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  • जेपी अस्पताल में डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, वेतन और स्टाइपेंड के लिए भूख हड़ताल जारी, तीन महीने की सैलरी और पांच महीने का भुगतान अटका

    जेपी अस्पताल में डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, वेतन और स्टाइपेंड के लिए भूख हड़ताल जारी, तीन महीने की सैलरी और पांच महीने का भुगतान अटका


    भोपाल। भोपाल के जयप्रकाश जिला अस्पताल यानी जेपी अस्पताल में वेतन और स्टाइपेंड के भुगतान को लेकर डॉक्टरों का विरोध तेज हो गया है। बकाया राशि नहीं मिलने और वेतन में कथित कटौती से नाराज तीन डॉक्टर 21 अक्टूबर से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। गुरुवार को भी उनका आंदोलन जारी रहा और वे रातभर अस्पताल परिसर में डटे रहे। डॉक्टरों का कहना है कि भुगतान का भरोसा मिलने के बावजूद उनके खाते में पूरी राशि नहीं आई है। ऐसे में उन्होंने बकाया भुगतान और वेतन में कटौती के कारणों को स्पष्ट करने की मांग उठाई है।

    अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनीष बरथरे के मुताबिक वे बुधवार से भूख हड़ताल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि बुधवार सुबह सिविल सर्जन की ओर से एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने पहुंचा था। प्रतिनिधिमंडल ने एक महीने का वेतन जारी करने की बात कही थी। डॉक्टरों को उम्मीद थी कि इससे उनकी आर्थिक परेशानी कुछ कम होगी लेकिन जब उन्होंने खाते में आई राशि की जांच की तो भुगतान पूरा नहीं मिला। उनका आरोप है कि एक महीने का वेतन जारी करने की बात कहे जाने के बावजूद खाते में कम राशि आई है। इसी वजह से उनकी नाराजगी और बढ़ गई।

    इस आंदोलन में शामिल पीजी छात्र डॉ. शुभम कश्यप की परेशानी भी गंभीर बताई जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार उनका पांच महीने का स्टाइपेंड अब तक बकाया है। उनका कहना है कि उन्हें एक महीने का स्टाइपेंड भी नहीं मिला है। इसके अलावा पिछले तीन साल में स्टाइपेंड बढ़ने के बाद मिलने वाला एरियर भी लंबित है। लंबे समय से भुगतान नहीं होने के कारण उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टरों ने मांग की है कि उनके बकाया भुगतान की स्थिति स्पष्ट की जाए और लंबित राशि जल्द जारी की जाए।

    डॉक्टरों के मुताबिक चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनीष बरथरे और पीजीएमओ ऑर्थोपेडिक्स डॉ. रविंद्र पाल का करीब तीन महीने का वेतन बकाया होने की शिकायत है। वहीं डॉ. शुभम कश्यप पांच महीने के स्टाइपेंड और एरियर का इंतजार कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि वेतन और स्टाइपेंड समय पर मिलना जरूरी है क्योंकि इससे उनकी रोजमर्रा की जरूरतें और आर्थिक जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। भुगतान में लगातार देरी होने से उनके सामने मुश्किलें खड़ी हो रही हैं।

    डॉक्टरों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब एक महीने का वेतन देने की बात कही गई थी तो खाते में पूरी राशि क्यों नहीं पहुंची। वे चाहते हैं कि भुगतान में देरी और कथित कटौती के पीछे के कारणों की जानकारी दी जाए। उनका कहना है कि जब तक बकाया राशि और भुगतान संबंधी शिकायतों पर स्पष्ट जवाब नहीं मिलता तब तक उनका विरोध जारी रह सकता है।

    फिलहाल जेपी अस्पताल में तीन डॉक्टरों की भूख हड़ताल ने वेतन और स्टाइपेंड भुगतान की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में अस्पताल प्रबंधन की ओर से भुगतान में देरी और कथित कटौती को लेकर आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी डॉक्टरों की मांगों पर क्या कदम उठाते हैं और लंबित भुगतान का समाधान कब तक हो पाता है।

  • मप्र संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ का जोरदार प्रदर्शन, हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होने का खतरा

    मप्र संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ का जोरदार प्रदर्शन, हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होने का खतरा


    भोपाल में मंगलवार को लगभग 30 हजार आउटसोर्स स्वास्थ्य कर्मचारी मप्र संविदा आउटसोर्स स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के आह्वान पर जेपी अस्पताल परिसर में प्रदर्शन कर रहे हैं। कर्मचारियों ने नारेबाजी करते हुए दोपहर 1 बजे न्याय यात्रा निकालने का निर्णय लिया है, जो सीधे मुख्यमंत्री निवास तक जाएगी। इस दौरान वे अपनी 9 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन मुख्यमंत्री को सौंपेंगे।

    संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह कौरव ने बताया कि प्रदर्शन 2 फरवरी से शुरू हुआ था। विभागीय अधिकारियों की अनदेखी के कारण बीते दो दिन कर्मचारियों ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताया। आज वे संचालनालय स्वास्थ्य सेवाओं से न्याय यात्रा निकालकर अपनी मांगों को राजधानी में प्रत्यक्ष रूप से मुख्यमंत्री तक पहुंचाएंगे।

    पुलिस ने जेपी अस्पताल परिसर में बैरिकेडिंग कर कर्मचारियों को रोकने की तैयारी की है, जबकि कर्मचारियों का दावा है कि उन्हें न्याय यात्रा निकालने की अनुमति दी गई है।

    संघ के अनुसार प्रदेशभर के जिला अस्पताल, सिविल हॉस्पिटल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शहरी स्वास्थ्य केंद्र, संजीवनी क्लिनिक और पोषण पुनर्वास केंद्रों में लगभग 30 हजार आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं। ये कर्मचारी रिपोर्टिंग, सफाई, सुरक्षा, कुपोषित बच्चों की देखभाल और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हड़ताल होने की स्थिति में अस्पतालों की सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।

    कर्मचारियों की प्रमुख मांग है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत सेवाएं दे चुके आउटसोर्स कर्मचारियों को बिना शर्त रिक्त तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर समायोजित किया जाए और नियमित किया जाए। साथ ही उत्तर प्रदेश और हरियाणा की तर्ज पर नीति बनाकर स्थायी समाधान और न्यूनतम 21 हजार रुपये वेतन निर्धारित करने की मांग भी शामिल है।

    संघ की 9 सूत्रीय मांगों में वेतन वृद्धि का 11 माह का एरियर भुगतान, निजी आउटसोर्स एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट करना, सीधे खाते में वेतन भुगतान, शासकीय अवकाश, नियमित भर्ती में 50 प्रतिशत आरक्षण, स्वास्थ्य बीमा और ग्रेच्युटी लाभ शामिल हैं। संघ का आरोप है कि दोहरी और दमनकारी नीति के कारण वर्षों से कर्मचारी शोषित हो रहे हैं, जबकि वे 12-14 घंटे तक लगातार कार्य कर स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ बने हुए हैं।

    संघ ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो 25 फरवरी 2026 से प्रदेशभर के कर्मचारी सामूहिक हड़ताल पर चले जाएंगे। कर्मचारियों का कहना है कि अब न्याय यात्रा के जरिए सीधे मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की जाएगी और बिना उनके भविष्य की सुरक्षा के स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती संभव नहीं है।

  • भोपाल के जेपी अस्पताल में मरीज को दी फफूंद लगी दवा सीनियर डॉक्टर नदारद ओपीडी में इंटर्न डॉक्टरों के भरोसे इलाज

    भोपाल के जेपी अस्पताल में मरीज को दी फफूंद लगी दवा सीनियर डॉक्टर नदारद ओपीडी में इंटर्न डॉक्टरों के भरोसे इलाज


    भोपाल । भोपाल के जेपी अस्पताल जिला चिकित्सालय में एक गंभीर घटना सामने आई है जहां शुक्रवार शाम एक मरीज को फफूंद लगी दवा दी गई। यह मामला दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है और अस्पताल प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है। मरीज ने दवा लेने से पहले उसे देखा जिससे किसी बड़ी दुर्घटना से बचा जा सका। यदि मरीज ने दवा की स्थिति का ध्यान नहीं किया होता तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या बन सकती थी।

    मरीज सतीष सेन ने बताया कि वे शुक्रवार शाम करीब पांच बजे पैर में फ्रैक्चर की आशंका के चलते जेपी अस्पताल की आर्थोपेडिक ओपीडी में पहुंचे थे। ओपीडी में उस वक्त कोई सीनियर डॉक्टर मौजूद नहीं थे और इंटर्न डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया। इसके बाद मरीज को एक्स-रे की सिफारिश की गई और दर्द की दवा लिखी गई जो बाद में फफूंद लगी हुई मिली।

    इस घटना ने अस्पताल में चिकित्सा गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मरीज को अगर दवा की स्थिति का पता न चलता तो इसे स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा माना जा सकता था। इसके अलावा सीनियर डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने भी ओपीडी में इलाज के स्तर को प्रभावित किया।

    इस मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य संगठनों नेप्रशासन से कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही से बचा जासके और मरीजों को बेहतर इलाज और दवाइयां मिल सकें। अस्पताल प्रशासन को इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत कदम उठाने चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीजों को गुणवत्ता वाली दवाइयां और इलाज मिले।