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  • किशोर कुमार के बेटे से लेकर अपनी अलग पहचान तक, अमित कुमार ने सुरों से रचा सुनहरा इतिहास; जन्मदिन पर खास कहानी

    किशोर कुमार के बेटे से लेकर अपनी अलग पहचान तक, अमित कुमार ने सुरों से रचा सुनहरा इतिहास; जन्मदिन पर खास कहानी

    नई दिल्ली । हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में अमित कुमार का नाम उन चुनिंदा गायकों में लिया जाता है, जिन्होंने पारिवारिक विरासत से आगे बढ़कर अपनी अलग पहचान बनाई। अपनी मधुर आवाज, सहज गायकी और भावपूर्ण प्रस्तुति के दम पर उन्होंने 1980 के दशक में एक ऐसी जगह बनाई, जो आज भी संगीत प्रेमियों के बीच विशेष महत्व रखती है। 3 जुलाई 1952 को कोलकाता में जन्मे अमित कुमार का जीवन संगीत, अभिनय और रचनात्मकता से भरपूर रहा।

    अमित कुमार के पिता महान गायक और अभिनेता किशोर कुमार तथा मां प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका रूमा गुहा ठाकुरता थीं। ऐसे संगीतपूर्ण वातावरण में पले-बढ़े अमित का रुझान बचपन से ही गायन और अभिनय की ओर था। कोलकाता में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुति को काफी सराहना मिली और उनकी प्रतिभा धीरे-धीरे फिल्म जगत का ध्यान आकर्षित करने लगी।

    फिल्मी दुनिया में उनका शुरुआती सफर अभिनय से शुरू हुआ। कम उम्र में उन्होंने अपने पिता के निर्देशन वाली फिल्म में अभिनय किया और इसके बाद बाल कलाकार के रूप में अपना पहला गीत भी रिकॉर्ड किया। हालांकि पार्श्वगायक के रूप में पहचान बनाने का सफर आसान नहीं था। शुरुआती वर्षों में उन्होंने लगातार अभ्यास किया और अपनी गायकी को निखारने पर पूरा ध्यान दिया।

    उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें संगीतकार आरडी बर्मन के सामने अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। उस समय वह बेहद घबराए हुए थे, लेकिन उनकी प्रस्तुति ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। यही अवसर आगे चलकर उनके संगीत सफर की मजबूत नींव बना और उन्हें बड़े संगीतकारों के साथ काम करने का अवसर मिला।

    साल 1981 में एक लोकप्रिय फिल्म के गीत ने उन्हें देशभर में नई पहचान दिलाई। इसके बाद उनकी आवाज कई युवा अभिनेताओं की पहचान बन गई। रोमांटिक, भावनात्मक और ऊर्जावान गीतों में उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब पसंद किया। 1980 के दशक में उन्होंने एक से बढ़कर एक सुपरहिट गीत गाकर खुद को उस दौर के सबसे लोकप्रिय पार्श्वगायकों में स्थापित कर लिया।

    उनके करियर का एक ऐतिहासिक क्षण वह भी रहा जब प्रतिष्ठित पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक की दौड़ में उनका मुकाबला अपने ही पिता किशोर कुमार से हुआ। पुरस्कार मिलने के बाद पिता और पुत्र का वह भावनात्मक पल भारतीय फिल्म संगीत के सबसे यादगार क्षणों में गिना जाता है। यह उपलब्धि अमित कुमार के स्वतंत्र और सफल करियर की बड़ी पहचान बन गई।

    पिता किशोर कुमार के निधन के बाद उन्होंने उनकी अधूरी फिल्म को पूरा करने की जिम्मेदारी निभाई। बाद में अपने मार्गदर्शक आरडी बर्मन के निधन के पश्चात उन्होंने धीरे-धीरे पार्श्वगायन से दूरी बनाई और स्वतंत्र संगीत, लाइव कॉन्सर्ट तथा अपने संगीत प्रोजेक्ट्स पर ध्यान केंद्रित किया। आज भी अमित कुमार की आवाज और उनके गीत भारतीय फिल्म संगीत की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनका सफर यह साबित करता है कि विरासत प्रेरणा दे सकती है, लेकिन स्थायी पहचान केवल प्रतिभा, मेहनत और समर्पण से ही बनती है।

  • रिकॉर्डिंग से पहले ही ठुकरा दी गई थी आवाज, आशा भोसले ने साझा किया किशोर कुमार के संघर्ष और सफलता का अनसुना किस्सा

