC भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहा आंदोलन लगातार तेज होता जा रहा है। मंगलवार को सत्याग्रह धरना 11वें दिन में पहुंच गया, जबकि अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का तीसरा दिन रहा। आंदोलन स्थल पर बड़ी संख्या में युवा, अभिभावक और समर्थक पहुंचकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में जुटे।

    आंदोलन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने कहा कि यह संघर्ष झारखंड के युवाओं के भविष्य और उनके अधिकारों की लड़ाई है। उन्होंने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्ष और आंदोलन की राह पर चलते हुए वे युवाओं को न्याय दिलाने के लिए आंदोलन जारी रखेंगे।

    भूख हड़ताल से बिगड़ी तबीयत
    लगातार तीन दिनों से अन्न और पानी का त्याग कर भूख हड़ताल पर बैठे देवेंद्र नाथ महतो की तबीयत बिगड़ गई है। बताया जा रहा है कि उनका ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर काफी कम हो गया है। इसके अलावा कमजोरी, शरीर में दर्द, थकान और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं भी बढ़ गई हैं। चिकित्सकों की सलाह पर उन्हें स्लाइन चढ़ाई गई है।

    ‘मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा’
    महतो ने कहा कि जब तक राज्य सरकार JPSC–JSSC भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं करती और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया लागू करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि यह किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि झारखंड के लाखों बेरोजगार युवाओं और उनके परिवारों के भविष्य और सम्मान की लड़ाई है।

    श्रद्धांजलि मार्च भी निकाला
    4 अगस्त को पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की पुण्यतिथि के अवसर पर आंदोलनकारियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और JPSC-JSSC परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के विरोध में श्रद्धांजलि मार्च भी निकाला।

    युवाओं का बढ़ता समर्थन
    आंदोलन स्थल पर लगातार बढ़ रही युवाओं और अभिभावकों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को लेकर राज्यभर में व्यापक असंतोष और चिंता बनी हुई है।

    JPSC जांच में 14 गिरफ्तार
    उधर, झारखंड CID ने JPSC परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच के दौरान मंगलवार को तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसके साथ ही इस मामले में अब तक गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या बढ़कर 14 हो गई है।

  • पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    नई दिल्ली । पेपर लीक के मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को प्रेस वार्ता कर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। भाजपा सांसद और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों के मामलों को राजनीतिक मुद्दा बनाता है, जबकि कर्नाटक और झारखंड में सामने आए कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के मामलों पर चुप्पी साधे हुए है। उन्होंने कहा कि छात्रों के हितों को लेकर विपक्ष का रुख समान नहीं है।

    संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि झारखंड में बड़ी संख्या में छात्र लंबे समय से कथित परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की ओर से उनके समर्थन में कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर भी विपक्ष इन मामलों को प्रमुखता से नहीं उठा रहा है। भाजपा का दावा है कि विपक्ष केवल उन्हीं मुद्दों को आगे बढ़ाता है जिनसे उसे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है।

    भाजपा ने संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के संचालन को लेकर भी विपक्ष पर निशाना साधा। संबित पात्रा ने कहा कि संसद का प्रत्येक सत्र जनता के धन से चलता है और इस पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन लगातार हंगामे के कारण प्रश्नकाल और कई महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के रवैये की वजह से महत्वपूर्ण विषयों पर सदन में अपेक्षित चर्चा नहीं हो पा रही है।

    प्रेस वार्ता के दौरान भाजपा ने कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे के एक बयान का भी उल्लेख किया। पार्टी ने दावा किया कि पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के संबंध में मंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील थी। भाजपा ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी प्रतिक्रिया देने की मांग करते हुए कहा कि उन्हें इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। वहीं कांग्रेस की ओर से इस मामले में अलग-अलग अवसरों पर अपने विचार व्यक्त किए जाते रहे हैं।

    इधर झारखंड में राज्य लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी छात्र निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इसी मामले में झारखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष से जांच एजेंसियों द्वारा कई दौर की पूछताछ भी की जा चुकी है। उन्होंने इससे पहले अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं।

    पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बना हुआ है। विभिन्न राज्यों में सामने आए मामलों को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। वहीं अभ्यर्थियों की मांग है कि सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राज्यों की राजनीति में भी प्रमुख बना रह सकता है।

  • झारखंडः गुमला में पंचायत ने बच्ची से दुष्कर्म का मामला दबाकर आरोपी से वसूला जुर्माना और कर ली शराब-मटन की पार्टी

    झारखंडः गुमला में पंचायत ने बच्ची से दुष्कर्म का मामला दबाकर आरोपी से वसूला जुर्माना और कर ली शराब-मटन की पार्टी


    नई दिल्ली । झारखंड के गुमला जिले से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। जिले के घाघरा थाना क्षेत्र स्थित पलमा गांव में तीन साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म की शर्मनाक घटना के बाद गांव की पंचायत ने मामले को रफा-दफा करने के लिए आरोपी से तत्काल 20 हजार का जुर्माना वसूला और इससे शराब एवं मटन पार्टी की।

    इसकी जानकारी मिलने पर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दुष्कर्म के आरोपी को गिरफ्तार किया। अब गैरकानूनी पंचायत बुलाने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी चल रही है। घटना बीते शनिवार, 11 जुलाई 2026 की है, जब पलमा गांव के ही रहने वाले दरिंदे सुनील लोहरा ने तीन वर्षीय मासूम बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया और उसके साथ बर्बरता की।

