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  • सुरों से बदलेगी कश्मीर की कहानी एआर रहमान बोले फिल्मों में संघर्ष नहीं अब दिखेगी घाटी की खूबसूरती और कश्मीरियत

    सुरों से बदलेगी कश्मीर की कहानी एआर रहमान बोले फिल्मों में संघर्ष नहीं अब दिखेगी घाटी की खूबसूरती और कश्मीरियत


    नई दिल्ली। ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने कश्मीर को लेकर सिनेमा की पारंपरिक सोच बदलने की जरूरत बताई हैनई दिल्ली। शनिवार को श्रीनगर पहुंचे रहमान ने कहा कि कश्मीर को अब केवल संघर्ष और हिंसा की कहानियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता शांत वातावरण समृद्ध संस्कृति और सद्भाव के लिए भी जानी जाती है और फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने कश्मीर की इसी सकारात्मक तस्वीर को मजबूती से पेश किया जा सकता है।

    विज्ञापन की शूटिंग के सिलसिले में श्रीनगर पहुंचे एआर रहमान ने बातचीत के दौरान कहा कि कश्मीर बेहद खूबसूरत शांत और प्रेरणादायक जगह है। उनके मुताबिक सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि यह लोगों की सोच और किसी स्थान को देखने का नजरिया बदलने की क्षमता भी रखता है। ऐसे में फिल्मकारों की जिम्मेदारी है कि वे कश्मीर की पुरानी हिंसक छवि को बार बार दोहराने के बजाय घाटी की खूबसूरती शांति और सांस्कृतिक विरासत को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाएं।

    रहमान की इस अपील को कश्मीर में पर्यटन और फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने की कोशिशों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लंबे समय तक फिल्मों में कश्मीर को संघर्ष आतंक और तनाव की पृष्ठभूमि के रूप में दिखाया जाता रहा है। हालांकि अब घाटी की प्राकृतिक सुंदरता स्थानीय संस्कृति लोक परंपराओं और सामान्य जनजीवन को केंद्र में रखकर नई कहानियां सामने लाने की संभावना बढ़ रही है। रहमान का मानना है कि अगर सिनेमा कश्मीर के इस बदले हुए पहलू को दुनिया तक पहुंचाता है तो इससे घाटी को लेकर लोगों की धारणा में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

    एआर रहमान ने कश्मीर में आयोजित हो रहे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की भी सराहना की। उन्होंने इसे एक अच्छी शुरुआत बताते हुए उम्मीद जताई कि आने वाले समय में यह महोत्सव दुनिया के प्रमुख फिल्म आयोजनों में अपनी अलग पहचान बना सकता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह दुनिया भर के लोग बड़े फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए अलग अलग शहरों का रुख करते हैं उसी तरह कश्मीर भी सिनेमा प्रेमियों और फिल्मकारों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बन सकता है।

    उनका कहना था कि कश्मीर की मेहमाननवाजी संस्कृति और खूबसूरत वादियां देश और दुनिया के लोगों को अपनी ओर खींच सकती हैं। फिल्म फेस्टिवल के जरिए स्थानीय कलाकारों फिल्मकारों और रचनात्मक प्रतिभाओं को भी बड़ा मंच मिल सकता है। इससे कश्मीर में फिल्म निर्माण की गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी फायदा पहुंचने की उम्मीद है।

    रहमान की बातों में कश्मीर की एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें बंदूक और बारूद की जगह संगीत कला सिनेमा और शांति को प्रमुखता मिले। उनका संदेश साफ है कि घाटी की पहचान केवल उसके अतीत के संघर्षों से नहीं बल्कि उसकी खूबसूरती संस्कृति और कश्मीरियत से भी होनी चाहिए। सिनेमा इस बदलाव की कहानी दुनिया तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है।

  • ऑपरेशन सिंदूर के 1 साल: जख्म अभी बाकी, लेकिन सीमा पर लौट रही जिंदगी; डर के बीच उम्मीद की नई शुरुआत

    ऑपरेशन सिंदूर के 1 साल: जख्म अभी बाकी, लेकिन सीमा पर लौट रही जिंदगी; डर के बीच उम्मीद की नई शुरुआत


    नई दिल्ली। एक साल पहले शुरू हुआ ऑपरेशन सिंदूर आज भी देश के साहस, जवाबी कार्रवाई और मजबूत इरादों की याद दिलाता है। इस ऑपरेशन ने जहां दुश्मन को कड़ा संदेश दिया, वहीं सीमा पर बसे लोगों के जीवन को गहरे जख्म भी दिए। अब एक साल बाद तस्वीर बदलती जरूर दिख रही है घाव अभी भरे नहीं हैं, लेकिन उम्मीद की नई सुबह जरूर दिखाई दे रही है।

