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  • मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जमानत अर्जियों के लिए गठित कीं सात विशेष पीठें, 6 नवंबर तक चलेगी सुनवाई

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जमानत अर्जियों के लिए गठित कीं सात विशेष पीठें, 6 नवंबर तक चलेगी सुनवाई


    मध्य प्रदेश:
    हाईकोर्ट की जबलपुर स्थित मुख्य पीठ ने जमानत अर्जियों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए सात विशेष पीठों का गठन किया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य लंबित जमानत मामलों पर सुनवाई करना और उनके जल्द निराकरण की प्रक्रिया को गति देना है। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार, ये विशेष पीठें 29 अक्टूबर से 6 नवंबर 2026 तक नियमित न्यायिक कार्यवाही पूरी होने के बाद दोपहर 2:30 बजे से सुनवाई करेंगी।

    नई व्यवस्था उन वकीलों और पक्षकारों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनकी जमानत अर्जियां निर्धारित अवधि के दौरान सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं। संबंधित मामलों में अब विशेष पीठों के तय कार्यक्रम के अनुसार कार्यवाही होगी। इस पहल से लंबित अर्जियों को सुनवाई के लिए अतिरिक्त अवसर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, किसी मामले में जमानत मिलने या उसके अंतिम निराकरण का निर्णय संबंधित पीठ सुनवाई के दौरान उपलब्ध तथ्यों, दलीलों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर करेगी।

    जमानत अर्जियों की सुनवाई के लिए गठित सात एकल पीठों में न्यायमूर्ति विवेक रूसिया, न्यायमूर्ति आनंद पाठक, न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा, न्यायमूर्ति दीपक खोट, न्यायमूर्ति रामकुमार चौबे और न्यायमूर्ति बीपी शर्मा के नाम शामिल हैं। जारी जानकारी में इन विशेष सुनवाई सत्रों के लिए न्यायाधीशों को जिम्मेदारी सौंपे जाने का उल्लेख है। हालांकि, उपलब्ध विवरण में सातों पीठों के गठन के बावजूद छह न्यायाधीशों के नाम ही स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।

    विशेष पीठों के गठन के पीछे लंबित जमानत अर्जियों पर समयबद्ध सुनवाई की आवश्यकता प्रमुख मानी जा रही है। अदालतों में विभिन्न प्रकार के मामलों के बीच जमानत अर्जियों के लिए अलग समय निर्धारित होने से संबंधित प्रकरणों को सुनने की प्रक्रिया व्यवस्थित हो सकती है। इस व्यवस्था के तहत निर्धारित अवधि में सूचीबद्ध अर्जियों पर सुनवाई की जाएगी। पक्षकारों और उनके अधिवक्ताओं को अपने मामले की सूची और निर्धारित समय के संबंध में हाईकोर्ट की आधिकारिक सूचना पर ध्यान देना होगा।

    जमानत अर्जियों के अलावा विविध अपीलों की सुनवाई के लिए भी अलग व्यवस्था की गई है। इसके तहत न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की एकल पीठ गठित की गई है, जो निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार विविध अपीलों से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगी। इस तरह हाईकोर्ट प्रशासन ने जमानत मामलों के साथ विविध अपीलों की सुनवाई के लिए भी न्यायिक कार्यवाही को व्यवस्थित करने का कदम उठाया है।

    विशेष पीठों की यह व्यवस्था 6 नवंबर तक निर्धारित है। इस दौरान नियमित न्यायिक कार्यवाही समाप्त होने के बाद दोपहर 2:30 बजे से संबंधित मामलों की सुनवाई की जाएगी। जिन पक्षकारों की अर्जियां इस अवधि में सूचीबद्ध हैं, उनके लिए सुनवाई की तारीख और पीठ की जानकारी महत्वपूर्ण होगी। वकीलों को भी निर्धारित सूची के अनुसार तैयारी करनी होगी, ताकि अदालत के सामने आवश्यक दस्तावेज और दलीलें प्रस्तुत की जा सकें।

