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  • कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, कहा- 15 साल में बसाया घर, फिर बेघर मत होने दो

    कश्मीरी पंडित कर्मचारियों ने अमित शाह को लिखी चिट्ठी, कहा- 15 साल में बसाया घर, फिर बेघर मत होने दो

    नई दिल्ली। कश्मीर घाटी में प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज (PM पैकेज) के तहत काम कर रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ गई है। लगातार मिल रही धमकियों के बीच कर्मचारियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर तत्काल सुरक्षा कदम उठाने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि वे करीब 15 साल से घाटी में अपने जीवन को दोबारा बसाने की कोशिश कर रहे हैं और अब उन्हें फिर से विस्थापन की ओर धकेले जाने का डर सताने लगा है।

    ऑल PM पैकेज एम्प्लॉईज फोरम के अध्यक्ष सनी रैना ने चिट्ठी के माध्यम से कश्मीरी हिंदू कर्मचारियों और उनके परिवारों की चिंताओं को सामने रखा है। उनका कहना है कि भले ही ऊपर से हालात सामान्य दिखाई देते हों, लेकिन जमीन पर डर और तनाव का माहौल बना हुआ है। कई परिवार अपनी सुरक्षा के साथ-साथ बच्चों के भविष्य को लेकर भी चिंतित हैं।

    कर्मचारियों ने कहा है कि हाल के दिनों में सामने आई हर धमकी उन्हें 1990 के दशक की घटनाओं की याद दिलाती है। उस दौर में धमकी भरे पत्र और नोटिस डर का माहौल बनाने के शुरुआती संकेत बने थे। इसके बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी थी। अब दोबारा धमकी भरे पत्र सामने आने से कर्मचारियों के बीच पुराने भय की स्थिति बन रही है।

    पिछले कुछ हफ्तों के दौरान PM पैकेज के तहत घाटी में तैनात कर्मचारियों को लगातार धमकियां मिलने की बात सामने आई है। कई पत्रों में उन्हें सरकारी नौकरी छोड़ने की चेतावनी दी गई है और ऐसा नहीं करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। इन मामलों में यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC) नाम के संगठन का उल्लेख सामने आया है।

    कर्मचारियों की चिंता उस समय और बढ़ गई, जब उनका निजी डेटा ऑनलाइन लीक होने की बात सामने आई। सोशल मीडिया पर कुछ कर्मचारियों के फोन नंबर, घर के पते और वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर तक साझा किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे घाटी में रह रहे कर्मचारियों और उनके परिवारों में सुरक्षा को लेकर डर बढ़ गया है।

    कर्मचारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी किराए के कमरों में रहने को मजबूर हैं। वहीं, जहां ट्रांजिट कॉलोनियां बनाई गई हैं, वहां भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में कर्मचारियों ने आवासीय क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा और उसे मजबूत करने की मांग की है।

    अमित शाह को लिखी चिट्ठी में धमकियों की गंभीरता से जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। कर्मचारियों ने PM पैकेज के तहत काम कर रहे लोगों, उनके परिवारों और आवासीय कॉलोनियों की सुरक्षा बढ़ाने की अपील की है। साथ ही ऐसा प्रभावी सिस्टम बनाने की मांग की गई है, जिसके जरिए किसी कर्मचारी को धमकी मिलने पर वह तुरंत शिकायत दर्ज करा सके और समय पर सुरक्षा सहायता मिल सके।

    कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि वे कश्मीर घाटी छोड़ना नहीं चाहते। उनका कहना है कि पिछले 15 वर्षों में उन्होंने उस जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश की है, जो कई दशक पहले उजड़ गया था। वर्ष 2022 में राहुल भट की हत्या के बाद भी घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। अब नई धमकियों ने एक बार फिर उनकी सुरक्षा की चिंता बढ़ा दी है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें नौकरी और सुरक्षा में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर न किया जाए। वे कश्मीर में रहकर काम करना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए सुरक्षित माहौल चाहते हैं।

  • जम्मू-कश्मीर में धमकियों पर फारूक का बड़ा बयान बोले राज्य का दर्जा रोकने की साजिश

    जम्मू-कश्मीर में धमकियों पर फारूक का बड़ा बयान बोले राज्य का दर्जा रोकने की साजिश


    नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को कथित तौर पर मिल रही धमकियों को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इन धमकियों को लेकर उपराज्यपाल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि घाटी में कश्मीरी पंडितों को डराने का काम कराया जा रहा है ताकि जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा देने की प्रक्रिया को टाला जा सके। उनके इस बयान के बाद भाजपा और कश्मीरी पंडित समुदाय की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है।

