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  • मध्यप्रदेश में अब दूध विक्रेताओं के लिए लाइसेंस अनिवार्य, मिलावटी दूध पर कड़ा नियंत्रण

    मध्यप्रदेश में अब दूध विक्रेताओं के लिए लाइसेंस अनिवार्य, मिलावटी दूध पर कड़ा नियंत्रण



    भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने दूध और दुग्ध उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य में अब डेयरी सहकारी समितियों को छोड़कर सभी दूध उत्पादक और विक्रेता लाइसेंस या पंजीकरण के बिना अपने कारोबार को जारी नहीं रख सकते। यह निर्णय एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप लिया गया है।

    सरकार ने दूध संग्रह और परिवहन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों और भंडारण व्यवस्थाओं की नियमित जांच के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों का मानना है कि इससे मिलावटी दूध और नकली दुग्ध उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। राज्य में ऐसे दूध उत्पादकों और विक्रेताओं की पहचान की जाएगी जो अभी तक पंजीकृत नहीं हैं। साथ ही, दूध से जुड़ी हर गतिविधि की मासिक निगरानी रिपोर्ट 15 और 30 या 31 तारीख को तैयार कर प्राधिकरण को भेजी जाएगी।

    मध्यप्रदेश देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहाँ कुल 213 लाख टन दूध का उत्पादन होता है, जो देश के कुल उत्पादन का लगभग 9 प्रतिशत है। राज्य में भैंस के दूध का हिस्सा लगभग 48 प्रतिशत है। वर्ष 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 652 से 707 ग्राम प्रतिदिन रही।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य में दूध उत्पादन को वर्तमान 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड के साथ अनुबंध भी किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में दूध संग्रह को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 381 नई सहकारी समितियां भी संचालित हो रही हैं।

    प्रदेश सरकार ने दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना भी शुरू की है। इस योजना के तहत यदि कोई किसान 25 गायों की यूनिट स्थापित करता है, तो उसे 10 लाख रुपए तक की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन बढ़ाना और किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करना है।

    केंद्र सरकार भी दूध उत्पादन और बिक्री पर नजर रख रही है। एफएसएसएआई ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने क्षेत्र में दूध उत्पादकों और विक्रेताओं की निगरानी बढ़ाएं। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि डेयरी सहकारी समितियों के सदस्य इस अनिवार्यता से छूट प्राप्त हैं, लेकिन अन्य सभी को खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुसार पंजीकरण या लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।

    एफएसएसएआई ने विशेष पंजीकरण अभियान चलाकर उन दूध उत्पादकों और विक्रेताओं की पहचान करने को कहा है जो अब तक पंजीकृत नहीं हैं। साथ ही, दूध संग्रह, परिवहन और भंडारण की जांच को नियमित रूप से लागू करने का निर्देश भी दिया गया है।

  • डेयरी क्रांति की ओर मध्यप्रदेश का बड़ा कदम: मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना को बताया ऐतिहासिक

    डेयरी क्रांति की ओर मध्यप्रदेश का बड़ा कदम: मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना को बताया ऐतिहासिक

    भोपाल।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि पशुपालकों एवं दुग्ध उत्पादकों को हर संभव तरीके से आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रदेश में दुग्ध उत्पादन बढ़ाया जाएगा। आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के निर्माण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, पशुपालकों को आत्मनिर्भर बनाने सहित वर्तमान डेयरी उद्योग को सुनियोजित, सुव्यवस्थित, व्यावसायिक और लाभकारी बनाने की दिशा में ‘डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना’ आरंभ की है। यह योजना खासतौर पर उन जरूरतमंद युवाओं, किसानों और पशुपालकों के लिए आशा की किरण बनकर उभरी है, जो आधुनिक डेयरी इकाई स्थापित कर अपनी आय का स्थायी साधन विकसित करना चाहते हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नये-नये अवसर सृजित करना और पशुपालकों की आय में वृद्धि करना है।

    डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना में लाभार्थियों को 25 दूधारू पशुओं की एक इकाई स्थापित करने का अवसर दिया जाता है। इच्छुक और सक्षम हितग्राही अधिकतम 8 इकाइयां अर्थात 200 पशुओं तक की डेयरी परियोजना भी स्थापित कर सकते हैं। यह योजना छोटे से लेकर मध्यम स्तर के डेयरी उद्यमियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। योजना की एक प्रमुख शर्त यह है कि प्रति इकाई के लिए इच्छुक हितग्राही के पास कम से कम 3.50 एकड़ कृषि भूमि उपलब्ध हो। भूमि की यह व्यवस्था पशुओं के आवास, चारे की व्यवस्था और डेयरी के समुचित तरीके से संचालन के लिए जरूरी है। इसके साथ ही सरकार पशुपालकों/दूध उत्पादकों की प्रोफेशनल ट्रेनिंग को भी महत्व दे रही है, जिससे पशुपालक वैज्ञानिक और आधुनिक पद्धति से अपना डेयरी बिजनेस चला सकें। पशुपालकों को आर्थिक सहायता देना इस योजना का सबसे आकर्षक पहलू है। परियोजना की कुल लागत पर सरकार द्वारा अनुदान सब्सिडी भी दिया जा रहा है।

    अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के लाभार्थियों को कुल परियोजना लागत का 33 प्रतिशत तथा अन्य सभी वर्गों को 25 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जा रहा है। शेष राशि बैंक ऋण के जरिए उपलब्ध कराई जा रही है। इस प्रावधान से बड़े निवेश की बाधा काफी हद तक कम हो जाती है और डेयरी बिजनेस शुरू करना भी आसान हो जाता है। योजना में लाभार्थियों के चयन में पारदर्शिता पर विशेष जोर दिया गया है। आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन रखी गई है और चयन सामान्यत: “पहले आओ-पहले पाओ” के आधार पर ही किया जा रहा है। साथ ही उन पशुपालकों को भी प्राथमिकता दी जा रही है, जो पहले से ही किन्हीं दुग्ध संघों या सहकारी संस्थाओं को निरंतर दुग्ध आपूर्ति कर रहे हैं। आवेदन के लिए आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, भूमि के दस्तावेज, बैंक खाता विवरण, जाति प्रमाण पत्र यदि लागू हो  और प्रशिक्षण प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज जरूरी हैं। इच्छुक आवेदक पशुपालन एवं डेयरी विभाग के आधिकारिक पोर्टल या अपने जिले के पशु चिकित्सा सेवाएं कार्यालय से विस्तृत जानकारी और मार्गदर्शन भी ले सकते हैं।

    योजना के बारे में कुछ तथ्य

    1. मुख्यमंत्री पशुपालन विकास योजना में नवीन घटक के रूप में राज्य सरकार ने 25 अप्रैल 2025 को डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना को मंजूरी दी।

    2. योजना के अंतर्गत 25 दुधारु पशु की प्रति इकाई राशि 36 लाख से 42 लाख रुपये तक की इकाई लागत है।

    3. योजना में अधिकतम 8 इकाइयों की स्थापना एक हितग्राही द्वारा की जा सकती है। एक इकाई में एक ही नस्ल के गौ-वंश एवं भैसवंशीय पशु रहेंगे।

    4. हितग्राही के पास प्रत्येक इकाई के लिये न्यूनतम 3.50 एकड़ कृषि भूमि होना जरूरी है।

    5. भूमि के लिये परिवार के सामूहिक खाते भी सम्मिलित हैं। इनके लिये अन्य सदस्यों की सहमति भी जरूरी होगी।

    6. इकाइयों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि होने पर आनुपातिक रूप से न्यूनतम कृषि भूमि की अर्हता में भी आनुपातिक वृद्धि जरूरी होगी।

    7. पात्र हितग्राही को ऋण राशि का भुगतान चार चरणों में किया जायेगा।