    हाईकोर्ट प्रशासन की इस पहल से लंबित जमानत अर्जियों के निपटारे की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्धारित अवधि में कितने मामलों की सुनवाई पूरी होती है और उनमें क्या आदेश पारित किए जाते हैं। फिलहाल, जबलपुर मुख्य पीठ में 29 अक्टूबर से 6 नवंबर तक चलने वाले विशेष सुनवाई कार्यक्रम पर संबंधित पक्षकारों और अधिवक्ताओं की नजर रहेगी।

  • पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों के परिवारों से मिले अमित शाह, न्याय का भरोसा और 2029 तक नशा खत्म करने का लक्ष्य

    पंजाब में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों के परिवारों से मिले अमित शाह, न्याय का भरोसा और 2029 तक नशा खत्म करने का लक्ष्य

    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को पंजाब के एक दिवसीय दौरे के दौरान नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने गुरदासपुर, संगरूर और मानसा में मृतकों के परिवारों की बातें सुनीं और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया। इस दौरान नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावित परिवारों की मांगें प्रमुख मुद्दे रहे। शाह ने दिसंबर 2029 तक नशे के कारोबार को खत्म करने का लक्ष्य भी दोहराया।

    दशहरे के अवसर पर शाह सबसे पहले बटाला पहुंचे और वहां से गुरदासपुर जिले के मारी पनवां गांव गए। यहां उन्होंने 15 अक्टूबर को मारे गए बिक्रमजीत सिंह के परिवार से मुलाकात की। ग्रामीणों का आरोप है कि बिक्रमजीत ने अपने क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी का विरोध किया था, जिसके कारण उन्हें निशाना बनाया गया। हालांकि, पुलिस के अनुसार, उनकी हत्या मोबाइल फोन को लेकर दो गुटों के बीच हुए विवाद का परिणाम थी। दोनों पक्षों के बीच बताए गए घटनाक्रम को लेकर जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

    बिक्रमजीत के परिजनों ने गृह मंत्री के सामने मामले में न्याय की मांग रखी। परिवार के एक सदस्य के मुताबिक, शाह ने उनका ज्ञापन पढ़ा और उनकी बातें ध्यानपूर्वक सुनीं। बिक्रमजीत के चाचा गुरनाम सिंह ने भी कहा कि गृह मंत्री ने परिवार को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया है। इस मुलाकात के दौरान पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों भी मौजूद रहे। शाह के दौरे को देखते हुए गुरदासपुर, संगरूर और मानसा में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।

    इसके बाद गृह मंत्री संगरूर पहुंचे, जहां उन्होंने तुरबंजारा गांव के गुलजार सिंह के परिवार से मुलाकात की। दलित समुदाय से संबंध रखने वाले गुलजार की सात सितंबर को मृत्यु हो गई थी। परिवार का आरोप है कि उन्होंने अपने क्षेत्र में नशीले पदार्थों की आपूर्ति को लेकर पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा से सवाल किया था। इसके बाद उन्हें कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया और जातिसूचक टिप्पणियां की गईं। परिजनों के अनुसार, इन परिस्थितियों से परेशान होकर गुलजार ने जहरीला पदार्थ खा लिया था। परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच और तथ्यों की पुष्टि इस मामले में महत्वपूर्ण है।

    संगरूर के बाद शाह मानसा पहुंचे, जहां उन्होंने नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता परविंदर सिंह झोटा के परिजनों से मुलाकात की। झोटा की 13 अक्टूबर को मानसा के एक व्यस्त बाजार में स्थित मेडिकल स्टोर के भीतर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के समय वह फेसबुक लाइव कर रहे थे। आरोप है कि मेडिकल स्टोर संचालक अश्वनी कुमार ने एक बुजुर्ग को नशीली दवाएं बेचने पर सवाल उठाए जाने के बाद झोटा को गोली मारी। पुलिस ने आरोपी को राजस्थान के सालासर से हिरासत में लिया था।

    झोटा के पिता भीम सिंह ने पहले ही बेटे की हत्या की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग उठाने की बात कही थी। शाह के पंजाब पहुंचने से कुछ घंटे पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान ने घोषणा की कि राज्य सरकार ने इस हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया है। इससे मामले की जांच को लेकर नया घटनाक्रम सामने आया है।