    जब इस घटना की जानकारी गांव के कुछ रसूखदारों को लगी, तो उन्होंने पुलिस को सूचना देने या पीड़ित परिवार को कानूनी न्याय दिलाने के बजाय, रविवार को गांव में ही एक गुपचुप पंचायत बुला ली। इस पंचायत का मुख्य उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि पूरे मामले को रफा-दफा करना था। पंचायत में बैठे दबंगों ने अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए मासूम के जख्मों की कीमत लगा दी और आरोपी सुनील लोहरा पर एक लाख रुपये का आर्थिक जुर्माना ठोकने का फरमान सुना दिया।

    दबंगों ने आरोपी से मौके पर ही 20 हजार रुपये नकद वसूल लिए और शेष 80 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि एक सप्ताह के भीतर हर हाल में चुकाने की सख्त मोहलत दे दी। लेकिन, संवेदनहीनता का सबसे वीभत्स रूप इसके बाद देखने को मिला। पीड़ित परिवार और तड़पती हुई मासूम बच्ची के चीख-पुकार को पूरी तरह दरकिनार कर, पंचायत के इन कथित पंचों ने आरोपी से मौके पर वसूले गए उसी 20 हजार रुपये से गांव में ही मटन और शराब का बंदोबस्त किया।

    इसके बाद दुष्कर्म के पैसों से इन रसूखदारों ने जमकर जश्न मनाया और मटन-शराब की पार्टी की। इस बीच, गांव के ही एक सजग नागरिक ने हिम्मत दिखाई और गुप्त रूप से घाघरा थाना पुलिस को पूरे घटनाक्रम की सटीक सूचना दे दी। पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आया और आनन-फानन में घाघरा थाना पुलिस की एक विशेष टीम ने पलमा गांव में भारी दबिश देकर छापेमारी की। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी सुनील लोहरा को उसके ठिकाने से धर दबोचा और उसे सलाखों के पीछे भेज दिया।

    आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और दुष्कर्म की अत्यंत गंभीर व गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस पीड़ित परिवार पर केस दबाने का दबाव बनाने, साक्ष्यों को नष्ट करने और जघन्य सामाजिक अपराध को छुपाने का षड्यंत्र रचने के आरोप में पंचायत के आयोजकों, उसमें शामिल दबंगों और शराब पार्टी करने वालों की पहचान में जुटी है।

  • पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    पैतृक संपत्ति विवाद में सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था, ‘घर दामाद’ को नहीं मिला कानूनी अधिकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड से जुड़े उरांव आदिवासी समुदाय के एक पैतृक संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तराधिकार संबंधी पारंपरिक व्यवस्था की कानूनी व्याख्या स्पष्ट की है। अदालत ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार कर लेने से उसे पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक संबंधित समुदाय की स्थापित परंपरा में ऐसी व्यवस्था का स्पष्ट आधार मौजूद न हो। इस निर्णय के साथ सर्वोच्च अदालत ने निचली अदालतों और उच्च न्यायालय के फैसलों को निरस्त कर दिया।

    मामला झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय की एक पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा था। विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब परिवार के एक सदस्य की संतान नहीं थी और उनकी संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। एक पक्ष का कहना था कि मृतक ने अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए वही संपत्ति का वैध उत्तराधिकारी है। वहीं दूसरे पक्ष ने दावा किया कि उरांव समुदाय की पारंपरिक व्यवस्था में ऐसी कोई मान्यता नहीं है और संपत्ति का अधिकार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को मिलना चाहिए।

    सर्वोच्च अदालत की पीठ ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और समुदाय की प्रचलित परंपराओं का परीक्षण करने के बाद कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि उरांव समाज में चाचा अपनी भतीजी के पति को ‘घर दामाद’ बनाकर उत्तराधिकारी नियुक्त करने की कोई स्थापित और मान्य परंपरा मौजूद है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी प्रथा या रिवाज को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब उसके अस्तित्व और निरंतर पालन के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं।

    अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यदि संपत्ति के स्वामी का कोई प्रत्यक्ष पुरुष उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो ऐसी स्थिति में समुदाय की पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था के अनुसार निकटतम पुरुष गोत्रीय रिश्तेदार को संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होगा। इसी आधार पर अदालत ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के पूर्व आदेशों को निरस्त कर दिया।

    यह मामला पहले ट्रायल कोर्ट, फिर प्रथम अपीलीय अदालत और उसके बाद झारखंड हाई कोर्ट तक पहुंचा था। इन सभी अदालतों ने ‘घर दामाद’ के पक्ष में दिए गए तर्कों को स्वीकार किया था। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन निर्णयों में संबंधित समुदाय की वास्तविक परंपराओं का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया और स्थापित प्रथाओं के समर्थन में ठोस साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किए गए।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आदिवासी समुदायों में प्रचलित पारंपरिक उत्तराधिकार कानूनों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि किसी भी समुदाय की परंपराओं को मान्यता देने के लिए उनके ऐतिहासिक, सामाजिक और कानूनी आधार का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। केवल पारिवारिक व्यवस्था या व्यक्तिगत सहमति के आधार पर उत्तराधिकार संबंधी अधिकार स्वतः स्थापित नहीं किए जा सकते।

    इस निर्णय को भविष्य में आदिवासी समुदायों से जुड़े संपत्ति विवादों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह फैसला इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि पारंपरिक कानूनों की व्याख्या साक्ष्यों और स्थापित रिवाजों के आधार पर ही की जाएगी, न कि केवल मौखिक दावों या व्यक्तिगत व्यवस्थाओं के आधार पर।