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  • 210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?

    210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?


    नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे को लेकर चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। बालेन शाह ने ब्रिटेन की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे सीमा विवादों को वह यूनाइटेड किंगडम के सामने भी उठाएंगे। इसके बाद 210 साल पुराने इस विवाद पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    लिपुलेख दर्रा हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक रणनीतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्ग है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले को तिब्बत के पुरांग क्षेत्र से जोड़ता है। यही दर्रा कैलास मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्गों में से एक माना जाता है। भारत और चीन के बीच हुए समझौतों के तहत वर्षों से इस मार्ग का उपयोग तीर्थयात्रियों और सीमित व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।

    इस विवाद की जड़ वर्ष 1816 में हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि में छिपी है। यह संधि तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। संधि के अनुसार काली नदी को भारत और नेपाल की सीमा माना गया था। हालांकि विवाद इस बात को लेकर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है।

    भारत का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिपुलेख क्षेत्र के निकट स्थित कालापानी इलाके से होता है। इस आधार पर भारत लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र को अपने भूभाग का हिस्सा मानता है। दूसरी ओर नेपाल का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है। यदि नेपाल के दावे को सही माना जाए तो कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा का इलाका नेपाल के क्षेत्र में आता है।

    विवाद को और जटिल बनाने वाला एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1865 के आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने सीमा निर्धारण में कुछ बदलाव किए थे। भारत का पक्ष है कि बाद के आधिकारिक नक्शों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर यह क्षेत्र भारत का हिस्सा रहा है। वहीं नेपाल का आरोप है कि ब्रिटिश शासन के दौरान सीमा निर्धारण में उसके हितों की अनदेखी की गई थी।

    यह विवाद वर्ष 2020 में तब और तेज हो गया जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किया। नेपाल ने इसका विरोध करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया था।

    भारत का लगातार यही रुख रहा है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और आपसी बातचीत के माध्यम से होना चाहिए। नई दिल्ली किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रही है। वहीं नेपाल में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दल और नेता इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की वकालत करते रहे हैं।

    लिपुलेख विवाद केवल सीमा रेखा का सवाल नहीं है बल्कि इसमें ऐतिहासिक दस्तावेज, सामरिक महत्व, धार्मिक आस्था और दोनों देशों के राष्ट्रीय हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि दो सदियों बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं सका है और समय-समय पर दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों में चर्चा का विषय बन जाता है।

  • लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल का ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ या कूटनीतिक दबाव? बालेन शाह के बयान से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल रिश्तों पर नई चुनौती

    लिपुलेख विवाद फिर गरमाया: नेपाल का ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ या कूटनीतिक दबाव? बालेन शाह के बयान से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल रिश्तों पर नई चुनौती


    नई दिल्ली। नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से चले आ रहे लिपुलेख सीमा विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर तनाव बढ़ा दिया है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से उठे नए बयान के बाद यह मुद्दा फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया है।

    नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि Lipulekh Pass के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर भारत और चीन द्वारा किए जा रहे उपयोग पर उसे आपत्ति है। काठमांडू का दावा है कि यह क्षेत्र नेपाल की संप्रभु भूमि का हिस्सा है और किसी भी गतिविधि के लिए उसकी सहमति जरूरी है।

    नेपाल का सख्त रुख
    नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भारत और चीन दोनों को औपचारिक रूप से अपनी आपत्ति भेजते हुए कहा है कि लिपुलेख और उससे जुड़े क्षेत्र नेपाल की सीमाओं के भीतर आते हैं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि वह इस मामले को कूटनीतिक तरीके से आगे बढ़ाएगी।

    नेपाल में इस मुद्दे को लेकर जनता की भावनाएं भी तेजी से जुड़ रही हैं, जिससे सरकार के लिए इसे राजनीतिक रूप से नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया है।

    ‘राष्ट्रवादी कार्ड’ की चर्चा
    इसी बीच काठमांडू के मेयर और युवा नेता Balen Shah (बालेन शाह) के बयानों ने इस विवाद को और हवा दे दी है। माना जा रहा है कि उन्होंने इस मुद्दे को “राष्ट्रवादी भावना” के तौर पर उठाकर घरेलू राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।

    विवाद की ऐतिहासिक जड़ें
    इस पूरे विवाद की जड़ें 1816 की Treaty of Sugauli से जुड़ी हैं, जिसमें भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) और नेपाल के बीच सीमाएं तय हुई थीं। नेपाल का दावा है कि काली नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है, जिससे लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र नेपाल का हिस्सा बनते हैं।वहीं भारत का तर्क है कि वास्तविक उद्गम स्थल पूर्व की ओर है, और इस आधार पर यह क्षेत्र भारतीय प्रशासन के अंतर्गत आता है।

    भारत का पक्ष और रणनीतिक महत्व
    भारत इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानता है, क्योंकि यह चीन सीमा के करीब स्थित है और सैन्य दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से इस इलाके में भारतीय चौकियां मौजूद हैं।

    भारत ने हाल के वर्षों में यहां सड़क और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट भी विकसित किए हैं, जिससे कैलाश मानसरोवर यात्रा आसान हो सके और सीमा तक पहुंच मजबूत हो।

    2020 का तनाव और नया नक्शा
    2020 में भारत द्वारा लिपुलेख रोड के उद्घाटन के बाद नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने क्षेत्र में दिखाया था, जिसे संसद से भी मंजूरी मिली थी।विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद फिलहाल आसान समाधान की ओर नहीं बढ़ रहा है। भारत, नेपाल और चीन के रणनीतिक हित इस क्षेत्र में जुड़े होने के कारण यह मुद्दा लंबे समय तक कूटनीतिक तनाव का कारण बना रह सकता है।

    फिलहाल दोनों देश अपने-अपने रुख पर कायम हैं नेपाल कूटनीतिक बातचीत की बात कर रहा है, जबकि भारत इसे अपने प्रशासनिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है।