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  • काशी में गरजे सीएम योगी: सनातन को मिटाने वाले खुद मिट गए, ॐ जाप और सोमनाथ महोत्सव में गूंजे नारे

    काशी में गरजे सीएम योगी: सनातन को मिटाने वाले खुद मिट गए, ॐ जाप और सोमनाथ महोत्सव में गूंजे नारे



    नई दिल्ली। काशी विश्वनाथ धाम में एक भव्य कार्यक्रम के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सनातन संस्कृति और भारत की आध्यात्मिक विरासत को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि जिन्होंने सनातन को मिटाने का प्रयास किया, वे इतिहास में खुद मिट गए हैं। योगी ने मुहम्मद गौरी और औरंगजेब जैसे आक्रांताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे आक्रमणकारियों ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन वे भारत की आत्मा को कभी नहीं तोड़ सके। उन्होंने कहा कि भारत की चेतना अजर-अमर है और सनातन परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी सदियों पहले थी।

    सीएम योगी ने कहा कि काशी विश्वनाथ धाम और सोमनाथ मंदिर भारत के गौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक हैं। उन्होंने बताया कि काशी में आज भव्य और दिव्य धाम का स्वरूप दिखाई दे रहा है, जो भारत की आस्था और संस्कृति का प्रतीक है। इसी तरह सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भारत की आध्यात्मिक शक्ति का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि दोनों मंदिर हमें यह संदेश देते हैं कि भले ही आक्रमण हों, लेकिन सनातन संस्कृति को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

    इस अवसर पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में विधिवत दर्शन-पूजन किया और परिसर में ‘ॐ’ का जाप भी किया। कार्यक्रम के दौरान सोमनाथ मंदिर के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित सोमनाथ अमृत महोत्सव का लाइव प्रसारण भी देखा गया। यह वही ऐतिहासिक मंदिर है जिसका 1951 में स्वतंत्र भारत में पुनः प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी।

    कार्यक्रम में धार्मिक माहौल देखने को मिला। छात्र-छात्राओं ने शंखनाद और डमरू वादन किया, जिससे पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। वहीं गुजरात से आई महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में ‘वोट फॉर भाईसाहब’ के नारे लगाए, जिससे माहौल राजनीतिक रंग भी लेता नजर आया।

    सीएम ने अपने संबोधन में कहा कि आज भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को फिर से वैश्विक पहचान दिला रहा है। उन्होंने कहा कि पहले भारत अपनी परंपराओं पर उतना गर्व नहीं कर पाया, लेकिन अब देश अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है और अपनी पहचान को मजबूती से स्थापित कर रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि सोमनाथ मंदिर पर इतिहास में कई बार आक्रमण हुए और उसे नष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार वह फिर से अपने गौरव के साथ खड़ा हुआ। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है कि यहां विनाश अस्थायी है और सृजन हमेशा स्थायी रहता है।

    कार्यक्रम के अंत में सीएम ने कहा कि भारत के देवस्थल केवल पत्थर की इमारतें नहीं हैं, बल्कि वे हमारी आस्था, संस्कृति और चेतना के प्रतीक हैं। इन्हें कोई शक्ति मिटा नहीं सकती और यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है।

    इस पूरे आयोजन ने काशी में धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल को और भी भव्य बना दिया, जहां आस्था, इतिहास और आधुनिक भारत की सोच एक साथ दिखाई दी।

  • काशी की पावन धरा पर सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य का हुआ भव्य समापन

    काशी की पावन धरा पर सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य का हुआ भव्य समापन


    भोपाल।
    धर्म, संस्कृति और ज्ञान की अविनाशी नगरी काशी के बीएलडब्ल्यू मैदान में पिछले तीन दिनों से चल रहे सांस्कृतिक महाकुंभ (सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य) का रविवार की शाम गौरवमयी समापन हुआ। महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य के मंचन के अंतिम दिन बाबा विश्वनाथ के हजारों भक्तों, कला रसिकों, कला प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने भरपूर आनंद लिया।

    मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार के विशेष सहयोग से आयोजित महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ के अंतिम दिन वाराणसी की जनता का उत्साह अपने चरम पर रहा। समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए।


    विक्रमादित्य नायक जन-जन के हृदय में लोकमान्य

    उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश कुमार ने कहा कि भारत की माटी में भगवान श्रीराम और युगावतार श्रीकृष्ण के बाद यदि कोई नायक जन-जन के हृदय में लोकमान्य हुआ है, तो वे उज्जैन के अधिपति सम्राट विक्रमादित्य ही थे। उन्होंने कहा कि “इतिहास के पन्नों में सम्राट विक्रमादित्य ने दुर्दांत विदेशी आक्रांताओं को भारत की सीमाओं से खदेड़कर निर्णायक विजय प्राप्त की थी, जिसके उपलक्ष्य में गौरवशाली ‘विक्रम सम्वत्’ का प्रवर्तन हुआ।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें मिलकर अपनी गौरवशाली विरासत को विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित उज्जैन की ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ इसी सांस्कृतिक सेतु का जीवंत प्रमाण है।


    महानाट्य का सजीव मंचन: आँखों के सामने जीवंत हुआ इतिहास

    समापन की संध्या पर ‘विशाला’ संस्था उज्जैन के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। भव्य त्रि-आयामी मंच पर जब सैकड़ों कलाकारों ने एक साथ सम्राट के पराक्रम और उनके सुशासन को जीवंत किया, तो पूरा मैदान ‘जय श्री महाकाल’ के जयघोष से गूँज उठा।

    नाटक के निर्देशक संजीव मालवीय के कुशल निर्देशन में सम्राट की न्यायप्रियता, ‘सिंहासन बत्तीसी’ के प्रसंग और विदेशी शत्रुओं के दमन के दृश्यों को जिस भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पार्श्व संगीत, युद्ध के सजीव दृश्य और प्रभावशाली संवादों ने यह सिद्ध कर दिया कि हमारी गौरवशाली संस्कृति आज भी जन-मानस के हृदय में धड़कती है।


    अभूतपूर्व प्रदर्शनी: सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या का अटूट संबंध

    मंचन के साथ-साथ आयोजन स्थल पर मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर केंद्रित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस प्रदर्शनी ने वाराणसी के विद्वानों और आमजन को एक चौंकाने वाले ऐतिहासिक तथ्य से परिचित कराया कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर का प्राचीन निर्माण सम्राट विक्रमादित्य द्वारा ही संपन्न कराया गया था। प्रदर्शनी में भारतीय ऋषि और विज्ञान, शिव पुराण और मध्य प्रदेश के पवित्र स्थलों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रदर्शनी देखने आए विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने इसे ‘ज्ञान का खजाना’ बताया। कक्षा दसवीं की छात्रा रोहिणी यादव ने साझा किया कि उसे पहली बार अपनी समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा और विक्रमादित्य के अयोध्या दर्शन के बारे में इतनी गहराई से पता चला।


    ‘माँ गंगा से नर्मदा तक’: पर्यटन और संस्कृति का ऐतिहासिक एमओयू

    इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच हुआ एमओयू रहा, जिसकी थीम माँ गंगा से नर्मदा तक” रखी गई। इसके माध्यम से काशी विश्वनाथ (वाराणसी) और महाकालेश्वर (उज्जैन) के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के स्टॉल्स पर काशीवासियों को ‘लघु मध्य प्रदेश’ का अनुभव हुआ। व्हीआर बॉक्स के माध्यम से लोगों ने काशी में बैठे-बैठे ही ओरछा, सांची और खजुराहो की गलियों की यात्रा की। वहीं ‘माँ की रसोई’ में परोसे गए मालवा की प्रसिद्ध थाली, इंदौरी पोहा-जलेबी और कुल्हड़ चाय का स्वाद चखने के लिए लोगों का तांता लगा रहा।


