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  • Health Alert: अगर बार बार सूज रहे हैं पैर तो हो जाएं सतर्क शरीर दे रहा है गंभीर बीमारी का संकेत

    Health Alert: अगर बार बार सूज रहे हैं पैर तो हो जाएं सतर्क शरीर दे रहा है गंभीर बीमारी का संकेत


    नई दिल्ली । पैरों में सूजन आना एक ऐसी समस्या है जिसे अधिकतर लोग थकान लंबे समय तक खड़े रहने या अधिक चलने का परिणाम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि यदि यह परेशानी बार बार हो रही है या कई दिनों तक बनी रहती है तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पैरों में लगातार रहने वाली सूजन शरीर के अंदर चल रही किसी गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत भी हो सकती है। इसलिए केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय समय रहते डॉक्टर से जांच कराना बेहद जरूरी है।

    पैरों में सूजन तब होती है जब शरीर के ऊतकों में जरूरत से ज्यादा तरल पदार्थ जमा होने लगता है। इसे चिकित्सकीय भाषा में एडिमा कहा जाता है। कई बार यह समस्या लंबे समय तक बैठे रहने यात्रा करने या अधिक नमक खाने के कारण भी हो सकती है लेकिन यदि सूजन रोजाना होने लगे दर्द के साथ हो या केवल एक पैर में दिखाई दे तो यह चिंता का विषय बन सकता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि हृदय की कार्यक्षमता कमजोर होने पर शरीर में रक्त का संचार प्रभावित होता है जिससे पैरों और टखनों में सूजन दिखाई देने लगती है। इसी तरह किडनी की कार्यप्रणाली प्रभावित होने पर शरीर अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर नहीं निकाल पाता जिससे सूजन बढ़ सकती है। लीवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों में भी शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है और पैरों में सूजन दिखाई देने लगती है।

    इसके अलावा नसों की कमजोरी वैरिकोज वेन्स लिम्फ संबंधी समस्याएं थायरॉयड की गड़बड़ी मोटापा मधुमेह और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी पैरों में सूजन का कारण बन सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान भी कई महिलाओं में पैरों में सूजन देखी जाती है लेकिन यदि इसके साथ सिरदर्द धुंधला दिखना या रक्तचाप बढ़ा हुआ हो तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी होता है।

    अगर सूजन के साथ सांस लेने में तकलीफ सीने में दर्द तेज बुखार त्वचा का रंग बदलना या अचानक वजन बढ़ने जैसी समस्याएं भी महसूस हों तो इसे बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं और तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

    पैरों की सूजन से बचाव के लिए नियमित व्यायाम करना पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और नमक का सीमित सेवन करना लाभदायक माना जाता है। लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने या खड़े रहने से बचें और बीच बीच में पैरों को हिलाते रहें। आराम करते समय पैरों को हल्का ऊंचा रखकर लेटना भी सूजन कम करने में मदद कर सकता है। यदि डॉक्टर ने किसी विशेष बीमारी का इलाज बताया है तो दवाओं का नियमित सेवन और समय समय पर जांच कराना भी जरूरी है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर अक्सर छोटी छोटी समस्याओं के जरिए बड़ी बीमारियों का संकेत देता है। इसलिए यदि पैरों की सूजन बार बार हो रही है या लंबे समय तक बनी रहती है तो स्वयं इलाज करने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लेकर आवश्यक जांच कराना सबसे सुरक्षित कदम है। समय पर पहचान और सही उपचार गंभीर जटिलताओं से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • शिमला मिर्च से बढ़ता है पोटैशियम? डायलिसिस मरीजों को क्यों रखनी चाहिए सावधानी

    शिमला मिर्च से बढ़ता है पोटैशियम? डायलिसिस मरीजों को क्यों रखनी चाहिए सावधानी


    नई दिल्ली । किडनी की बीमारी या डायलिसिस की स्थिति में खानपान पर विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी होता है। जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर से कई जरूरी मिनरल्स और अपशिष्ट पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण तत्व पोटैशियम है, जिसका संतुलन बिगड़ने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

    मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में पोटैशियम का बढ़ना हाइपरकलेमिया कहलाता है, जो दिल की धड़कन को प्रभावित कर सकता है और गंभीर मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसी वजह से डायलिसिस मरीजों को हमेशा लो-पोटैशियम डाइट लेने की सलाह दी जाती है।