    अनंतनाग में पत्रकारों से बातचीत के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों को मिल रही धमकियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि घाटी में अब कश्मीरी पंडितों की संख्या बेहद कम है। उन्होंने तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर में कई बड़े प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी हिंदू समुदाय से हैं। ऐसे में अगर हिंदुओं को निशाना बनाकर धमकियां दी जा रही हैं तो इन वरिष्ठ अधिकारियों को इस तरह की धमकियां क्यों नहीं मिल रही हैं। इसी सवाल के आधार पर उन्होंने मौजूदा प्रशासन की भूमिका पर संदेह जताया।

    फारूक अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि इन धमकियों के पीछे उपराज्यपाल प्रशासन का हाथ हो सकता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी उपराज्यपाल प्रशासन के पास है इसलिए उसे यह बताना चाहिए कि धमकियां कहां से आ रही हैं और इनके पीछे कौन लोग हैं। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने कोई सार्वजनिक सबूत पेश नहीं किया। उनका बयान फिलहाल राजनीतिक आरोप के तौर पर सामने आया है।

    फारूक अब्दुल्ला ने इस पूरे विवाद को जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे से भी जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर पहले जो आश्वासन दिए गए थे उन्हें पूरा नहीं किया गया है। उनके मुताबिक पहले परिसीमन होगा फिर विधानसभा चुनाव होंगे और उसके बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की बात कही गई थी। लेकिन उनका आरोप है कि इस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।

    उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ हुई मुलाकात का भी जिक्र किया। फारूक के मुताबिक उनके सांसदों को भरोसा दिया गया था कि राज्य के दर्जे से जुड़ा फैसला जल्द लिया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि उस आश्वासन के बाद काफी समय बीत चुका है लेकिन अब तक स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं हुई है। इसी मुद्दे को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

    फारूक अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 और 35ए के मुद्दे पर भी अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने पहले भाजपा के साथ मिलकर इन प्रावधानों को हटाने में मदद की थी वही अब राज्य के दर्जे और अनुच्छेद 370 की बहाली की बात कर रहे हैं। उन्होंने इसे जनता को भ्रमित करने की कोशिश बताया।

    वहीं भाजपा ने फारूक अब्दुल्ला के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी प्रवक्ता अंकुर शर्मा ने उनके बयान को चौंकाने वाला बताते हुए आरोप लगाया कि वह कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और उनके दर्द को नकारने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा का कहना है कि कश्मीरी पंडितों से जुड़े मुद्दे को राजनीतिक साजिश के रूप में पेश करने के बजाय उनकी सुरक्षा और सम्मान पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और राज्य के दर्जे के सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। एक ओर फारूक अब्दुल्ला प्रशासन पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा उनके बयान को कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रति असंवेदनशील बता रही है। अब इस विवाद में प्रशासन की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।

  • प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीरी पंडित समुदाय के पर्व ‘हेराथ पोश्ते’ पर दी शुभकामनाएं

    प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीरी पंडित समुदाय के पर्व ‘हेराथ पोश्ते’ पर दी शुभकामनाएं


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीरी पंडित समुदाय के समृद्ध परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाने वाले पवित्र त्योहार हेराथ पोश्ते के अवसर पर शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने सभी समुदाय के सदस्यों के जीवन में स्वास्थ्य, खुशहाली और समृद्धि की कामना की।प्रधानमंत्री मोदी ने संदेश में कहा, इस पवित्र अवसर पर, मैं सभी के जीवन में स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करता हूं। यह नए सफलता के मार्ग खोले और हर घर को खुशियों और संतोष से भर दे। उन्होंने इस त्योहार के महत्व पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कश्मीरी पंडित समुदाय की समृद्ध परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

    हेराथ पोश्ते का पर्व कश्मीरी पंडित समुदाय में धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। यह उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक प्रथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है। इस अवसर पर परिवार और समुदाय के लोग मिलकर पूजा-अर्चना और उत्सव आयोजित करते हैं, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन मजबूत होते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के संदेश ने इस पर्व के अवसर पर समुदाय में उत्साह और आनंद की भावना बढ़ा दी है। उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की कि यह पर्व सभी के लिए खुशियों और सफलता का संदेश लेकर आए। उनके संदेश ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं का सम्मान सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

    हेराथ पोश्ते के अवसर पर कश्मीरी पंडित समुदाय देशभर में अपने घरों और मंदिरों में पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार आयोजन करता है। इस पर्व के माध्यम से युवा पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शुभकामना संदेश के माध्यम से समाज में भाईचारे और सामूहिक कल्याण की भावना को भी उजागर किया। उनके संदेश ने न केवल कश्मीरी पंडित समुदाय, बल्कि पूरे देश में सांस्कृतिक और धार्मिक सौहार्द्र की भावना को बल दिया।