    पंजाब में नशे की समस्या और उससे जुड़े मामलों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हैं। राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। अमित शाह का यह 20 दिनों के भीतर दूसरा पंजाब दौरा है। इससे पहले 30 सितंबर को उन्होंने जालंधर में भाजपा की ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ के समापन पर रैली को संबोधित किया था। अब मृतकों के परिवारों से मुलाकात और नशे के कारोबार को खत्म करने के लक्ष्य ने इस मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • भोपाल में 12 साल की बच्ची की हत्या के बाद हंगामा, आरोपी को सौंपने की मांग पर तीन घंटे प्रदर्शन

    भोपाल में 12 साल की बच्ची की हत्या के बाद हंगामा, आरोपी को सौंपने की मांग पर तीन घंटे प्रदर्शन

    मध्य प्रदेश । की राजधानी भोपाल के बैरागढ़ इलाके में 12 वर्षीय बच्ची की हत्या के मामले में शनिवार, 17 अक्टूबर को लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। घटना से नाराज लोगों ने बैरागढ़ थाने के बाहर करीब तीन घंटे तक प्रदर्शन किया और आरोपी को कड़ी सजा देने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने थाने के गेट पर धक्का देकर अंदर घुसने की कोशिश भी की, लेकिन पुलिस बल ने उन्हें रोक दिया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया।

    मामले में 23 वर्षीय आरोपी मोबिन को पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और परिजनों से मिली जानकारी के आधार पर हिरासत में लिया। पुलिस के अनुसार, शुरुआती पूछताछ में उसके अपराध स्वीकार करने की बात सामने आई है। हालांकि, मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जांच और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर की जा रही है।

    घटना 15 अक्टूबर की रात की है, जब बैरागढ़ इलाके में रहने वाली 12 वर्षीय बच्ची घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। परिजनों ने उसकी तलाश की। अगले दिन, 16 अक्टूबर को बच्ची का शव कृष्णा कॉम्प्लेक्स के पीछे स्थित एक खंडहर में मिला। शव मिलने के बाद इलाके में आक्रोश फैल गया और लोगों ने आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग शुरू कर दी।

    प्रारंभिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बच्ची के साथ यौन हिंसा और गला घोंटकर हत्या किए जाने की पुष्टि होने की बात सामने आई है। घटनास्थल से जुड़े विवरण के अनुसार, बच्ची के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था और उसके शरीर के निचले हिस्से पर कपड़े नहीं थे। उसके सामने के दो दांत भी टूटे हुए बताए गए हैं। पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।

    शनिवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोपी को फांसी देने, उसके मकान पर बुलडोजर चलाने और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालत में कराने की मांग की। कुछ लोगों ने आरोपी को पुलिस के हवाले करने के बजाय उन्हें सौंपने की मांग भी की। पुलिस ने भीड़ को थाने में प्रवेश करने से रोकने के लिए मुख्य गेट बंद कर दिए।

    प्रदर्शन का असर भोपाल-सीहोर रोड पर भी पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर जाम लगा दिया, जिससे लगभग दो किलोमीटर तक वाहनों की कतार लग गई। इस दौरान यात्रियों और वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ा। थाने के सामने महिलाएं भी धरने पर बैठीं। पुलिस अधिकारियों ने लगातार लोगों को समझाने की कोशिश की और अतिरिक्त बल की मदद से स्थिति संभालने का प्रयास किया।

    मामले में सहायक पुलिस आयुक्त रत्नेश तोमर ने बताया कि पुलिस ने हत्या और बहला-फुसलाकर ले जाने सहित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया है। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है। विस्तृत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिलने के बाद मामले में जरूरत के अनुसार अतिरिक्त कानूनी धाराएं जोड़ी जाएंगी।

    पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से अधिकारी पीड़ित परिवार के संपर्क में हैं। प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया गया कि मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी और आरोपी के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

    करीब तीन घंटे तक चले विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम के बाद प्रदर्शनकारी शांत हुए। इसके बाद परिजन बच्ची का शव अंतिम संस्कार के लिए घर ले गए। एहतियात के तौर पर इलाके में पुलिस बल तैनात रखा गया। घटना की जांच जारी है और विस्तृत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई स्पष्ट होगी।

