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  • ट्रैफिक और पुलिस पर वीडियो बनाना पड़ा महंगा, मोरक्को में विदेशी कंटेंट क्रिएटर को अदालत ने सुनाई एक साल की सजा

    ट्रैफिक और पुलिस पर वीडियो बनाना पड़ा महंगा, मोरक्को में विदेशी कंटेंट क्रिएटर को अदालत ने सुनाई एक साल की सजा

    नई दिल्ली । सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो को लेकर मोरक्को में एक विदेशी कंटेंट क्रिएटर को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। फ्रेंच-अल्जीरियाई इन्फ्लुएंसर यास नौबेले को स्थानीय अदालत ने एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। मामला उस वीडियो से जुड़ा है जिसमें उन्होंने मोरक्को की ट्रैफिक व्यवस्था, स्थानीय नागरिकों की ड्राइविंग शैली और पुलिस व्यवस्था पर सार्वजनिक टिप्पणियां की थीं। अदालत ने इन टिप्पणियों को सरकारी संस्थाओं की कथित मानहानि और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला माना।

    जानकारी के अनुसार, 30 वर्षीय यास नौबेले निजी यात्रा पर मोरक्को के ऐतिहासिक शहर माराकेश पहुंची थीं। इसी दौरान उन्होंने टैक्सी में यात्रा करते हुए एक वीडियो रिकॉर्ड किया और उसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा कर दिया। वीडियो में उन्होंने शहर की ट्रैफिक व्यवस्था, सड़क सुरक्षा, वाहन चालकों के व्यवहार और यातायात नियमों के पालन को लेकर कई आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं, जो बाद में व्यापक चर्चा का विषय बन गईं।

    वीडियो में उन्होंने स्थानीय ट्रैफिक पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि बिना उचित कारण लोगों को रोका जाता है। इसके अलावा उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े आरोप भी लगाए और मोरक्को की व्यवस्थाओं की तुलना दूसरे देशों से करते हुए उन्हें कमजोर बताया। सोशल मीडिया पर वीडियो के तेजी से वायरल होने के बाद मामला प्रशासन के संज्ञान में आया, जिसके बाद संबंधित एजेंसियों ने इसकी जांच शुरू कर दी।

    प्रशासन के अनुसार, जांच में वीडियो की सामग्री का परीक्षण किया गया और इसे सरकारी संस्थाओं की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला माना गया। इसके बाद इन्फ्लुएंसर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। बताया गया कि यात्रा पूरी होने के बाद जब वह फ्रांस लौटने के लिए एयरपोर्ट पहुंचीं, तब सीमा अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने संबंधित वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट से हटा दिया था, लेकिन तब तक जांच प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी थी।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने वीडियो, उपलब्ध साक्ष्यों और अन्य दस्तावेजों की समीक्षा की। न्यायालय ने उन्हें मोरक्को के नागरिकों और पुलिस बल के प्रति कथित अपमानजनक टिप्पणी करने का दोषी मानते हुए एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने इसके साथ आर्थिक दंड भी लगाया। हालांकि फैसले के बाद उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर उच्च अदालत में अपील करने का कानूनी अधिकार भी प्रदान किया गया है।

    यह मामला एक बार फिर इस तथ्य को सामने लाता है कि अलग-अलग देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानहानि और सरकारी संस्थाओं पर सार्वजनिक टिप्पणी से जुड़े कानून अलग-अलग हो सकते हैं। किसी भी विदेशी नागरिक या सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर के लिए यह आवश्यक है कि वह जिस देश की यात्रा कर रहा हो, वहां के स्थानीय कानूनों और कानूनी प्रावधानों की जानकारी रखे तथा उनका पालन करे। इंटरनेट पर साझा की गई सामग्री कई बार सीमाओं से परे भी कानूनी परिणाम उत्पन्न कर सकती है।

    डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बीच यह घटना सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है। अधिक लोकप्रियता या व्यापक पहुंच हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में प्रकाशित सामग्री यदि स्थानीय कानूनों का उल्लंघन करती है या किसी देश की संस्थाओं को लेकर कानूनी विवाद खड़ा करती है, तो उसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। इसलिए ऑनलाइन सामग्री साझा करते समय तथ्यात्मकता, जिम्मेदारी और स्थानीय नियमों का पालन करना पहले से कहीं अधिक आवश्यक माना जा रहा है।

