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  • कन्हैया कुमार कहां हैं? राहुल गांधी के साथ मार्च में दिखीं नेहा बोरा, छात्र संगठनों को मिली अहमियत

    कन्हैया कुमार कहां हैं? राहुल गांधी के साथ मार्च में दिखीं नेहा बोरा, छात्र संगठनों को मिली अहमियत


    नई दिल्ली।
    कथित वोट चोरी के मुद्दे पर कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अपील के बाद विपक्षी दलों के साथ छात्र और नागरिक संगठन भी सड़कों पर उतर रहे हैं। इस दौरान अखिल भारतीय छात्र संघ (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा प्रदर्शन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। वहीं, कभी छात्र आंदोलनों के चर्चित चेहरों में शामिल रहे कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    हालांकि, कन्हैया कुमार सोमवार को बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च में शामिल हुए थे, लेकिन वह कैमरों की नजर से दूर रहे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के प्रभारी होने के नाते कन्हैया की भूमिका अब बदल गई है। ऐसे में उनकी व्यक्तिगत मौजूदगी से ज्यादा संगठन की भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है।


    राहुल गांधी के साथ मार्च में दिखीं नेहा बोरा

    कथित वोट चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन में नेहा बोरा और उनके साथियों की सक्रियता चर्चा में है। पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन के दौरान भी नेहा युवाओं की आवाज उठाती रही हैं। अब वह मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे पर विपक्ष के प्रदर्शन में सक्रिय दिखाई दे रही हैं।

    इंडिया गठबंधन के बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च में नेहा बोरा छात्र संगठनों के साथ शामिल हुईं। मार्च के दौरान कई मौकों पर राहुल गांधी एक हाथ से प्रियंका गांधी और दूसरे हाथ से नेहा बोरा का हाथ थामे नजर आए। इस दौरान प्रियंका गांधी को नेहा के नारों में आवाज मिलाते हुए भी देखा गया। विपक्ष के प्रमुख नेताओं के लिए तैयार किए गए ट्रक पर भी नेहा मौजूद थीं।

    इस भागीदारी ने छात्र संगठनों और नागरिक समूहों को विपक्ष के आंदोलन में मिल रही अहमियत को रेखांकित किया है।

    कहां हैं कन्हैया कुमार?

    कन्हैया कुमार भी बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च में शामिल थे, लेकिन वह प्रमुख नेताओं की तरह कैमरों के सामने दिखाई नहीं दिए। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, कन्हैया कुमार को एनएसयूआई की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए उनकी भूमिका केवल किसी प्रदर्शन में व्यक्तिगत तौर पर शामिल होने तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्र संगठन की भागीदारी सुनिश्चित करना भी है।

    कथित वोट चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन में एनएसयूआई लगातार सक्रिय है। पार्टी के भीतर यह माना जा रहा है कि संगठन की मौजूदगी और भागीदारी को मजबूत करना भी इस राजनीतिक अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    छात्र और नागरिक संगठनों पर जोर

    राजनीतिक रणनीतिकारों के अनुसार, पेपर लीक के खिलाफ युवाओं का आंदोलन हो या मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का मुद्दा, नेहा बोरा इन मामलों में सक्रिय रही हैं। यही वजह है कि राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के मार्च में छात्र संगठनों और नागरिक समूहों से जुड़े लोगों को प्रमुखता दी।

    इस रणनीति के पीछे यह संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि मतदाता सूची से जुड़ा मुद्दा केवल कांग्रेस या किसी एक विपक्षी नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे व्यापक जनभागीदारी के साथ उठाया जा रहा है। विपक्ष का तर्क है कि अपने अधिकारों से जुड़े सवालों पर विभिन्न संगठनों को मिलकर आवाज उठानी चाहिए।


    वोटर लिस्ट के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विपक्ष

    मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्षी नेताओं ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका दायर करने वालों में राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव समेत 10 दलों के नेता शामिल हैं।

    सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, याचिका सोमवार शाम दाखिल की गई। इसमें विपक्ष की ओर से कुल 10 राहतों की मांग की गई है।

    याचिका दायर करने वाले नेताओं में मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय, अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले, शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की सांसद महुआ माजी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एम. ए. बेबी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेता ई. टी. मोहम्मद बशीर शामिल हैं।

