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  • हरिद्वार से दिल्ली तक निकली अनोखी कांवड़ यात्रा, मैकलारेन जैसी डमी कार में भगवान शिव की प्रतिमा ने खींचा सबका ध्यान

    हरिद्वार से दिल्ली तक निकली अनोखी कांवड़ यात्रा, मैकलारेन जैसी डमी कार में भगवान शिव की प्रतिमा ने खींचा सबका ध्यान

    नई दिल्ली । सावन माह में जारी कांवड़ यात्रा के बीच उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक अनोखी कांवड़ ने श्रद्धालुओं और राहगीरों का विशेष ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मैकलारेन स्पोर्ट्स कार जैसी दिखने वाली विशेष डमी संरचना में भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कर निकाली गई इस कांवड़ को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़क किनारे रुकते नजर आए। दूर से देखने पर यह किसी वास्तविक लग्जरी स्पोर्ट्स कार जैसी दिखाई देती थी, लेकिन पास आने पर लोगों को पता चला कि यह श्रद्धालुओं द्वारा विशेष रूप से तैयार कराया गया प्रतिरूप है।

    यह अनोखी कांवड़ दिल्ली के नवादा गांव से आए छह शिवभक्तों द्वारा तैयार कराई गई है। श्रद्धालुओं ने 28 जुलाई को हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी से लगभग 40 लीटर गंगाजल लेकर अपनी यात्रा आरंभ की थी। यात्रा के दौरान गंगाजल को इसी विशेष रूप से डिजाइन की गई कांवड़ के भीतर सुरक्षित रखा गया। श्रद्धालुओं का उद्देश्य दिल्ली पहुंचकर अपने गांव के शिव मंदिर में भगवान शिव का विधि-विधान से जलाभिषेक करना है।

    श्रद्धालुओं के अनुसार, हर वर्ष कांवड़ यात्रा में नई-नई थीम और रचनात्मक डिज़ाइन देखने को मिलते हैं। इसी सोच के साथ इस बार उन्होंने पारंपरिक कांवड़ को आधुनिक स्वरूप देने का निर्णय लिया। सामूहिक चर्चा के बाद स्पोर्ट्स कार की थीम पर कांवड़ तैयार करने का विचार सामने आया और फिर भगवान शिव की प्रतिमा को उसके केंद्र में स्थापित कर इसे अंतिम रूप दिया गया। उनका कहना है कि उद्देश्य केवल अपनी आस्था को एक अलग और आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना था।

    जानकारी के अनुसार जिस स्पोर्ट्स कार से प्रेरणा लेकर यह मॉडल बनाया गया है, उसकी वास्तविक कीमत करोड़ों रुपये बताई जाती है। हालांकि यात्रा में शामिल वाहन पूरी तरह डमी मॉडल है और इसे केवल धार्मिक यात्रा के लिए तैयार किया गया है। श्रद्धालुओं ने बताया कि इस विशेष प्रतिरूप को बनाने और सजाने में लगभग सात से आठ लाख रुपये का खर्च आया। आकर्षक रंग-सज्जा, आधुनिक डिज़ाइन और भगवान शिव की प्रतिमा के संयोजन ने इसे पूरी यात्रा का प्रमुख आकर्षण बना दिया।

    मुजफ्फरनगर से गुजरते समय इस अनोखी कांवड़ को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कई राहगीरों ने पहली नजर में इसे असली स्पोर्ट्स कार समझ लिया। जब उन्हें इसके डमी मॉडल होने की जानकारी मिली तो उत्सुकता और बढ़ गई। बड़ी संख्या में लोगों ने इस अनूठी प्रस्तुति के साथ तस्वीरें और वीडियो बनाए। श्रद्धालुओं ने भी लोगों का अभिवादन करते हुए अपनी यात्रा जारी रखी।

    कांवड़ यात्रा के दौरान हर वर्ष श्रद्धालु अपनी आस्था को अलग-अलग कलात्मक और रचनात्मक स्वरूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। कहीं धार्मिक झांकियां तैयार की जाती हैं तो कहीं विशेष थीम पर आधारित कांवड़ बनाई जाती हैं। इस वर्ष मैकलारेन जैसी स्पोर्ट्स कार के रूप में तैयार की गई यह कांवड़ भी उसी रचनात्मक परंपरा का नया उदाहरण बनकर सामने आई है, जिसने धार्मिक आस्था के साथ आधुनिक डिज़ाइन का अनोखा मेल प्रस्तुत किया।