  • ट्रांसजेंडर संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अलग-अलग हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई पर लगाई रोक; सभी मामलों की होगी एकसाथ सुनवाई

    ट्रांसजेंडर संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अलग-अलग हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई पर लगाई रोक; सभी मामलों की होगी एकसाथ सुनवाई

    नई दिल्ली । ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। देश के विभिन्न हाई कोर्ट में इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग-अलग सुनवाई की स्थिति को देखते हुए शीर्ष अदालत ने संबंधित कार्यवाहियों पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले को एकीकृत रूप से सुनने की दिशा में कदम बढ़ाया है। अदालत के इस निर्णय को न्यायिक प्रक्रिया में एकरूपता और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार की उस याचिका पर विचार किया, जिसमें विभिन्न हाई कोर्ट में लंबित मामलों को एक स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए कहा कि एक ही कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े मामलों की अलग-अलग मंचों पर सुनवाई से परस्पर विरोधी आदेश आने की संभावना बनी रहती है। ऐसे में यह उचित होगा कि सभी मामलों पर या तो एक ही हाई कोर्ट विचार करे या फिर शीर्ष अदालत स्वयं इस विषय पर अंतिम निर्णय दे।

    वर्तमान में इस संशोधन कानून को लेकर राजस्थान, कर्नाटक, केरल और दिल्ली सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाएं दायर की गई हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संशोधित कानून ट्रांसजेंडर समुदाय के उन अधिकारों को प्रभावित करता है जिन्हें पहले न्यायपालिका द्वारा मान्यता दी जा चुकी है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि कानून का उद्देश्य अधिकारों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट बनाना है।

    सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से प्रस्तुत पक्ष में यह दलील दी गई कि मामले की संवैधानिक प्रकृति और इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए सभी याचिकाओं को एक साथ सुनना आवश्यक है। यह भी कहा गया कि इस विषय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय पहले ही न्यायपालिका द्वारा दिया जा चुका है, इसलिए आगे की सुनवाई व्यापक कानूनी दृष्टिकोण के साथ होनी चाहिए।

    विवाद के केंद्र में वर्ष 2014 का वह ऐतिहासिक निर्णय है जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार मौलिक अधिकारों के दायरे में माना गया था। संशोधन कानून को चुनौती देने वाले पक्षों का कहना है कि नया प्रावधान उस सिद्धांत को कमजोर कर सकता है जिसे न्यायपालिका ने पहले स्वीकार किया था। इसी आधार पर कई याचिकाओं में कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट संकेत दिया है कि विषय गंभीर संवैधानिक महत्व का है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस मामले पर विचार के लिए बड़ी पीठ गठित करने की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि सभी कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की व्यापक समीक्षा की जा सके।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न न्यायालयों में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाने से मामले में एकरूपता आएगी और सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का समान अवसर मिलेगा। साथ ही इससे देशभर में लागू होने वाले किसी भी अंतिम निर्णय को लेकर भ्रम की स्थिति भी कम होगी।

    अब सभी पक्षों की प्रतिक्रियाएं प्राप्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि लंबित याचिकाओं को सीधे अपने पास सुनवाई के लिए रखा जाए या किसी एक उच्च न्यायालय को संयुक्त रूप से इन मामलों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी जाए। आने वाले समय में इस मामले का फैसला ट्रांसजेंडर अधिकारों, संवैधानिक व्याख्या और सामाजिक न्याय से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को प्रभावित कर सकता है।

  • महिला वकीलों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा रोडमैप, CJI सूर्यकांत ने 50% प्रतिनिधित्व की वकालत कर दिया स्पष्ट संदेश

    महिला वकीलों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा रोडमैप, CJI सूर्यकांत ने 50% प्रतिनिधित्व की वकालत कर दिया स्पष्ट संदेश

    नई दिल्ली । भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि इस दिशा में एक मजबूत और दीर्घकालिक संस्थागत व्यवस्था तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रवेश स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि महिलाएं अपने पूरे पेशेवर जीवन में आगे बढ़ सकें और नेतृत्वकारी भूमिकाओं तक पहुंच सकें।

    लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी पेशे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि न्यायिक और कानूनी संस्थाओं में संतुलित भागीदारी समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर कई पहलें शुरू की गई हैं और भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे।