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    नई दिल्ली । मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में 23 सितंबर को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। 2023 में बनाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही दो सदस्यीय पीठ के दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही। इसके बाद मामले को बड़ी पीठ के सामने भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग की गई है। याचिकाओं में 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नई चयन व्यवस्था निर्धारित की गई है।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की राय में अंतर सामने आया। दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण यह तय किया गया कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बड़ी पीठ विचार करेगी।

    कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक दलील दी गई, जिसमें इस व्यवस्था की तुलना जजों द्वारा जजों की नियुक्ति से की गई। इस तर्क पर न्यायमूर्ति दत्ता ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह की दलील को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना जरूरी है।

    न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि याचिकाओं पर पांच दिनों से अधिक समय तक सुनवाई हुई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों न्यायाधीश एकमत होकर फैसला देते तो संस्थागत एकता को मजबूती मिलती, लेकिन इस मामले में दोनों की राय अलग रही। उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार शासन कानून के अधीन होता है और कानून से ऊपर नहीं।

    वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की बातों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद है और इसका निर्णय बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए। दोनों न्यायाधीशों की अलग राय सामने आने के बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि 2023 में बनाए गए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून से जुड़ी है। इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सिफारिश पर की जाती थी। अगस्त 2023 में नई व्यवस्था से संबंधित विधेयक पेश किया गया। इसमें नियुक्ति से जुड़ी समिति की संरचना में बदलाव किया गया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया।

    दिसंबर 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और उसी महीने इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद जनवरी 2024 में जया ठाकुर ने नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस समय अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

    मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों की नई नियुक्तियों को रोकने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई थी, लेकिन उस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नए चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।

    अब दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद इस मामले का अगला चरण बड़ी पीठ के सामने होगा। बड़ी पीठ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून और उसके संवैधानिक पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

  • हिंदी दिवस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल, अब अहम फैसलों का आसान हिंदी सार ऑडियो-वीडियो बुलेटिन में मिलेगा

    हिंदी दिवस पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पहल, अब अहम फैसलों का आसान हिंदी सार ऑडियो-वीडियो बुलेटिन में मिलेगा

    नई दिल्ली ।हिंदी दिवस के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट ने लोगों तक न्यायिक फैसलों की जानकारी आसान भाषा में पहुंचाने की दिशा में एक नई पहल की घोषणा की है। कोर्ट जल्द ‘हिंदी जन सूचना सेवा’ शुरू करेगा। इस सेवा के तहत सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों और आदेशों का सरल हिंदी में सार उपलब्ध कराया जाएगा। इसके साथ ही रोजाना हिंदी में ऑडियो और वीडियो बुलेटिन भी जारी किए जाएंगे।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रोजाना 15 से 30 मिनट का हिंदी ऑडियो और वीडियो बुलेटिन जारी किया जाएगा। इसमें महत्वपूर्ण फैसलों और आदेशों की जानकारी आसान भाषा में दी जाएगी। संबंधित फैसले का आधिकारिक लिंक भी उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि लोग जरूरत पड़ने पर मूल आदेश या फैसले तक पहुंच सकें।

    सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य कानूनी और न्यायिक जानकारी को आम लोगों के लिए अधिक सहज बनाना है। अदालतों के फैसले अक्सर लंबे और कानूनी शब्दावली से भरे होते हैं, जिसके कारण उन्हें हर व्यक्ति के लिए समझना आसान नहीं होता। ऐसे में सरल हिंदी में फैसलों का सार लोगों को महत्वपूर्ण न्यायिक जानकारी समझने में मदद करेगा।

    इस सेवा में ऑडियो और वीडियो माध्यम को भी शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य उन लोगों के लिए सुविधा बढ़ाना है, जिन्हें लंबे कानूनी दस्तावेज पढ़ने या उनकी जटिल भाषा समझने में परेशानी होती है। यह पहल विशेष रूप से आम लोगों, वादकारियों और दिव्यांगजनों की सुविधा को ध्यान में रखकर शुरू की जा रही है।