    हरिद्वार से गंगाजल लेकर विभिन्न राज्यों और शहरों की ओर बढ़ रहे लाखों शिवभक्तों के बीच यह विशेष कांवड़ चर्चा का विषय बनी हुई है। श्रद्धालुओं का कहना है कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति है, जबकि यह अनूठी प्रस्तुति उसी भावना को अलग अंदाज में व्यक्त करने का माध्यम है। निर्धारित स्थान पर पहुंचकर वे भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे और सावन माह की धार्मिक परंपरा का विधिवत पालन करेंगे।

  • सावन में दिखी सांप्रदायिक सौहार्द की तस्वीर, मुस्लिम युवक ने 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ चढ़ाने का लिया संकल्प

    सावन में दिखी सांप्रदायिक सौहार्द की तस्वीर, मुस्लिम युवक ने 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ चढ़ाने का लिया संकल्प


    नई दिल्ली। श्रावण मास में देशभर में भगवान शिव की भक्ति का उत्साह चरम पर है। कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु हरिद्वार और अन्य तीर्थस्थलों से गंगाजल लाकर शिवालयों में जलाभिषेक कर रहे हैं। इसी बीच उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जिसने आस्था, मानवता और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश एक साथ दिया है। मेरठ के फलावदा कस्बे के रहने वाले 22 वर्षीय मुस्लिम युवक शाकिर ने हरिद्वार से 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ उठाकर भगवान शिव के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा का परिचय दिया है।

    फलावदा के मोहल्ला होली चौक, मंदवाड़ी रोड निवासी शाकिर एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से हैं। उनके पिता मंजूर मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं और स्वयं शाकिर भी मेहनत-मजदूरी कर अपने घर की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उनकी भगवान भोलेनाथ के प्रति आस्था लगातार मजबूत होती गई। बताया जाता है कि पिछले तीन वर्षों से वह नियमित रूप से भगवान शिव की आराधना कर रहे हैं और हर वर्ष कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं।

    पिछले वर्ष शाकिर हरिद्वार से 101 लीटर गंगाजल लेकर आए थे और क्षेत्र के शिवालयों में जलाभिषेक किया था। इस बार उन्होंने अपनी श्रद्धा को और आगे बढ़ाते हुए 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ उठाई। उनकी यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि समाज में भाईचारे और पारस्परिक सम्मान का संदेश भी बन गई है।

    श्रावण मास में भगवान शिव को करुणा, समरसता और लोककल्याण का देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महादेव के दरबार में किसी भी प्रकार का जाति, धर्म या वर्ग का भेद नहीं होता। शाकिर की कांवड़ यात्रा इसी भावना को साकार करती नजर आती है। उनकी इस पहल की स्थानीय लोगों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोग इसे गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत की खूबसूरत मिसाल बता रहे हैं।

    हरिद्वार से लौटते समय रुड़की सहित कई पड़ावों पर कांवड़ सेवा शिविरों में शाकिर का गर्मजोशी से स्वागत किया गया। शिवभक्तों ने तालियों के साथ उनका उत्साह बढ़ाया और उनकी आस्था को सम्मान दिया। रास्ते भर उन्हें शुभकामनाएं मिलती रहीं, जिससे उनकी यात्रा और भी यादगार बन गई।

    इसी दौरान मेरठ से ही एक और भावुक तस्वीर सामने आई। मवाना तहसील के बहादुरपुर गांव निवासी अमरपाल अपनी 81 वर्षीय मां ओमवती को कांवड़ में बैठाकर यात्रा करा रहे हैं। कांवड़ के एक ओर गंगाजल और दूसरी ओर अपनी मां को बैठाकर वह सेवा और श्रद्धा का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं। परिवार का कहना है कि बुजुर्ग मां की वर्षों पुरानी कांवड़ यात्रा की इच्छा को पूरा करने के लिए यह निर्णय लिया गया।