    लोक कलाओं का मनोहारी संगम

    महानाट्य के मुख्य मंचन से पूर्व मध्य प्रदेश के लोक कलाकारों ने अपनी अद्भुत कला से काशी को सराबोर कर दिया। मालवा का मटकी नृत्य, निमाड़ का गणगौर, डिंडोरी का गुदम्बबाजा और उज्जैन के डमरू दल की गूँज ने दोनों राज्यों के साझा सांस्कृतिक डीएनए को प्रदर्शित किया।

    कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का सम्मान विक्रम पंचांग और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। इस अवसर पर पंडित नरेश शर्मा, डॉ. राजेश कुशवाहा और राजा भोज शोध प्रभाग के निदेशक संजय यादव ने इस आयोजन को भारतीय गौरव को विश्व पटल पर लाने का एक ‘सांस्कृतिक अनुष्ठान’ बताया। जय महाकाल और जय बाबा विश्वनाथ के नारों के साथ इस ऐतिहासिक त्रिवार्षिक उत्सव का समापन हुआ, जिसने काशी और उज्जैन के बीच के सदियों पुराने आध्यात्मिक संबंधों को और भी प्रगाढ़ कर दिया।

  • होली खेलने से पहले करें त्वचा की सही तैयारी वरना रंग छोड़ सकते हैं जिद्दी दाग

    होली खेलने से पहले करें त्वचा की सही तैयारी वरना रंग छोड़ सकते हैं जिद्दी दाग


    नई दिल्ली/वाराणसी। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी के अवसर पर शिवनगरी काशी भक्ति और रंगों के अनोखे संगम में डूब जाती है। होली से ठीक चार दिन पहले पड़ने वाला यह पर्व काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को विशेष स्वरूप देता है। मान्यता है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती को उनके मायके से काशी लेकर आते हैं और इसी उपलक्ष्य में पूरा शहर उत्सव में सराबोर हो उठता है।

    पौराणिक परंपरा के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव माता गौरा के साथ गौना बारात लेकर काशी पहुंचते हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के कारण काशीवासी इस दिन बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती का भव्य स्वागत करते हैं। शहर की गलियों से लेकर प्रमुख मंदिरों तक नमः पार्वती पतये हर हर महादेव के जयकारों की गूंज सुनाई देती है। जहां अन्य स्थानों पर होली की केवल तैयारियां होती हैं वहीं काशी में इस दिन से विधिवत रंगोत्सव की शुरुआत मानी जाती है। भक्त बाबा और माता से अनुमति लेकर गुलाल अबीर और फूलों की वर्षा के साथ होली खेलना आरंभ करते हैं।

    श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में इस अवसर पर विशेष आयोजन होता है। बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती का भव्य डोला निकाला जाता है जो संकरी गलियों से गुजरते हुए श्रद्धालुओं को दर्शन देता है। पूरा क्षेत्र रंगों और फूलों से भर जाता है। मंदिर प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्र के अनुसार मंदिर परिसर में बेरिकेडिंग की जाएगी और स्पर्श दर्शन की व्यवस्था नहीं रहेगी ताकि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    इस वर्ष एक विशेष आकर्षण मथुरा ब्रज की रास परंपरा का समावेश भी है। ब्रज के रसिया और रंग खेलने वाले कलाकार काशी पहुंचेंगे और यहां रास रचाएंगे जिससे उत्सव का उल्लास और भी बढ़ जाएगा। यह सांस्कृतिक संगम काशी की आध्यात्मिक गरिमा को नए रंगों से सजा देगा।

    स्थानीय निवासी प्रभुनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि काशीवासी देवी देवताओं के साथ मिलकर बाबा और माता के आगमन की खुशी मनाते हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है। इस दिन भक्त रंग अर्पित कर होली खेलने की अनुमति मांगते हैं और मान्यता है कि भगवान शिव माता पार्वती को उनके ससुराल का भ्रमण भी कराते हैं।