    रिकॉर्डिंग से पहले ही ठुकरा दी गई थी आवाज, आशा भोसले ने साझा किया किशोर कुमार के संघर्ष और सफलता का अनसुना किस्सा


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में किशोर कुमार और आशा भोसले की जोड़ी को सबसे सफल और लोकप्रिय गायकों में गिना जाता है। दोनों ने अपने लंबे करियर में अनगिनत सुपरहिट गीत दिए, लेकिन सफलता की इस ऊंचाई तक पहुंचने से पहले उन्हें कई कठिन दौर से भी गुजरना पड़ा। हाल ही में आशा भोसले ने अपने शुरुआती संघर्ष का एक ऐसा संस्मरण साझा किया, जिसने उस दौर के संगीत जगत की चुनौतियों और कलाकारों के संघर्ष को फिर से चर्चा में ला दिया।

    आशा भोसले ने बताया कि अपने करियर के शुरुआती दिनों में वह और किशोर कुमार एक गीत की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो पहुंचे थे। उस समय रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया बेहद कठिन होती थी और कलाकारों को एक ही टेक में बेहतरीन प्रदर्शन करना पड़ता था। जैसे ही दोनों ने गीत गाना शुरू किया, वहां मौजूद रिकॉर्डिस्ट ने उनकी आवाज पर आपत्ति जताते हुए कहा कि उनकी आवाज इस गीत के लिए उपयुक्त नहीं है और किसी दूसरे गायक को बुलाया जाना चाहिए। यह टिप्पणी दोनों के लिए बेहद निराशाजनक थी।

    उन्होंने बताया कि इस प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने किसी तरह का विवाद नहीं किया और शांतिपूर्वक स्टूडियो से बाहर निकल आए। लंबे समय तक रिकॉर्डिंग की तैयारी में व्यस्त रहने के कारण दोनों काफी भूखे थे। इसके बाद वे पास के रेलवे स्टेशन पहुंचे, जहां बैठकर भोजन किया और चाय पी। आशा भोसले के अनुसार, उन्होंने इस घटना को सहजता से लिया, लेकिन किशोर कुमार इस व्यवहार से काफी आहत और नाराज थे। इसके बावजूद दोनों ने अपने संघर्ष को अपनी मेहनत पर हावी नहीं होने दिया।

    समय बीतने के साथ दोनों कलाकारों ने अपनी प्रतिभा और निरंतर अभ्यास के दम पर संगीत जगत में ऐसी पहचान बनाई, जिसे आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है। वर्षों बाद एक अन्य रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी मुलाकात उसी रिकॉर्डिस्ट से हुई, जिसने कभी उनकी आवाज को अस्वीकार कर दिया था। आशा भोसले ने बताया कि उसे देखते ही किशोर कुमार को पुरानी घटना याद आ गई और उन्होंने उससे बात करने की इच्छा जताई। हालांकि उन्होंने किशोर कुमार को समझाया कि बीती बातों को लेकर किसी के सम्मान या आजीविका पर असर नहीं पड़ना चाहिए। उनके समझाने के बाद माहौल सामान्य हो गया।

    बातचीत के दौरान आशा भोसले ने किशोर कुमार के साथ अपने आत्मीय रिश्ते का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में दोनों अक्सर साथ रिकॉर्डिंग करते थे और किशोर कुमार अपने चंचल स्वभाव के कारण माहौल को हल्का बनाए रखते थे। वे मजाक-मस्ती करते हुए उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते थे, जिससे रिकॉर्डिंग का तनाव भी कम हो जाता था। यही सहजता और आपसी समझ बाद में उनके गीतों की खूबसूरत केमिस्ट्री में भी दिखाई दी।

    आशा भोसले ने यह भी कहा कि किशोर कुमार बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे। वह केवल गायक ही नहीं, बल्कि अभिनेता, संगीतकार, निर्माता, लेखक और फिल्मकार के रूप में भी अपनी अलग पहचान रखते थे। उन्होंने बताया कि वह उनके पहनावे और व्यवहार से ही उनके मूड का अंदाजा लगा लेती थीं। अच्छे मूड में होने पर वह पूरे उत्साह के साथ बातचीत करते थे, जबकि शांत रहने के दिनों में वह उन्हें अधिक परेशान नहीं करती थीं। दोनों के बीच हमेशा भाई-बहन जैसा स्नेहपूर्ण रिश्ता बना रहा।