    नई हिंदी जन सूचना सेवा की शुरुआत चीफ जस्टिस सूर्य कांत की पहल पर की जा रही है। इसके साथ ही आगे चलकर इस व्यवस्था को अन्य भारतीय भाषाओं में भी शुरू करने की तैयारी है। इससे अलग-अलग भाषाओं में न्यायिक फैसलों की जानकारी उपलब्ध कराने की दिशा में व्यवस्था का विस्तार किया जा सकेगा।

    सुप्रीम कोर्ट पहले भी न्याय व्यवस्था में भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल और फैसलों की पहुंच बढ़ाने के लिए कदम उठाता रहा है। कोर्ट ने ‘सुवास’ यानी Supreme Court Vidhik Anuvaad Software नाम का एआई आधारित अनुवाद सॉफ्टवेयर विकसित किया है। इसकी मदद से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हिंदी के साथ तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली और कन्नड़ समेत कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है।

    अब तक करीब 30 हजार फैसलों का हिंदी में अनुवाद किया जा चुका है। बड़ी संख्या में फैसले ई-एससीआर पर भी उपलब्ध हैं। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य भाषाओं में भी फैसलों के अनुवाद की व्यवस्था की गई है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर फैसलों के आधिकारिक क्षेत्रीय अनुवाद भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और कई जज समय-समय पर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि न्याय की जानकारी आम लोगों तक प्रभावी तरीके से तभी पहुंच सकती है, जब वे अदालत के फैसलों को अपनी भाषा में समझ सकें। ‘हिंदी जन सूचना सेवा’ इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाली पहल है।

    कोर्ट की ओर से बताया गया है कि जरूरी व्यवस्थाएं पूरी होने के बाद यह सेवा जल्द शुरू की जाएगी। इसके माध्यम से महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों की जानकारी सरल हिंदी में उपलब्ध होने के साथ ऑडियो और वीडियो प्रारूप में भी लोगों तक पहुंचाई जाएगी।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता


    नई दिल्ली ।
    पूर्व हाई कोर्ट जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और कहा कि इस तरह की याचिकाएं सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश रहते हुए उनके आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी और इस मामले में पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने पुलिस को शिकायत दी थी, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। उन्होंने कहा कि पूर्व न्यायाधीश अब पद पर नहीं हैं और उन्हें किसी तरह की कानूनी छूट प्राप्त नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना था कि मामले की जांच जरूरी है और कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी है। जब वकील ने कहा कि पिछली याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी क्योंकि उस समय शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, तो अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को बार-बार दोहराना उचित नहीं है।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक अधिवक्ता हैं और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को समझना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और केवल प्रचार हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। इसके बाद पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

    यशवंत वर्मा इससे पहले भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में आए थे। उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया के तहत महाभियोग की कार्रवाई शुरू की गई थी। हालांकि, उन्होंने बाद में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रही। नियमों के अनुसार, संसद द्वारा हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए संबंधित न्यायाधीश के पास इस्तीफा देने का विकल्प उपलब्ध होता है।

    मामला उस घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित यशवंत वर्मा के आवास पर आग लगने के बाद कथित रूप से जली हुई नकदी मिलने की बात सामने आई थी। घटना के बाद इस मामले ने काफी चर्चा बटोरी थी और जांच की मांग उठी थी। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि अदालत किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल को मंजूरी नहीं देगी। शीर्ष अदालत ने अपने रुख से यह संदेश दिया है कि न्यायिक व्यवस्था में दाखिल होने वाली याचिकाएं ठोस आधार और वास्तविक कानूनी जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए।

  • ट्विशा केस की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा– जिस तरह मामला संभाला गया वह दुखद, दोनों पक्ष तुरंत रोकें बयानबाजी

    ट्विशा केस की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा– जिस तरह मामला संभाला गया वह दुखद, दोनों पक्ष तुरंत रोकें बयानबाजी