    कार्यक्रम के दौरान उनसे यह सवाल पूछा गया कि बड़ी संख्या में छात्राएं कानून की पढ़ाई तो करती हैं, लेकिन करियर के मध्य चरण तक पहुंचते-पहुंचते अनेक महिलाएं इस पेशे से बाहर हो जाती हैं। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक वास्तविक समस्या है और इसे केवल नीतिगत घोषणाओं से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत समर्थन, समान अवसर और पेशेवर विकास के अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है।

    उन्होंने बताया कि पहले भी उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकारी पैनलों में लॉ ऑफिसर के पदों पर महिलाओं की नियुक्तियों का अनुपात 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की पर्याप्त मौजूदगी न केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी भी बनाती है।

    मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बार काउंसिल, जिला बार एसोसिएशन और अन्य बार संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। उनका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें महिला वकीलों को नेतृत्व के अवसर भी मिल सकें। उन्होंने संकेत दिया कि संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को स्थायी रूप से मजबूत करने की योजना पर कार्य जारी है।

    महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे के अलावा मुख्य न्यायाधीश ने भारत की न्यायिक व्यवस्था के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक वास्तविकताओं, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप एक स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित करना चाहिए। उनके अनुसार, भारतीय अदालतों को ऐसे कानूनी सिद्धांतों और व्याख्याओं को बढ़ावा देना चाहिए जो देश की विशिष्ट आवश्यकताओं और सामाजिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करें।

    उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी बदलावों के दौर में न्यायपालिका को आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तंत्र विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उनका मानना है कि भविष्य की न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी, इसलिए भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्वतंत्र और विश्वसनीय डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश के इन विचारों को न्यायपालिका में लैंगिक समानता, संस्थागत सुधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। उनका संदेश स्पष्ट था कि न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सुधारों की आवश्यकता है, जिन पर लगातार कार्य किया जा रहा है।

  • कॉकरोच जनता पार्टी विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, CJI की टिप्पणी ने खींचा सबका ध्यान

    कॉकरोच जनता पार्टी विवाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, CJI की टिप्पणी ने खींचा सबका ध्यान

    नई दिल्ली ।देश में तेजी से चर्चा का विषय बने कॉकरोच जनता पार्टी विवाद ने अब न्यायिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है। इस मुद्दे को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आईं। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार तो किया, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि भावनात्मक दृष्टिकोण से अधिक कानूनी तथ्यों और प्रक्रियाओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता को शांत रहने की सलाह देते हुए कहा कि मामलों को अत्यधिक भावनात्मक तरीके से देखने के बजाय तथ्यों के आधार पर समझने की आवश्यकता है। अदालत की यह टिप्पणी सुनवाई के दौरान सबसे अधिक चर्चा का विषय बन गई।

    दरअसल, याचिका में आरोप लगाया गया था कि एक विशेष डिजिटल अभियान और उससे जुड़े कथित नैरेटिव के जरिए न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। याचिकाकर्ता का दावा था कि विवादित टिप्पणियों को वास्तविक संदर्भ से हटाकर अलग तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

    हालांकि अदालत ने मामले को तत्काल सुनवाई योग्य नहीं माना और कहा कि फिलहाल ऐसी कोई असाधारण परिस्थिति दिखाई नहीं देती, जिसके आधार पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने संकेत दिए कि आने वाले समय में सभी पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की जाएगी और उसके बाद उचित निर्णय लिया जाएगा।

    याचिकाओं में कई गंभीर मांगें भी रखी गई हैं। इनमें न्यायालय में होने वाली बहसों के कथित दुरुपयोग पर रोक लगाने, फर्जी कानूनी दस्तावेजों और प्रमाणपत्रों से जुड़े मामलों की जांच तथा विवादित डिजिटल गतिविधियों की निष्पक्ष जांच की मांग शामिल बताई जा रही है।

    इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत एक विवादित टिप्पणी से जुड़ी चर्चा के बाद हुई थी, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। बाद में स्पष्ट किया गया कि टिप्पणी का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि उन लोगों पर चिंता जताना था जो गलत तरीकों से पेशे में प्रवेश कर व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं।