    याचिका में मिलीं 14 खामियां

    सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में 14 खामियां बताई गई हैं। अदालत की वेबसाइट पर इनका उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ताओं को कमियां दूर करने के लिए कहा गया है।

    प्रमुख खामियों में याचिका दाखिल करने के शुल्क का कम भुगतान किया जाना शामिल है। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ताओं से 220 रुपये का अतिरिक्त शुल्क जमा करने को कहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, खामियों को दूर करने के लिए 90 दिन का समय दिया गया है।

    इस बीच, कथित वोट चोरी के खिलाफ विपक्ष का राजनीतिक आंदोलन और न्यायिक प्रक्रिया दोनों आगे बढ़ रहे हैं। प्रदर्शन में छात्र संगठनों की सक्रिय भागीदारी और कन्हैया कुमार की संगठनात्मक भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • DUSU में NSUI का खाता नहीं खुला, राहुल गांधी ने मांगा जवाब, कन्हैया-विनोद से किए सवाल

    DUSU में NSUI का खाता नहीं खुला, राहुल गांधी ने मांगा जवाब, कन्हैया-विनोद से किए सवाल


    नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI के केंद्रीय पैनल में एक भी सीट नहीं जीत पाने के बाद पार्टी के भीतर समीक्षा शुरू हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने NSUI प्रभारी कन्हैया कुमार और राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जाखड़ के साथ बैठक कर चुनावी नतीजों, उम्मीदवारों के चयन और प्रचार रणनीति पर चर्चा की। बैठक में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल भी मौजूद रहे।

    राष्ट्रपति पद पर भी मुकाबला रहा करीबी

    रिपोर्टों के मुताबिक बैठक में राहुल गांधी ने खास तौर पर राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना था कि मुकाबला करीबी होने के बावजूद अंतिम नतीजा NSUI के पक्ष में नहीं गया। उन्होंने चुनाव के दौरान अपनाई गई रणनीति और संगठन की तैयारियों को लेकर कन्हैया कुमार और विनोद जाखड़ से जवाब मांगा।

    DUSU के चार केंद्रीय पदों में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद पर NSUI से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले दीपांशु शौकीन ने जीत दर्ज की। NSUI का आधिकारिक पैनल कोई केंद्रीय सीट नहीं जीत सका।

    टिकट वितरण पर भी उठे सवाल

    बैठक में उम्मीदवारों के चयन और टिकट वितरण को लेकर भी चर्चा हुई। रिपोर्टों के अनुसार, दीपांशु शौकीन को आधिकारिक टिकट नहीं देने के फैसले पर सवाल उठाया गया। शौकीन बाद में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे और उपाध्यक्ष पद जीत लिया।

    इसके अलावा कुछ अन्य उम्मीदवारों के टिकट को लेकर भी संगठन के भीतर असहमति की बात सामने आई है। रिपोर्टों में दावा किया गया कि उम्मीदवारों के चयन से जुड़े फैसलों ने NSUI के वोटों को प्रभावित किया और संगठन के आधिकारिक उम्मीदवारों के सामने बगावत की स्थिति बनी।

    वेणुगोपाल ने भी मांगी रिपोर्ट

    DUSU नतीजों के बाद कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी चुनावी प्रदर्शन की समीक्षा की थी। रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी ने उनसे चुनाव परिणाम और हार के कारणों पर विस्तृत जानकारी लेने को कहा था। इसके बाद NSUI की रणनीति और संगठनात्मक तैयारियों को लेकर बैठक हुई।

    बैठक में प्रचार अभियान, उम्मीदवारों के चयन, जमीनी स्तर पर संगठन की सक्रियता और छात्रों के बीच पहुंच जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आगे की छात्र राजनीति के लिए संगठन को मजबूत करने और युवाओं से जुड़ाव बढ़ाने पर भी जोर दिए जाने की रिपोर्ट है।

    युवा मुद्दों से जुड़ाव पर भी चर्चा

    DUSU चुनाव के नतीजे ऐसे समय आए हैं, जब कांग्रेस की ओर से युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर अभियान चलाया जा रहा है। ऐसे में विश्वविद्यालय चुनाव में NSUI का प्रदर्शन पार्टी के लिए समीक्षा का विषय बना है। राहुल गांधी की बैठक में संगठन की कैंपस स्तर की गतिविधियों और छात्रों के बीच संपर्क को लेकर भी चर्चा होने की बात सामने आई है।