    नई दिल्ली। ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़े मामले ने अब न्यायिक और सामाजिक स्तर पर गंभीर चर्चा का रूप ले लिया है। मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने जिस प्रकार इस पूरे घटनाक्रम को संभाला गया, उस पर गहरी चिंता जताई और कहा कि स्थिति बेहद दुखद रही है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी मामले में जांच पूरी होने से पहले मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया तथ्यों और जांच पर आधारित होती है, इसलिए भावनाओं या अटकलों के आधार पर किसी निर्णय तक पहुंचना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच बेहद आवश्यक है। न्यायालय ने दोनों पक्षों से मीडिया में बयानबाजी बंद करने की अपील करते हुए कहा कि किसी भी तरह की सार्वजनिक टिप्पणी जांच की दिशा और निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। अदालत का मानना था कि जब जांच प्रक्रिया चल रही हो तब हर संबंधित पक्ष को संयम और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। इससे न केवल जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलता है बल्कि सत्य तक पहुंचने की प्रक्रिया भी मजबूत होती है।

    मामले के दौरान न्यायपालिका को लेकर फैल रही विभिन्न चर्चाओं और अटकलों पर भी अदालत ने नाराजगी व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि बिना किसी आधार के ऐसी बातें फैलाना कि न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, बेहद गंभीर विषय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष में कोई राय व्यक्त नहीं की गई है और पूरे मामले को निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। न्यायपालिका का उद्देश्य केवल सत्य और न्याय सुनिश्चित करना होता है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया पर बढ़ती अटकलों के प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी और अपुष्ट जानकारियां कई बार वास्तविक जांच को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि तथ्यों के सामने आने तक धैर्य और जिम्मेदारी बनाए रखी जाए।

    फिलहाल सभी की नजरें आगे की जांच प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। उम्मीद की जा रही है कि निष्पक्ष जांच के माध्यम से पूरे मामले की सच्चाई सामने आएगी और जो भी तथ्य सामने होंगे, उन्हीं के आधार पर न्याय की दिशा तय होगी। ऐसे संवेदनशील मामलों में संयम, धैर्य और न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

  • त्विषा मामला बना बड़ा सवाल: दूसरे पोस्टमार्टम से उठीं नई उम्मीदें, न्याय की राह पर टिकी सबकी नजर

    त्विषा मामला बना बड़ा सवाल: दूसरे पोस्टमार्टम से उठीं नई उम्मीदें, न्याय की राह पर टिकी सबकी नजर


    नई दिल्ली। एक बेटी की असमय मौत ने पूरे समाज को भावुक और चिंतित कर दिया है। इस मामले ने न केवल एक परिवार को गहरे दर्द में डुबो दिया है, बल्कि कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। अब इस पूरे प्रकरण में नए मोड़ के साथ मामले की निष्पक्ष जांच की मांग और तेज हो गई है। दूसरे पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू होने के बाद एक बार फिर लोगों की नजरें इस केस पर टिक गई हैं। परिवार को उम्मीद है कि इस कदम से कई ऐसे सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं, जो अब तक अनसुलझे बने हुए हैं।

    मृतका के परिवार ने शुरू से ही पहले पोस्टमार्टम की प्रक्रिया और रिपोर्ट को लेकर कई सवाल उठाए थे। उनका मानना था कि मामले की गहराई से और निष्पक्ष तरीके से जांच की जानी चाहिए ताकि किसी भी तरह की आशंका या संदेह को दूर किया जा सके। इसी को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक टीम द्वारा दोबारा पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू की गई। इस प्रक्रिया से परिवार को यह उम्मीद बंधी है कि घटना से जुड़ी परिस्थितियों की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

    परिवार के लिए यह समय बेहद भावुक और पीड़ादायक बना हुआ है। एक ओर जहां वे अपनी बेटी को अंतिम विदाई देने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर न्याय की लड़ाई भी जारी है। परिजनों का कहना है कि एक सपनों से भरी जिंदगी अचानक इस तरह खत्म हो जाना केवल एक परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि समाज के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। उनके दर्द और सवालों ने कई लोगों को भावुक कर दिया है।