    श्रावण मास में सामने आई ये दोनों घटनाएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज को प्रेम, सेवा, सम्मान और सामाजिक सौहार्द का मजबूत संदेश भी देती हैं। शाकिर की शिवभक्ति और अमरपाल की मातृसेवा यह साबित करती है कि सच्ची आस्था इंसान को जोड़ने का काम करती है। ऐसे प्रेरक उदाहरण समाज में विश्वास, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को और मजबूत करने का काम करते हैं।

  • ममता और भक्ति का अद्भुत संगम 90 वर्षीय सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पदयात्रा कर रहीं काजल चौधरी

    ममता और भक्ति का अद्भुत संगम 90 वर्षीय सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पदयात्रा कर रहीं काजल चौधरी


    नई दिल्ली । सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और कांवड़ यात्रा के लिए विशेष माना जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं और भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। इस बार भी श्रद्धालुओं का सैलाब सड़कों पर दिखाई दे रहा है लेकिन इन्हीं हजारों कांवड़ियों के बीच एक ऐसी कांवड़ लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गई है जिसने सेवा समर्पण और पारिवारिक संस्कार की नई मिसाल पेश कर दी है। दिल्ली के शाहदरा की रहने वाली काजल चौधरी अपनी 90 वर्षीय सास चंद्रिदेवी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक पैदल यात्रा कर रही हैं। यह दृश्य जिसने भी देखा उसकी आंखें नम हो गईं और हर किसी ने उनकी सराहना की।

    काजल चौधरी पेशे से लोक गायिका हैं और अपने भजन तथा देहाती रागनी के कारण सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रिय हैं। उन्होंने इस वर्ष अपनी सास को कंधों पर बैठाकर कांवड़ यात्रा शुरू की है। खास बात यह है कि उनके साथ 71 किलो गंगाजल भी है जिसे वह भगवान शिव को अर्पित करेंगी। पूरी यात्रा के दौरान उनका परिवार भी उनके साथ चल रहा है और सभी मिलकर सेवा और श्रद्धा का संदेश दे रहे हैं।

    यह पहली बार नहीं है जब काजल चौधरी ने ऐसा किया हो। पिछले वर्ष भी उन्होंने अपनी सास को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से दिल्ली तक की यात्रा पूरी की थी। इसके अलावा इसी वर्ष उन्होंने अपनी सास के साथ 84 कोस की परिक्रमा भी की थी। लगातार दूसरी बार इस तरह की यात्रा कर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बुजुर्गों की सेवा केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि सबसे बड़ा धर्म भी है।

    काजल चौधरी का कहना है कि माता पिता और सास ससुर की सेवा से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता। उनका मानना है कि जब तक बुजुर्ग हमारे साथ हैं तब तक उनकी हर इच्छा का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने लोगों से भी अपील की कि अपने माता पिता और बुजुर्गों की सेवा पूरे मन से करें ताकि उनका आशीर्वाद जीवनभर साथ बना रहे।

    इस यात्रा के दौरान काजल चौधरी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी भावुक अपील की है। उन्होंने बताया कि उनकी सास की इच्छा मुख्यमंत्री से मिलने की है और वे उन्हें अपने हाथों से एक भेंट देना चाहती हैं। काजल ने उम्मीद जताई कि उनकी सास की यह इच्छा भी जल्द पूरी होगी।

    मुजफ्फरनगर से गुजर रही यह अनोखी कांवड़ अब लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है। रास्ते में जहां भी यह कांवड़ पहुंचती है लोग रुककर काजल और उनकी सास का अभिवादन करते हैं। कई श्रद्धालु उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं तो कई लोग उन्हें आधुनिक समय का श्रवण कुमार कहकर सम्मान दे रहे हैं। हालांकि काजल कहती हैं कि उन्होंने केवल अपना पारिवारिक कर्तव्य निभाया है और हर बेटे बहू को अपने बुजुर्गों के प्रति यही भावना रखनी चाहिए।

    आज जब भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवारों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं तब काजल चौधरी की यह यात्रा समाज को यह संदेश देती है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा करने से नहीं बल्कि अपने बुजुर्गों की सेवा और सम्मान करने से भी पूरी होती है। यही संस्कार भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान हैं और यही भाव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकते हैं।