    धार्मिक दृष्टि से रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन शिव पार्वती की पूजा करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलने और दांपत्य जीवन में सुख समृद्धि आने की मान्यता है। काशी के छोटे बड़े सभी मंदिरों को सजाया जाता है दीप जलाए जाते हैं और पूरा वातावरण भक्ति और उल्लास से भर उठता है। रंगभरी एकादशी काशी की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है जहां आस्था रंगों से मिलकर अनोखा उत्सव रचती है।

  • रंगभरी एकादशी 2026 : 27 या 28 फरवरी? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण समय

    रंगभरी एकादशी 2026 : 27 या 28 फरवरी? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण समय


    नई दिल्ली । 2026 में रंगभरी एकादशी जिसे अमलकी एकादशी भी कहा जाता है का व्रत फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाया जाएगा। यह पवित्र व्रत होली के उत्सव से कुछ दिनों पहले आता है और विशेष रूप से भगवान विष्णु साथ ही भगवान शिव पार्वती के पूजन के लिए प्रसिद्ध है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ काशी वाराणसी आए थे जहां नगरवासियों ने उनका रंगों और गुलाल से स्वागत किया था। तब से इस दिवस को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है और काशी में होली उत्सव की शुभ शुरुआत भी इसी दिन मानी जाती है।

    रंगभरी एकादशी 2026 की तिथि  वेदिक पंचांग के अनुसार:

    फाल्गुन शुक्ल एकादशी तिथि 27 फरवरी 2026 की रात 12:33 बजे से प्रारंभ होकर 10:32 बजे तक रहेगी।  उदय तिथि के नियम के अनुसार सुबह के समय पर यह तिथि मौजूद रहने के कारण 27 फरवरी शुक्रवार को ही रंगभरी एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

    रंगभरी एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त

    पूजा और उपवास के दौरान शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:09 बजे से सुबह 05:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक  विजय मुहूर्त: दोपहर 02:29 बजे से 03:15 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग: लगभग सुबह 10:48 बजे से रात तक शुभ रहता है

    व्रत पारण कब करें?

    रंगभरी एकादशी का व्रत पारण 28 फरवरी 2026 को सुबह 06:47 बजे से 09:06 बजे के बीच किया जा सकता है जो पारण के लिए विशेष शुभ समय माना जाता है।  इस दिन व्रत में निर्जला उपवास या फलाहारी व्रत रखा जा सकता है जैसा श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार करते हैं।

    पूजा का महत्व और विधि

    रंगभरी एकादशी के दिन श्रद्धालु स्नान के बाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होकर पूजा करते हैं। मुख्य पूजन में आमलकी आंवला का फल दान निवेद्य के रूप में चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ तुलसी दीप धूप और नारियल का भी प्रयोग किया जाता है।  धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में शांति सौहार्द सुख समृद्धि और भक्ति भाव की प्राप्ति होती है। साथ ही इस व्रत से भगवान विष्णु के आशीर्वाद से मानसिक उन्नति भी होती है।

    धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ

    वाराणसी में रंगभरी एकादशी को होली का शुभ शुभारंभ माना जाता है। मंदिरों एवं घाटों पर भक्त रंग गुलाल के साथ पूजा करते हैं और काशी में होली खेल के प्रचलन की शुरुआत इसी दिन से होती है।

  • काशी के मणिकर्णिका घाट पर सुंदरीकरण के नाम पर बुलडोजर, इंदौर राज परिवार ने दोहराया संकल्प

    काशी के मणिकर्णिका घाट पर सुंदरीकरण के नाम पर बुलडोजर, इंदौर राज परिवार ने दोहराया संकल्प