    फिलहाल कांग्रेस की ओर से बैठक में राहुल गांधी द्वारा कही गई हर बात का आधिकारिक ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए उनके कथित सवालों और फटकार से जुड़ी जानकारियां मीडिया रिपोर्टों और सूत्रों के हवाले से सामने आई हैं। चुनाव परिणाम के बाद पार्टी के भीतर अब टिकट वितरण से लेकर चुनावी रणनीति तक की समीक्षा का दौर जारी है।

  • JNU नारेबाजी पर उमर खालिद के पिता का बड़ा हमला: बोले-विरोध अब अपराध बन गया, कन्हैया कुमार राजनीतिक दबाव में चुप

    JNU नारेबाजी पर उमर खालिद के पिता का बड़ा हमला: बोले-विरोध अब अपराध बन गया, कन्हैया कुमार राजनीतिक दबाव में चुप


    नई दिल्ली।  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हाल ही में हुई नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन को लेकर उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने मौजूदा हालात पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश में अब विरोध करना अपराध बनता जा रहा है, जबकि गंभीर अपराधों के दोषियों को आसानी से जमानत मिल जाती है। उनका कहना है कि यह स्थिति लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए बेहद चिंताजनक है।
    सैयद कासिम रसूल इलियास ने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को मिली जमानत के खिलाफ कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान कुछ नारे जरूर लगाए गए, लेकिन कोई आधिकारिक बयान या भड़काऊ भाषण नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, “यह विरोध न तो हिंसक था और न ही किसी कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने वाला, फिर भी एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट तैयार कर दी गई। यह दर्शाता है कि असहमति को दबाने का एक चलन बन चुका है।”

    उमर खालिद के पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं होने के बावजूद उसे लंबे समय तक जेल में रखा गया।

    उन्होंने कहा कि दंगों के समय उमर खालिद की मौजूदगी तक साबित नहीं हो पाई, इसके बावजूद उसे जमानत नहीं दी गई, जबकि उसी एफआईआर में नामजद कुछ अन्य आरोपियों को राहत मिल चुकी है। उन्होंने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया और कहा कि यह सब एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।

    कासिम रसूल इलियास ने इस पूरे मामले में कन्हैया कुमार का जिक्र करते हुए भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि कन्हैया कुमार और उमर खालिद दोनों जेएनयू में सहपाठी रहे हैं और 2016 के मामले में दोनों को आरोपी बनाया गया था। इसके बावजूद कन्हैया कुमार इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बच रहे हैं।

    उन्होंने कहा, “कन्हैया कुमार अब एक राजनेता हैं और किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। पार्टी और राजनीति से जुड़े दबावों के कारण वे उमर खालिद के मुद्दे पर सवाल उठाने से पीछे हट रहे हैं। यह स्थिति अजीब जरूर है, लेकिन उनकी राजनीतिक मजबूरियां उनके पैरों में बेड़ियों की तरह हैं।”

    सैयद कासिम का मानना है कि मौजूदा दौर में छात्रों और युवा वर्ग के लिए शांतिपूर्ण विरोध करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि जब देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपी भी जमानत पा जाते हैं, तो केवल नारे लगाने या विरोध दर्ज कराने वालों को निशाना बनाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

    उन्होंने आगे कहा कि राजनीति और निजी स्वार्थों के चलते असल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है। यदि राजनीतिक हस्तक्षेप न हो, तो उमर खालिद जैसे मामलों में निष्पक्ष और त्वरित न्याय संभव हो सकता है। उनके अनुसार, प्रशासन और न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर काम करना चाहिए।

    सैयद कासिम रसूल इलियास ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में विरोध और असहमति की आवाज़ को दबाना समाज के लिए खतरनाक संकेत है।

    उन्होंने उम्मीद जताई कि समाज, न्यायपालिका और संस्थाएं मिलकर यह सुनिश्चित करेंगी कि छात्रों और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

    इस बयान से साफ है कि उमर खालिद के परिवार के लिए न्याय की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनके पिता का मानना है कि न्याय और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है, और यदि इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंच सकती है।