    इसी बीच सोशल मीडिया पर शुरू हुआ व्यंग्यात्मक अभियान धीरे-धीरे एक बड़े डिजिटल विमर्श में बदलता दिखाई दिया। समय के साथ यह केवल मजाक या ऑनलाइन ट्रेंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों को उठाने का माध्यम बन गया। इसने शिक्षा, रोजगार और परीक्षा प्रणाली से जुड़े सवालों को लेकर व्यापक चर्चा भी पैदा की।

    फिलहाल यह मामला केवल एक ऑनलाइन बहस नहीं रह गया है बल्कि न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका जैसे बड़े विषयों को भी केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में इस मामले पर होने वाली सुनवाई पर कई लोगों की नजर बनी रह सकती है।

  • लखनऊ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की अनुमति बिना “अग्रिम जांच” वैध नहीं

    लखनऊ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: कोर्ट की अनुमति बिना “अग्रिम जांच” वैध नहीं


    नई दिल्ली। लखनऊ उच्च न्यायालय पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी भी आपराधिक मामले में आगे की जांच (Further Investigation) शुरू करने से पहले अदालत की अनुमति लेना जरूरी है। बिना कोर्ट की मंजूरी की गई अग्रिम विवेचना को वैध नहीं माना जा सकता।यह फैसला जस्टिस Shree Prakash Singh की एकल पीठ ने सैयद मोहम्मद हमजा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

     कोर्ट ने क्या कहा?
    हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

    एक ही केस में दोबारा संज्ञान (Second Cognizance) लेना कानूनन स्वीकार्य नहीं है

    यदि ट्रायल पहले से चल रहा है, तो पुलिस को आगे की जांच से पहले अदालत की अनुमति लेनी होगी

    बिना अनुमति दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट कानूनी सवालों के घेरे में आएगी

     पूरा मामला क्या था?
    वर्ष 2021 में अंबेडकरनगर में मामला दर्ज हुआ था

    शुरुआती चार्जशीट में हत्या की धारा नहीं लगाई गई थी

    बाद में पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर धारा 302 और 201 IPC जोड़ते हुए सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी गई

    याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि:

    आगे की विवेचना से पहले ट्रायल कोर्ट से अनुमति नहीं ली गई

    यह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के खिलाफ है
     सरकार ने क्या माना?
    सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह स्वीकार किया गया कि:

    एसपी के निर्देश पर आगे की जांच हुई

    लेकिन ट्रायल कोर्ट से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी

    इसके बाद हाई कोर्ट ने:

    29 अप्रैल 2023 की सप्लीमेंट्री चार्जशीट

    3 फरवरी 2026 का सेकेंड कॉग्निजेंस ऑर्डर

    13 फरवरी 2026 का डिस्चार्ज ऑर्डर

     तीनों को निरस्त कर दिया।

    फैसले का महत्व
    यह निर्णय इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे:

    पुलिस जांच प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी मजबूत होगी

    एक ही केस में बार-बार कार्रवाई पर रोक लगेगी

    आरोपी के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी

    हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसियां कानून के मुताबिक दोबारा उचित प्रक्रिया अपनाकर कार्रवाई कर सकती हैं।

  • पाकिस्तान में न्यायपालिका पर सवाल: फर्जी डिग्री के आधार पर फैसले सुनाते रहे जज, पद से हटाए गए

    पाकिस्तान में न्यायपालिका पर सवाल: फर्जी डिग्री के आधार पर फैसले सुनाते रहे जज, पद से हटाए गए

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने नियुक्तियों की पारदर्शिता और डिग्री सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तारिक महमूद जहांगीरी नामक जज को कथित तौर पर फर्जी कानून की डिग्री के आधार पर वर्षों तक पद पर बने रहने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया है।

    यह कार्रवाई इस्लामाबाद हाई कोर्ट के 116 पन्नों के विस्तृत फैसले के बाद की गई, जिसमें अदालत ने मामले को “गंभीर संस्थागत धोखाधड़ी” बताया।

    डिग्री शुरू से ही अवैध पाई गई

    अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि जहांगीरी की लॉ डिग्री वैध नहीं थी, इसलिए उनकी न्यायिक नियुक्ति भी कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं मानी जा सकती। कोर्ट के अनुसार, किसी भी न्यायिक पद के लिए शैक्षणिक योग्यता की प्रामाणिकता अनिवार्य है, और इस मामले में वही मूल आधार ही संदिग्ध पाया गया।

