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  • ज्येष्ठ कालाष्टमी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां: काल भैरव की नाराजगी से बढ़ सकती हैं जीवन में परेशानियां, जानें शुभ-अशुभ नियम

    ज्येष्ठ कालाष्टमी पर भूलकर भी न करें ये गलतियां: काल भैरव की नाराजगी से बढ़ सकती हैं जीवन में परेशानियां, जानें शुभ-अशुभ नियम

    नई दिल्ली । सनातन धर्म में आध्यात्मिक साधना और ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए कालाष्टमी का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस वर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाली मासिक कालाष्टमी 8 जून, दिन सोमवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि का प्रारंभ 8 जून को तड़के सुबह 3 बजकर 24 मिनट पर होगा, जिसका समापन अगले दिन 9 जून को सुबह 3 बजकर 23 मिनट पर होगा। इस विशेष दिन पर भगवान शिव के रौद्र रूप और अंशावतार भगवान काल भैरव की प्राकट्य पूजा और व्रत का विधान है, जो जीवन के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने की क्षमता रखता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव की आराधना करने से जीवन में व्याप्त किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा, तंत्र-मंत्र का प्रभाव और मानसिक भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, जिन जातकों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा राहु और केतु के अशुभ प्रभाव चल रहे हों, उनके लिए यह दिन विशेष फलदायी माना गया है। हालांकि, ज्योतिष शास्त्र और पुराणों में इस दिन कुछ विशेष कार्यों को वर्जित घोषित किया गया है, जिन्हें करने से साधक को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    कालाष्टमी के दिन सबसे महत्वपूर्ण नियम पशु सेवा से जुड़ा है। सनातन परंपरा में श्वान (कुत्ते) को भगवान काल भैरव का वाहन और प्रतीक माना गया है। इसलिए इस दिन भूलकर भी किसी कुत्ते को मारना, डांटना या उसे जूते-चप्पल दिखाना महापाप की श्रेणी में आता है। ऐसा करने से काल भैरव तत्काल रुष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही, इस दिन कुत्ते को कभी भी जूठा भोजन या अपवित्र अन्न नहीं देना चाहिए। इसके विपरीत, इस शुभ तिथि पर काले कुत्ते को ताजी एवं मुलायम रोटी, गुड़ या मीठे बिस्कुट खिलाना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है।

    जो श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं, उनके लिए खान-पान के कड़े नियम निर्धारित हैं। कालाष्टमी के व्रत में सामान्य नमक या समुद्री नमक का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है, क्योंकि इससे व्रत खंडित होने का दोष लगता है जिसके परिणाम जीवन में कष्टकारी हो सकते हैं। व्रत न रखने वाले सामान्य लोगों को भी इस दिन पूरी तरह सात्विकता का पालन करना चाहिए। इस तिथि पर मदिरापान और मांसाहार जैसे तामसिक भोजन से पूर्ण दूरी बना लेनी चाहिए, क्योंकि अनजाने में किया गया ऐसा कृत्य भी गंभीर दोष का कारण बनता है।

    शास्त्रों में भगवान काल भैरव को ‘दंडपाणि’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है अन्याय और अधर्म के मार्ग पर चलने वालों को कड़ा दंड देने वाला। यही कारण है कि कालाष्टमी के दिन किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य, झूठ बोलने, किसी का दिल दुखाने या छल-कपट करने से बचना चाहिए। इस दिन किए गए गलत कार्यों का परिणाम बेहद कष्टप्रद हो सकता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को कम से कम सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक इन कड़े नियमों और मर्यादाओं का अक्षुण्ण पालन करना अनिवार्य बताया गया है।