    यह संस्मरण इस बात का उदाहरण है कि किसी भी कलाकार की शुरुआती असफलताएं उसकी अंतिम पहचान तय नहीं करतीं। प्रतिभा, धैर्य और लगातार मेहनत के बल पर किशोर कुमार और आशा भोसले ने न केवल चुनौतियों को पीछे छोड़ा, बल्कि भारतीय संगीत जगत में ऐसी अमिट पहचान बनाई, जिसे आने वाली पीढ़ियां भी सम्मान के साथ याद करती रहेंगी।

  • शूटिंग के दौरान किशोर कुमार को पड़ा असली जोरदार मुक्का, 'विलेन' प्राण को आखिर क्यों उठाना पड़ा यह कदम?

    शूटिंग के दौरान किशोर कुमार को पड़ा असली जोरदार मुक्का, 'विलेन' प्राण को आखिर क्यों उठाना पड़ा यह कदम?


    नई दिल्ली:  भारतीय सिनेमा के इतिहास में किशोर कुमार एक ऐसे कलाकार रहे हैं, जिनकी ऊर्जा और मजाकिया अंदाज का कोई मुकाबला नहीं था। लेकिन कभी-कभी उनकी यही ‘मस्ती’ उनके साथी कलाकारों के लिए सिरदर्द बन जाया करती थी। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा बॉलीवुड के मशहूर विलेन प्राण ने साझा किया था, जो फिल्म ‘पहली झलक’ की शूटिंग से जुड़ा है। प्राण और किशोर कुमार की जोड़ी ने ‘हाफ टिकट’ और ‘आशा’ जैसी कई यादगार फिल्मों में साथ काम किया, लेकिन ‘पहली झलक’ के सेट पर कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना खुद किशोर दा ने भी नहीं की होगी। वाकया एक फाइट सीन का था, जहाँ प्राण को किशोर कुमार के पेट में मुक्का मारना था, लेकिन किशोर कुमार की खिलंदड़ फितरत के चलते यह सीन पूरा होना नामुमकिन लग रहा था।

    प्राण साहब ने एक पुराने इंटरव्यू में इस घटना को याद करते हुए बताया था कि किशोर कुमार के साथ सीरियस सीन शूट करना किसी चुनौती से कम नहीं था। उस दिन फाइट सीन के दौरान जैसे ही प्राण उनके करीब जाकर फिल्मी मुक्का मारते, किशोर कुमार दर्द का नाटक करने के बजाय जोर-जोर से हंसने लगते थे। एक के बाद एक लगभग 12 से 14 रीटेक हो चुके थे, लेकिन किशोर कुमार गंभीर होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। पूरी यूनिट परेशान थी और वक्त निकलता जा रहा था। आखिरकार, प्राण ने एक कड़ा फैसला लिया। अगले शॉट में जैसे ही कैमरा रोल हुआ, प्राण ने हवा में हाथ चलाने के बजाय सचमुच का एक जोरदार मुक्का किशोर कुमार के पेट में जड़ दिया। असली चोट लगते ही किशोर कुमार के मुंह से चीख निकल पड़ी और वे दर्द से दोहरे हो गए। प्राण ने तुरंत कहा, “बस, यही रिएक्शन तो हमें फिल्म के लिए चाहिए था!”

    इस वाकये के बाद सीन तो परफेक्ट शूट हो गया, लेकिन किशोर कुमार की हालत कुछ देर के लिए खराब हो गई थी। प्राण ने मजाकिया लहजे में यह भी स्वीकार किया कि किशोर कुमार का व्यक्तित्व इतना संक्रामक था कि उनके साथ काम करते-करते एक गंभीर विलेन की छवि वाला इंसान भी उनकी तरह ही बन जाता था। प्राण ने कहा कि अगर वे एक-दो फिल्में और किशोर दा के साथ कर लेते, तो शायद वे भी उनके ‘क्लोन’ बन जाते और अपनी गंभीरता खो देते। यह किस्सा आज भी बॉलीवुड के गलियारों में बड़े चाव से सुनाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि उस दौर के कलाकारों के बीच कितनी गहरी समझ और काम के प्रति कितना अनूठा समर्पण हुआ करता था। किशोर कुमार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ये शरारतें और प्राण साहब जैसे दिग्गजों के साथ उनके ये किस्से आज भी प्रशंसकों के चेहरों पर मुस्कान ले आते हैं।