    विश्वविद्यालय रिकॉर्ड से हुआ खुलासा

    मीडिया रिपोर्ट, विशेषकर डॉन में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, अदालत को कराची विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से आधिकारिक रिकॉर्ड प्राप्त हुए। इन दस्तावेजों ने प्रस्तुत किए गए प्रमाणपत्रों को पूरी तरह फर्जी साबित कर दिया।

    जांच में यह भी सामने आया कि:

    • 1988 में जहांगीरी ने कथित तौर पर फर्जी नामांकन संख्या के साथ परीक्षा दी।

    • परीक्षा के दौरान नकल करते पकड़े गए और उन पर तीन वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया।

    • बाद में उन्होंने दंड स्वीकार नहीं किया और किसी अन्य छात्र के एनरोलमेंट नंबर का इस्तेमाल कर दोबारा परीक्षा देने का प्रयास किया।

    कॉलेज में प्रवेश का कोई रिकॉर्ड नहीं

    सुनवाई के दौरान संबंधित लॉ कॉलेज प्रशासन ने अदालत को बताया कि जहांगीरी ने संस्थान में कभी औपचारिक प्रवेश ही नहीं लिया था। अदालत ने उन्हें मूल दस्तावेज पेश करने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया, लेकिन वे ऐसा करने में असफल रहे।

    सुनवाई टालने की कोशिशें भी खारिज

    जहांगीरी ने फुल बेंच से सुनवाई की मांग, चीफ जस्टिस को मामले से अलग करने की अपील और कार्यवाही स्थगित कराने जैसे कई प्रयास किए। अदालत ने इन कदमों को “मामले को लंबा खींचने की रणनीति” बताते हुए खारिज कर दिया।

    अदालत की सख्त टिप्पणी

    कोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर चुका था, तब संबंधित जज की जिम्मेदारी थी कि वह अपनी डिग्री की वैधता सिद्ध करें। ऐसा न कर पाने पर उन्हें पद से हटाना आवश्यक हो गया।

    पाकिस्तान में छिड़ी नई बहस

    यह मामला अब पाकिस्तान में न्यायिक नियुक्तियों की पारदर्शिता, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन और संस्थागत जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस का कारण बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के बाद नियुक्ति प्रक्रिया की जांच और कड़े सत्यापन तंत्र की मांग तेज हो सकती है।

  • NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम

    NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम


    नई दिल्ली । दिल्ली में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की 8वीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में पहली बार ज्यूडिशियरी करप्शन नामक चैप्टर शामिल किया गया है। इस चैप्टर में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार लंबित मुकदमों की बड़ी संख्या और जजों की पर्याप्त कमी जैसे मुद्दों को समझाया गया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत ने इस कदम पर कड़ा विरोध जताया और इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री देश में वकीलों और जजों के बीच चिंता का कारण बन रही है और वे न्यायपालिका की गरिमा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होने देंगे।

    CJI सूर्यकांत ने यह प्रतिक्रिया बुधवार 25 फरवरी 2026 को तब दी जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले को उनके समक्ष उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका की छवि को बदनाम करने की किसी भी कोशिश को मंजूरी नहीं दी जाएगी। न्यायपालिका में पारदर्शिता बनाए रखने और भ्रष्टाचार के मामलों को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही ठोस तंत्र मौजूद हैं और इनकी जानकारी बच्चों तक पहुंचाना इस तरह के ढंग में सही नहीं है।

    NCERT की नई किताब में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका शीर्षक वाले चैप्टर में अदालतों के पदानुक्रम न्याय तक पहुंच और न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों के समाधान का उल्लेख किया गया है। इस चैप्टर में यह भी बताया गया है कि जज एक आचार संहिता Code of Conduct के तहत बंधे होते हैं जो न केवल अदालत के भीतर बल्कि बाहर भी उनके आचरण को नियंत्रित करती है। गंभीर मामलों में जज को हटाने के संवैधानिक नियम पार्लियामेंट के इंपीचमेंट मोशन और केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने के उपायों का भी जिक्र है।

    किताब में CPGRAMS सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए 2017 से 2021 के बीच लगभग 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त होने का आंकड़ा भी साझा किया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में 81,000 हाईकोर्ट्स में 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ लंबित मामले होने का विवरण भी दिया गया है।