    इस पूरे मामले ने समाज में बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और न्याय को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। परिवार का कहना है कि हर बेटी को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। यदि किसी भी घटना के पीछे प्रताड़ना या मानसिक दबाव जैसी परिस्थितियां मौजूद हों, तो उनका निष्पक्ष खुलासा होना जरूरी है। ऐसे मामलों में पारदर्शी जांच न केवल पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने में मदद करती है बल्कि समाज का भरोसा भी मजबूत करती है।

    इस बीच जांच एजेंसियां मामले के हर पहलू की पड़ताल में जुटी हुई हैं। संबंधित लोगों से पूछताछ की जा रही है और सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आगे की प्रक्रिया जारी है। घटना से जुड़े अलग-अलग दावों और आरोपों की सत्यता की जांच की जा रही है ताकि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हर पहलू को विस्तार से समझा जा सके।

    फिलहाल पूरा मामला संवेदनशील दौर से गुजर रहा है और हर किसी की नजर आने वाली जांच रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई पर बनी हुई है। लोगों को उम्मीद है कि सच्चाई जल्द सामने आएगी और जो भी तथ्य सामने होंगे, उनके आधार पर निष्पक्ष कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि समाज के भरोसे की सबसे मजबूत नींव भी होता है।

  • 33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

    33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई


    नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है।

    कोर्ट का बड़ा फैसला
    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

    वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए
    विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते

    क्या था मामला?
    यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

    पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट
    एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है।
    सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी
    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है।

    वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण
    अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया।

    सम्मान की वापसी को प्राथमिकता
    चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे।

    सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।

  • उज्जैन दर्शन से लौटते समय नवविवाहिता की संदिग्ध मौत, मायके ने ससुराल पर लगाया दहेज हत्या का आरोप

    उज्जैन दर्शन से लौटते समय नवविवाहिता की संदिग्ध मौत, मायके ने ससुराल पर लगाया दहेज हत्या का आरोप

    नई दिल्ली। जबलपुर के कटंगी क्षेत्र के कैमोरी गांव निवासी नवविवाहिता पूजा साहू की मौत ने पूरे इलाके में सनसनी मचा दी है। पूजा की शादी 6 फरवरी 2026 को गढ़ा फाटक निवासी निखिल साहू से हुई थी। शादी के कुछ दिनों बाद पूजा अपने पति और परिवार के साथ उज्जैन दर्शन के लिए गई थी। परिजनों के अनुसार, 20 फरवरी को जब वे वापस लौट रहे थे, तब पूजा की अचानक तबीयत बिगड़ गई। पति निखिल ने परिवार को एक वीडियो भेजकर बताया कि पूजा की हालत खराब है। लेकिन रास्ते में तेंदूखेड़ा, दमोह के पास पूजा की मौत हो गई।

    मृतका के मायके पक्ष का आरोप है कि पूजा के साथ लगातार दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा था। परिजनों के अनुसार, शादी के समय 10 लाख रुपए की मांग की गई थी, जिसमें केवल 4 लाख रुपए दिए गए। पूजा ने अपनी मौत से पहले अपने मोबाइल के जरिए परिजनों को वीडियो भेजे थे, जिनमें उन्होंने ससुराल वालों के बर्ताव और अपनी व्यथा बताई। ये वीडियो अब पुलिस को साक्ष्य के रूप में सौंपे जा रहे हैं।

    पूजा की मौत के बाद पूरे साहू समाज में आक्रोश फैल गया। समाज के सैकड़ों लोग और मृतका के रिश्तेदार जबलपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे। उन्होंने नारेबाजी की और दोषियों के खिलाफ तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की मांग की। समाज के प्रतिनिधियों ने बताया कि यह हत्या बीमारी का रूप देने की कोशिश है।

    पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जीरो में मामला दर्ज कर जांच के लिए डायरी दमोह भेज दी है। एएसपी सूर्यकांत शर्मा ने आश्वासन दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    इस मामले में पूजा की मौत ने परिवार और समाज में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। फिलहाल पुलिस साक्ष्यों और वीडियो की जांच कर रही है ताकि मामले की वास्तविकता सामने आ सके और न्याय सुनिश्चित हो।