    काशी। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर सुंदरीकरण के नाम पर बुलडोजर चलाने, अहिल्याबाई समेत कई ऐतिहासिक मूर्तियों को तोड़कर खंडित करने और गंगा में डाल देने का मामला देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। इंदौर से खासगी देवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट के अध्यक्ष और राजपरिवार के प्रतिनिधि यशवंत होल्कर भी दो दिन पहले काशी पहुंचे। अपनी नाराजगी जताई। वापस जाने से पहले उन्होंने मणिकर्णिका घाट की पवित्र माटी माथे लगाई। घाट पर तोड़ी गई मढ़ी के निकट उन्होंने पुन: क्षमायाचना की और काशी में महारानी की विरासत संरक्षित और सुरक्षित रखने का संकल्प भी दोहराया।

    जिला प्रशासन के आला अधिकारियों द्वारा आश्वस्त किए जाने के बाद वह यहां से रवानगी के लिए तैयार हुए। उन्हें विश्वास दिलाया गया है कि खंडित मूर्तियों के अवशेष जल्द खोज लिए जाएंगे। उनके मणिकर्णिका घाट पहुंचने से पहले ही काफी संख्या में पीएसी के जवानों को तैनात कर दिया गया था। इस बात पर कड़ी नजर रखी गई कि कोई दूर से भी मोबाइल से फोटो या वीडियो न बना सके।

    मणिकर्णिका घाट की मौजूदा स्थिति देखने के बाद वह निकट स्थित ताड़केश्वर मंदिर भी गए। प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि रानी मां की चारों मूर्तियां यही रखी जाएंगी। जो दो साबूत मूर्तियां हैं उन्हें यथाशीघ्र इस मंदिर में भेजवाया जाए। अधिकारियों ने जल्द से जल्द मूर्तियां ताड़केश्वर मंदिर भेजने पर सहमति जता दी है। वहीं ट्रस्ट के स्थानीय प्रबंधक रमेश उपाध्याय ने बताया कि गुरुवार को अवकाश का दिन होने से मूर्तियां नहीं लाई जा सकी हैं। उम्मीद है कि 16 जनवरी को शाम तक मूर्तियां गुरुधाम मंदिर से मणिकर्णिका स्थित ताड़केश्वर मंदिर पहुंचा दी जाएं।

    उपाध्याय ने बताया कि हम लोग अपने स्तर से भी मूर्तियों के अवशेष खोजने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। वहां से उठाया गया मलबा कहां फेंका गया है, इसकी जानकारी भी नहीं दी जा रही है। यदि यही बता दिए जाए कि मलबा कहां फेंका गया है तो मूर्तियों के अवशेष खोजने की राह आसान हो सकती है।
    सिविल में मुकदमा दर्ज फिर भी सूचना नहीं दी

    ट्रस्ट के स्थानीय प्रबंधक रमेश उपाध्याय ने बताया कि मणिकर्णिका घाट से सटा हिस्सा जो जनाना घाट के नाम से जाना जाता है, यहां लगी मूर्तियों को संरक्षित करने को लेकर ट्रस्ट की ओर से सिविल कोर्ट में मुकदमा दर्ज किया गया है। उसमें नगर निगम को पार्टी बनाया गया है। मुकदमे से संबंधित नोटिस तक दिया जा चुका है। वह मुकदमा ही इस बात के लिए किया गया है कि जनाना घाट की मूर्तियों को न तोड़ा जाए। घाट पर बने धार्मिक प्रतीक सुरक्षित रहें। बावजूद इसके ट्रस्ट को बिना सूचित किए तोड़फोड़ की गई। हमारी अब भी इतनी ही मांग है कि मूर्तियां हमें लौटाई जाएं। घाट पर कोई भी निर्माण ट्रस्ट की सहमति के बिना न कराया जाए। मणिकर्णिका घाट ट्रस्ट के अधीन आने वाली धर्मार्थ संपत्ति है।
    प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री से अनुरोध