    शिमला मिर्च को आमतौर पर एक हल्की और सुरक्षित सब्जी माना जाता है। पोषण संबंधी आंकड़ों के अनुसार, 100 ग्राम कच्ची हरी शिमला मिर्च में लगभग 170 से 180 मिलीग्राम पोटैशियम पाया जाता है। लाल और पीली शिमला मिर्च में यह मात्रा थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे अन्य कई सब्जियों और फलों की तुलना में कम पोटैशियम वाला भोजन माना जाता है।

    इसके अलावा शिमला मिर्च में विटामिन C, विटामिन A और एंटीऑक्सीडेंट्स भी पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि डायलिसिस मरीज इसे पूरी तरह बंद करने की बजाय सीमित मात्रा में सेवन कर सकते हैं। इसे मुख्य भोजन का बड़ा हिस्सा नहीं बनाना चाहिए और अन्य हाई-पोटैशियम फूड जैसे टमाटर या आलू के साथ मिलाकर अधिक मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए।

    हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए किसी भी आहार को अपनाने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।

  • कम उम्र में बढ़ रहा किडनी रोग का खतरा खराब लाइफस्टाइल और अनकंट्रोल शुगर जिम्मेदार

    कम उम्र में बढ़ रहा किडनी रोग का खतरा खराब लाइफस्टाइल और अनकंट्रोल शुगर जिम्मेदार


    नई दिल्ली:आज के समय में खराब लाइफस्टाइल और असंतुलित खानपान के कारण कई गंभीर बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें किडनी की बीमारियां सबसे चिंताजनक मानी जा रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार किडनी से जुड़ी कई बीमारियां शरीर में बिना किसी स्पष्ट संकेत के धीरे धीरे विकसित होती रहती हैं। यही वजह है कि इन्हें साइलेंट किलर भी कहा जाता है। जब तक इसके लक्षण सामने आते हैं तब तक कई बार बीमारी काफी गंभीर स्थिति में पहुंच चुकी होती है।

    देश में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और ये दोनों ही समस्याएं किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कारण मानी जाती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक शुगर या ब्लड प्रेशर की समस्या रहती है तो उसे नियमित रूप से किडनी की जांच करानी चाहिए। समय पर जांच से बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है और गंभीर स्थिति से बचाव संभव हो सकता है।

    नोएडा एक्सटेंशन स्थित यथार्थ हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर उपेंद्र सिंह के अनुसार पिछले दो से तीन वर्षों में किडनी से जुड़ी समस्याओं के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब 30 से 45 वर्ष की आयु के लोगों में भी किडनी की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। इसके पीछे सेडेंटरी लाइफस्टाइल अत्यधिक तनाव शरीर में पानी की कमी और प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

    डॉक्टरों के मुताबिक क्रॉनिक किडनी डिजीज और किडनी स्टोन के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। क्रॉनिक किडनी डिजीज एक ऐसी बीमारी है जो बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे धीरे शरीर को प्रभावित करती है। कई मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं जब यह बीमारी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है और किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो जाती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर आज भी किडनी रोग के सबसे बड़े जोखिम कारक हैं। अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीजों में इन दोनों में से एक या दोनों समस्याएं मौजूद होती हैं। इसके अलावा दर्द निवारक दवाओं का अधिक उपयोग बिना डॉक्टर की सलाह के जिम सप्लीमेंट या स्टेरॉयड लेना शरीर में पानी की कमी और खराब जीवनशैली भी किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कारण बन रहे हैं।

    कई मामलों में बीमारी की देर से पहचान होने के कारण मरीजों को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ जाती है जिससे परिवारों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ जाता है। हालांकि समय रहते सावधानी बरती जाए तो किडनी की बीमारियों से काफी हद तक बचाव संभव है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पैरों या चेहरे पर सूजन दिखाई दे पेशाब में झाग आए पेशाब की मात्रा या रंग में बदलाव महसूस हो या लगातार थकान और भूख में कमी महसूस हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा उल्टी आना जी मिचलाना या अचानक ब्लड प्रेशर का बढ़ जाना भी किडनी से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट क्रिएटिनिन टेस्ट और यूरिन टेस्ट करवाते रहना चाहिए। इसके साथ ही रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पीना नमक का सेवन सीमित करना धूम्रपान से दूर रहना और वजन को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। संतुलित आहार और नियमित व्यायाम से किडनी को स्वस्थ रखा जा सकता है और किडनी फेलियर जैसी गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।