    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करने वाले मामले सही रूप में और संतुलित तरीके से प्रस्तुत किए जाने चाहिए। गरीब और वंचित वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच का मुद्दा गंभीर है लेकिन इसे पाठ्यपुस्तक में इस तरह से दर्शाना न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और वे किसी भी कदम को रोकने या संशोधित करने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

    इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चों को शिक्षा में वास्तविकता और संवेदनशील विषयों को कैसे प्रस्तुत किया जाए ताकि उन्हें जानकारी मिल सके लेकिन संस्थाओं की छवि को बदनाम किए बिना। NCERT ने इस एडिशन में मुख्य रूप से सिस्टम की कमजोरियों और सुधार प्रयासों को उजागर किया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवेदनशील मानते हुए आगे कार्रवाई की संभावना जताई है।

  • सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल धोखाधड़ी पर जताई चिंता, 54 हजार करोड़ के गबन मामले को लेकर CJI हैरान

    सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल धोखाधड़ी पर जताई चिंता, 54 हजार करोड़ के गबन मामले को लेकर CJI हैरान


    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल धोखाधड़ी के जरिए 54,000 करोड़ रुपये के गबन को गंभीर अपराध करार दिया और कहा कि इस तरह की घटनाओं को रोकने में बैंकों की सक्रिय भूमिका जरूरी है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि आरबीआई, बैंक और दूरसंचार विभाग जैसे सभी संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर मानक संचालन प्रक्रिया  तैयार की जाए।

    सुप्रीम कोर्ट की चिंता

    प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे असामान्य और बड़े पैमाने के लेनदेन पर ग्राहकों को तुरंत सतर्क करें। उदाहरण के लिए, यदि कोई आमतौर पर 10-20 हजार रुपये निकालने वाला पेंशनभोगी अचानक लाखों रुपये निकालता है, तो बैंक को तत्काल अलर्ट जारी करना चाहिए। पीठ ने जोर देकर कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी से गबन की गई राशि कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। यह बैंक अधिकारियों की लापरवाही या मिलीभगत के कारण हो सकता है।

    CBI को जांच में शामिल किया गया

    सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट मामलों की पहचान और जांच का निर्देश दिया। गुजरात और दिल्ली की सरकारों को कहा गया कि वे इस जांच के लिए आवश्यक स्वीकृति दें। अदालत ने डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों को मुआवजा देने में उदार दृष्टिकोण अपनाने की भी सिफारिश की।

    SOP और AI का इस्तेमाल

    अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने बताया कि आरबीआई ने बैंकों के लिए SOP का मसौदा तैयार किया है, जिसमें साइबर धोखाधड़ी रोकने के उपाय जैसे अस्थायी डेबिट होल्ड शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के लिए AI टूल्स के उपयोग की सिफारिश भी की ताकि संदिग्ध लेनदेन पर तत्काल अलर्ट जारी किया जा सके।

    बैंकों पर कड़ी टिप्पणी
    पीठ ने कहा कि बैंकों का ध्यान ज्यादातर व्यवसायिक मोड पर है, जिससे वे अपराधियों के लिए मंच बन सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने बताया कि अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर धोखाधड़ी के जरिए 52,000 करोड़ रुपये से अधिक का गबन हुआ। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “ये बैंक अब एक बोझ बनते जा रहे हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि वे धन के रखवाले हैं और भरोसे को नहीं तोड़ना चाहिए। कई बार बैंक धोखेबाजों को ऋण देते हैं और फिर एनसीएलटी/एनसीएलएटी जैसी संस्थाएं सामने आती हैं।”

    डिजिटल अरेस्ट क्या है
    ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक साइबर अपराध का बढ़ता स्वरूप है, जिसमें ठग पीड़ित को सरकारी अधिकारी या अदालत के रूप में पेश कर ऑडियो/वीडियो कॉल के माध्यम से डराते-धमकाते हैं। इसका उद्देश्य पीड़ितों को पैसे देने के लिए मजबूर करना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सीबीआई को देशव्यापी जांच करने और आरबीआई से साइबर अपराधियों के खातों को फ्रीज़ करने में AI का उपयोग करने का निर्देश दे रखा है।