    नकारात्मकता को दूर करने और पुण्य फल की प्राप्ति के लिए इस दिन कुछ विशेष उपाय भी बताए गए हैं। कालाष्टमी के पावन अवसर पर किसी भी काल भैरव मंदिर में जाकर उनके सम्मुख सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। इसके अलावा, मंदिर में उड़द की दाल, काले तिल और सरसों का तेल दान करने से पितृदोष और ग्रह बाधाओं से शांति मिलती है। इस दिन छोटे बालकों को उनकी प्रिय वस्तुएं या मिष्ठान भेंट करना भी पारिवारिक समृद्धि और मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम उपाय माना गया है।

  • कालाष्टमी व्रत 2026: ग्रहदोष शांत करने के असरदार उपाय

    कालाष्टमी व्रत 2026: ग्रहदोष शांत करने के असरदार उपाय


    नई दिल्ली । कालाष्टमी हिन्दू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है जिसे विशेष रूप से कालभैरव की उपासना के लिए मनाया जाता है। इस दिन शनि राहु और केतु से जुड़े ग्रहदोषों को शांत करने के लिए भक्त विशेष उपाय करते हैं। 2026 में वैशाख माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 9 अप्रैल को रात 09:19 मिनट से शुरू होकर 10 अप्रैल को रात 11:15 मिनट तक रहेगी। इसलिए इस वर्ष कालाष्टमी का व्रत 10 अप्रैल शुक्रवार को रखा जाएगा।

    धर्मशास्त्रों के अनुसार कालभैरव की पूजा निशा काल में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। यह समय इसलिए शुभ है क्योंकि कालभैरव का जन्म रात्रि में हुआ था। रात के समय विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति जीवन में भय रोग और शत्रुओं से मुक्ति प्राप्त करता है और ग्रहों के क्रूर प्रभाव शांत होते हैं।

    कालाष्टमी पर कई अचूक उपायों का पालन कर भक्त अपनी समस्याओं और बाधाओं से मुक्त हो सकते हैं। सबसे पहले इस दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी या गुड़ लगी रोटी खिलाना शुभ माना जाता है। यदि काला कुत्ता न मिले तो किसी भी कुत्ते को रोटी अर्पित कर सकते हैं। ऐसा करने से राहु और केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।

    शनि दोष से मुक्ति पाने के लिए शाम के समय कालभैरव मंदिर में जाकर सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाना अत्यंत प्रभावशाली उपाय है। साथ ही 108 बार ‘ॐ कालभैरवाय नमः’ मंत्र का जाप करने से कोर्ट-कचहरी और शत्रुओं की बाधाएं दूर होती हैं। शनि की महादशा यदि प्रभावी हो रही हो तो भैरव जी को शमी के पत्ते और काले तिल अर्पित करना चाहिए। इससे भगवान शिव और भैरव दोनों प्रसन्न होते हैं और आकस्मिक संकटों से रक्षा होती है।

    नींबू से जुड़ा उपाय भी इस दिन बड़ा कारगर माना गया है। कालभैरव को प्रसन्न करने के लिए नींबू अर्पित करने से कालसर्प दोष और ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं। इसके अलावा विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में बाधाओं का नाश होता है और मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

    वैशाख माह की कालाष्टमी इस बार कई विशेष संयोगों के कारण अधिक महत्व रखती है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन कुछ विशेष उपाय अपनाने से जातक को स्वास्थ्य शत्रु से मुक्ति और आर्थिक लाभ की प्राप्ति संभव होती है। इसलिए भक्तों को चाहिए कि वे इस दिन व्रत और पूजा का पालन पूरी श्रद्धा और विधि विधान से करें।

    संक्षेप में कालाष्टमी का व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि जीवन में शांति सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा लाने वाला भी है। काले कुत्ते को रोटी खिलाना सरसों के तेल का दीपक जलाना शमी के पत्ते और काले तिल अर्पित करना और नींबू से उपाय करना इन सभी कर्मों से शनि राहु और केतु दोषों से मुक्ति मिलती है। इस प्रकार कालाष्टमी व्रत व्यक्ति के जीवन में डर रोग और शत्रुओं से सुरक्षा की नींव रखता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर मार्गदर्शित करता है।