    एलओसी से सटे उड़ी सेक्टर के गांवों में जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। चुरुंडा, सिलिकोट, सलामाबाद, गिंगल और लगामा जैसे गांव, जो कभी गोलाबारी से थम गए थे, आज फिर खेतों की हरियाली और बच्चों की स्कूल वापसी से जिंदा नजर आने लगे हैं। छोटे कारोबार फिर शुरू हो चुके हैं, लेकिन हर चेहरे पर सतर्कता अब भी साफ झलकती है।

    बीते संघर्ष के निशान अभी मिटे नहीं हैं। कई गांवों में घरों की दीवारों पर गोलियों और मोर्टार के निशान आज भी उस भयावह दौर की कहानी कहते हैं। चुरुंडा और सिलिकोट में दर्जनों घर क्षतिग्रस्त हुए थे, जबकि कई परिवारों ने अपने अपनों को खोया। लोगों की आंखों में आज भी वो खौफ जिंदा है, जब हर पल जान बचाने की जद्दोजहद थी।

    स्थानीय लोग बताते हैं कि हालात अब शांत जरूर हैं, लेकिन यह शांति स्थायी नहीं बल्कि उम्मीद और डर के बीच सांस ले रही है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग आज भी सुरक्षा से जुड़ी है—कई गांवों में अब तक पर्याप्त बंकर नहीं हैं, जबकि सीमावर्ती इलाकों में खतरा कब बढ़ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।

    पुंछ और आसपास के इलाकों में भी हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। गोलाबारी में तबाह हुए सैकड़ों घर अब फिर से खड़े हो गए हैं। सरकार की मदद और लोगों की मेहनत से दीवारें तो दोबारा बन गईं, लेकिन अपनों को खोने का दर्द आज भी उतना ही गहरा है। कई परिवार ऐसे हैं, जो उस दर्दनाक घटना के बाद आज तक अपने घर लौट नहीं पाए।

    सीमावर्ती इलाकों में अब सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि बंकरों की संख्या बढ़ाई जाए, आधुनिक तकनीक से सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाए और आपातकालीन सेवाओं को बेहतर बनाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।

    हालांकि, इस पूरे दौर में भारतीय सेना की भूमिका को लोग सबसे बड़ा सहारा मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सेना की चौकसी ही उनका आत्मविश्वास बनाए रखती है। खेतों में काम करते किसान और आंगन में खेलते बच्चे इस बात के गवाह हैं कि जिंदगी आगे बढ़ रही है—डर के साथ, लेकिन हौसले के दम पर।

    एक साल बाद तस्वीर साफ है ऑपरेशन सिंदूर ने दुश्मन को करारा जवाब दिया और सीमा पर बड़ी घटनाओं पर रोक लगी। पाकिस्तान की ओर से बड़े हमलों में कमी आई है, जिससे लोगों में भरोसा बढ़ा है।

    फिर भी, सीमावर्ती गांवों की असली कहानी यही है जख्म अभी भी ताजा हैं, यादें अब भी दर्द देती हैं, लेकिन इन सबके बीच उम्मीद जिंदा है। लोग कहते हैं “डटे थे, डटे हैं और डटे रहेंगे।” यही जज्बा इन इलाकों को आगे बढ़ा रहा है और यही विश्वास है कि आने वाले समय में यह शांति स्थायी रूप लेगी।

  • कश्मीर में शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के समर्थन में लगे पोस्टर, सुरक्षा एजेंसियां सतर्क, जांच शुरू

    कश्मीर में शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के समर्थन में लगे पोस्टर, सुरक्षा एजेंसियां सतर्क, जांच शुरू

    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में संदिग्ध पोस्टर सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। पुल डोडा क्षेत्र की एक दीवार पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर के समर्थन में पोस्टर चिपकाए जाने का मामला सामने आया है।

    इससे जुड़ी एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत जांच शुरू कर दी। वीडियो में दावा किया गया है कि ‘जम्मू कश्मीर यूथ मूवमेंट’ नाम के एक आजादी समर्थक संगठन ने यह पोस्टर लगाया है। पोस्टर में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने में पाकिस्तान की भूमिका की सराहना की गई है और कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के मुद्दे पर पाकिस्तान के समर्थन के लिए आभार जताया गया है।

    मामले को गंभीर मानते हुए पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है। एक रिपोर्ट के अनुसार, डोडा पुलिस ने BNS की धारा 353(1) के तहत केस (FIR नंबर 95/2026) दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। डोडा के डीएसपी कृष्ण रतन ने बताया कि वीडियो में आपत्तिजनक सामग्री है, जिससे क्षेत्र में तनाव या अफरा-तफरी फैल सकती है। फिलहाल पुलिस यह भी जांच कर रही है कि वायरल वीडियो असली है या फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया गया है।

    अब तक किसी भी संदिग्ध को हिरासत में नहीं लिया गया है, क्योंकि मौके से ऐसा कोई पोस्टर बरामद नहीं हुआ है। पुलिस वीडियो की जियो-टैग लोकेशन की भी जांच कर रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना वास्तव में वहीं हुई या नहीं। अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की गहन जांच जारी है और जल्द ही सच्चाई सामने लाने की कोशिश की जा रही है।