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  • सीनियरिटी से नहीं मिलता हाईकोर्ट जज बनने का अधिकार कॉलेजियम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

    सीनियरिटी से नहीं मिलता हाईकोर्ट जज बनने का अधिकार कॉलेजियम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी


    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कॉलेजियम की सिफारिशों में सामान्य परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति पूरी तरह कॉलेजियम के स्वतंत्र आकलन और गोपनीय प्रक्रिया पर आधारित होती है। ऐसे मामलों की गहन न्यायिक जांच केवल असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है।

    मामला हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की उस सिफारिश को चुनौती दी थी जिसमें उनसे जूनियर तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में आगे बढ़ाए गए थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि पहले उनके नाम पर पुनर्विचार के निर्देश दिए गए थे लेकिन बाद में उनसे कनिष्ठ अधिकारियों की सिफारिश कर दी गई।

    सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पहले ही मंजूरी दे चुका है तब इस स्तर पर उस प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा का कोई ठोस आधार नहीं बनता। अदालत ने यह भी कहा कि कॉलेजियम की कार्यवाही पूरी तरह गोपनीय होती है और उसकी जांच पड़ताल शुरू करना पूरी व्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

    पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में गोपनीयता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। यदि हर सिफारिश की न्यायिक जांच शुरू कर दी जाए तो यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करेगा और अनावश्यक विवादों का रास्ता खुल जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर कॉलेजियम के फैसलों की पड़ताल कर किसी नए विवाद या मुसीबतों का पिटारा नहीं खोलना चाहती।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि यदि आवश्यक समझें तो हाईकोर्ट के सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष अपनी शिकायत रखें अथवा उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा लें।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। कॉलेजियम नियुक्ति के समय योग्यता अनुभव कार्यशैली ईमानदारी और समग्र मूल्यांकन जैसे कई पहलुओं पर विचार करता है। इसलिए केवल वरिष्ठ होने के आधार पर नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को औपचारिक रूप से खारिज किया गया है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने संकेत दिया कि उनकी सेवा अवधि अभी लंबी है और भविष्य में रिक्तियां आने पर उनके नाम पर फिर विचार किया जा सकता है।

    इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्तियों की पारदर्शिता जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही आवश्यक उसकी गोपनीयता भी है। कॉलेजियम प्रणाली में अदालत का हस्तक्षेप सीमित रहेगा ताकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहे।

  • कॉलेजियम पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सिर्फ वरिष्ठता से नहीं मिलता जज बनने का अधिकार

    कॉलेजियम पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सिर्फ वरिष्ठता से नहीं मिलता जज बनने का अधिकार


    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि केवल वरिष्ठता किसी अधिकारी को हाईकोर्ट का जज बनने का अधिकार नहीं देती। अदालत ने दोहराया कि जजों के चयन की प्रक्रिया में उम्मीदवार की उपयुक्तता योग्यता और समग्र मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जाती है। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा लिए गए निर्णय न्यायिक समीक्षा और सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर हैं।

    यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। मल्होत्रा ने दावा किया था कि उनकी उम्मीदवारी को उचित तरीके से नहीं देखा गया और उनसे जूनियर अधिकारियों को हाईकोर्ट जज के पद के लिए आगे बढ़ा दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया।

    मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कॉलेजियम के निर्णयों में दखल देना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे पूरी चयन प्रक्रिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा हो सकता है। पीठ ने कहा कि किसी भी उम्मीदवार का चयन व्यापक विचार विमर्श और मूल्यांकन के बाद किया जाता है तथा केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि पहले दिए गए एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने चयन प्रक्रिया को अधिक सामूहिक और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता जताई थी। हालांकि अदालत ने माना कि कॉलेजियम की प्रक्रिया अपने निर्धारित मानकों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर संचालित होती है तथा इसमें उम्मीदवारों की उपयुक्तता का मूल्यांकन सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है।

    पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी जूनियर अधिकारी की सिफारिश की जाती है तो इससे वरिष्ठ अधिकारी को स्वतः कानूनी चुनौती देने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत के अनुसार कॉलेजियम का निर्णय उसकी संतुष्टि और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित होता है और उस संतुष्टि को न्यायिक मंच पर चुनौती नहीं दी जा सकती। यही कारण है कि कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर माना गया है।

    सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश से तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम हाईकोर्ट जज के रूप में मंजूर किए थे। अदालत ने कहा कि इन नामों पर विचार करते समय सभी संबंधित दस्तावेजों सूचनाओं और रिपोर्टों का अध्ययन किया गया था। इसलिए एक बार कॉलेजियम द्वारा निर्णय ले लिए जाने के बाद अदालत उसके सही या गलत होने पर न्यायिक स्तर पर पुनर्विचार नहीं कर सकती।

    पीठ ने अरविंद मल्होत्रा को सलाह देते हुए कहा कि वे अभी अपेक्षाकृत युवा हैं और उन्हें धैर्य रखना चाहिए। साथ ही उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी गई कि यदि उनके खिलाफ कोई लंबित जांच या प्रशासनिक प्रक्रिया है तो उसके शीघ्र निपटारे के लिए वे संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं।

    इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया केवल वरिष्ठता पर आधारित नहीं है बल्कि योग्यता क्षमता निष्पक्षता और समग्र उपयुक्तता जैसे कई महत्वपूर्ण मानकों पर निर्भर करती है। अदालत का यह रुख भविष्य में जज नियुक्ति से जुड़े विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक माना जा रहा है।