  • सुप्रीम कोर्ट के जज का चेतावनी भरा संदेश, कॉलेजियम प्रणाली पर उठाए सवाल

    सुप्रीम कोर्ट के जज का चेतावनी भरा संदेश, कॉलेजियम प्रणाली पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कॉलेजियम सिस्टम में सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता जताई है। शनिवार को पुणे के ILS लॉ कॉलेज में दिए व्याख्यान में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहरी ताकतों से नहीं, बल्कि भीतर से है।

    जस्टिस भुइयां ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले का उदाहरण देते हुए कॉलेजियम के फैसले पर सवाल उठाया। अगस्त में कॉलेजियम ने उन्हें छत्तीसगढ़ HC भेजने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र सरकार के अनुरोध पर अक्टूबर में उनका तबादला इलाहाबाद HC कर दिया गया।यह तबादला उस समय हुआ जब जस्टिस श्रीधरन ने मई में एक भाजपा मंत्री द्वारा सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर स्वतः संज्ञान लिया था। कानून विशेषज्ञ इसे सरकार के खिलाफ असुविधाजनक निर्णय की “सजा” मानते हैं।

    अधिकार और संवैधानिक नैतिकता:
    जस्टिस भुइयां ने कहा, “जजों के तबादले में सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। यह न्यायपालिका का अनन्य क्षेत्र है।” उन्होंने कॉलेजियम के सदस्यों से आग्रह किया कि वे बिना किसी डर या पक्षपात के अपनी शपथ का पालन करें और सिस्टम की अखंडता बनाए रखें। वेने कहा, “यदि न्यायपालिका अपनी साख खो देगी, तो जज और अदालतें रह जाएंगी, लेकिन न्यायपालिका की आत्मा गायब हो जाएगी।”

    कॉलेजियम प्रणाली में सुधार:

    जस्टिस भुइयां ने स्वीकार किया कि वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली जजों की नियुक्ति के लिए आदर्श नहीं है और इसमें सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश की व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा हो सकती है, लेकिन फैसले हमेशा संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।

  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने शुक्रवार को एक अर्जी पर नाराजगी जताते हुए याचिकाकर्ता (Petitioner)को फटकार लगाई और एक लाख रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया। यह याचिका अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों (Provisions)के तहत छूट देने के सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर करके न्यायपालिका को बदनाम न करें।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की पीठ यूनाइटेड वॉयस फॉर एजुकेशन फोरम एनजीओ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है, क्योंकि यह उन्हें आरटीई दायित्वों से पूरी तरह से छूट देती है। पीठ ने कहा कि अगर वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं तो उन्हें भी दंडित करना होगा। कोर्ट ने जुर्माना लगाते हुए कहा कि सख्त संदेश देना जरूरी है। आप कानून के जानकार और पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? आप कोर्ट के महत्व को समझते नहीं हैं। 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आरटीई एक्ट को आर्टिकल 30(1) के तहत अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं माना था।

    इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि ‘म्यूचुअल फंड सही है’ जैसे लोकप्रिय विज्ञापन अभियान निवेशकों को गुमराह करते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ इस साल सितंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया को निवेशक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए दी गई छूट को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

    साथ ही, देश में सभी इमारतों को भूकंप रोधी बनाने और भूकंप की स्थिति से निपटने के लिए समाधान की मांग करने वाली याचिका शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया कि पहले यह माना जाता था कि दिल्ली सबसे ज्यादा भूकंप संभावित क्षेत्र है, लेकिन नई रिपोर्ट में पता चला है कि देश का 75 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप संभावित है। इस पर जज ने कहा तो क्या सभी लोगों को चांद पर रहने भेज दिया जाए? इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि वह भूकंप से कम नुकसान के उपाय अपनाने की बात लेकर कोर्ट पहुंचे हैं। देश में भूकंप के खतरे को ध्यान में रखते हुए भवन और दूसरे निर्माण होने चाहिए।

    याचिकाकर्ता ने जापान में हाल ही में आए भूकंप का जिक्र किया। उन्होंने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए वहां पर होने वाले विशेष किस्म के भवन निर्माण पर चर्चा करनी चाही, लेकिन पीठ ने उन्हें रोका। कोर्ट ने कहा कि मीडिया में कौन सी रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है, उसके आधार पर कोर्ट में सुनवाई नहीं होती। यह विषय नीतिगत है।