    इससे पहले मणिकर्णिका घाट पर रानी अहिल्याबाई की मूर्तियां तोड़े जाने की जांच तथा उन्हें खासगी देवी अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट ने अपनी सुपुर्दगी में देने का अनुरोध प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से किया है। ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंत होल्कर ने मंडलायुक्त की मौजूदगी में नगर आयुक्त को दोनों पत्र गुरुधाम मंदिर में सौंपे।

    यशवंत होल्कर महारानी की तोड़ी गई मूर्तियों के समक्ष क्षमायाचना और शुद्धि पूजन के लिए गुरुधाम मंदिर पहुंचे थे। दो खंडित और दो साबुत मूर्तियां यहीं रखी हैं। उन्होंने कहा कि काशी में रानी अहिल्याबाई की मूर्ति का अपमान अक्षम्य है। काशी में उनकी स्मृतियों के साथ ऐसे आचरण की कल्पना भी इंदौर राजपरिवार को नहीं थी। ट्रस्ट और इंदौर राजपरिवार इसकी कटु शब्दों में भर्त्सना करता है। मणिकर्णिका घाट की मढ़ी के चार किनारों पर बनीं रानी मां की चार मूर्तियां तोड़ी गईं। इनमें से दो खंडित नहीं हैं लेकिन अन्य दो का निचला हिस्सा ही मिला है। उनका शेष हिस्सा सात दिन में हमें उपलब्ध कराया जाए।

    उन्होंने कहा कि हम पुरातात्विक पद्धति से उसका पुनर्निर्माण कराने में सक्षम हैं। जब तक मणिकर्णिका घाट का नवनिर्माण पूरा नहीं हो जाता तब तक मूर्तियों को छोटे विश्वनाथ मंदिर (अहिल्याबाई घाट) के गर्भगृह में रखेंगे और पूजा के लिए पुजारी नियुक्त करेंगे। देशभर की तमाम संपत्तियों की भांति ही मणिकर्णिका घाट के संरक्षण-संवर्द्धन का दायित्व ट्रस्ट का ही है और यह अधिकार सुप्रीम कोर्ट से मिला है।
    लगा मर्डर मिस्ट्री सुलझा रहे अधिकारी

    मणिकर्णिका घाट पर तोड़ी गईं रानी अहिल्याबाई होल्कर की मूर्तियों का गुरुधाम मंदिर में दोपहर नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ऐसे अवलोकन कर रहे थे मानो वह कोई मर्डर मिस्ट्री सुलझाने में लगे हों। खंडित और साबूत मूर्तियों को नीचे से ऊपर तक निहारते हुए फोन पर किसी को यथास्थिति से अवगत कराते जा रहे थे।

    यह काम करते हुए उन्हें अहसास हुआ कि मातहतों और सुरक्षाकर्मियों के अतिरिक्त कुछ अन्य लोग भी परिसर में हैं तो उन्होंने सभी को अनुरोध पूर्वक परिसर से बाहर कर दिया। गेट पर तैनात सिपाही को आदेश दिया कि कोई भी आए गेट नहीं खुलना चाहिए। इसके बाद फिर मूर्तियों की गहन जांच पड़ताल में जुट गए। कुछ सफाई कर्मचारियों से वह साबूत और खंडित मूर्तियां कपड़े में लपेटकर अंदर रखने की तैयारी कर रहे थे।

    इसी बीच होल्कर ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंत होल्कर पहुंच गए। उनके लिए भी द्वार नहीं खोला गया। करीब दस मिनट बाद मंडलायुक्त एस.राजलिंगम को आता देख सिपाही ने दरवाजा खोला। तब ट्रस्ट के अध्यक्ष और कुछ कर्मचारी परिसर में दाखिल हुए। पूजन सामग्री लेकर पहुंचे कर्मचारियों, पूजा कराने पहुंचे ट्रस्ट के पुजारियों को भी बाहर ही रोक दिया गया।